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अजमेर के गरीब नवाज़ की मज़ार पर दिन भर बहती रहती है भक्ति रस की धारा

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Sep 12 2018 4:14PM

अजमेर के गरीब नवाज़ की मज़ार पर दिन भर बहती रहती है भक्ति रस की धारा
Image Source: Google
राजस्थान स्थित अजमेर भी जाना असंख्य श्रद्धालुओं के मन की चाहत है। भारत ही नहीं दुनिया भर से, सूफी संत ख्वाजा मोइनूदीन चिश्ती के चाहने वाले रोज़ाना अजमेर का रुख करते हैं। कई दशकों से तमन्ना थी की अजमेर जाकर सजदा करूं। कभी जा नहीं पाया मगर इस बार इतफाक, सच गजब इतफाक रहा कि बेटी की शादी में विदेश से आया बेटा भी साथ हो लिया और बेटी व दामाद भी साथ में आए।
 
चंडीगढ़ से सीधी ट्रेन जाती है ‘गरीब रथ’। गाड़ी एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर रुकती है, मगर वक्त रात का होता है और सीधे अजमेर पहुंचाती है इसलिए अच्छी है। हमने बरसों बाद रेलयात्रा करनी थी इसलिए ज़्यादा मज़ा आना ही था। खाना प्राइवेट सप्लायर से अंबाला में मंगा लिया था। खाने में सब्जी तो गरम रहती है मगर नान खाने में देर हो जाए तो रबड़ की तरह हो जाती है और लगभग काटकर खानी पड़ती है। खाने के बाद दो तीन घंटे तो ताश सीखते खेलते बीत गए, मेरी पत्नी ने संभवतः पहली बार ताश खेली। पहुंचने की जल्दी थी नहीं, अगले दो तीन दिन सबकी छुट्टी थी। सुबह की चाय और हल्का नाश्ता तो ट्रेन में ही हो गया था मगर अजमेर आने में समय लग रहा था। 
 
अरावली पर्वतावलियों की तलहटी में सन 1113 के आसपास बसना शुरू हुआ अजमेर अब स्मार्ट शहरों की लिस्ट में है। रेलवे स्टेशन पर फास्ट वाईफाई का विज्ञापन यह बताता है। स्टेशन से बाहर आते आते दीवारों व छतों पर की गई चित्रकारी लोगों की बातचीत, पहनावा समझा देता है कि आप राजस्थान में हैं। बुर्का कायम है मगर अब डिज़ाइन ने इसमें पैठ बना ली है। हम पेट की आग बुझाने रैस्टौरेंट में बैठे। परांठे में भरपूर मिर्चीली स्टफिंग ने जगह का स्वाद भी बता दिया। होटल जाने के लिए ई-रिक्शा के ड्राइवर ने तंग बाज़ार में झटकट और छोटी मोटी टक्करें मारते हुए झट से होटल में पटक दिया। यहां से मज़ार पास में ही रही। संस्कारों के कारण सूफी संगीत, कवाली हम पांचों को पसंद रहा, सो हमारी दिली तमन्ना पूरी होने जा रही थी। होटल के रिसेप्शन पर बताया, आप के साथ ख़ादिम भेजेंगे। समझाया कि वहां मज़ार पर कहीं पैसे न चढ़ाएं न किसी को दें। कैमरा हमें छोड़कर जाना पड़ा हां सेलफोन का कैमरा क्लिक कर सकता है।
 
हम खादिम के साथ जा रहे हैं, हर दुकान के बाहर तक सामान रखा है हालांकि बाज़ार तंग है। पारम्परिक बेकरी के साथ समोसे, पकौड़े कितना कुछ फ्राइड हाज़िर, साथ की दुकान में बकरे की गर्दन पर छुरी चल रही। यहां की खास मिठाई सोहन हलवा कई स्वादों में है, लोगों ने दुकानें हाट की तरह सजा रखी हैं। लोबान कई खुशबुओं में बिक रहा, यह बिरोजा के मिश्रण से बनता है जब इसे जलते कोयले पर डालते हैं तो धूनी की तरह पर्यावरण को खास खुशबू से भर देता है। लोबान अगरबती में भी है। खादिम कह रहा है कि अपने पैसों, मोबाइल फोन का ध्यान रखें अंदर कई शातिर लोग इन्हें चुराने में मशगूल रहते है। यहां याद आ गया कि खुदा उसकी मदद करते हैं जो अपनी मदद आप करता है। हर प्रसिद्ध धर्मस्थल की तरह श्रद्धालुओं की लाइन है। किलानुमा क्षेत्र में अनेक दुकानों पर गुलाब व चमेली के लाखों फूल रखे हैं। हमने कहा और देर न हुई, टोकरी में गुलाब के फूल व चादर हाज़िर। चादर आपकी श्रद्धा के मुताबिक कीमत की जो आप चढ़ाना चाहें। मेरे बेटे व दामाद ने इन्हें अपने सर पे सजाया और चल पड़े मज़ार की ओर, अब एक नया आदमी हमारे साथ रहा जो दुकान वाले का बंदा था। यहां मोबाइल, कैमरे से बेहतर व्यस्त भूमिका निभाता है। छोटी राजस्थानी रंगीन पगड़ियां व हरा रंग खूब दिखा पहना व आसपास का हिस्सा बना हुआ। श्रद्धालु जो मज़ार से आ चुके हैं आराम से फर्श पर यहां वहां बैठे हैं। जाने वाले उत्सुकता की लाइन में खड़े हैं। दाएं तरफ साफ सुथरी जगह पर नमाज़ अदा की जा रही है। इतर व गुलाब की सुगंध ने वातावरण को महका रखा है।
 
सफेद संगमरमर की शानदार गुंबद के नीचे इबादत के लिए हम मज़ार के पास खड़े हैं। अलौकिक कहिए, अनूठी, विरल भावना दिल में उमड़ रही है, चांदी की ऐतिहासिक, कलात्मक चारदिवारी के बीच गुलाब की पंखुड़ियों में गरीब नवाज़ हैं। आदर से चादर पेश की जाती है, हमारी ओर से अर्पित गुलाब की पंखुड़ियां यहां बिछी तमाम पंखुड़ियों का हिस्सा हो जाती हैं। इस अद्भुत जगह की सौम्य दिव्यता मेरे रोम रोम में तन्मयता से लिपटी सिहरन उगा देती है। संतुष्टि ने दिल में घर कर लिया और मुक़द्दर की मुरम्म्त हो गई। गरीब नवाज़ पर यकीन रखने वाले सिर झुकाकर शुक्रिया अदा कर रहे हैं। मन्नत मांग रहे हैं। चांदी पर उत्कृष्ट कारीगरी के साथ-साथ यहां दीवारों पर खुशनुमा रंगों में आकर्षक चित्रकारी भी लाजवाब है। बाहर प्रांगण में, कव्वाली के माध्यम से की जा रही ज़ियारत अमीर खुसरो की याद दिला रही है। उनके कितने ही बोल यहां गरीब नवाज़ की शान बढ़ा रहे हैं। चिश्ती दरगाहों में प्रमुख इस दरगाह के आंगन में हिंदु, मुस्लिम व सिख कलाकारों को बड़े अदब के साथ सजदा करते देखा गया है। शहनाई, तबला, हारमोनियम व ढोलक सुर में बंधकर पंचमस्वर में गाए जा रहे कलाम का साथ देकर भक्ति रस का माहौल रचते हैं तो लगता है यहां जो पवित्र श्रद्धा व साफ दिल से दुआ करते हैं उनकी मुरादें ज़रूर पूरी होती होंगी। 
 
गायक व साथी आकर फर्श पर बैठ हारमोनियम पर उंगलियां चलाते स्वर साधते हैं, ढोलकी चंद लम्हों में ही समां बांध देती है। यहां पेश हो रहे कलाम, गरीब नवाज़ की इबादत की खुदाई मस्ती से वातावरण को लबरेज कर देते हैं।  
 
‘मची है धूम आलम में तुम्हारे आने की, बना करती हैं यहां तक़दीरें ज़माने की'
 
‘शहर ए अजमेर पर रहमत की घटा छाई है'
 
हज़रत अमीर खुसरो की मशहूर रचना ‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके.....’ लब बार बार गुनगुनाते हैं और मन बार बार सुनता है
 
इंसानी ख़िदमत को अपनी मंज़िल मानने वाले सूफी संत ख्वाजा मुइनूदीन चिश्ती, दुनिया के शांतिदूत हैं। मज़ार पर अपार जनसमूह है, बताते हैं यहां कभी ऑफ सीजन नहीं होता। दुनिया भर से, गरीब, बड़े, अमीर और धन कुबेर ‘गरीब’ बनकर दुआ करने पहुंचते हैं। कितने ही नामों से जाना जाने वाला सालाना उर्स ख्वाजा की याद में मनाया जाता है, जो इस्लामिक कैलेंडर के सातवें महीने के पहले छह दिन तक चलता है। बताते हैं सूफी संत ने छह दिन अकेले में प्रार्थना करते करते ‘उस’ दुनिया के लिए ‘इस’ दुनिया को अलविदा कह दिया था। देसी विदेशी मकबूल गायक, क़व्वाल उनके साथी, साज़िंदों की टोलियां यहां दिन रात यहां ख़्वाजा के आंगन में भक्ति रस फुहारती रहती हैं और श्रद्धालुओं की बजती तालियां उनका रंग जमा रही होती हैं। उर्स के समापन दिवस पर सुबह की दुआ के बाद लोग इकट्ठा होना शुरू हो जाते हैं। पवित्र कुरान, दारूड, शीजा ए चिशतिया व अन्य काव्यों का पाठ होता है। सभी के लिए शांति, समृद्धि, व खुशी के लिए दुआ की जाती है। मुग़लों के समय से स्थित ऐतिहासिक विशाल आकार की दो देगों (विशाल बर्तन) में चावल, घी, मेवे, केसर डालकर खीर का नियाज़ (प्रसाद) बना हज़ारों लाखों श्रद्धालुओं द्वारा खाया जाता है। आजकल श्रद्धालु इस देग में नकदी व खाद्य अर्पित कर रहे हैं। 
 
यात्रा का मक़सद पूरा हो जाए तो बेहद तस्सली मिलती है, उधर कामकाज बुला रहा होता है। अब हम ई-रिक्शा में स्टेशन जा रहे हैं। नाक को बेहद परेशान करती, गंदी नालियों से उगती दुर्गंध बताती है कि हम लोग विश्व विख्यात धार्मिक जगहों की सफाई व रख रखाव के बारे में कितने जागरूक हैं। साफ दिखता है कि हम हर सामाजिक मुहिम को कितनी संजीदगी से लेते हैं। सड़क पर पहुंचते हैं तो ट्रैफिक अखाड़े में ट्रक, बस, थ्री वहीलर, रिक्शा, साइकिल, पैदल और जानवर सब सामूहिक दंगल हारते दिखे। स्टेशन पर बैठे इंतज़ार करना है गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी नहीं है। इस बीच मेरी नज़र एक रेलवे महिला सफाई कर्मचारी की तरफ जाती है जो घूंघट निकाले, नंगे हाथ और पूरी तन्मयता से कचरा पेटी से कूड़ा निकाल कर ठेले में डाल रही है। काश गरीब नवाज़ से प्रेरणा लेकर हम मानवता के लिए कुछ ज़रूरी काम भी करते।
 
-संतोष उत्सुक

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