आखिर युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन?

कहीं विपक्ष के इशारे पर थिरक रहा 'जेन-जी' भारी पड़ रहा है तो कहीं सवर्ण संगठनों का जनप्रदर्शन भाजपा नेतृत्व की रीति-नीति पर सवालों के गोले बरसा रहा है। वहीं कांग्रेस व उसके समर्थक दल जिस तरह से अपने अपने मुद्दों पर भाजपा को घेर रहे हैं, उससे पार्टी के कट्टर समर्थकों में भी ऊहापोह मची हुई है!
भाजपा के राजनीतिक गलियारों में एक सवाल सबको बेचैन किए हुए है कि आखिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सपा मुखिया अखिलेश यादव, राजद सुप्रीमो तेजस्वी यादव, आप नेता अरविंद केजरीवाल, जनसुराज नेता प्रशांत किशोर आदि जैसे राजनीतिक क्षत्रपों को सियासी रूप से निपटाने के लिए नितिन नवीन के रूप में जो राजनीतिक तुरूप का पत्ता चला है, वह अब मनहूसियत की ओर अग्रसर है!
कहीं विपक्ष के इशारे पर थिरक रहा "जेन-जी" भारी पड़ रहा है तो कहीं सवर्ण संगठनों का जनप्रदर्शन भाजपा नेतृत्व की रीति-नीति पर सवालों के गोले बरसा रहा है। वहीं कांग्रेस व उसके समर्थक दल जिस तरह से अपने अपने मुद्दों पर भाजपा को घेर रहे हैं, उससे पार्टी के कट्टर समर्थकों में भी ऊहापोह मची हुई है! पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन उनकी उपलब्धि जरूर है, लेकिन सवाल तो यहां तक उठ रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पार्टी की कीमत पर उन्हें एक सीमा के बाद युवाओं के बीच चमकने नहीं देना चाहते और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की तरह सिर्फ अपना-अपना अनुगामी बनाए रखना चाहते हैं?
चूंकि नितिन नवीन के ऊपर पीएम मोदी का ठप्पा लगा हुआ है, इसलिए उनपर एक सीमा के बाद बड़े नेता विश्वास भी नहीं कर पा रहे हैं और अफवाह उड़वा रहे हैं कि नितिन नवीन में नैसर्गिक नेतृत्व क्षमता की कमी है? इससे मोदी-भागवत दोनों परेशान हैं। राजनीतिक विश्लेषक की मानें तो यह सवाल असल में नितिन नवीन की व्यक्तिगत क्षमता से ज्यादा भाजपा के सत्ता-संगठन मॉडल का सवाल है? अभी उपलब्ध घटनाक्रम को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह उन्हें “चमकने नहीं देना चाहते”। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा में किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की पर्याप्त जगह मिलती है?
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देखा जाए तो अगस्त 2026 में नितिन नवीन ने स्वयं Gen Z outreach की रणनीति पर बड़ी बैठक की, जिसमें करीब 45 नेताओं ने हिस्सा लिया। इस बैठक में पार्टी ने युवाओं के मुद्दों और उनसे संवाद की रणनीति पर जोर दिया है, हालांकि सर जमीन पर ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इसमें युवा कम दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, मेरे आकलन में तीन संभावनाएँ हैं:-
पहली, यह “नियंत्रित नेतृत्व” की रणनीति हो सकती है: भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की राजनीतिक ब्रांड-शक्ति इतनी बड़ी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वतंत्र जन-नेता के रूप में उभरना आसान नहीं है। पार्टी अध्यक्ष का प्राथमिक काम संगठन, चुनाव और रणनीति का संचालन रहता है; लेकिन प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का समानांतर राष्ट्रीय चेहरा बनना उसका घोषित उद्देश्य नहीं होता। इसलिए नितिन नवीन की दृश्यता कम होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें जानबूझकर रोका जा रहा है।
दूसरी, नितिन नवीन अभी “राष्ट्रीय नेता” बनने की प्रक्रिया में हैं: वे भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभव तथा युवा ऊर्जा को मिलाने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना और राष्ट्रीय जननेता बनना दो अलग चीजें हैं। ऐसा इसलिए कि राष्ट्रीय जननेता बनने के लिए चाहिए: अपनी विशिष्ट राजनीतिक भाषा, युवाओं के बीच स्वतः आकर्षण, लगातार देशव्यापी उपस्थिति, कठिन मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, संगठन से बाहर भी व्यक्तिगत जनाधार, मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी पहचान, लेकिन इनमें से अधिकांश का मूल्यांकन अभी करना जल्दी होगा।
तीसरी, सबसे दिलचस्प संभावना: नितिन नवीन की क्षमता है, लेकिन उनकी “राजनीतिक ब्रांडिंग” अभी विकसित नहीं हुई है: यही वह जगह है जहाँ मैं आपकी पिछली बात से सहमत हूँ कि युवाओं को जोड़ना केवल कार्यक्रमों से नहीं होगा। पार्टी अभी bike yatras, hackathons, marathons, campus activities और social-media outreach जैसी योजनाओं पर विचार कर रही है। लेकिन युवा किसी नेता से केवल यह नहीं सुनना चाहता कि “मोदी सरकार ने यह किया”, बल्कि अब वह पूछता है: “आप स्वयं मेरे लिए क्या सोचते हैं?” यहीं नितिन नवीन को अपनी अलग पहचान बनानी होगी। असली परीक्षा यही है!
ऐसे में अगर नितिन नवीन हर भाषण में मोदी सरकार की उपलब्धियों के प्रवक्ता बने रहेंगे, तो वे संगठन के सफल अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन युवा जननेता बनने में कठिनाई होगी। लेकिन यदि वे कहें—“मोदी जी ने भारत को 2047 का लक्ष्य दिया है; अब मेरी पीढ़ी तय करेगी कि उस भारत की शिक्षा, रोजगार, AI, उद्यमिता और राजनीति कैसी होगी।” तो एक अलग राजनीतिक आवाज पैदा होगी।
# सवाल है कि क्या स्वाभाविक उभार से मोदी-शाह उन्हें रोकेंगे?
मेरे पास ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि मोदी या शाह नितिन नवीन को युवाओं के बीच उभरने से रोक रहे हैं। उलटे, उपलब्ध रिपोर्टों में मोदी और शाह की ओर से युवाओं को केंद्र में रखने की बात तथा नितिन नवीन के नेतृत्व में Gen Z outreach को आगे बढ़ाने की तस्वीर मिलती है। लेकिन भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में एक संस्थागत सीमा जरूर है, वह यह कि - मोदी = सर्वोच्च राष्ट्रीय राजनीतिक ब्रांड। शाह = संगठन/रणनीति का शक्तिशाली केंद्र। राष्ट्रीय अध्यक्ष = संगठन का चेहरा और समन्वयक। नितिन नवीन को इस ढाँचे के भीतर रहते हुए “अपनी जगह” बनानी होगी।
और अगर प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता की बात करें? तो अभी फैसला देना जल्दबाजी होगा, बल्कि मैं नितिन नवीन के लिए अगले 12–18 महीने को नेतृत्व की अग्निपरीक्षा मानूंगा। तब देखना होगा कि क्या वे युवाओं के बीच बिना प्रधानमंत्री के नाम के भी भीड़ आकर्षित कर सकते हैं? बेरोजगारी, परीक्षा, शिक्षा और AI जैसे असुविधाजनक सवालों पर अपनी भाषा विकसित करते हैं? भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए युवाओं को भी नेतृत्व में ऊपर लाते हैं? सोशल मीडिया पर केवल पार्टी का संदेश दोहराने के बजाय अपना राजनीतिक विचार रखते हैं? किसी संकट में स्वयं आगे आकर समाधान प्रस्तुत करते हैं? राज्यों में जाकर “नितिन नवीन मॉडल” जैसी कोई संगठनात्मक पहचान बनाते हैं? अगर इन छह सवालों का जवाब अगले डेढ़ साल में हाँ होता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि उनमें प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता नहीं है।
वहीं, नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ा खतरा मोदी-शाह से कम और “सिर्फ अध्यक्ष रह जाने” का ज्यादा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे सफल हो सकते हैं—बैठकें करें, संगठन विस्तार करें, चुनाव जिताएँ, पदाधिकारी नियुक्त करें। उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभवी और युवा नेताओं का मिश्रण भी इसी संगठनात्मक भूमिका की ओर संकेत करता है। लेकिन इतिहास में कुछ अध्यक्ष संगठन के पदाधिकारी बनकर रह जाते हैं और कुछ अपने दौर के राजनीतिक चेहरे बन जाते हैं। लिहाजा, नितिन नवीन को दूसरा रास्ता चुनना होगा। और इसके लिए शायद उन्हें मोदी-शाह से टकराने की जरूरत नहीं है; यह उनका स्वभाव भी नहीं है। इसलिए उन्हें मोदी-शाह की छाया के भीतर अपनी राजनीतिक धूप पैदा करनी होगी। यही उनकी वास्तविक नेतृत्व-परीक्षा है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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