• सप्तमी तिथि को ऊषा अर्घ्य देकर सम्पन्न होता है छठ पर्व

छठ महापर्व की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सादगी तथा पवित्रता को खास महत्व दिया जाता है। इसके अलावा पर्यावरण को प्राथिमकता देते हुए नदी के किनारे बांस की टोकरी में सूर्य भगवान की पूजा होती है। इसके अलावा प्रसाद बनाने में चावल, गुड़ और गेहूं का इस्तेमाल किया जाता है।

छठ महापर्व की शुरूआत हो गयी है। आज षष्ठी तिथि है जिसमें सांध्य अर्घ्य दिया जाता है उसके बाद सप्तमी तिथि को ऊषा अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य देवता को अर्घ्य देकर विधिवत पूजा की जाती है उसके बाद छठ महापर्व सम्पन्न हो जाता है तो आइए हम आपको सांध्य तथा ऊषा अर्घ्य के बारे में खास बातें बताते हैं।

इसे भी पढ़ें: छठ महापर्व पर खरना का क्यों है खास महत्व, आइये समझते हैं

शाम का अर्घ्य

छठ पर्व के तीसरे दिन शाम को अर्घ्य दिया जाता है उसे संध्या अर्घ्य भी कहा जाता है। यह संध्या अर्घ्य चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस पवित्र दिन लोग पूरे दिन पूजा की तैयारियां करते हैं और शाम को नदी या तालाब किनारे परिवार सहित प्रसाद को लेकर जाते हैं। छठ पूजा में खास तौर से प्रसाद बनाया जाता है जिसमें ठेकुआ और कचवानिया बनाया जाता है। प्रसाद में ठेकुआ और कचवानिया के अलावा सभी तरह के मौसमी फल भी रखे जाते हैं। छठ पूजा के दौरान सभी प्रसाद को बांस की टोकरी में रखा जाता है जिसे दउरा कहा जाता है। घर में पूजा करने के बाद एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल, तथा पूजा का सामान दउरा में रख कर घर के पुरुष सदस्य घाट की ओर जाते हैं। प्रसाद के दउरा को सिर पर इसलिए रखा जाता है क्योंकि वह अपवित्र न हो।

नदी या तालाब के किनारे स्थान बनाकर महिलाएं बैठती हैं तथा नदी से मिटटी निकाल कर छठ माता का जो चौरा बनाया जाता है और वहां नारियल के साथ पूजा का सामान रखा जाता है। सूरज डूबने से थोड़ी देर पहले व्रती पूजा का सामान लेकर पानी में खड़े हो जाते हैं। उसके बाद अर्घ्य देने के बाद कुछ लोग घाट पर रात भर रूकते हैं लेकिन कुछ लोग अपने दउरा का प्रसाद लेकर घर चले जाते हैं। उसके बाद सप्तमी की सुबह अर्घ्य दिया जाता है। 

सुबह का अर्घ्य 

छठ पर्व के चौथे दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय भक्त उगते सूर्य की पूजा कर अर्घ्य देते हैं। कुछ लोग शाम के अर्घ्य में चढ़ाए गए पकवानों को नए पकवानों से बदल देते हैं लेकिन फलों को नहीं बदला जाता रहै। इस समय भी शाम की तरह ही विधिवत पूजा कर अर्घ्य दिया जाता है। उसके बाद वहां खड़े लोगों को प्रसाद बांट कर घर आते हैं। घर आंकर प्रसाद को अपने पड़ोसियों में वितरित किया जाता है। घर के पास पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है और व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रत तोड़ते हैं। इस तरह व्रत तोड़ने को पारण कहा जाता है। इसके व्रती कुछ अन्न-जल ग्रहण करते हैं।

ऐसे दें अर्घ्य 

सबसे पहले व्रती नदी, तालाब या नहर के पानी में उतर कर खड़े होकर सूर्य का ध्यान करते हैं। उसके बाद बांस और पीतल के बर्तनों में रखे गए प्रसाद को हाथ में लेकर सूर्य भगवान को तीन बार दिखाकर जल को स्पर्श कराते हैं। उसके बाद परिवार के लोग लोटे में दूध भरकर प्रसाद के ऊपर अर्पित करते हैं।

इसे भी पढ़ें: छठ पूजा में की जाती है सूर्य देव की उपासना

अर्घ्य का मुहूर्त 

छठ पूजा में अर्घ्य देने का मुहूर्त होता है तथा उसी मुहूर्त के समय अर्घ्य दिया जाता है।

इस साल 20 नवंबर: दिन शुक्रवार- को संध्या अर्घ्य शाम 05:26 बजे दिया जाएगा।

21 नवंबर: दिन शनिवार-  06:49 बजे सुबह का अर्घ्य दिया जाएगा। 

छठ का सामाजिक महत्व

छठ महापर्व की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सादगी तथा पवित्रता को खास महत्व दिया जाता है। इसके अलावा पर्यावरण को प्राथिमकता देते हुए नदी के किनारे बांस की टोकरी में सूर्य भगवान की पूजा होती है। इसके अलावा प्रसाद बनाने में चावल, गुड़ और गेहूं का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही इस महापर्व की विशेषता है कि इसमें वेद और पुराण को प्राथमिकता न देकर किसानों, ग्रामीण जन जीवन और परम्पराओं को महत्व दिया जाता है। 

प्रज्ञा पाण्डेय