मैकाल की पहाडि़यों में स्थित अमरकंटक है लोकप्रिय हिन्दू तीर्थस्थल

  •  प्रीटी
  •  जनवरी 19, 2019   16:18
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मैकाल की पहाडि़यों में स्थित अमरकंटक है लोकप्रिय हिन्दू तीर्थस्थल

अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध महाभारत के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं- इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है।

अमरकंटक नर्मदा नदी, सोन नदी और जोहिला नदी का उदगम स्थान है। यह मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित है। यह हिंदुओं का पवित्र स्थल है। मैकाल की पहाडि़यों में स्थित अमरकंटक मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले का लोकप्रिय हिन्‍दू तीर्थस्‍थल है। समुद्र तल से 1065 मीटर ऊंचे इस स्‍थान पर ही मध्‍य भारत के विंध्य और सतपुड़ा की पहाडि़यों का मेल होता है। चारों ओर से टीक और महुआ के पेड़ो से घिरे अमरकंटक से ही नर्मदा और सोन नदी की उत्‍पत्ति होती है। नर्मदा नदी यहां से पश्चिम की तरफ और सोन नदी पूर्व दिशा में बहती है। यहां के खूबसूरत झरने, पवित्र तालाब, ऊंची पहाडि़यों और शांत वातावरण सैलानियों को मंत्रमुग्‍ध कर देते हैं। प्रकृति प्रेमी और धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को यह स्‍थान काफी पसंद आता है। अमरकंटक का बहुत सी परंपराओं और किवदंतियों से संबंध रहा है। कहा जाता है कि भगवान शिव की पुत्री नर्मदा जीवनदायिनी नदी रूप में यहां से बहती है। माता नर्मदा को समर्पित यहां अनेक मंदिर बने हुए हैं, जिन्‍हें दुर्गा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। अमरकंटक बहुत से आयुर्वेदिक पौधों मे लिए भी प्रसिद्ध है, जिन्‍हें किंवदंतियों के अनुसार जीवनदायी गुणों से भरपूर माना जाता है।

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धुनी पानी

अमरकंटक का यह गर्म पानी का झरना है। कहा जाता है कि यह झरना औषधीय गुणों से संपन्‍न है और इसमें स्‍नान करने शरीर के असाध्‍य रोग ठीक हो जाते हैं। दूर-दूर से लोग इस झरने के पवित्र पानी में स्‍नान करने के उद्देश्‍य से आते हैं, ताकि उनके तमाम दुखों का निवारण हो।

नर्मदाकुंड और मंदिर

नर्मदाकुंड नर्मदा नदी का उदगम स्‍थल है। इसके चारों ओर अनेक मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों में नर्मदा और शिव मंदिर, कार्तिकेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर, अन्‍नपूर्णा मंदिर, गुरू गोरखनाथ मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, वंगेश्‍वर महादेव मंदिर, दुर्गा मंदिर, शिव परिवार, सिद्धेश्‍वर महादेव मंदिर, श्रीराधा कृष्‍ण मंदिर और ग्‍यारह रूद्र मंदिर आदि प्रमुख हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव और उनकी पुत्री नर्मदा यहां निवास करते थे। माना जाता है कि नर्मदा उदगम की उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है, इसीलिए शिव को जटाशंकर कहा जाता है।

नर्मदा कुण्ड और मंदिर, नर्मदा नदी का उद्गम यहीं है

दूधधारा

अमरकंटक में दूधधारा नाम का यह झरना काफी लो‍कप्रिय है। ऊंचाई से गिरते इसे झरने का जल दूध के समान प्रतीत होता है इसीलिए इसे दूधधारा के नाम से जाना जाता है।

कलचुरी काल के मंदिर

नर्मदाकुंड के दक्षिण में कलचुरी काल के प्राचीन मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों को कलचुरी महाराजा कर्णदेव ने 1041-1073 ई. के दौरान बनवाया था। मछेन्‍द्रथान और पातालेश्‍वर मंदिर इस काल के मंदिर निर्माण कला के बेहतरीन उदाहरण हैं।


सोनमुदा

सोनमुदा सोन नदी का उदगम स्‍थल है। यहां से घाटी और जंगल से ढ़की पहाडियों के सुंदर दृश्‍य देखे जा सकते हैं। सोनमुदा नर्मदाकुंड से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर मैकाल पहाडि़यों के किनारे पर है। सोन नदी 100 फीट ऊंची पहाड़ी से एक झरने के रूप में यहां से गिरती है। सोन नदी की सुनहरी रेत के कारण ही इस नदी को सोन कहा जाता है।


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मां की बगिया

मां की बगिया माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी-भरी बगिया से स्‍थान से शिव की पुत्री नर्मदा पुष्‍पों को चुनती थी। यहां प्राकृतिक रूप से आम, केले और अन्‍य बहुत से फलों के पेड़ उगे हुए हैं। साथ ही गुलबाकावली और गुलाब के सुंदर पौधे यहां की सुंदरता में बढोतरी करती हैं। यह बगिया नर्मदाकुंड से एक किलोमीटर की दूरी पर है।


कपिलधारा

लगभग 100 फीट की ऊंचाई से गिरने वाला कपिलधारा झरना बहुत सुंदर और लोकप्रिय है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि कपिल मुनी यहां रहते थे। घने जंगलों, पर्वतों और प्रकृति के सुंदर नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। माना जाता है कि कपिल मुनी ने सांख्‍य दर्शन की रचना इसी स्‍थान पर की थी। कपिलधारा के निकट की कपिलेश्‍वर मंदिर भी बना हुआ है। कपिलधारा के आसपास अनेक गुफाएं है जहां साधु संत ध्‍यानमग्‍न मुद्रा में देखे जा सकते हैं।


कबीर चबूतरा

स्‍थानीय निवासियों और कबीरपंथियों के लिए कबीर चबूतरे का बहुत महत्‍व है। कहा जाता है कि संत कबीर ने कई वर्षों तक इसी चबूतरे पर ध्‍यान लगाया था। कहा जाता है कि इसी स्‍थान पर भक्त कबीर जी और सिक्खों के पहले गुरु श्री गुरु नानकदेव जी मिलते थे। उन्होंने यहां अध्‍यात्‍म व धर्म की बातों के साथ मानव कल्‍याण पर चर्चाएं की। कबीर चबूतरे के निकट ही कबीर झरना भी है। मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर और डिंडोरी जिले के साथ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली की सीमाएं यहां मिलती हैं।

सर्वोदय जैन मंदिर

यह मंदिर भारत के अद्वितीय मंदिरों में अपना स्‍थान रखता है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में स्‍थापित मूर्ति का वजन 24 टन के करीब है।


श्री ज्‍वालेश्‍वर महादेव मंदिर

श्री ज्‍वालेश्‍वर महादेव मंदिर अमरकंटक से 8 किलोमीटर दूर शहडोल रोड पर स्थित है। यह खूबसूरत मंदिर भगवान शिव का समर्पित है। यहीं से अमरकंटक की तीसरी नदी जोहिला नदी की उत्‍पत्ति होती है। विन्‍ध्‍य वैभव के अनुसार भगवान शिव ने यहां स्‍वयं अपने हाथों से शिवलिंग स्‍थापित किया था और मैकाल की पह‍ाडि़यों में असंख्‍य शिवलिंग के रूप में बिखर गए थे। पुराणों में इस स्‍थान को महा रूद्र मेरू कहा गया है। माना जाता है कि भगवान शिव अपनी पत्‍नी पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। मंदिर के निकट की ओर सनसेट प्‍वाइंट है।

मन्दिर और मूर्तियाँ

अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध महाभारत के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं- इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है। इसे कर्णदहरिया का मन्दिर भी कहते हैं। यह तीन विशाल शिखरयुक्त मन्दिरों के समूह से मिलकर बना है। ये तीनों पहले एक महामण्डप से संयुक्त थे, किन्तु अब यह नष्ट हो गया है। इस मन्दिर के बाद का बना हुआ एक अन्य मन्दिर मच्छींद्र का भी है। इसका शिखर भुवनेश्वर के मन्दिर के शिखर की आकृति का है। यह मन्दिर कई विशेषताओं में कर्णदहरिया के मन्दिर का अनुकरण जान पड़ता है।

नर्मदा का उदगम

नर्मदा का वास्तविक उदगम उपर्युक्त कुण्ड से थोड़ी दूर पर है। बाण ने इसे चंद्रपर्वत कहा है। यहीं से आगे चलकर नर्मदा एक छोटे से नाले के रूप में बहती दिखाई पड़ती है। इस स्थान से प्रायः ढाई मील पर अरंडी संगम तथा एक मील और आगे नर्मदा की कपिलधारा स्थित है। कपिलधारा नर्मदा का प्रथम प्रपात है, जहाँ पर नदी 100 फ़ुट की ऊँचाई से नीचे गहराई में गिरती है। इसके थोड़ा और आगे दुग्धधारा है, जहाँ नर्मदा का शुभ्रजल दूध के श्वेत फेन के समान दिखाई देता है। शोण या सोन नदी का उदगम नर्मदा के उदगम से एक मील दूर सोन-मूढ़ा नामक स्थान पर से हुआ है। यह भी नर्मदा स्रोत के समान ही पवित्र माना जाता है। महाभारत वनपर्व में नर्मदा-शोण के उदगम के पास ही वंशग़ुल्म नामक तीर्थ का उल्लेख है। यह स्थान प्राचीन काल में विदर्भ देश के अंतर्गत था। वंशग़ुल्म का अभिज्ञान वासिम से किया गया है।

प्रीटी







महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:35
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महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पावन नाम हमारे गौरवशाली इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज भी उन्हें सरबंसदानी, दानवीर, क्रांतिवीर एवं संत−सिपाही के रूप में याद किया जाता है। यों तो हमारे देश में अनेकों दानवीर हुए हैं जिन्होंने मानवता को त्रास मुक्त करने के लिए अनेकों बलिदान दिए। जैसे महर्षि शिबि ने इस संसार को राक्षसों के आतंक से बचाने के लिए जीते जी अपनी हडि्डयों का दान तक दे डाला। लेकिन दुनिया के इतिहास को बांचने पर कोई भी ऐसा उद्धरण नहीं मिलता जहाँ पर किसी ने अपने माता−पिता, पुत्रों एवं अपने सर्वस्व का दान दिया हो। मानवता की रक्षा हेतु गुरु जी अपने 7 और 9 साल के बच्चों का बलिदान देने से भी नहीं घबराए।

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हमारे विद्वतजनों का कथन है कि पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं। जिस समय उनका जन्म हुआ तो पीर भीखण शाह जी ने पश्चिम दिशा में सिजदा करने की बजाय पूर्व दिशा में सिजदा किया। जब उनके शिष्यों ने उनकी इस उल्टी रीति का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि इस संसार के दुःख, संताप हरने वाला अवतार धरण कर चुका है। मैंने पूर्व दिशा से उठ रहे उसी इलाही नूर को सिजदा किया है। आप सब देखेंगे कि वो अपने दिव्य बल−शौर्य, कुर्बानी और संतत्व से इस संसार का काया कल्प करके रख देगा। और उनकी इस बात को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 9 साल की छोटी-सी अवस्था में ही सिद्ध कर दिया था। जिस समय कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आकर उन्हें औरंगज़ेब द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचारों से अवगत कराते हैं। तो उनकी बात सुनकर श्री गुरु तेग बहादुर जी अत्यंत गंभीर होकर वचन करते हैं कि इसके लिए तो किसी महापुरुष को अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी। उस समय बाल गोबिंद भी श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास ही बैठे थे, कहने लगे−पिता जी आप से बड़ा महापुरुष इस संसार में भला और कौन हो सकता है? वह जानते थे कि महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुर्बानियां भी महान ही देनी पड़ती हैं। इसलिए बाल गोबिंद 9 साल की अल्प आयु में ही मानवता की रक्षा हेतु अपने गुरु पिता का बलिदान देकर क्रांति का आगाज़ करते हैं। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि समाज में फैले अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार की जड़ें जमा चुकी गहरी मलीनता को साफ करने लिए किसी महान क्रांति की ही आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि क्रांति ही वह मशाल है जो जुल्म और जालिमों द्वारा फैलाई कालिमा को दूर कर सकती है। महान कवि नामधरी सिंह दिनकर भी क्रांति की परिभाषा देते हुए कहते हैं− 'जब अचानक से आई कोई परिवर्तन की लहर इस संसार की दशा व दिशा को तेजी से बदल दे उसे क्रांति कहा जाता है। क्रांति वह धधकती ज्वाला है जो मानव के अंदर पल रहे अन्याय के भय को समाप्त कर इसके खिलाफ लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।' और गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐसी ही क्रांति का आगाज़ करते हुए कहा−'चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं। तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।। 

क्रांति को अंग्रेजी में Revolution कहा जाता है जो लैटिन भाषा के शब्द revolutio से निकला है जिसका अर्थ होता है a turn around अर्थात् किसी अवस्था का बिलकुल ही पलट जाना। अगर हम अवस्था की बात करें तो संसार में रहने वाले जीवों की मुख्यतः दो अवस्थाएं होती हैं। एक है बाह्य और दूसरी है आंतरिक। बाह्य अवस्था में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक आदि कारण आते हैं। परंतु आंतरिक कारणों में मानव का चिंतन, नैतिकता, चरित्र आदि जैसे गुण आते हैं। 

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम क्रांति के द्वारा किसी की बाह्य अवस्था तो बदल सकते हैं लेकिन किसी की आंतरिक अवस्था को बदलना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जैसे आप किसी को रहने के लिए अच्छा घर, अच्छे कपड़े व खाना तो दे सकते हैं लेकिन उसे मानसिक तृप्ति देना आप के वश में नहीं है। वस्तुतः यह व्यक्ति की आंतरिक अवस्था है जो उसके अंदर से उत्पन्न होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी इस बात से भिज्ञ थे कि बाह्य क्रांति के द्वारा आप लोगों पर कुछ समय तक शासन तो कर सकते हैं लेकिन उनके अंदर आंतरिक परिवर्तन नहीं ला सकते। एवं किसी में अंदरूनी परिवर्तन लाए बिना उसे बदलना सिर्फ उसका लिबास बदलने के समान है। जिन्हें कुछ समय पश्चात फिर से बदलना पड़ सकता है। इसलिए वही क्रांति सफल मानी जाती है जिससे लोगों की सोच में भी अंतर आ जाए। इसलिए वे खालसा पंथ की सृजना करके एक आध्यात्मिक क्रांति का आगाज़ करते हैं। क्योंकि इसी के द्वारा ही समाज के बिगड़े चेहरे को फिर से संवारा जा सकता है। जिससे जालिम हुकमरानों के पैरों तले रौंदी मानवता को फिर से खुले आसमान में उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, परिणाम स्वरूप बिचित्र सिंह जैसे डरे, सहमे, भीरु लोगों में शौर्य का संचार हो जाता है।

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उस समय औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा। परिणामतः वह न तो लोगों की दशा बदल सका एवं न ही दिशा। अपितु लोगों के अंदर एक डर, भय व सहम पैदा कर दिया। 

लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब खालसे का सृजन किया तो वह उनसे शीश भी मांगते हैं। परंतु गुरु जी को बिना कोई प्रश्न पूछे उनके सेवक अपने शीश कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं। आइए देखते हैं अंतर कहाँ पर है? किसी की सोच बदलने या उसे अपनी सोच छोड़ने के लिए उसे नए एवं श्रेष्ठ विचार प्रदान करने पड़ते हैं। जिस पगडंडी को लोग मार्ग समझ लेते हैं उसकी बजाय उन्हें विशाल मार्ग देना पड़ता है। और इस पगडंडी से विशाल मार्ग पर आगे बढ़ना ही क्रांति से आध्यात्मिक क्रांति का सफर है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी वाले दिन इसी विशाल आध्यात्मिक क्रांति की स्थापना की एवं लोगों के अंदर नवचेतना का संचार किया। हम इस बात को भलीभांति जानते हैं कि श्री गुरु जी एक महान योद्धा व तलवार के धनी थे। वह तलवार के जोर पर लोगों को खालसा बना सकते थे। लेकिन उन्होंने पहले लोगों की आंतरिक अवस्था को बदलकर आध्यात्मिक क्रांति को पहल दी एवं लोगों के अंदर भक्ति एवं शक्ति के सच्चे सुमेल की स्थापना की और वे संत सिपाही कहलाए। एवं दबे कुचले लोगों धर्म, जाति, देश और खुद की रक्षा के लिए शौर्य पैदा किया। समाज पर भारी पड़ रही आतंकी शक्तियों का समूल नाश किया। सज्जनों इतिहास में ऐसे महान पन्ने किसी आध्यात्मिक पुरुष द्वारा ही लिखे जा सकते हैं। जो विश्व पटल पर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करते हैं। 

आज सदियां बीत जाने के बाद भी मानव श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना जीवन धन्य कर रहा है। महापुरुष व उनकी शिक्षाएं किसी खास काल के लिए होती अपितु वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम करती हैं। 

इसलिए सज्जनों अगर आज हम भी समाज से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, चरित्रहीनता, जाति−पाति, ईर्ष्या, द्वेष का समूल नाश करना चाहते हैं तो हमें भी अपने अंदर एक संपूर्ण क्रांति अर्थात आध्यात्मिक क्रांति की मशाल जगानी पड़ेगी। क्योंकि यदि हर एक व्यक्ति अपने अंदर से दूषित विचारों का नाश कर दे तो फिर समाज को सुंदर, आनंदमयी एकता के सूत्र में बंधने से कोई भी अमानवीय ताक्त नहीं रोक सकती। इसलिए आओ हम सब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दानवीरता को याद करते हुए उनके श्री चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

-सुखी भारती







Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:28
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Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या?

हम विगत अंकों से श्री हनुमान जी के दिव्य चरित की महिमा व उनके समाज पर पड़ रहे उत्कृष्ट प्रभाव का अवलोकन कर पा रहे हैं। उनकी जीव को प्रभु से जोड़ने की कला व उनके पीछे छुपे परमार्थ की स्वर्ण अक्षरों में भी प्रशंसा की जाए तो कम है। कितनी विचित्र बात है कि वे स्वयं तो दास बन गए और सुग्रीव को बनवा दिया मित्र। मानो वे कहना चाह रहे हों कि हे जीव! अगर तूने किसी को मित्र बनाना ही है तो संसार में सच्चा मित्र मिलना अति दुर्लभ व कठिन है। कहने को तो सब कह देंगे कि हे मित्र! हम सदा साये की तरह आपके साथ चलेंगे। लेकिन हम इतना तो जानते ही हैं कि साया भी तो तभी तक साथ चलता है जब तक आपके समीप प्रकाश के स्रोत विद्यमान हैं। प्रकाश हो तो एक साया तो होता ही है और प्रायः अनेकों साए भी प्रकट होने लगते हैं। लेकिन कब तक? ज़रा प्रकाश का साथ घटने तो दो, अंधकार को रास्तों पर बिछने तो दें, फिर देखना। साए का कहीं नामोनिशान भी प्रतीत नहीं होगा। 

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ठीक इसी प्रकार संसार के मित्र होते हैं। जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या? जो केवलमात्र स्वार्थ की नींव पर टिके हों। उनके ऐसे बेबुनियाद दावे हमें आखिर कहाँ तक आधार देंगे? जिसमें शब्दों के तो बड़े से बड़े इन्द्र जाल हों लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य ही निकले। हम बैठे हैं तो साथ बैठने वालों की संख्या बहुत हो लेकिन प्रश्न तो यह है कि साथ खड़ा कौन होता है? 

मित्रता की ही बात करें तो कर्ण और दुर्योधन में लोक मत के अनुसार गहरी मित्रता है। लेकिन इस मित्रता की आधारशिला क्या थी? यही न कि दुर्योधन ने कुंतीपुत्र कर्ण को अंग प्रदेश का राजा घोषित किया था। उसमें भी उसका कोई स्वार्थ यही था कि इतना बड़ा योद्धा मेरे सदा काम आएगा। कर्ण को भले ही राज्य का लोभ नहीं था। लेकिन मन में यह अहसास तो हावी था ही कि भरी सभा में जब सब मेरा तिरस्कार कर रहे थे तो दुर्योधन ने मुझे अंगराज बना कर सम्मान दिया। मुझे राजा बनाया और इसका ऋण मैं दुर्योधन के काम आकर चुकाऊंगा। यही वह कारण था जिसके चलते कर्ण ने दुर्योधन का अधर्म में भी साथ निभाया। तो क्या मित्र का धर्म यही था कि हमें तो बस आँखें बंद कर अपने मित्र का हर परिस्थिति में साथ देना है भले ही वह धर्म पर हो अथवा अधर्म पर। जी नहीं! वास्तविक मित्र तो वह ही है जो अपने मित्र को अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर उन्मुख करे। यह कैसी मित्रता है कि एक मित्र कुँए में गिर रहा है और हम उसको गिरने से बचाने के बजाय ऊँचे स्वर में यह कहते आगे बढ़ रहे हैं कि मित्र तुम अकेले कुँए में क्यों गिरोगे, रुको मैं भी तुम्हारे साथ गिरता ही गिरुंगा क्योंकि मैं तेरा सच्चा मित्र हूँ।

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भगवान श्रीराम भी सुग्रीव से मित्रता कर रहे हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ है कि सुग्रीव अपनी सेना सहित श्री सीता जी को ढुंढ़वाने में उनकी सहायता करेंगे। भला उन्हें किसी की सहायता की क्या आवश्यकता हो सकती थी। और वास्तव में तात्त्विक दृष्टि से तो श्रीसीता जी श्रीराम जी से विलग थीं ही नहीं। बस यह सब तो लीला मात्रा घटना थी। किंतु हाँ सहायता की आवश्यकता सुग्रीव को अवश्य थी। और श्रीराम ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य एवं पत्नी दिलाकर यह सहायता निश्चित ही की। उसे मान−सम्मान, पद प्रतिष्ठा सब दिया। लेकिन दुर्योधन की तरह उनका मित्र भाव कहीं भी ऐसा नहीं था मैं सुग्रीव का अपने लिए 'योग' नहीं अपितु 'प्रयोग' करूँगा। लेकिन सुग्रीव अगर श्रीराम से हुए इस पावन योग का दुरुपयोग करेगा तो अवश्य ही मैं उसे अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर मोडूंगा। और श्रीराम ने आगे चलकर ऐसा किया भी। क्योंकि राज्य और पत्नी मिलने के पश्चात तो सुग्रीव अपना सेवा कार्य भूल ही गया था। सिर्फ माया में मस्त होकर रह गया। प्रभु को लगा कि बारिश के चार मास बीतने के बाद भी सुग्रीव ने हमारी कोई सुध नहीं ली तो अब हमें ही उसकी सुध लेनी पड़ेगी। तो श्रीराम लक्ष्मण के समक्ष ही क्रोधित स्वर में यह घोषणा करते हैं कि सुग्रीव अपना सेवा धर्म बिसार चुका है। जिस कारण मैं उसी बाण से उसका वध करूंगा जिस बाण से मैंने बालि को मारा था−

सुग्रीवहिं सुधि मोरि बिसारी बिहारी। पावा राज कोस पुर नारी।। 

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥

लक्ष्मण जी श्रीराम जी का यह स्वभाव देखकर एक बार तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि प्रभु का स्वभाव तो सदैव क्षमा करना और सब कुछ देकर भी, सब भूल जाना ही है। लेकिन कह रहे हैं कि मैं सुग्रीव को उसी बाण से मार डालूंगा जिस से मैंने बालि को मारा था। यह देखकर लक्ष्मण मन ही मन समझ जाते हैं कि प्रभु सुग्रीव को मारने वाले बिलकुल नहीं हैं। क्योंकि प्रायः तो आजतक यही देखा गया है कि अगर कोई किसी पर क्रोधित है तो वह उसे उसी क्षण मारने के लिए दौड़ता है। और अकसर यही कहता है कि रूक तुझे मैं अभी मज़ा चखाता हूँ। लेकिन यहाँ प्रभु कह रहे हैं कि मैं आज नहीं अपितु कल मारूंगा तो इसका अर्थ है कि वे मारने−वारने वाले बिलकुल नहीं हैं। वे तो बस सुग्रीव का कोई पाप ही हर रहे हैं। श्री लक्ष्मण जी ने यह मौका पाकर कहा कि प्रभु आप बड़े हो और सुग्रीव के बड़े भाई को आपने मारा। सुग्रीव छोटा है तो उसे मारने का आदेश अपने छोटे भाई अर्थात् मुझे दीजिए न। श्रीराम ने सुग्रीव को देखा तो सोच में पड़ गए कि अरे लक्ष्मण तो सुग्रीव वध हेतु सच में ही तत्पर हो गए हैं। अरे भाई! अपने मित्र को भी भला कोई मारता है? मित्र की तो रक्षा की जाती है। हमें सुग्रीव को नहीं अपितु उसकी मूढ़ता और अज्ञानता को मारना है। इसलिए हे लक्ष्मण! सुग्रीव हमारे पास बालि के भय के कारण आया था। बालि वध के साथ ही सुग्रीव का भय भी चला गया। अब फिर से तुम भी उसको भय दिखाना, मारना मत। और भय भी इतना नहीं कि वह हमसे डर कर कहीं और दूर ही भाग जाए। बस ऐसे डराना कि भागकर भी हमारी ही तरफ आए।

भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।

सज्जनों कितनी पावन व हितकारी मित्रता है श्रीराम जी की। लेकिन यह सब संभव कब हुआ जब श्री हनुमान जी सद्प्रयास करते हैं। श्री हनुमान जी आगे भी कैसे−कैसे परहित के कार्य करते हैं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...

-सुखी भारती







Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 15, 2021   16:50
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Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

सज्जनों! श्रीमद्भगवत गीता केवल श्लोकों का पुंज नहीं है। श्लोक होते हुए भी भगवान की वाणी होने से ये मंत्र भी हैं। इन मंत्र रूपी श्लोकों में बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ है जो समस्त मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

आइए ! गीता प्रसंग में चलें--- पिछले अंक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मन में उत्पन्न शंका का समाधान करते हुए कर्मयोग करने का उपदेश दिया था। इस जगत में कर्म ही प्रधान है, कर्म की प्रधानता को देखकर ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा—

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कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।

श्री भगवान उवाच

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 

आगे भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है। 

इंसान के कर्तव्य कर्म का असर देवताओं पर भी पड़ता है और वे भी अपने कर्तव्य कर्म में संलग्न हो जाते हैं। 

इस विषय में एक दृष्टांत है- चार किसान बालक थे। आषाढ़ का महीना आने पर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलाने का समय आ गया है, वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समय पर अपने कर्तव्य का पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेत में जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरों ने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि क्या बात है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर 

ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्य पालन में पीछे क्यों रहें? ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लगे। अब मेघों (बादलों) ने विचार किया, हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगने पर उन्होंने भी सोचा कि हम अपने कर्तव्य से क्यों हटें? उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। अब मेघों की गर्जना सुनकर इंद्र ने सोचा कि बात क्या है? जब इंद्र को मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब इंद्र ने भी अपने कर्तव्य-पालन का निश्चय किया और मेघों को वर्षा करने की आज्ञा दे दी।    

यह है, कर्म का प्रभाव। जब प्रत्येक व्यक्ति अहंकार छोड़कर अपने-अपने कर्तव्य का पालन करता है, तब परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार को सुख पहुंचता है। 

अब निम्नलिखित श्लोक में भगवान अपना स्वयं का उदाहरण देकर अपने वक्तव्य की पुष्टि करते हैं। 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे पृथा पुत्र पार्थ! इस त्रैलोक में मेरे लिए कुछ भी करना बाकी नहीं है। मुझे सब कुछ प्राप्त है फिर भी मैं कर्म करता हूँ। भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

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“धर्म संरक्षणार्थाय धर्म संस्थापनाय च”

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन ! यदि मैं अपना कर्म सावधानी पूर्वक न करूँ तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि मैं आदर्श पुरुष हूँ। सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं, यदि मैं अपने कर्तव्य का पालन नहीं करूँ, तो इस संसार में कोई भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और कर्तव्य का पालन नहीं करने से उनका पतन हो जाएगा। मनुष्य को इस जगत में कैसे रहना चाहिए? यह बताने के लिए भगवान मनुष्य लोक में अवतार लेते हैं। सच पूछिए, तो संसार एक पाठशाला है जहाँ हमें लोभ और लालच को किनारे कर अपने साथ-साथ दूसरों के हित के लिए कर्म करना सीखना है। शास्त्र और उपनिषदों का यही निचोड़ है कि हम जीवन पर्यंत दूसरों के हित में लगे रहें। उसी का जीवन धन्य है जिसने स्वयं को पर हित में लगा दिया।

गोस्वामी तुलसीदास महाराज की यह अमर चौपाई भी इसी बात का समर्थन करती है।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण

- आरएन तिवारी







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