अपना बोया ही काट रही ममता बनर्जी

Mamata Banerjee
ANI

संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया, नतीजतन नवंबर 1997 में सरकार गिर गई और 1998 में नए सिरे से लोकसभा चुनाव हुए। तब तक ममता कांग्रेस छोड़कर एक नई पार्टी बना चुकी थीं। चुनावों में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ सीट का समझौता किया और सात सीटें जीतीं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस को मिली ऐतिहासिक पराजय के बाद, जिस तरह पार्टी के विधायक और सांसद ममता बनर्जी से नाता तोड़ रहे हैं, उसने कई लोगों को हैरान किया है। लेकिन ममता बनर्जी पिछले 28-29 सालों से जिस तरह की सिद्धान्तहीन राजनीति करती रही हैं, उसे देखते हुए इन जन-प्रतिनिधियों के कारनामे कुछ भी असामान्य नहीं लगते। वे बस वही कर रहे हैं जो ममता दीदी ने उन्हें सिखाया है। असल में, अच्छा शिष्य वही है जो अपने गुरु के दिखाए रास्ते पर चले। ये सांसद और विधायक भी वही कर रहे हैं जो ममता बनर्जी करती रही हैं, यानी बिना किसी सिद्धांत या आदर्शवादी राजनीति। किसी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना और काम निकल जाने पर उसे छोड़ देना, बार-बार उससे मुंह मोड़ लेना और विपक्षी पार्टियों के विधायकों पर हमला करना।

तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों और सांसदों पर मुख्य आरोप यह है कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद, वे अब विपक्षी भाजपा के साथ मिल रहे हैं, वही भाजपा, जिसे उन्होंने चुनाव के दौरान सांप्रदायिक पार्टी बताकर हराया था। लेकिन ममता बनर्जी ने भी 1998 में ऐसा ही किया था, जब उन्होंने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उस समय ममता बनर्जी को कांग्रेस से यह शिकायत थी कि राज्य में लेफ्ट फ्रंट को हराने के लिए कांग्रेस भाजपा के साथ हाथ क्यों नहीं मिला रही है? उस समय ममता भाजपा को सांप्रदायिक नहीं मानती थीं। उन्होंने यह भी कहा था कि भाजपा कोई सांप्रदायिक पार्टी नहीं है। तो, अगर अब तृणमूल कांग्रेस के सांसद और विधायक कह रहे हैं कि भाजपा सांप्रदायिक पार्टी नहीं है, तो इसमें क्या गलत है? वे बस अपनी प्रिय नेता के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चार बार (2013, 2017, 2022 और 2024 में) अपना पक्ष बदला, लेकिन ममता बनर्जी अब तक पांच बार अपना पक्ष बदल चुकी हैं। इतिहास के पन्ने पलटे तो, बात 1997 की है, केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी। संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया, नतीजतन नवंबर 1997 में सरकार गिर गई और 1998 में नए सिरे से लोकसभा चुनाव हुए। तब तक ममता कांग्रेस छोड़कर एक नई पार्टी बना चुकी थीं। चुनावों में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ सीट का समझौता किया और सात सीटें जीतीं। हालांकि, वह सरकार में शामिल नहीं हुईं क्योंकि उन्होंने राज्य में अपनी नई बनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया। 13 महीने बाद केंद्र सरकार गिर गई।

1999 के चुनावों के बाद एक नई सरकार बनी, जिसमें ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं। 2001 में, जब बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक थे, तो ममता को लगा कि कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करना फायदेमंद रहेगा। इसलिए, मार्च 2001 में उन्होंने रक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले (तहलका स्टिंग ऑपरेशन) का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। हालांकि, इससे भी बंगाल में लेफ्ट फ्रंट को हराया नहीं जा सका। लेफ्ट फ्रंट ने 199 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 31 प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ़ 60 सीटें मिलीं।

अगले विधानसभा चुनाव में अभी पांच साल बाकी थे और केंद्र में भाजपा की सरकार थी। इसलिए, 2003 में ममता बनर्जी फिर से वाजपेयी सरकार में शामिल हो गईं। वह सितंबर 2003 में वाजपेयी सरकार में मंत्री बनीं, जबकि गुजरात दंगे डेढ़ साल पहले, यानी फरवरी 2002 में हो चुके थे। उन्होंने दंगों के लिए गुजरात में मोदी सरकार के इस्तीफे की मांग की थी, लेकिन जब अप्रैल 2002 में लोकसभा में वाजपेयी सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया, तो ममता की पार्टी ने वाजपेयी का समर्थन किया। इस समर्थन के बदले, कुछ महीनों बाद उन्हें फिर से मंत्री बनाया गया।

ममता बनर्जी ने 2004 के लोकसभा और 2006 के विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ गठबंधन करके लड़े। हालांकि, जब उनकी पार्टी को दोनों चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। 2004 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को सिर्फ एक सीट मिली और 2006 के विधानसभा चुनावों में न सिर्फ पार्टी का वोट शेयर घटा (26 प्रतिशत हो गया) बल्कि उसकी सीटें भी आधी रह गईं, तो ममता को लगा कि भाजपा के साथ गठबंधन करने का कोई फायदा नहीं है। केंद्र में भाजपा के सत्ता से बाहर होने के बाद, ममता बनर्जी ने फिर से कांग्रेस पार्टी का रुख किया। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े। तृणमूल कांग्रेस ने 19 सीटें जीतीं। इस जीत से उत्साहित होकर, उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर 2011 का विधानसभा चुनाव लड़ा और सरकार बनाई।  

सरकार बनाने के ठीक एक साल बाद, ममता ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ दिया, क्योंकि उन्हें अब कांग्रेस की सीढ़ी की जरूरत नहीं थी, लेकिन वह यहीं नहीं रुकीं। वह उस सीढ़ी को ही आग लगाने पर आमादा थीं। इसलिए उन्होंने विपक्षी विधायकों को एक-एक करके तोड़ना शुरू किया और अगले पांच सालों में कांग्रेस पार्टी के 42 विधायकों को अपनी तरफ कर लिया। कांग्रेस ही पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बन चुकी थी। उन्होंने लेफ्ट फ्रंट के चार विधायकों को भी पार्टी में शामिल किया, जबकि उन्हें उनकी जरूरत नहीं थी। इन विधायकों के बिना भी, पार्टी के पास 184 विधायकों का मजबूत बहुमत था।

2016 के विधानसभा चुनाव के बाद भी ममता बनर्जी ने विपक्षी विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करना जारी रखा, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार अकेले चुनाव लड़ा था और 211 सीटें जीती थीं। उन्हें विपक्षी विधायकों को अपने पाले में लाने की जरूरत नहीं थी। फिर भी, अगले पांच सालों में उन्होंने कांग्रेस के 18 और लेफ्ट फ्रंट के 4 विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। यह सिलसिला 2021 के चुनावों के बाद भी जारी रहा, जब भाजपा के टिकट पर चुने गए 7 विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें से सिर्फ तीन या चार विधायकों ने अपनी सीट से इस्तीफा दिया और तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर उपचुनाव लड़ा। बाकी नेता अपनी सीटें छोड़े बिना तृणमूल कांग्रेस के साथ बने रहे। स्पीकर उनकी सदस्यता रद्द करने की याचिकाओं पर कोई फैसला नहीं ले रहे थे, जबकि वे अपना विधायी कार्यकाल पूरा करते रहे। कुछ नेता तो मंत्री भी बन गए, और कुछ ने सत्ता के फायदों का आनंद लेना जारी रखा।

विपक्ष के जिन विधायकों ने मंत्री पद, पैसे और सत्ता के लिए पाला बदला था, और ममता बनर्जी को उसमें कुछ भी अनैतिक नहीं लगा था, वही काम आज उनकी ‘अपनी’ पार्टी के तृणमूल विधायक और सांसद भी कर रहे हैं; तो फिर ममता को क्या शिकायत होनी चाहिए? बागी तृणमूल विधायक और सांसद अपना नया गुट बनाकर भाजपा नीत एनडीए के पक्ष में खड़े है। असल में आज ममता दीदी को वही फसल काटनी पड़ रही है, जो खुद उन्होंने बोयी थी। तृणमूल कांग्रेस के पंद्रह साल के कार्यकाल में जो अत्याचार, अनाचार और भ्रष्टाचार हुआ है, उससे ममता दीदी की छवि को गहरा धक्का लगा। आज उनके साथ जो हो रहा है, वो उनके कर्मों का ही नतीजा है। इसलिए उनके साथ न उनके नेता खड़े हैं, और न ही जनता।  तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के साथ आज जो कुछ हो रहा है, उस घटनाक्रम से ममता बनर्जी के सिवाय कोई दूसरा दुखी भी नहीं है। 

- डॉ. आशीष वशिष्ठ, 

स्वतंत्र पत्रकार

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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