History Revisited: विमान दुर्घटना के बाद संजय की जेब में क्या तलाश रही थीं इंदिरा? विमान हादसे के पीछे का रहस्य

History Revisited: विमान दुर्घटना के बाद संजय की जेब में क्या तलाश रही थीं इंदिरा? विमान हादसे के पीछे का रहस्य

उत्तर प्रदेश के अमेठी से सांसद रहे संजय गांधी को अपने जीवनकाल के दौरान तीन हत्या के प्रयासों का सामना करना पड़ा। विकिलीक्स ने खुलासा किया था संजय गांधी पर तीन बार जानलेवा हमले किए गए थे।

एक 23 साल का लड़का जिसने अपनी मां को एक आइडिया शेयर करते हुए कि मैं देश की पहली जनता कार का निर्माण करूंगा। मां ने अपने बेटे के कार निर्माण के लिए सरकारी कंपनी के गठन का प्रस्ताव रख दिया और मारुति मोटर्स लिमिटेड कंपनी अस्तित्व में आई। जब 28 का हुआअ तो कहा मां मैं इस देश की सारी समस्याओं को हर लूंगा। तमाम दिग्गज मंत्री से लेकर संतरी तक उसके सामने हाथ बांधे खड़े नजर आए। देखते ही देखते महज 33 साल की उम्र में वो सियासत की धुरी बन गया। इस नेता के बारे में कई किस्से हैं और कहानियां हैं और साथ ही कहा जाता है कि उसे उड़ना बहुत पसंद था। केवल सियासत में ही नहीं बल्कि हवा में भी। सियासत की तरह फ्लाइंग में भी खतरनाक हद तक जोखिम लेने ऐसा शौक की चप्पल में ही प्लेन उड़ाना हवा में कलाबाजियां खाना उसका पसंदीदा शगल बन गया। लेकिन उसका यही शौक जिंदगी का आखिरी सबब भी बन गया। 1980 में भरी एक उड़ान उसकी आखिरी उड़ान साबित होती है। हम बात कर रहे हैं इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की। 23 जून 1980 इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की जिंदगी के आखिरी सुबह। सफदरजंग एयरपोर्ट के रनवे से संजय गांधी ने ठीक 7:58 पर उड़ान भरी। संजय गांधी आसमान में सुबह की सैर करना चाहते थे। लेकिन उनकी ये उड़ान अधूरी रह गई। वो सफदरजंग के रनवे पर वापस कभी नहीं लौटे। संजय गांधी की जिंदगी से जुड़े जितने किस्से मशहूर हैं उतनी ही उनके मौत को लेकर भी कई सारी कॉन्सपिरेसी थ्योरी भी सामने आई। आज आपको संजय गांधी के जीवन और मौत से जुड़ी उन्हीं कुछ कहानियों के बारे में बताते हैं।

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विमान दुर्घटना से पहले संजय को मारने की तीन कोशिशें की गईं

उत्तर प्रदेश के अमेठी से सांसद रहे संजय गांधी को अपने जीवनकाल के दौरान तीन हत्या के प्रयासों का सामना करना पड़ा। विकिलीक्स ने खुलासा किया था संजय गांधी पर तीन बार जानलेवा हमले किए गए थे। अमेरिकी खुफिया विभाग द्वारा 6 सितंबर 1976 को विदेश विभाग को प्रदान किए गए टेलीग्राफिक संचार में लिखा गया कि तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे को एक अज्ञात हमलावर ने निशाना बनाया था। हालांकि हमला एक "सुनियोजित हत्या का प्रयास" था, गांधी बच गए और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा। संजय गांधी पर एक और हमला 30 से 31 अगस्त 1976 को हुआ। विकिलीक्स के मुताबिक हमलावर ने संजय गांधी पर 3 गोलियां चलाई लेकिन वह बच गए। यह साफ नहीं है कि वह जख्मी हुए थे या नहीं। विकिलीक्स के मुताबिक संजय गांधी को इमरजेंसी के दौरान ही निशाना बनाया गया। विकीलीक्स द्वारा दस्तावेज़ को सार्वजनिक करने से पहले, संजय के जीवन पर इस तरह के किसी भी प्रयास के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अन्य अमेरिकी केबलों ने भारतीय राजनीति में संजय गांधी की भूमिका को आपातकाल के पीछे एक सत्तावादी व्यक्ति के रूप में वर्णित किया, जिन्होंने अपनी मां की शक्ति को बरकरार रखने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। जब 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई, तो कई जांच शुरू की गईं। हालांकि, उनमें से किसी ने भी संजय गांधी के ऊपर हुए हमलों के प्रयास को लेकर कोई जांच नहीं की गई। कांग्रेस के सत्ता में वापस आने के तुरंत बाद 23 जून 1980 को विमान दुर्घटना में 33 वर्षीय युवा सांसद की मौत हो गई थी।

सियासत की तरह फ्लाइंग में भी खतरनाक हद तक जोखिम लेने की आदत

राजीव गांधी जहां विमान उड़ाने के तमाम नियमों का पालन किया करते थे। वहीं संजय गांधी प्लेन को कार की तरह उड़ाया करते थे। तेज हवा में कलाबाजियां खाना उनका शौक था। 1977 से ही गांधी परिवार के करीबी रहे धीरेंद्र ब्रह्मचारी एक ऐसा टू शिटर विमान पिट्स एस टू ए इंपोर्ट करना चाहते थे जिसे खासतौर पर हवा में कलाबाजियां खाने के लिए बनाया गया था। मई 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने इस विमान को भारत लाने की मंजूरी दी थी। आनन-फानन में इस विमान को असेंबल करके सफदरजंग हवाई अड्डे दिल्ली फ्लाई क्लब में पहुंचा दिया गया। संजय गांधी पहले ही दिन उस विमान को उड़ाना चाह रहे थे। लेकिन पहला मौका फ्लाइंग क्लब के इंस्ट्रक्टर को मिला। संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को इस नए पिट्स विमान पर अपना हाथ आजमाया। उस वक्त संजय गांधी अमेठी से सांसद थे और एक महीने पहले ही कांग्रेस के महासचिव बनाए गए थे। मगर संजय को अपनी सत्ता और ताकत के लिए इन पदों की कोई जरूरत नहीं थी। सब जानते थे कि पिछले पांच साल से वहीं कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे। 23 जून 1980 सुबह के वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर से एक हरे रंग की मेटाडोर गाड़ी बाहर निकली। जिसमें इंदिरा गांधी के छोटे बेटे 14 दिसंबर 1946 को जन्मे संजय गांधी चला रहे थे। बताया जाता है कि संजय जल्दी में घर से निकले और मां को बाय भी नहीं बोला। 3 महीने 10 दिन का बेटा वरुण सो रहा था। पत्नी मेनका उसे संभालने में लगी हुई थी। संजय एक किलोमीटर दूर सफदरजंग एयरपोर्ट पहुंचे। यहां दिल्ली फ्लाइंग क्लब के चीफ इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना उनका इंतजार कर रहे थे। कलाबाजी खाने के लिए मुफीद लाल इंजन वाला एयरक्राफ्ट पिट्स एस टू ए तैयार खड़ा था। संजय गांधी सियासत की तरह फ्लाइंग में भी खतरनाक हद तक लापरवाह और जोखिम लेने वाले थे। वो अक्सर सुरक्षा नियमों को तोड़ दिया करते थे।

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चप्पल में ही प्लेन उड़ाने लग जाते 

कुछ दावों के मुताबिक संजय गांधी ने अपने बड़े भाई की कॉकपिट में प्लेन उड़ाते समय उचित जूते पहनने की सलाह को  को नजरअंदाज कर दिया। राजीव गांधी ने कई बार संजय गांधी को प्लेन उड़ाने के दौरान जूते पहनने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। संजय गांधी के बड़े भाई राजीव गांधी ने उन्हें पिट्स प्लेन उड़ाने से मना भी किया था क्योंकि संजय गांधी के पास प्लेन उड़ाने का बहुत खास अनुभव नहीं था। संजय गांधी के पास प्लेन उड़ाने का बस 300 से 350 घंटे का ही अनुभव था। राजीव गांधी पर आयोजित एक फोटो प्रदर्शनी पर बनाए गए 5 मिनट के वीडियो में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस बात जिक्र भी किया था। राहुल गांधी ने कहा- 'उन्हें (संजय गांधी को) वह प्‍लेन नहीं उड़ाना चाहिए था लेकिन उन्होंने उड़ाया। और वही हुआ जो उड़ाने का अनुभव न होने पर होता है। आसानी से खुद की जान ली जा सकती है।'

संजय का नियंत्रण खत्म हो गया और फिर घर्र घर्र की आवाज के साथ...

सुबह 7.15 बजे के करीब कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला। संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए। उसके भी कुछ मिनटों के बाद उनका नियंत्रण खत्म हो गया और फिर घर्र घर्र की आवाज करता हुआ डिप्लोमैटिक एनक्लेव में संजय गांधी के घर से कुछ ही मिनटों की एरियल दूरी पर पिट्स क्रैश कर गया। कहा जाता है कि उस दिन यूपी के मुख्यमंत्री राजा साहब यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह इंदिरा गांधी से मुलाकात के लिए उनके निवास स्थान पर आए हुए थे। तभी इंदिरा के सहायक आरके धवन को ये बोलते हुए सुनते हैं कि बहुत बड़ा हादसा हो गया। बस इतना सुनते ही बिखरे हुए बालों में ही इंदिरा गांधी बाहर निकलीं और घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं। मौके पर एंबुलैंस और एयरक्राफ्ट पहुंचे और डालियां काटी गईं व विमान के मलबे के बीच से संजय और सुभाष के शरीर को निकाला गया।

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सुब्रमण्यम स्वामी ने संजय गांधी की मौत के पीछे सोवियत-सोनिया लिंक का आरोप लगाया

भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने साल 2021 में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष और संजय की भाभी सोनिया गांधी को निशाना बनाते हुए संजय गांधी की मौत को लेकर एक नया दावा किया। द वीक की रिपोर्ट के अनुसार स्वामी ने आरोप लगाया कि तत्कालीन सोवियत संघ ने सोनिया को लाभ पहुंचाने के लिए संजय की मौत की साजिश रची थी। उन्होंने इस बारे में ट्वीट करते हुए लिखा कि "आखिरकार टीडीके को फायदा पहुंचाने के लिए सोवियत संघ ने उनके विमान में एक रिसाव को ठीक कर दिया और उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी। विमान अशोका होटल के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया, लेकिन विस्फोट नहीं हुआ। क्यों?" टीडीके एक संक्षिप्त शब्द है जिसे स्वामी ट्विटर पर सोनिया को संदर्भित करने के लिए उपयोग करते हैं। स्वामी ने पहले आरोप लगाया था कि सोवियत संघ और सोनिया गांधी की मिली भगत थी। 2019 में उन्होंने दावा किया कि सोनिया गांधी ने 1984 में इंदिरा से स्वर्ण मंदिर पर हमला करने का आग्रह किया था। उन्होंने ट्वीट किया कि स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन "पाकिस्तान के खिलाफ हमारी रक्षा के लिए हमें (भारत) यूएसएसआर पर अधिक निर्भर बनाने के लिए एक सोवियत संघ की साजिश थी।

संजय की जेब में क्या तलाश रही थीं इंदिरा?

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका तवलीन सिंह ने अपनी किताब दरबार में लिखा है कि जो रिपोर्टर घचटनास्थल पर पहुंचा था उसने हादसे को लेकर तमाम कहानियां सुनाई। कहा जाता है कि मां इंदिरा गांधी दुर्घटना के चंद मिनट बाद ही वहां पहुंच गई थीं। इसके साथ ही वो संजय गांधी की जेब में कुछ तलाश रही थीं और बाद में वापस लौट गईं। ये भी कहा जाता है कि इंदिरा एक बार फिर उस जगह गईं जहां संजय का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। कहा गया वह संजय की घड़ी और चाबियों का गुच्छा ढ़ूढ़ने गई थीं। उस घड़ी में स्विस बैंक का अकाउंट नंबर था। इसके साथ ही  अफवाहों में तो इंदिरा गांधी को रुमाल में लपेट कर कुछ दिये जाने की बात भी रही लेकिन कभी इसकी पुष्टि नहीं हुई।

- अभिनय आकाश