प्रियंका गांधी के आते ही कांग्रेस को मिलने लगे हैं नये गठबंधन साथी

By अजय कुमार | Publish Date: Feb 18 2019 4:42PM
प्रियंका गांधी के आते ही कांग्रेस को मिलने लगे हैं नये गठबंधन साथी
Image Source: Google

प्रियंका गांधी वाड्रा के आते ही कांग्रेस को नए साथी भी मिलने लगे हैं। महान दल से गठबंधन हो गया है। शिवपाल यादव भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए प्रियंका के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकसभा चुनाव प्रभारी प्रियंका वाड्रा प्रदेश कांग्रेस का 'संदेश' लेकर दिल्ली चली गई हैं। दिल्ली में इस पर अलग से मंथन होगा। संदेश साफ है कि कांग्रेस को किसी भी दल से सीटों की 'खैरात' नहीं मांगनी चाहिए। इससे जनता में गलत मैसेज जाता है और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है। वैसे भी 2017 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाने का हश्र देखा जा चुका है। मात्र सात सीटों पर सिमट गई है कांग्रेस। कांग्रेसियों को तो अभी भी यही लगता है कि अगर 2017 में अकेले चुनाव लड़ा जाता तो हम कम से कम 50 सीटों पर जरूर जीत हासिल कर लेते। हुआ इसका उलट। अखिलेश सरकार के खिलाफ चल रही सत्ता विरोधी लहर में कांग्रेस भी तिनके की तरह उड़ गई। इसका मतलब यह नहीं है कि सपा के साथ जाने से हुए नुकसान के बाद कांग्रेस ने गठबंधन की सियासत से ही तौबा कर ली है। गठबंधन तो होगा, लेकिन उन दलों से जो कांग्रेस के वर्चस्व और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में सहज स्वीकार करेंगे। जब ऐसे दलों की बात होती है तो इसमें समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर महान दल, शिवपाल यादव की नवगठित 'प्रगतिशील समाजवादी पार्टी', राजा भैया की जनसत्ता पार्टी, भाजपा से छिटकती दिख रही चार विधायकों वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल भी कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। बसपा−सपा के साथ अभी तक खड़ा नजर आ रहा राष्ट्रीय लोकदल भी ज्यादा सीटें मिलने की दशा में कांग्रेस की तरफ आ सकता है। इसकी वजह है प्रियंका वाड्रा के आने के बाद कांग्रेस की स्थिति में सुधार आना। कांग्रेस जिन छोटे दलों को साथ लेकर चलना चाह रही है उनका भले ही पूरे यूपी में प्रभाव न हो, लेकिन सीमित क्षेत्र में इनकी मतदाताओं पर अच्छी खासी पकड़ है।
 
       
यह दल कांग्रेस के साथ आने के लिए इसलिए इच्छुक भी हैं क्योंकि चंद दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश की सियासत में प्रियंका वाड्रा एक नया 'सितारा' बन कर आई हैं। उनसे कांग्रेस को उम्मीदें हैं तो विपक्ष को खतरा। माया−अखिलेश की तो पूरी रणनीति पर ही ग्रहण लग गया है। इसी के चलते सपा−बसपा अपने प्रत्याशियों की नई लिस्ट बना रही हैं ताकि प्रियंका फैक्टर से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। यह और बात है कि प्रियंका के नाम पर अभी जनता बंटी हुई है। किसी को प्रियंका में इंदिरा दिखती हैं तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इंदिरा गांधी से प्रियंका की तुलना को गैर−जरूरी मानते हैं।


 
 
खैर, इन बातों से बेफिक्र प्रियंका कांग्रेस का कायाकल्प करने के लिए 'मैराथन दौड़' लगा रही हैं। प्रियंका गांधी वाड्रा का आगमन प्रदेश कांग्रेस के लिए शुभ संकेत है। यह बात प्रियंका की 'शख्सियत', 'काबलियत' और हाजिर जवाबी ने साफ कर दी है। अब तो चारों तरफ यही चर्चा है कि राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका पर दाँव लगाकर कुछ गलत नहीं किया। इसकी कुछ बानगी देखिए। प्रियंका गांधी मीडिया से रूबरू नहीं हुईं थी। मगर मीडिया कहां छोड़ने वाला था। ऐसे ही जब प्रियंका का मीडिया कर्मियों से आमना−सामना हुआ तो एक पत्रकार ने रॉबर्ट वाड्रा से प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ के संबंध में जब पूछा तो प्रियंका ने बड़ी हाजिर जवाबी दिखते हुए कहा, 'यह सब तो चलता ही रहेगा।' उनके इतना कहते ही रॉबर्ट वाड्रा के नाम पर प्रियंका को घेरने की कोशिश करने वालों के मुंह पर ताला लग गया। इसी प्रकार जब प्रियंका से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बड़ी साफगोई से कह दिया कि मोदी का मुकाबला करने के लिए राहुल हैं। यानी वह यह मैसेज नहीं देना चाहती थीं कि मोदी का हराने का जिम्मा उन्होंने राहुल से लेकर अपने कंधों पर डाल लिया है। अगर प्रियंका मान लेतीं कि हाँ वह मोदी से मुकाबला करेंगी तो विरोधी शोर मचाने लगते कि राहुल फेल हो गए हैं, इसलिये मोदी से मुकाबले को प्रियंका को आगे लाया गया है।
 


 
प्रियंका के आते ही कांग्रेस को नए साथी भी मिलने लगे हैं। महान दल से गठबंधन हो गया है। शिवपाल यादव भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए प्रियंका के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। 14 फरवरी को प्रियंका की लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस थी, लेकिन उससे पहले कश्मीर में आतंकी हमला हो गया, जिसमें 40 आरपीएफ के जवान शहीद हो गए। प्रियंका ने सियासी समझदारी दिखाते हुए प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी, उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि तो दी ही इसके साथ यह भी कह दिया कि वह शहीद होने वालों के परिवार का दर्द समझती हैं। प्रियंका का इशारा दादी इंदिरा और पिता राजीव गांधी की शाहादत की ओर था। प्रियंका ने प्रेस कांफ्रेंस नहीं की, लेकिन अपने अगल−बगल बैठे दो लोगों का परिचय मीडिया से जरूर करा दिया। यह नेता मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर से भाजपा विधायक अवतार सिंह भडाना और पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं सांसद रामलाल राही थे। इन दोनों नेताओं की प्रियंका ने घर वापसी कराई। प्रियंका का चार दिवसीय लखनऊ दौरा समाप्त चुका है, लेकिन इन चार दिनों में प्रियंका ने कांग्रेस को काफी कुछ दे दिया। कांग्रेसियों के हौसले बढ़े हुए हैं। लब्बोलुआब यह है कि प्रियंका कांग्रेस की सोई हुई आत्मा को जगाना चाहती हैं ताकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से पहले वाली मजबूत कांग्रेस का सपना साकार हो सके।
               
-अजय कुमार
 


रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video