रहने लायक शहरों की रैंकिंग से शर्मसार देश

महानगरों में रहने वाले लोगों की हालत नरक में रहने जैसी हो गई। प्रदूषण से लोग जहरीली सांस लेने को मजबूर हो गए। पानी बिजली के लिए हाहाकार मच गया। ट्रेफिक जाम से लोगों की सांस फूल गई। बारिश के दौरान पूरा शहर जलमग्न हो गया। सड़कों पर गडढों में भरे पानी से लोगों की मौत होने लगी।
चुनावों के दौरान भाजपा नारा देती रही है। डबल और ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने को। अर्थात भाजपा का शासन केंद्र में हो, राज्य में हो और महानगर निगमों में भी हो तो विकास भी दुगनी ओर तीगुनी रफ्तार से होगा। देश के ज्यादातर मतदाताओं ने भाजपा की बात पर भरोसा भी कर लिया और केंद्र के अलावा कई राज्यों में सरकार और महा नगर निगमों में भाजपा बोर्ड बनवा दिया। अब मतदाता निंश्चिंत हो गए कि चलो जिन जहां तीन स्थानों पर भाजपा की सरकार है, वहां विकास रॉकेट की रफ्तार से उड़ेगा। लेकिन परिणाम जन अपेक्षाओं के विपरीत आए।
महानगरों में रहने वाले लोगों की हालत नरक में रहने जैसी हो गई। प्रदूषण से लोग जहरीली सांस लेने को मजबूर हो गए। पानी बिजली के लिए हाहाकार मच गया। ट्रेफिक जाम से लोगों की सांस फूल गई। बारिश के दौरान पूरा शहर जलमग्न हो गया। सड़कों पर गडढों में भरे पानी से लोगों की मौत होने लगी। यह हालत अकेले भाजपा के डबल ट्रिपल इंजन वाले राज्यों के महानगरों की नहीं है बल्कि कांग्रेस और दूसरे दलों के राज्यों का भी यही हाल है।
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भारत के महानगरों की यह भयावह तस्वीर इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा जारी ग्लोबल लिवेबिलिटी (रहने योग्य) इंडेक्स 2026 में उजागर हुई है। दुनिया के 173 शहरों का स्वास्थ्य, शिक्षा, आधारभूत ढांचा, पर्यावरण, स्थिरता और सांस्कृतिक सुविधाओं जैसे प्रमुख मानकों के आधार पर मूल्यांकन किया गया। जिसमें देश की राजधानी नई दिल्ली 120वें स्थान पर रही, जबकि आर्थिक राजधानी मुंबई 121वें स्थान पर कायम रही। दक्षिण भारत के प्रमुख महानगर चेन्नई को 123वां और बेंगलुरु को लिवेबिलिटी रैकिंग में 127वां स्थान मिला है। यह देश के सत्तारुढ़ दलों के नेताओं के लिए बेशक शर्म का विषय नहीं हो, किन्तु रैकिंग की इस हालत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हुई है।
उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले वर्ष की तुलना में इन शहरों की रैंकिंग में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। यह स्थिति दर्शाती है कि तेज आर्थिक विकास के बावजूद भारतीय महानगरों में जीवन गुणवत्ता, यातायात, प्रदूषण, सार्वजनिक सेवाओं और शहरी सुविधाओं से जुड़ी चुनौतियां और भारी भ्रष्टाचार अभी भी गंभीर समस्या बनी हुई हैं। गौरतलब है कि केंद्र में भाजपा सरकार है, दिल्ली राज्य में भाजपा की सरकार है और दिल्ली के महानगर निगम में भी भाजपा का कब्जा है। इसी तरह महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना की सरकार है। मुंबई महानगर निगम में भाजपा शिवसेना का बोर्ड है। दिल्ली और मुंबई में ट्रिपल इंजिन की सरकार है। इसके बावजूद विश्व लिवेबिलिटी रैंकिंग में नई दिल्ली 120वें स्थान पर जबकि आर्थिक राजधानी मुंबई 121वें स्थान पर रही है।
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। राजधानी बेंगलुरु को लिवेबिलिटी रैकिंग में 127वां स्थान प्राप्त हुआ। हालांकि कांग्रेस ने कभी डबल या ट्रिपल इंजिन की सरकार का नारा नहीं दिया। इसी तरह ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन में द्रमुक का बोर्ड है, अब यहां एक इंजिन रह गया है, पिछले महीनों तक जब स्टालिन की सरकार तमिलनाडु में थी, तब यहां डबल इंजिन की सरकार थी। अब तमिलनाडु में अभिनेता विजय की सरकार है। विश्व रहने योग्य रैकिंग में चेन्नई को 123वां मिला है।
ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन ने पहला स्थान हासिल करते हुए दुनिया के सबसे रहने योग्य शहर का दर्जा बरकरार रखा। ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना दूसरे और ऑस्ट्रेलिया का मेलबर्न तीसरे स्थान पर रहा। कल्पना की जा सकती है कि जब भारत के चार प्रमुख शहरों की रहने लायक विश्व रैकिंग का ये हाल है तो देश के बाकी शहरों का बुनियादी सुविधाओं के मामले में क्या हाल होगा। ऐसा नहीं है कि इन महानगरों की हालत नरक की तरह है, इनमें कुछ कम या ज्यादा खराब हालत देश के बाकी दूसरे छोटे शहरों की भी है, जो महानगर बनने की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं।
केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा किए गए वादे खोखले साबित हुए हैं। पिछले वर्ष शहरी कार्यक्रमों पर खर्च की गई राशि घोषित राशि से 40 प्रतिशत कम थी। सरकार की शहरी स्वच्छता की प्रमुख पहल का बजट आधा कर दिया गया, जबकि कुछ ही सप्ताह पहले इंदौर में कच्चे सीवेज से दूषित पानी पीने से दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी। यह वही शहर है जिसे सरकार ने पिछले आठ वर्षों से लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया है। सत्ता के केंद्रों के करीब होने के बावजूद भी स्थानीय लोग कुशासन से सुरक्षित नहीं रह पाते। गुजरात के गांधीनगर में जनवरी 2026 में दूषित जल से टाइफाइड फैल गया था।
पिछले साल देश भर के 26 शहरों में कम से कम 5,500 लोग दशकों पुरानी खराब पाइपलाइनों के कारण सीवेज से दूषित पानी पीने से बीमार पड़ गए थे और ये तो केवल दर्ज और रिपोर्ट किए गए मामले हैं। क्या स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें, चमकदार भवन और आकर्षक परियोजनाएं हैं? क्या स्मार्ट शहर वह नहीं होना चाहिए जो सामान्य से अधिक बारिश को भी सहजता से संभाल सके? यदि अरबों रुपये जल निकासी, सड़क निर्माण और शहरी विकास पर खर्च हो रहे हैं, तो पहली तेज बारिश में ही सड़कें नदी और चौराहे तालाब क्यों बन जाते हैं?
केंद्र सरकार 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात करती हैं। देश को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना दिखाया जा रहा है। विकसित भारत की इमारत उस बुनियाद पर खड़ी की जा रही है जो हर मानसून में हिल जाती है? क्या अब समय नहीं आ गया है कि विकास के दावों से पहले शहरों की जल निकासी व्यवस्था, निर्माण की गुणवत्ता, नगर नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए? लेकिन क्या हर मॉनसून हमारे इन सभी दावों की वास्तविकता सामने नहीं रख देता?
क्या विकसित भारत केवल बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेस वे और गगनचुंबी इमारतों से बनेगा? या फिर उसकी पहचान ऐसी मजबूत बुनियादी व्यवस्था से होगी जो हर मौसम में नागरिकों को सुरक्षित और सुगम जीवन दे सके? भारत शहरी निवासियों को बुनियादी सुविधाएं देने में विफल रहा है। स्वच्छ जल, सांस लेने योग्य हवा और एक ऐसी सरकार जिसे विफल होने पर वे वोट देकर हटा सकें। जब तक भारत लोकतांत्रिक जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लेता और निर्वाचित शहरी नेताओं को कर लगाने और कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देता, तब तक नागरिकों को दुनिया के कुछ सबसे भयावह शहरी वातावरणों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होना पड़ेगा।
- योगेन्द्र योगी
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