मधुमेह क्या है? कैसे होता है? क्या लक्षण हैं? कैसे बचें?

  •  शुभा दुबे
  •  दिसंबर 28, 2017   13:30
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मधुमेह क्या है? कैसे होता है? क्या लक्षण हैं? कैसे बचें?

मधुमेह ऐसी बीमारी है जो एक बार किसी के शरीर को पकड़ ले तो उसे फिर जीवन भर छोड़ती नहीं। इस बीमारी का जो सबसे बुरा पक्ष है वह यह कि यह शरीर में अन्य कई बीमारियों को भी निमंत्रण देती है।

आजकल के इस भागदौड़ भरे युग में अनियमित जीवनशैली के चलते जो बीमारी सर्वाधिक लोगों को अपनी गिरफ्त में ले रही है वह है मधुमेह। मधुमेह को धीमी मौत भी कहा जाता है। यह ऐसी बीमारी है जो एक बार किसी के शरीर को पकड़ ले तो उसे फिर जीवन भर छोड़ती नहीं। इस बीमारी का जो सबसे बुरा पक्ष है वह यह है कि यह शरीर में अन्य कई बीमारियों को भी निमंत्रण देती है। मधुमेह रोगियों को आंखों में दिक्कत, किडनी और लीवर की बीमारी और पैरों में दिक्कत होना आम है। पहले यह बीमारी चालीस की उम्र के बाद ही होती थी लेकिन आजकल बच्चों में भी इसका मिलना चिंता का एक बड़ा कारण हो गया है। 

मधुमेह कैसे होता है

जब हमारे शरीर के पैंक्रियाज में इंसुलिन का पहुंचना कम हो जाता है तो खून में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। इस स्थिति को डायबिटीज कहा जाता है। इंसुलिन एक हार्मोन है जोकि पाचक ग्रंथि द्वारा बनता है। इसका कार्य शरीर के अंदर भोजन को एनर्जी में बदलने का होता है। यही वह हार्मोन होता है जो हमारे शरीर में शुगर की मात्रा को कंट्रोल करता है। मधुमेह हो जाने पर शरीर को भोजन से एनर्जी बनाने में कठिनाई होती है। इस स्थिति में ग्लूकोज का बढ़ा हुआ स्तर शरीर के विभिन्न अंगों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है।

यह रोग महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होता है। मधुमेह ज्यादातर वंशानुगत और जीवनशैली बिगड़ी होने के कारण होता है। इसमें वंशानुगत को टाइप-1 और अनियमित जीवनशैली की वजह से होने वाले मधुमेह को टाइप-2 श्रेणी में रखा जाता है। पहली श्रेणी के अंतर्गत वह लोग आते हैं जिनके परिवार में माता-पिता, दादा-दादी में से किसी को मधुमेह हो तो परिवार के सदस्यों को यह बीमारी होने की संभावना अधिक रहती है। इसके अलावा यदि आप शारीरिक श्रम कम करते हैं, नींद पूरी नहीं लेते, अनियमित खानपान है और ज्यादातर फास्ट फूड और मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं तो मधुमेह होने की संभावना बढ़ जाती है।

बड़ा खतरा

डायबिटीज के मरीजों में सबसे ज्यादा मौत हार्ट अटैक या स्ट्रोक से होती है। जो व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त होते हैं उनमें हार्ट अटैक का खतरा आम व्यक्ति से पचास गुना ज्यादा बढ़ जाता है। शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने से हार्मोनल बदलाव होता है और कोशिशएं क्षतिग्रस्त होती हैं जिससे खून की नलिकाएं और नसें दोनों प्रभावित होती हैं। इससे धमनी में रुकावट आ सकती है या हार्ट अटैक हो सकता है। स्ट्रोक का खतरा भी मधुमेह रोगी को बढ़ जाता है। डायबिटीज का लंबे समय तक इलाज न करने पर यह आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे व्यक्ति हमेशा के लिए अंधा भी हो सकता है।

मधुमेह के लक्षण

-ज्यादा प्यास लगना

-बार-बार पेशाब का आना

-आँखों की रौशनी कम होना

-कोई भी चोट या जख्म देरी से भरना

-हाथों, पैरों और गुप्तांगों पर खुजली वाले जख्म

-बार-बर फोड़े-फुंसियां निकलना

-चक्कर आना

-चिड़चिड़ापन

मधुमेह से बचाव के यह कुछ उपाय आपके काम आएंगे

- अपने ग्लूकोज स्तर को जांचें और भोजन से पहले यह 100 और भोजन के बाद 125 से ज्यादा है तो सतर्क हो जाएं। हर तीन महीने पर HbA1c टेस्ट कराते रहें ताकि आपके शरीर में शुगर के वास्तविक स्तर का पता चलता रहे। उसी के अनुरूप आप डॉक्टर से परामर्श कर दवाइयां लें।

- अपनी जीवनशैली में बदलाव करें और शारीरिक श्रम करना शुरू करें। जिम नहीं जाना चाहते हैं तो दिन में तीन से चार किलोमीटर तक जरूर पैदल चलें या फिर योग करें।

- कम कैलोरी वाला भोजन खाएं। भोजन में मीठे को बिलकुल खत्म कर दें। सब्जियां, ताज़े फल, साबुत अनाज, डेयरी उत्पादों और ओमेगा-3 वसा के स्रोतों को अपने भोजन में शामिल कीजिये। इसके अलावा फाइबर का भी सेवन करना चाहिए।

- दिन में तीन समय खाने की बजाय उतने ही खाने को छह या सात बार में खाएं। 

- धूम्रपान और शराब का सेवन कम कर दें या संभव हो तो बिलकुल छोड़ दें।

- आफिस के काम की ज्यादा टेंशन नहीं रखें और रात को पर्याप्त नींद लें। कम नींद सेहत के लिए ठीक नहीं है। तनाव को कम करने के लिए आप ध्यान लगाएं या संगीत आदि सुनें।

- नियमित रूप से स्वास्थ्य की जांच कराते रहें और शुगर लेवल को रोजाना मॉनीटर करें ताकि वह कभी भी लेवल से ज्यादा नहीं हो। एक बार शुगर बढ़ जाता है तो उसके लेवल को नीचे लाना काफी मुश्किल काम होता है और इस दौरान बढ़ा हुआ शुगर स्तर शरीर के अंगों पर अपना बुरा प्रभाव छोड़ता रहता है।

- गेहूं और जौ 2-2 किलो की मात्रा में लेकर एक किलो चने के साथ पिसवा लें। इस आटे की बनी चपातियां ही भोजन में खाएं।

- मधुमेह रोगियों को अपने भोजन में करेला, मेथी, सहजन, पालक, तुरई, शलगम, बैंगन, परवल, लौकी, मूली, फूलगोभी, ब्रौकोली, टमाटर, बंद गोभी और पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना चाहिए।

- फलों में जामुन, नींबू, आंवला, टमाटर, पपीता, खरबूजा, कच्चा अमरूद, संतरा, मौसमी, जायफल, नाशपाती को शामिल करें। आम, केला, सेब, खजूर तथा अंगूर नहीं खाना चाहिए क्योंकि इनमें शुगर ज्यादा होता है।

- मेथी दाना रात को भिगो दें और सुबह प्रतिदिन खाली पेट उसे खाना चाहिए।

- खाने में बादाम, लहसुन, प्याज, अंकुरित दालें, अंकुरित छिलके वाला चना, सत्तू और बाजरा आदि शामिल करें तथा आलू, चावल और मक्खन का बहुत कम उपयोग करें।

- शुभा दुबे







तारों के ध्वंस से जुड़ी गुत्थी समझने में सहायक नया शोध-अध्ययन

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 21, 2021   15:32
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तारों के ध्वंस से जुड़ी गुत्थी समझने में सहायक नया शोध-अध्ययन

डॉ. सोवन चक्रवर्ती ने बताया कि “सुपरनोवा से जुड़ी गुत्थियों को अभी तक पूरी तरह नहीं सुलझाया जा सका है, और यह प्रकृति का एक गूढ़ रहस्य बना हुआ है।” उन्होंने बताया कि सुपरनोवा विखंडन की प्रक्रिया में आण्विक प्रक्रियाओं के माध्यम से न्यूट्रिनो का सृजन होता है।

विशालकाय तारों में महा-विस्फोट (सुपरनोवा) को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आयी हैं। खगोल-विज्ञानियों की एक आम धारणा है कि तारों के जीवनकाल के अंत में होने वाले सुपरनोवा विस्फोट में न्यूट्रिनो के सिर्फ दो रूपों की भूमिका होती है। लेकिन, एक नये अध्ययन में पता चला है कि सुपरनोवा में न्यूट्रिनो के तीनों रूप या फ्लेवर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये तथ्य सुपरनोवा में न्यूट्रिनों के सिर्फ दो रूपों की भूमिका पर केंद्रित आम धारणा के विपरीत हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये तथ्य विशालकाय तारों के अंत को बेहतर ढंग से समझने में उपयोगी हो सकते हैं।

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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स, जर्मनी और नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय, अमेरिका के संयुक्त अध्ययन में यह खुलासा किया गया है। उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीएफआईआर) के एक सैद्धांतिक अध्ययन से पता चला था कि तारों के जीवनकाल के अंत में होने वाले सुपरनोवा विस्फोट का कारण न्यूट्रिनो हो सकते हैं। न्यूट्रिनो के बारे में जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉन, म्यूऑन और टाऊ के नाम से जाना जाता है। 

पृथ्वी पर मौजूद जीवों की तरह आकाश में चमकने वाले तारों का भी एक दिन अंत होना तय रहता है। तारों के भीतर संचित ऊर्जा जब समाप्त हो जाती है, तो उनकी चमक खोने लगती है। इस तरह तारों का अंत या मृत्यु हो जाती है। तारों की मृत्यु के समय प्रचंड महा-विस्फोट होता है, जिसे सुपरनोवा विस्फोट के रूप में जाना जाता है, जिससे कई नये तारों का जन्म होता है। अपने जीवन के अंत में भीमकाय तारों का विखंडन एक बड़े झटके के रूप में होता है, जो अपनी आकाशगंगा में भी उथल-पुथल का कारण बनता है। ऐसे में, सुपरनोवा के दौरान विमुक्त होने वाले कणों के अध्ययन से ब्रह्मांड की कई गुत्थियां सुलझायी जा सकती हैं। यह माना जाता है कि जिन तत्वों से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है, ऐसे लगभग सभी तत्व इसी तरह के विस्फोटों का परिणाम होते हैं।

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शोध पत्रिका फिजिकल रिव्यू लेटर (पीआरएल) में प्रकाशित इस अध्ययन ने पूरे विश्व के खगोल-विज्ञानियों का ध्यान आकर्षित किया है। यह अध्ययन आईआईटी, गुवाहाटी के भौतिकी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सोवन चक्रवर्ती एवं उनकी शोध छात्रा मधुरिमा चक्रवर्ती, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स, जर्मनी के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. फ्रांसेस्को केपोजी और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, अमेरिका में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो डॉ. मनिब्रता सेन द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

डॉ. सोवन चक्रवर्ती ने बताया कि “सुपरनोवा से जुड़ी गुत्थियों को अभी तक पूरी तरह नहीं सुलझाया जा सका है, और यह प्रकृति का एक गूढ़ रहस्य बना हुआ है।” उन्होंने बताया कि सुपरनोवा विखंडन की प्रक्रिया में आण्विक प्रक्रियाओं के माध्यम से न्यूट्रिनो का सृजन होता है। विखंडन से जुड़ी मूल चुनौती उन न्यूट्रिनो कणों से संबंधित है, जो आकार में बेहद सूक्ष्म होते हैं। न्यूट्रिनो कणों की अपनी जटिलताएं हैं। इन कणों की खोज के कई दशक के बाद भी भौतिक-विज्ञानी न्यूट्रनो से संबंधित रहस्यों को पूरी तरह समझ नहीं सके हैं। इन कणों की संरचना और द्रव्यमान जैसे बिंदुओं से संबंधित बहुत-सी बातें पहेली बनी हुई हैं। मौजूदा सुपरनोवा मॉडल यही बताता है कि म्यूऑन और टाऊ न्यूट्रिनो और एंटी-न्यूट्रिनो की काफी कुछ विशेषताएं एक जैसी हैं, और उन्हें एक ही प्रजाति का माना जाता है। 

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डॉ. सोवन चक्रवर्ती बताते हैं कि “यह जानकारी इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है कि अत्यंत घने सुपरनोवा कोर के न्यूट्रिनो अन्य न्यूट्रिनो कणों के संपर्क में आकर अपनी प्रकृति (फ्लेवर) बदल लेते हैं। यह बदलाव कुछ माइक्रो सेकेंड्स में होता है, और यह सुपरनोवा की समग्र प्रक्रिया को प्रभावित करता है, क्योंकि विभिन्न प्रकृति (फ्लेवर) वाले न्यूट्रिनो कण महा-विस्फोट के समय भिन्न कोणीय वितरण से उत्सर्जित होते हैं। अत्यंत तीव्र गति से होने वाला संक्रमण अरैखिक होता है, जो न्यूट्रिनो कणों के किसी अन्य स्रोत से तो नहीं, परंतु सुपरनोवा से प्रतिरोध करता है। हमने पहली बार सुपरनोवा में तीनों प्रकार की प्रकृति के न्यूट्रिनो के तीव्र रूपांतरण वाले नॉन-लीनियर स्वरूप की अनुकृति प्रदर्शित की है।” 

शोधकर्ताओं का कहना है कि न्यूट्रिनो के तीनों फ्लेवर में अंतर महत्वपूर्ण हैं। उनमें से किसी एक की अनदेखी से तीव्र गति से होने वाले फ्लेवर परिवर्तन की सही और स्पष्ट तस्वीर मिल पाना संभव नहीं है। यह अध्ययन ब्रह्मांड के कई रहस्यों को सुलझाने और भविष्य के कई शोध-अनुसंधानों को एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है। 

(इंडिया साइंस वायर)







दिल्ली में भूकंप स्रोतों की पहचान के लिए सर्वेक्षण

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 15, 2021   13:32
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दिल्ली में भूकंप स्रोतों की पहचान के लिए सर्वेक्षण

हाल के वर्षों में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं। भूकंप की बार-बार होने वाली घटनाओं को देखते हुए भूकंप के स्रोतों को चिह्नित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील हैं, और यहाँ 7.9 की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। इतनी अधिक तीव्रता के भूकंप से बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की आशंका रहती है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) द्वारा दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप के खतरे का सटीक आकलन करने के लिए भू-भौतिकीय सर्वेक्षण किया जा रहा है। एनसीएस के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पहल भूकंप के कारण होने वाले नुकसान को कम करने से संबंधित रणनीतियों के विकास में मददगार हो सकती है। एनसीएस यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), कानपुर के सहयोग से कर रहा है।

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हाल के वर्षों में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं। भूकंप की बार-बार होने वाली घटनाओं को देखते हुए भूकंप के स्रोतों को चिह्नित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। एनसीएस की इस पहल के अंतर्गत भूकंपीय खतरों के सटीक आकलन के लिए उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और भू-गर्भ क्षेत्र शोध का विश्लेषण और व्याख्या की जा रही है। इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी का उपयोग भूकंप-रोधी इमारतों, औद्योगिक इकाइयों, अस्पतालों, स्कूलों आदि को डिजाइन करने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा, हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) अन्वेषण, भू-तापीय अन्वेषण, कार्बन अनुक्रम, खनन अन्वेषण तथा हाइड्रोकार्बन और भूजल की निगरानी में भी इस तरह प्राप्त जानकारियों का उपयोग होता है।

भू-वैज्ञानिकों ने भूकंप के खतरे की दृष्टि से पूरे देश को पाँच जोन में विभाजित किया है। भूकंप के आसन्न खतरे के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों को जोन-5 में रखा गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और उसके आपपास के इलाकों को जोन-4 की श्रेणी में रखे गए हैं। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थानीय भूकंपीय नेटवर्क को सुदृढ़ करना और भ्रंश (फाल्ट) जैसी उप-सतह की विशेषताओं की रूपरेखा तैयार करना जरूरी है, जो भूकंप का कारण बन सकते हैं। भ्रंश (फाल्ट), धरती के अन्दर की चट्टान में टूट-फूट या दरार को कहा जाता है।

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दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ज्ञात भ्रंश (फाल्ट) को कवर करने के लिए 11 अस्थायी अतिरिक्त स्टेशनों की तैनाती के साथ भूकंप नेटवर्क को मजबूत बनाया जा रहा है। इससे भूकंप के कारणों की बेहतर समझ के लिए भूकंप पैदा होने व बाद के झटकों का सटीक स्थान-निर्धारण किया जा सकेगा। इन स्टेशनों से डेटा लगभग वास्तविक समय पर प्राप्त किया जा सकता है। इस डेटा का उपयोग संबंधित क्षेत्र के सूक्ष्म और छोटे भूकंपों का पता लगाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस विस्तारित नेटवर्क से अब भूकंप-केंद्र के निर्धारण में दो किलोमीटर तक की सटीकता आयी है। 

दिल्ली क्षेत्र में भू-भौतिकीय सर्वेक्षण- मैग्नेटोटेल्यूरिक (विद्युत चुम्बकीय-भू-सतह) भी किया जा रहा है। मैग्नेटोटेल्यूरिक (MT) एक भू-भौतिकीय पद्धति है, जिसमें भूगर्भीय संरचनाओं एवं गतिविधियों के अध्ययन के लिये पृथ्वी के चुंबकीय एवं विद्युत क्षेत्रों की भिन्नता का उपयोग किया जाता है। इस विधि के द्वारा भूकंप उत्प्रेरण की संभावना को बढ़ाने वाले तत्वों, जैसे मैग्मा आदि की आवृत्ति को मापा जाता है। इस विधि द्वारा 300 से 10,000 मीटर तक की गहराई में उच्च आवृत्तियों को रिकॉर्ड किया जा सकता है। इसके लिये प्रायः तीन प्रमुख भूकंपीय स्रोतों, महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट (MDF), सोहना फॉल्ट (SF) और मथुरा फॉल्ट (MF) से मापों को लिया जाता है। इस सर्वेक्षण में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून भी एक भागीदार है।

पिछले साल अप्रैल से अगस्त महीनों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी)- दिल्ली में चार छोटे-छोटे भूकंप की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 3.5 तीव्रता का पहला भूकंप लॉकडाउन के दौरान एनसीटी दिल्ली की पूर्वोत्तर सीमा में 12 अप्रैल, 2020 को आया था। इन भूकंपों के बाद रिक्टर पैमाने पर 3.0 से कम तीव्रता की लगभग एक दर्जन सूक्ष्म घटनाओं का अनुभव किया गया, जिनमें बाद में आने वाले कुछ झटके (आफ्टरशॉक्स) भी शामिल हैं।

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भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भूकंप की इन घटनाओं के केंद्र तीन अलग-अलग क्षेत्रों में आते हैं। इन क्षेत्रों में, उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीमा, रोहतक (हरियाणा) के दक्षिण-पूर्व में 15 किलोमीटर तक का क्षेत्र और फरीदाबाद (हरियाणा) से17 किलोमीटर पूर्व तक का क्षेत्र शामिल है। भूकंप की इन घटनाओं का स्थान निर्धारण राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) द्वारा संचालित राष्ट्रीय भूकंपीय नेटवर्क (एनएसएन) द्वारा किया गया है। 

भू-भौतिकीय और भूगर्भीय दोनों जमीनी सर्वेक्षणों के 31 मार्च 2021 तक पूरा होने की उम्मीद है। इससे पहले पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक महत्वकांक्षी परियोजना के अंतर्गत भूकंप के खतरे से ग्रस्त जोन-4 और जोन-5 में शामिल क्षेत्रों की माइक्रो-मैपिंग भी की जा रही है, जो भूकंप-रोधी शहरों के विकास और अत्यधिक आबादी वाले क्षेत्रों में इमारतों की सुरक्षा एवं जान-माल के नुकसान को कम करने में उपयोगी हो सकती है। 

(इंडिया साइंस वायर)







कोरोना से लड़ने के लिए आप तक ऐसे पहुँचेगी वैक्सीन!

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 11, 2021   20:13
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कोरोना से लड़ने के लिए आप तक ऐसे पहुँचेगी वैक्सीन!

टीकाकरण के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर विभिन्न टास्क फोर्स गठित किए हैं। हालांकि, टीकाकरण शुरू होगा तो कैसे कोरोना वैक्सीन, फैक्टरी से टीकाकरण केंद्र तक पहुँचेगी, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है।

कोविड-19 संक्रमण के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस के विरुद्ध भारत ने निर्णायक युद्ध के लिए कमर कस ली है। कोरोना वैक्सीन के उपयोग को मंजूरी मिलने के बाद पूरे देश में युद्ध स्तर पर इसके टीकाकरण की तैयारियां चल रही हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 16 जनवरी से विश्व का यह सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो रहा है। तीन जनवरी 2021 को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा दो टीकों (कोविशील्ड और कोवैक्सीन) के आपात उपयोग की मंजूरी मिलने के बाद अब चुनौती इस टीकाकरण को समुचित रूप से अंजाम देने की है। यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों में कई दौर के ट्रायल और हर जरूरतमंद व्यक्ति तक वैक्सीन पहुँचाने की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सशक्त रणनीति तैयार की गई है।

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कोविशील्ड और कोवैक्सीन को मंजूरी 

भारत में सीमित आपात उपयोग (रिस्ट्रिक्टेड इमरजेंसी यूज़ ऑथराइजेशन) के लिए दो कोरोना वैक्सीन - कोविशील्ड और कोवैक्सीन को अनुमति मिली है। कोविशील्ड को ऑक्सफोर्ड और एस्ट्रजेनका के संयुक्त प्रयास में पुणे स्थित कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा तैयार किया गया है। वहीं, कोवैक्सीन का निर्माण हैदराबाद की जैव प्रौद्योगिकी कंपनी भारत बायोटेक ने किया है। टीकाकरण के पहले चरण में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन दिए जाने की योजना है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा इस महत्वकांक्षी टीकाकरण कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तैयार कर ली गई है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 736  जिलों में वैक्‍सीन  पर ड्राई रन किया गया। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 736  जिलों में वैक्‍सीन  पर ड्राई रन किया गया। 

निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक टीकाकरण 

निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक प्राथमिक रूप से हेल्थकेयर वर्कर यानी डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य लोगो को वैक्सीन दी जाएगी, जिनकी संख्या करीब एक करोड़ बतायी जा रही है। इसके बाद करीब दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर, जिसमें राज्य पुलिस, अर्ध सैनिक बल, सैन्य बल और सैनिटाइजेशन वर्कर शामल हैं, को यह वैक्सीन दी जाएगी। हेल्थकेयर वर्कर और फ्रंटलाइन वर्कर्स को पंजीकरण नहीं कराना होगा, क्योंकि इनका डेटा सरकार के पास उपलब्ध है। पहले चरण में सबसे अधिक 27 करोड़ ऐसे लोग शामिल होंगे, जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, या फिर ऐसे लोग, जिन्हें पहले से ही कोई गंभीर बीमारी है। इस पूरे अभियान की तत्परता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि टीकाकरण कार्यक्रम का बिगुल बजने से पहले दो बार पूरी प्रक्रिया का ड्राई रन यानी मॉक ड्रिल किया जा चुका है।

उत्पादन इकाई से टीकाकरण केंद्र तक 

टीकाकरण के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर विभिन्न टास्क फोर्स गठित किए हैं। हालांकि, टीकाकरण शुरू होगा तो कैसे कोरोना वैक्सीन, फैक्टरी से टीकाकरण केंद्र तक पहुँचेगी, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। वैक्सीन का निर्माण कंपनी की उत्पादन इकाई में होता है, जहाँ से इसे भारत सरकार के गवर्न्मेंट मेडिकल स्टोर डिपार्टमेंट द्वारा संचालित प्राइमरी वैक्सीन स्टोर (जीएमसीडी) में भेजा जाएगा। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मेडिकल स्टोर संगठन में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, गुवाहाटी, करनाल और नई दिल्ली स्थित सात मेडिकल स्टोर डिपो शामिल हैं। उत्पादनकर्ता कंपनी हवाई यातायात के माध्यम से वैक्सीन इन जीएमसीडी डिपो पर भेजती है, जहाँ से इसे राज्यों के वैक्सीन डिपो तक पहुँचाया जाता है।

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भारत में इस समय कुल 37 राज्य वैक्सीन स्टोर हैं। रेफ्रिजरेटेड या इंसुलेटेड बैंक के जरिये वैक्सीन यहाँ तक पहुँचती है। इन भंडारण-केंद्रों से वैक्सीन को आगे पहुँचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की होती है। राज्यों के वैक्सीन डिपो से प्रदेश सरकार द्वारा जिला वैक्सीन स्टोर में कोरोना वैक्सीन को रेफ्रिजरेटेड या इंसुलेटेड वैन के जरिये भेजा जाएगा, जो तापमान नियंत्रित केंद्र होता है। चिह्नित किए गए वैक्सीन केंद्रों तक वैक्सीन को ताप नियंत्रित ट्रांसपोर्ट डिवाइस में भेजा जाएगा। इस तरह के वैक्सीन केंद्रों में जिला अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, या फिर उप-स्वास्थ्य केंद्र शामिल हो सकते हैं। हालांकि, टीकाकरण की तारीख और स्थान का निर्धारण जिला प्रशासन करेगा।

CoWin ऐप रखेगा अपडेट 

भारत में आम जनता को वैक्‍सीन लगवाने के लिए CoWin ऐप डाउनलोड  करना होगा। हालांकि, ध्यान देने की बात यह भी है कि गूगल प्ले स्टोर पर CoWin से मिलते-जुलते नाम वाले कई अन्य ऐप पहले से बन गए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि टीकाकरण अभियान शुरू होने से पहले CoWin ऐप लॉन्च किया जाएगा, जिसके बाद लोग इसे डाउनलोड कर सकेंगे। वैक्सीन लगवाने के लिए 12 भाषाओं में उपलब्ध इस ऐप पर पंजीकरण करना होगा। वैक्सीन की दो डोज लेने के बाद इस ऐप से सर्टिफिकेट भी मिलेगा। टीकाकरण के बाद किसी को परेशानी होती है तो साइड इफेक्ट मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी इस ऐप में ही है। इस ऐप को डिजीलॉकर से भी जोड़ा जा रहा है, ताकि वैक्सीन लगने के बाद सर्टिफिकेट इसी ऐप में सुरक्षित रखा जा सके। 24 घंटे की हेल्पलाइन और Chatbot भी ऐप में उपलब्ध होगा। 

(इंडिया साइंस वायर)







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