संघ पर आरोप लगाने से पहले राहुल इतिहास पढ़ लेते तो ठीक रहता

  •  डॉ. मोहनलाल गुप्ता
  •  अगस्त 26, 2017   11:50
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संघ पर आरोप लगाने से पहले राहुल इतिहास पढ़ लेते तो ठीक रहता

मेरा दागिस्तान की भूमिका में, कज्जाक लेखक रसूल हमजातोव ने अबू तालिब का एक कोटेशन लिखा है- यदि तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा।

मेरा दागिस्तान की भूमिका में, कज्जाक लेखक रसूल हमजातोव ने अबू तालिब का एक कोटेशन लिखा है- यदि तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा। यह एक साहित्यकार द्वारा जीवन के अनुभव के आधार पर लिखा गया दार्शनिक सत्य है। मेरा विश्वास है कि कांग्रेसी मित्र इसमें किसी हिंसा के दर्शन नहीं करेंगे। आजकल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार इतिहास पर गोलियां दाग रहे हैं। उन्होंने कहा है कि आरएसएस ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ा। उन्होंने कहा है कि आरएसएस ने हमेशा अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि आरएसएस हर स्थान पर अपने आदमियों को बैठा रही है। उन्होंने कहा है कि आरएसएस-बीजेपी मिलकर भारत के संविधान को बदलना चाहते हैं। उन्होंने वीर सावरकर का नाम लिए बिना उन पर भी कीचड़ उछाला है। 

राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर सिलसिलेवार बात होनी चाहिए। आरएसएस का जन्म 1925 में हुआ। उस समय बाल गंगाधर तिलक के निधन को पांच साल हो चुके थे और कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह गांधीजी और उनके साथियों के हाथों में था। उस समय जलियांवाला बाग में 484 लोगों को शहीद हुए 6 साल हो चुके थे और कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसा का राग अलाप रही थी। कांग्रेस की पिलपिली नीतियों के कारण बंगाल और पंजाब में क्रांतिकारियों का आक्रोश अपने चरम पर पहुंच रहा था और वे भारत को स्वतंत्र कराने के लिए मरने-मारने पर आमादा थे।

उन दिनों मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को लेकर सड़कों पर हिन्दुओं का खून बहाने की तैयारियां जोर-शोर से कर रही थी। लीग की अपनी एक निजी सेना थी जिसमें लड़ने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। हथियार एकत्र किये जा रहे थे और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को लीग की सेना में भर्ती किया जा रहा था। उसके दो संगठन बनाये गये, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। नेशनल गार्ड मुस्लिम लीग का गुप्त संगठन था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और दंगों के समय लाठी, भाले और चाकू के इस्तेमाल के निर्देश दिये जाते थे। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को ‘‘सालार’’ कहा जाता था।

ऐसी विचित्र परिस्थितियों में हिन्दु समाज की रक्षा के लिए आरएसएस का जन्म हुआ। खाकी नेकर पहनने वाले ये लोग हाथ में लाठी लेकर व्यायाम आदि करने के लिए एकत्रित होते थे और हिन्दू धर्म रूपी रत्न की मंजूषा की सुरक्षा के लिए अलख जगाने को तत्पर थे। आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगवार का उद्देश्य आरएसएस के रूप में राजनीतिक संगठन खड़ा करना नहीं था, क्योंकि ऐसा करने से आरएसएस के रूप में कांग्रेस के समानांतर हिन्दुओं का अलग राजनीतिक संगठन खड़ा हो जाता और इससे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में फूट जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती। 1925 से 1940 तक डॉ. हेडगवार और 1940 से 1973 तक माधव सदाशिव गोलवलकर आरएसएस के माध्यम से हिन्दू समाज के सांस्कृतिक उत्थान के लिए कार्य करते रहे। यह कार्य आज भी जारी है। यही कारण था कि हेडगवार सहित आरएसएस के हजारों स्वयं सेवक व्यक्तिगत रूप से देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुए।

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो आरएसएस के स्वयं सेवक हिन्दू जनता को मुस्लिम आक्रमणों से बचाने के लिए देश की सीमाओं पर जाकर खड़े हो गए। इस कारण हजारों निरीह हिन्दुओं के प्राण बचाए जा सके। काश्मीर रियासत का भारत में विलय करवाने में आरएसएस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सरदार पटेल के कहने पर गुरु गोलवलकर ने हरिसिंह को भारत में सम्मिलन के लिए तैयार किया। आगे चलकर जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने देश पर आई विपत्तियों में आरएसएस की सेवाएं लीं।

1962 के भारत-चीन युद्ध में आरएसएस ने देश की सेना के साथ-कंधे से कंधा मिलाया। सैनिक मार्गों के रक्षण का कार्य आरएसएस को सौंपा गया। सेना को रसद उपलब्ध कराने तथा शहीदों के परिवारों को संभालने में आरएसएस की प्रमुख भूमिका रही। इस योगदान के परिणाम स्वरूप जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस को 1963 की दिल्ली की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। 1962 के चीन युद्ध में हालात ऐसे थे कि कम्यूनिस्ट पार्टियां भारत की हार और चीन की जीत का स्वप्न देख रही थीं और चीनी सेनाओं के लिए विजय मालाएं हाथ में लिए बैठी थीं। नेहरू के निमंत्रण पर आरएसएस के 3500 मजबूत स्वयं सेवकों ने परेड में भाग लेकर देश की नागरिक इच्छा शक्ति का अनूठा प्रदर्शन किया। उस परेड के चित्र आज भी उपलब्ध हैं।

1965 के भारत-पाक युद्ध के समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेना को युद्ध सामग्री उपलब्ध कराने में आरएसएस से सेवाएं प्राप्त कीं। शास्त्रीजी ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था एवं कानून व्यवस्था आरएसएस के हाथों में सौंप दी। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इंदिरा गांधी के समय आरएसएस देश का पहला और एक मात्र सबसे बड़ा संगठन था जिसने घायल सैनिकों के लिए रक्तदान शिविरों का आयोजन किया तथा घायल सैनिकों को रक्त की कोई कमी नहीं होने दी। गोलवलकर जी के निधन पर, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जिन भाव-भीने शब्दों में उन्हें श्रद्धांजलि दी थी, उन शब्दों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

राहुल गांधी ने बीजेपी और आरएसएस पर संविधान बदलने की मंशा रखने का आरोप लगाया है। यह तो राहुल गांधी ही जानें कि ऐसा वे क्यों कह रहे हैं किंतु क्या जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश का संविधान नहीं बदला। इंदिरा गांधी ने तो संविधान से राजा राम, सीता और हिन्दू देवी देवताओं के चित्र हटा दिए। राजीव गांधी ने शाहबानो केस में संविधान में संशोधन कर दिया। तो क्या नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रबल बहुमत से चुनी हुई सरकार को संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं ?

वीर सावरकर को लेकर राहुल गांधी ने जो कुछ कहा है, उसके सम्बन्ध में केवल इतना कहना पर्याप्त होगा कि दो-दो काले पानी की सजा भुगतने वाला तथा अपने सम्पूर्ण परिवार को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए बलि चढ़ाने वाला देश का यह स्वतंत्रता सेनानी अपनी तरह का पूरे विश्व इतिहास में अकेला उदाहरण है। वीर सावरकर के लिए कहा जाता है कि गांधीजी ने उतना चरखा नहीं चलाया होगा जितना वीर सावरकर ने अण्डमान की जेल में कोल्हू चलाया। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के झूठ बोलने से देश और आरएसएस का इतिहास नहीं बदल जाएगा।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक हैं।)







भारत में निवेश के माहौल को और बेहतर बनाने के लिए बजट में इन बातों का रखना होगा ध्यान

  •  प्रह्लाद सबनानी
  •  जनवरी 28, 2021   14:20
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भारत में निवेश के माहौल को और बेहतर बनाने के लिए बजट में इन बातों का रखना होगा ध्यान

शीघ्र ही वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए केंद्र सरकार द्वारा बजट प्रस्तुत किया जाने वाला है और ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उक्त वर्णित मुद्दों का समाधान इस बजट में निकाला जाएगा एवं इस सम्बंध में कई नई नीतियों की घोषणा की जाएगी।

कोरोना महामारी के बाद देश की विकास दर में तेज़ी लाना अब केंद्र सरकार के सामने एक मुख्य चुनौती है। विकास दर में तेज़ी लाने के लिए उत्पादों को मांग बढ़ानी होगी जिसके लिए अंततः निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र में घरेलू एवं विदेशी निवेश को बढ़ाना होगा। देश में निवेश को आकर्षित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा हालांकि कई क़दम उठाए गए हैं, जिसके चलते भारत की “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में काफ़ी सुधार दृष्टिगोचर हुआ है एवं यह वर्ष 2014 की 142 की रैंकिंग से बहुत आगे बढ़कर 2019 में 63वें स्थान पर आ गई है। 10 मदों में से मुख्यतः 5 मदों- यथा, पूंजी बाज़ार में निवेशकों के हित सुरक्षित रखने (13), बिजली के लिए मंज़ूरी लेने (22), ऋण स्वीकृत करने (25), निर्माण कार्य हेतु मंज़ूरी प्राप्त करने (27) एवं दिवालियापन के मुद्दों को सुलझाने (52) में भारत की रैंकिंग में काफ़ी सुधार होकर हम वैश्विक स्तर पर प्रथम 50 देशों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। परंतु शेष अन्य 5 मदों- यथा अनुबंध पत्रों को लागू करने (163), प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री करने (154), नया व्यवसाय प्रारम्भ करने (136), टैक्स सम्बंधी मुद्दे सुलझाने (115) एवं विदेशी व्यापार करने (68) में अभी भी हम वैश्विक स्तर पर अन्य देशों से काफ़ी पिछड़े हुए हैं। मदों के नाम के आगे भारत की वर्ष 2019 की रैंकिंग दी गई है। अभी भी यदि भारत को विश्व के प्रथम 25 देशों में अपनी जगह बनानी है तो अब केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर कई आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करना होगा।

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केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों का अच्छा परिणाम अब दिखने लगा है एवं भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है। यह वर्ष 2016-17 में 4348 करोड़ अमेरिकी डॉलर, 2017-18 में 4486 करोड़ अमेरिकी डॉलर, 2018-19 में 4437 करोड़ अमेरिकी डॉलर, 2019-20 में 4998 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं 2020-21 में अप्रेल से सितम्बर 2020 तक 3000 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया है। 

देश में अब कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया है। विकास दर को पुनर्जीवित करने के लिए इस तरह के निर्णय लेना भी बहुत ज़रूरी है। पिछले वर्ष तकनीकी के क्षेत्र में बहुत बड़ी राशि का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। इस क्षेत्र में भारत ने बहुत अच्छा कार्य किया है। इसी रफ़्तार को बनाए रखना अब आवश्यक हो गया है। साथ ही, अब सप्लाई चैन एवं विनिर्माण के क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को आकर्षित करना होगा। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को लागू करने के साथ ही इन क्षेत्रों में भी विदेश निवेश के बढ़ने की संभावनायें अब प्रबल हो गई हैं। परंतु, भारत को नए नए उद्योग स्थापित करने हेतु किए जा रहे अनुबंध पत्रों को लागू कराने एवं टैक्स सम्बंधी मुद्दों का शीघ्र निपटारा करने के लिए भी अब नीतियों का निर्माण करना होगा ताकि विदेशी निवेशकों को भारत में व्यापार करने में आसानी हो एवं इस ओर उनका विश्वास उत्पन्न हो सके।

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साथ ही, देश में नया व्यवसाय स्थापित करने सम्बंधी नियमों को भी आसान बनाना अब ज़रूरी हो गया है। नया व्यवसाय प्रारम्भ करने सम्बंधी रैंकिंग में भारत का विश्व में 136वां स्थान है, जबकि चीन का 27वां स्थान है। इसी कारण चीन विनिर्माण के क्षेत्र में पूरे विश्व के लिए एक पावर हाउस बन गया है। चीन में नया व्यापार स्थापित करना बहुत ही आसान है। भारत को भी इस क्षेत्र में सोचना होगा। नया व्यापार प्रारम्भ करने के लिए ज़मीन की ज़रूरत होती है, बिजली की ज़रूरत होती है, इस प्रकार के क्षेत्र हमारे देश में राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते है। अतः इन क्षेत्रों में सुधार कार्यक्रम लागू करने के लिए राज्य सरकारों को निर्णय लेने होंगे एवं इस सम्बंध में नियमों को आसान बनाना होगा। उत्तर प्रदेश की सरकार ने ज़मीन एवं बिजली को आसानी से उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लैंड बैंक की स्थापना आदि जैसे कुछ अच्छे निर्णय लिए हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश में वहां की सरकार द्वारा कुछ जिले चिन्हित किए गए हैं जहां पर केवल एक ही तरह के उद्योग स्थापित किए जा सकेंगे। जैसे आगरा में फुटवेयर उद्योग, अलीगढ़ में ताला उद्योग आदि। इस तरह की क्लस्टर नीति को लागू करने के कारण एक ही तरह के उद्योग एक ही जिले में स्थापित किए जा रहे हैं जिसके चलते इन उद्योगों को आने वाली समस्याओं का हल भी बहुत आसानी से कर लिया जाता है, क्योंकि सामान्यतः इन उद्योगों की समस्यायें अक्सर एक जैसी होती हैं।    

मानव शक्ति, भारत के लिए सबसे बड़ी ताक़त है। यदि भारत में उपभोग को प्रेरणा दें तो उत्पादों के लिए भारी मांग उत्पन्न की जा सकती है, जिसके कारण निजी क्षेत्र अपने आप इन क्षेत्रों में अपना निवेश बढ़ाएगा। भारत की अर्थव्यवस्था वैसे भी उपभोग आधारित ही है। देश में यदि उपभोग बढ़ता है तो निजी निवेश भी बढ़ेगा ही। 

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कोरोना महामारी के दौरान चीन के अन्य देशों के साथ हुए व्यवहार के चलते चीन से बहुत कम्पनियां अपनी विनिर्माण इकाईयों को भारत, वियतनाम आदि देशों में ले जा रही हैं। भारत सरकार ने इस अवसर को अच्छे तरीक़े से समझा है और इस क्षेत्र में काफ़ी काम भी किया है। परंतु, अब समय आ गया है कि भारत में भी टैक्स एवं सब्सिडी को विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप ढाला जाये क्योंकि विशेष रूप से विनिर्माण एवं निर्यात के क्षेत्र में अन्य देश भारत के खिलाफ शिकायतें करते रहते हैं। वियतनाम ने अपने देश में टैक्स एवं सब्सिडी को विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप ढाल लिया है जिसके कारण विदेशी कम्पनियां वियतनाम में अपनी विनिर्माण इकाईयों को स्थापित करने के लिए प्रेरित हो रही हैं एवं चीन से जो इकाईयां विस्थापित हो रही हैं उनमें से अधिकतर इकाईयां वियतनाम ही जा रही हैं। 

हमारे देश में लॉजिस्टिक लागत, ज़मीन की लागत और बिजली की लागत बहुत अधिक है। हमें प्रयास करने होंगे कि किस प्रकार इन लागतों को कम किया जाये जिससे विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सके। इन लागतों के कम होने से देश में उत्पादित किए जा रहे उत्पाद की कुल लागत भी कम होने लगेगी एवं हमारे देश में उत्पादित उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकेगा। 

भारत की अब फ़ार्मा, ऑटोमोबाइल, इनफ़ोरमेशन टेक्नोलोजी, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में विकसित देशों में गिनती होने लगी है। इसी कारण से देश में कोर सेक्टर्स में विदेशी निवेश लगातार बढ़ा है परंतु अब नए क्षेत्र भी तलाशने होंगे। जैसे- बाग़वानी, कृषि आधारित उद्योग, टूरिज़म, विनिर्माण, शिक्षा, आदि क्षेत्रों में भी विदेशी निवेश को आकर्षित करना होगा। इन सभी क्षेत्रों में निवेशक फ़्रेंड्ली नीतियों का निर्माण करना होगा। इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से रोज़गार के बहुत अधिक नए अवसर उत्पन्न होंगे। जेनेरिक दवाईयों का भारत से निर्यात 2000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो रहा है, जेनेरिक दवाईयों की क़ीमत नॉन-जेनेरिक दवाईयों की तुलना में लगभग 1/10वां हिस्सा ही रहती है अतः भारत से जेनेरिक दवाईयों का निर्यात दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। भारत के अस्पतालों में भी विशेष रूप से प्राइमरी हेल्थ सेंटर में भी यदि जेनेरिक दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाई जाती है तो आम जनता को इससे बहुत बड़ा लाभ होगा। भारत में स्वास्थ्य सम्बंधी टेक्नोलोजी में भी बहुत निवेश किया जा सकता है, क्योंकि देश में यूनिवर्सल हेल्थ केयर सिस्टम लागू किया जा रहा है।

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शीघ्र ही वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए केंद्र सरकार द्वारा बजट प्रस्तुत किया जाने वाला है और ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उक्त वर्णित मुद्दों का समाधान इस बजट में निकाला जाएगा एवं इस सम्बंध में कई नई नीतियों की घोषणा की जाएगी। 

-प्रह्लाद सबनानी

सेवानिवृत्त उप-महाप्रबंधक

भारतीय स्टेट बैंक







जेल से बाहर तो आ गयीं शशिकला, लेकिन क्या पूरा हो पायेगा वो अधूरा ख्वाब ?

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  जनवरी 27, 2021   14:37
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जेल से बाहर तो आ गयीं शशिकला, लेकिन क्या पूरा हो पायेगा वो अधूरा ख्वाब ?

शशिकला को जेल ऐसे समय पर हुई थी जब उन्हें जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक विधायक दल का नेता चुन लिया गया था और वह मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही वाली थीं कि अचानक उन्हें जेल जाना पड़ गया और तमिलनाडु पर राज करने का उनका ख्वाब अधूरा रह गया।

तमिलनाडु पर राज करने का ख्वाब वर्षों से संजोए शशिकला की रिहाई ठीक विधानसभा चुनावों से पहले होना तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर सकता है। हालांकि शशिकला का स्वास्थ्य अब उन्हें पहले की तरह सक्रियता के साथ राजनीतिक गतिविधियों की कितनी इजाजत देता है यह देखने वाली बात होगी लेकिन एम. करुणानिधि के रूप में बड़ा उदाहरण भी सामने है जिन्होंने व्हील चेयर पर बैठे-बैठे ही वर्षों तक तमिलनाडु पर शासन किया। चुनावों से पहले तमिलनाडु में वैसे भी कई नेता फिट नहीं हैं। रजनीकांत अस्वस्थ होकर अस्पताल पहुँचे और राजनीति में आने की बात से किनारा कर लिया। कमल हासन भी हाल ही में अस्वस्थ हो गये लेकिन विधानसभा चुनावों में पूरे दमखम से उतरने का उनका माद्दा बरकरार है। अब देखना होगा कि शशिकला का आगे का क्या रुख रहता है? वह अन्नाद्रमुक में वापस लौटती हैं या राज्य में तीसरे मोर्चे की अगुवाई करती हैं इस पर सबकी नजर बनी रहेगी। वैसे तमिलनाडु में अब तक तीसरा मोर्चा कुछ नहीं कर पाया है।

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शशिकला की रिहाई अस्पताल से

एआईएडीएमके से निष्कासित नेता वीके शशिकला को बुधवार को अधिकारियों ने औपचारिकताएं पूरी करने के बाद जेल से रिहा कर दिया। शशिकला कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद विक्टोरिया अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी रिहाई की प्रक्रिया अस्पताल से पूरी की गई। एक सप्ताह पहले उनमें संक्रमण की पुष्टि हुई थी। शशिकला के वकील ने उनकी रिहाई संबंधी खबर मीडिया को दी। हम आपको बता दें कि तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता की करीबी मित्र शशिकला आय से अधिक 66 करोड़ रुपए की संपत्ति मामले में फरवरी 2017 से बेंगलुरु की पारापन्ना अग्रहारा के केन्द्रीय कारागार में बंद थीं। अस्पताल के बाहर शशिकला के समर्थकों की भीड़ थी और वह अपनी नेता के पक्ष में नारे लगा रहे थे। समर्थकों ने इस दौरान मिठाइयां भी बांटी। समर्थकों को अब शशिकला की अस्पताल से छुट्टी का इंतजार है।


ऐन मौके पर हुई थी जेल

आपको याद दिला दें कि शशिकला को जेल ऐसे समय पर हुई थी जब उन्हें जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक विधायक दल का नेता चुन लिया गया था और वह मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही वाली थीं कि अचानक उन्हें जेल जाना पड़ गया और तमिलनाडु पर राज करने का उनका ख्वाब अधूरा रह गया। देखा जाये तो दिसंबर 2016 में जयललिता की मौत के बाद से ही शशिकला के लिए चुनौतीपूर्ण दिनों की शुरुआत हो गयी थी। एक समय पार्टी और सरकार को अपने इशारों पर चलाती रहीं शशिकला को वो दिन भी देखना पड़ा जब सरकार की कमान तो हाथ में आते-आते रह ही गयी साथ ही पार्टी से भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पनीरसेल्वम ने जब शशिकला के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने से मना कर दिया तो शशिकला ने पनीरसेल्वम को बाहर का रास्ता दिखाने के इरादे से विधायकों को रिजॉर्ट में बंद करवा दिया। बाद में शशिकला के समर्थन से ई. पलानीस्वामी मुख्यमंत्री बन गये लेकिन शशिकला को जेल होते ही ई. पलानीस्वामी ने पलटी मार ली और शशिकला का साथ छोड़ कर पनीरसेल्वम से हाथ मिला लिया और उन्हें अपनी कैबिनेट में शामिल कर लिया। धीरे-धीरे पलानीस्वामी ने ना सिर्फ सरकार पर बल्कि पार्टी पर भी अपना प्रभाव कायम कर लिया। यही नहीं शशिकला के जेल जाने के बाद उनके परिवार से जुड़े लोगों को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। बाद में शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन ने साल 2018 में अपनी नई पार्टी AMMK का गठन कर लिया और चुनाव लड़ कर विधानसभा भी पहुँच गये।

जयललिता की विरासत पर नया हंगामा

अब जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में जयललिता की विरासत पर अधिकार को लेकर एक बार फिर हंगामा मचने की उम्मीद है। बुधवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने मरीना में पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के स्मारक का अनावरण किया। इस स्मारक का डिजाइन पौराणिक अमर पक्षी ‘फीनिक्स’ की आकृति पर आधारित है। तीन साल पहले इस स्मारक की आधारशिला रखी थी। इस कार्यक्रम में पनीरसेल्वम और विधानसभा अध्यक्ष पी धनपाल भी मौजूद थे। तीनों ने बाद में पूर्व मुख्यमंत्री को उस स्थान पर श्रद्धांजलि भी दी, जहां उन्हें पांच दिसंबर, 2016 को दफनाया गया था। इस मौके पर पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम ने साष्टांग प्रणाम किया। स्मारक पर जयललिता की एक विशाल तस्वीर पर भी इन नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। इस कार्यक्रम में कई मंत्री, सांसद, विधायक और पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद थे। पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम ने मई, 2018 में संयुक्त तौर पर इस स्मारक की आधारशिला रखी थी।

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बहरहाल, शशिकला के भतीजे और निर्दलीय विधायक टीटीवी दिनाकरन को उम्मीद है कि अब तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर होगा। हालांकि अन्नाद्रमुक सरकार, विपक्षी द्रमुक तथा कांग्रेस को नहीं लगता कि शशिकला अब कोई राजनीतिक प्रभाव डाल पाएंगी। तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के.एस. अलागिरी ने यह दावा करते हुए कि शशिकला की जेल से रिहाई का राज्य की राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, एक शिगूफा यह भी छोड़ दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा, सत्ताधारी अन्नाद्रमुक पर शशिकला को पार्टी में लेने के लिए दबाव बना रही है। तो इंतजार कीजिये शशिकला के नये राजनीति दाँव का या फिर तमिलनाडु के नये राजनीतिक घटनाक्रम का।

-नीरज कुमार दुबे







आखिर 26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है भारत का गणतंत्र दिवस ?

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  जनवरी 26, 2021   12:38
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आखिर 26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है भारत का गणतंत्र दिवस ?

26 जनवरी 1950 को भारत के नए संविधान की स्थापना के बाद प्रतिवर्ष इसी तिथि को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा आरंभ हुई क्योंकि देश की आजादी के बाद सही मायनों में इसी दिन से भारत प्रभुत्व सम्पन्न प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बना था।

देश की स्वतंत्रता के इतिहास में 26 जनवरी का स्थान कितना महत्वपूर्ण रहा, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में 26 जनवरी को ही सदैव स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था लेकिन 15 अगस्त 1947 को देश के स्वतंत्र होने के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाए जाने के बजाय इसका इतिहास भारतीय संविधान से जुड़ गया और यह भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व बन गया।

26 जनवरी 1950 को भारत के नए संविधान की स्थापना के बाद प्रतिवर्ष इसी तिथि को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाए जाने की परम्परा आरंभ हुई क्योंकि देश की आजादी के बाद सही मायनों में इसी दिन से भारत प्रभुत्व सम्पन्न प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बना था। भारत का संविधान 26 जनवरी 1949 को अंगीकृत किया गया था और कुछ उपबंध तुरंत प्रभाव से लागू कर दिए गए थे लेकिन संविधान का मुख्य भाग 26 जनवरी 1950 को ही लागू किया गया, इसीलिए इस तारीख को संविधान के ‘प्रारंभ की तारीख’ भी कहा जाता है और यही वजह थी कि 26 जनवरी को ही ‘गणतंत्र दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा।

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26 जनवरी को ही गणतंत्र दिवस के रूप में मनाए जाने के पीछे स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी जुड़ा है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 26 जनवरी का इतिहास अति महत्वपूर्ण एवं गौरवशाली रहा है। सन् 1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में भारत के लिए पूर्ण स्वराज्य की चर्चा की गई थी और उसके बाद मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित सर्वदल सम्मेलन ने कलकत्ता में हुए अधिवेशन में इस विषय पर और अधिक जोर दिया। इस सर्वदल सम्मेलन के सचिव थे मोतीलाल नेहरू के सुपुत्र पं जवाहरलाल नेहरू। अतः सर्वदल सम्मेलन की रिपोर्ट को ‘नेहरू रिपोर्ट’ के नाम से ही जाना गया।

इस रिपोर्ट में सर्वदल सम्मेलन के अध्यक्ष पं. मोतीलाल नेहरू ने उल्लेख किया कि भारत के सामने तात्कालिक राजनीतिक ध्येय अधिराज्य (डोमिनियन) स्तर को प्राप्त करना होगा लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस और पं. जवाहरलाल नेहरू ने रिपोर्ट में डोमिनियन स्तर का उल्लेख किए जाने पर इसका डटकर विरोध किया। इसी विरोध के मद्देनजर तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए यह आश्वासन दिया कि यदि अगले एक वर्ष के भीतर नेहरू रिपोर्ट में वर्णित डोमिनियन स्तर का दर्जा प्राप्त नहीं हो सका तो आगामी लाहौर अधिवेशन में वे स्वयं पूर्ण आजादी का प्रस्ताव पेश करेंगे।

गांधी जी ने 1928 में हुए कलकत्ता अधिवेशन में एक प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि सर्वदल सम्मेलन की रिपोर्ट में शासन विधान की जो योजना प्रस्तुत की गई है, कांग्रेस उसका स्वागत करती है और उसे भारत की साम्प्रदायिक व राजनीतिक समस्याओं को हल करने में अत्यधिक सहायता देने वाली मानती है, इसलिए अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट इस शासन विधान को राजनीतिक स्थिति में कोई बदलाव किए बिना 31 दिसम्बर 1929 तक ज्यों का त्यों स्वीकार कर ले तो कांग्रेस इस विधान को स्वीकार कर लेगी लेकिन यदि इस निर्धारित तिथि तक वह इसे स्वीकार न करे तो कांग्रेस अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलाएगी।

1927 में पूर्ण स्वराज्य की चर्चा शुरू होने तथा असहयोग आन्दोलन से उत्पन्न स्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार ने 1928 में एक कानूनी आयोग साइमन कमीशन गठित किया, जिसकी नियुक्ति के बारे में भारत शासन अधिनियम 1919 (धारा 84 क) में उपबंध था। इस आयोग को अधिनियम के कार्यकरण की जांच करके उस पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था।

1929 में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारतीय राजनीतिक विकास का उद्देश्य डोमिनियन प्रास्थिति है। 31 अक्तूबर 1929 को लार्ड इरविन ने सम्राट की ओर से घोषणा की कि भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाएगा लेकिन उस घोषणा में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि यह कार्य कब तक किया जाएगा, इसलिए ब्रिटिश सरकार की इस नीति के मद्देनजर कांग्रेस ने माना कि भारत को ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वराज तभी दिया जाएगा, जब ब्रिटिश सरकार ऐसा करने के लिए बाध्य हो जाएगी। अतः 31 दिसम्बर 1929 को कांग्रेस की लाहौर में हुई बैठक में देश की पूर्ण आजादी का प्रस्ताव पारित किया गया और उसी दिन स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहरा दिया गया, साथ ही महासमिति को भी यह अधिकार सौंप दिया गया कि वह जब चाहे, करबंदी और सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम आरंभ कर सकती है। 26 जनवरी 1930 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूर्ण स्वतंत्रता की शपथ ली गई।

सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में बने साइमन आयोग ने 1930 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसके बाद उस प्रतिवेदन पर विचार करने के लिए गोलमेज परिषद में ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। इस सम्मेलन की परिणति पर तैयार किए गए एक श्वेत पत्र की ब्रिटिश संसद की एक संयुक्त प्रवर समिति द्वारा परीक्षा की गई और प्रवर समिति की सिफारिशों के अनुसार भारत शासन विधेयक का प्रारूप तैयार करके उसे कुछ संशोधनों के साथ ‘भारत शासन अधिनियम 1935’ के रूप में पारित किया गया।

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उल्लेखनीय है कि 1929 में साइमन आयोग ने जो ‘डोमिनियन प्रास्थिति’ देने का वायदा किया था, वह इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त नहीं की गई, उल्टे इस अधिनियम ने मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक वैमनस्य को और अधिक बढ़ाया क्योंकि इसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड द्वारा 4 अगस्त 1932 को दिए गए साम्प्रदायिक अधिनिर्णय के आधार पर पृथक निर्वाचन मंडलों की व्यवस्था कर दी गई, जिसका आधार यह बताया गया कि दो मुख्य सम्प्रदाय सहमत नहीं हो सके हैं। इस अधिनियम में मुसलमानों के अलावा सिखों, ईसाईयों, एंग्लो इंडियनों और यूरोपीय लोगों के लिए भी पृथक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई थी, जिसके कारण राष्ट्रीय एकता के निर्माण में कई बाधाएं भी उत्पन्न होती रही।

जहां तक 26 जनवरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात है तो 26 जनवरी 1929 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने रावी नदी के तट पर देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की थी। उसके बाद 2 जनवरी 1930 को पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई बैठक में 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया और उसके बाद से हर वर्ष 26 जनवरी को देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाए जाने का फैसला किया गया। तभी से 26 जनवरी ने समस्त भारतवासियों के लिए एक राष्ट्रीय पर्व का रूप धारण कर लिया।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा कई पुस्तकों के रचयिता हैं और 31 वर्षों से साहित्य एवं पत्रकारिता में सक्रिय हैं। गत वर्ष भी इनकी ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ तथा ‘जीव जंतुओं का अनोखा संसार’ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।)







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