History Revisited: नेताजी: कटक से मिथक तक...

History Revisited: नेताजी: कटक से मिथक तक...

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे।

मौत एक शाश्वत सत्य है। लेकिन कुछ मौतें ऐसी होती हैं जिस पर रहस्य का कफ़न लिपटा होता है। नेताजी की मौत का रहस्य, भारतीय राजनीति के सबसे लंबे समय तक चलने वाला विवाद है। दशकों से भारतवासी जानना चाहते हैं कि आखिर सुभाष चंद्र बोस को क्या हुआ? क्या नेताजी एक विमान दुर्घटना में मारे गए थे या रूस में उनका अंत हुआ! या फिर 1985 तक वह , गुमनामी बाबा बनकर उत्तर प्रदेश में रहे। 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान हादसे में नेताजी की कथित मौत का सच जानने के लिए तीन-तीन आयोग बनाये गए। लेकिन हर जांच में कुछ न कुछ ऐसा आया, जिसने नेताजी की मौत की गुत्थी सुलझाने की बजाय और उलझा दी। इतना लंबा अरसा बीत जाने के बावजूद लोग यह मानने को तैयार नहीं है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना में ही मारे गए थे। कईयों का ये भी मानना है कि आज़ादी के बाद भी नेताजी काफी दिनों तक जीवित रहे और गुमनामी में अपनी ज़िंदगी बिताते रहे। इसके अलावा भी नेताजी को लेकर ढेरों कहानियां हैं, सैकड़ों अफ़साने हैं। आखिर क्या है सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच? क्या उनकी मौत एक हादसा थी? एक साज़िश? या फिर महज सियासत का एक सामान? इस प्रश्न के जवाब के लिए हमें इतिहास की गहराई में उतरने की जरूरत है और तथ्यों से जुड़ी रिपोर्टस् को खंगालने की भी आवश्यकता है। जिसके लिए हमने नेताजी से जुड़ी कुछ किताबें India's Biggest Cover Up और His Majesty's Oponent के सहारे नेताजी के मौत की रहस्य गाथा को समझने की कोशिश की और फिर सरल भाषा में आपको समझाने का प्रयास कर रहे हैं। एक ऐसी कहानी के जरिये जिसे इतनी विस्तारता से पहले कभी नहीं दिखाया गया है। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिनमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। नेताजी के प्रारंभिक पढ़ाई कटक के कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात उनकी शिक्षा कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज में हुई। बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने उसको इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अंग्रेजी शासनकाल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था, किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे वही सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। गांधी के लिए अहिंसा परम धर्म है, चाहे इस धर्म के धारण में हमें स्वराज की चाह को छोड़ना ही क्यों ना पड़े। बोस सहमत नहीं थे। उनके अनुसार अहिंसा और सत्याग्रह मंजिल नहीं केवल रास्ते थे, जिनको समय और जरूरतों के अनुसार बदला जा सकता था। क्योंकि एकमात्र लक्ष्य था स्वराज यानी विदेशी अधिकार से पूर्ण आजादी। दरअसल गांधी और बोस के संबंध कभी घनिष्ट रहे ही नहीं। सन 1921 में इन दोनों की पहली मुलाकात मुंबई के मणि भवन में हुई थी। भारत के तत्कालीन राजनीति में सबसे बड़े नेता से करीब 28 साल छोटे सुभाष चंद्र बोस ने भारत को आजादी दिलाने की गांधी की योजनाओं को अस्पष्ट करार दे दिया था। आईसीएस छोड़कर लंदन से लौटे जोशीले नौजवान को गांधी की सलाह थी कि वह चितरंजन दास से मिलकर इस मसले को गहराई से समझने की कोशिश करें। फिर भी गांधी से बोस के मतभेद हमेशा बने रहे। अगले 20 वर्षों तक चाहे वह जेल में रहे या यूरोप में उन्होंने गांधी की नीतियों का विरोध खुलकर किया। चाहे वह भगत सिंह की फांसी का मसला हो, भारत को संभावित राज्य का दर्जा देने की बात हो, आधुनिक औद्योगीकरण की जरूरत का मसला हो, अंतर दलीय प्रजातंत्र की बात हो या फिर कोई और मुद्दा बोस की निडरता जगजाहिर थी। बोस ने कहा था गांधीवादी मुझे नहीं अपनाएंगे और मैं कठपुतली नेता नहीं बनना चाहता हूं। हुआ भी कुछ ऐसा ही उनके विरोधियों ने उनका पीछा तब तक नहीं छोड़ा जब तक उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद ही नहीं छोड़ दिया। पार्टी के अंदर रहते हुए फॉरवर्ड ब्लॉक बनाने के उनके फैसले ने शीर्ष नेताओं को ज्यादा खुश नहीं किया। उनसे बंगाल कांग्रेस के नेतृत्व का हक भी छीन लिया गया और पार्टी में अगले 3 सालों तक कोई भी चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी गई। ऐसा लगता था जैसे कांग्रेस ब्रिटिश सत्ता नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ मोर्चा खोले खड़ी हो। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक कॉलम की रिपोर्ट का शीर्षक था- ''अनुशासनहीनता के चलते सुभाष बोस को मिली कड़ी सजा''। ऐसी रिपोर्ट को पढ़कर बोस चेहरे पर चोट खाई हुई कड़वी मुस्कुराहट फैल गयी।

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इस बीच दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मन से मिलकर ही आज़ादी हासिल की जा सकती है। सन 1940 के आते-आते सुभाष बोस का राजनैतिक करियर समाप्ति के कगार पे था। india's Biggest Cover Up के अनुसार 43 वर्षीय इस नेता के बारे में एक गांधीवादी ने खुलेआम कहा- गांधी के विरोधी कभी राजनैतिक तौर पर पनप नहीं सकते। जिसके बाद बोस को एक नए मंच की जरूरत थी। उन्होंने ये मंच खोज लिया। यह मंच बना उस समय का नाजीवादी जर्मनी। "मुझे भारत की आज़ादी चाहिए" का मंत्र लिए, अपनी जान पर खेलकर बोस अंग्रेजों को झांसा देकर पहले अफगानिस्तान से मॉस्को और फिर रोम होते हुए बर्लिन पहुंचे। शायद ही कोई औए ऐसा नेता ऐसा साहस दिखा सकता था। फिर नाज़ी जर्मनी की भूमि पर उदय हुआ भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले इस अभूतपूर्व सितारे का। "सुभाष बाबू" अब सेनानायक "नेताजी" बन गए। जर्मनी में ही उन्होंने आधुनिक भारत को दो सबसे बड़े तोहफे दिए।- भारत का राष्ट्रीय नारा (जय हिन्द) और भारत का राष्ट्र गान (जन गण मन) 

हिटलर और उनके बड़े अफसर नेताजी के मुरीद हो चुके थे। मुसोलिनी की तरह हिटलर भी नेताजी की तरफ यूं खिंचे जैसे लोहा चुम्बक की तरफ खिंचता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की सहायता से बोस ने आज़ाद हिन्द फौज बनाई। बोस का कहना था जार्ज वॉशिंगटन ने अपनी सेना की सहायता से अमेरिका की आज़ादी हासिल की थी। इटली को आज़ादी दिलाने वाले गरिबाल्डी के पास भी एक सेना थी। 

लेकिन उनकी उम्मीद है तब बिखरती हुई दिखने लगी जब आईएनए के सैनिकों को भारतीय सेना के सैनिकों के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। ये वह भारतीय सैनिक थे जो अंग्रेजों की गुलामी कर रहे थे। यह बात तब की है जब बंदी सैनिक खुद को भारत लाए जाने का इंतजार कर रहे थे। वह कैद में जरूर थे पर टूटे नहीं थे। उन्हें भारत लाकर इनको उसी जगह पर सजा दी गई जहां झंडा फहराने की उन्होंने कभी कसम खाई थी- लाल किला। अंग्रेजों का पासा उल्टा पड़ गया, बोस की लड़ाई सही साबित हो चुकी थी। आईएनए सैनिकों की बेइज्जती ने सभी हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई को ऐसा एकजुट किया कि स्वतंत्रता की शुरुआत से लेकर अब तक शायद ही ऐसी एकता कभी देखी गई हो।

- अभिनय आकाश