क्या होती है अखाड़ों की पेशवाई ? इस बार कौन कौन से अखाड़े और संत पहुँचे ?

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Jan 8 2019 7:22PM
क्या होती है अखाड़ों की पेशवाई ? इस बार कौन कौन से अखाड़े और संत पहुँचे ?
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पेशवाई एक धार्मिक शोभा यात्रा है जिसमें अखाड़ों के आचार्य, पीठाधीश्वर, महामंडलेश्वर, साधु-संत और नागा संन्यासियों का कारवां हाथी, घोड़े और ऊंट पर सवार होकर गंगा के किनारे बनी छावनी में पहुंचता है और पूरे मेले के दौरान वहां प्रवास करता है।

प्रयागराज में लगने जा रहे दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम कुंभ 2019 में वैसे तो आकर्षण के कई केंद्र रहेंगे लेकिन विभिन्न अखाड़े इनमें सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र होते हैं। आइए आपको बताते हैं इस साल जो प्रमुख अखाड़े कुंभ में भाग ले रहे हैं उनकी पेशवाई के बारे में। पेशवाई एक धार्मिक शोभा यात्रा है जिसमें अखाड़ों के आचार्य, पीठाधीश्वर, महामंडलेश्वर, साधु-संत और नागा संन्यासियों का कारवां हाथी, घोड़े और ऊंट पर सवार होकर गंगा के किनारे बनी छावनी में पहुंचता है और पूरे मेले के दौरान वहां प्रवास करता है।
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अखिल भारतीय श्री वैष्णव अखाड़े
 
अखिल भारतीय श्री वैष्णव तीनों अनी अखाड़ों की पेशवाई हाथी-घोड़े और बाजे-गाजे के साथ निकली। केपी ग्राउंड से निकली इस पेशवाई में श्री पंच निर्मोही अखाड़ा, श्री पंच दिगंबर अखाड़ा और श्री पंच निर्वाणी अखाड़ा के साधु संत हाथी-घोड़े और बघ्घी पर सवार थे। सबसे आगे सात हाथी, कई घोड़े और हाथ में ध्वजा लिए साधुओं का समूह था। इस समूह के पीछे साधु तलवार से कलाबाजी दिखा रहे थे। पेशवाई में रथ के क्रम में सबसे आगे जगद्गुरू रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य का रथ था। इसके पीछे दादू पंथी निर्मोही अखाड़ा, उज्जैन के महामंडलेश्वर महंत ज्ञान दास जी महाराज, श्री महंत माधवाचार्य जी महाराज, रामसुंदरदेवाचार्य जी महाराज और महामंडलेश्वर स्वामी रामदास जी महाराज का रथ था। इस शोभायात्रा की भव्यता और साधु-संतों का दर्शन करने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद थे। पेशवाई को देखने के लिए सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं का हुजूम खड़ा था। लोग पेशवाई पर फूल वर्षा कर साधु-संतों का स्वागत कर रहे थे।



किन्नर अखाड़ा
 
प्रयागराज में पहली बार किन्नर अखाड़े की देवत्व यात्रा निकली। किन्नर साधु संतों का दर्शन करने के लिए लाखों की तादाद में लोग एकत्रित हुए। राम भवन चौराहे से निकली इस देवत्व यात्रा की खास बात यह रही कि इसमें किन्नर संत घोड़ों और बग्घियों पर सवार थे, जबकि बाकी अखाड़ों की यात्रा में ट्रैक्टर ट्राली पर रखे सोने-चांदी के हौदों पर साधु-संत विराजमान थे। इस देवत्व यात्रा में 25 से अधिक बग्घियां थीं। वहीं दूसरी ओर, घोड़े गीत-संगीत की धुन पर थिरकते हुए बच्चों का मनोरंजन कर रहे थे। यद्यपि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने किन्नर अखाड़ा को मान्यता नहीं दी है। लेकिन किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बीच नगर में देवत्व यात्रा निकाली जिससे यह सभी के आकर्षण का केंद्र बनी। किन्नर अखाड़े की इस देवत्व यात्रा में सबसे आगे आठ बग्घियों पर अखाड़े के संत विराजमान थे और इसके पीछे अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ऊंट पर सवार थीं और लोगों को आशीर्वाद दे रही थीं। इनके पीछे एक वाहन में अखाड़े के आराध्य देवता महाकालेश्वर विराजमान थे। देवत्व यात्रा में आराध्य देवता के पीछे बाजे-गाजे और झांकियों के साथ बग्घियों पर किन्नर साधु संत सवार थे और लोगों को आशीर्वाद दे रहे थे। किन्नर संतों ने सुंदर साड़ियां पहन रखी थीं और खूब श्रृंगार कर रखा था जिससे उनकी यह यात्रा एक अलग ही छठा बिखेर रही थी।
 


 
श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा की पेशवाई
 
शैव संन्यासी सम्प्रदाय के श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा की पेशवाई बाघम्बरी गद्दी के निकट स्थित आनंद अखाड़ा के आश्रम से शुरू हुई जिसमें चांदी के हौदों पर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और अन्य साधु संत सवार थे। अखाड़े के आराध्य देव भुवन भास्कर भगवान सूर्यनारायण के संरक्षण में पारंपरिक ढंग से हाथी घोड़े और गाजे-बाजे के साथ पेशवाई छावनी पहुंची। पेशवाई का नेतृत्व अखाड़ा के आचार्य पीठाधीश्वर बालकानंद गिरी कर रहे थे। पेशवाई में सबसे आगे हाथी पर सवार साधु-महात्मा विराजमान थे और उनके पीछे अखाड़े की धर्म ध्वजा लहरा रही थी। ध्वजा के पीछे घोड़े पर सवार नागा साधुओं का समूह चल रहा था। इस समूह के पीछे पालकी में आराध्य भगवान सूर्य नारायण विराजमान थे। इनके पीछे चांदी के हौदे पर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर श्री ज्ञानानंदजी महाराज, श्रीमहंत शंकरानंद सरस्वती, महंत गणेशानंद जी महराज, महंत जगदीश गिरी, महंत कैलाश पुरी, महंत लक्ष्मण भारती, महंत विजेन्द्रानंद गिरी, महन्त गिरिजानंद सरस्वती, महंत रवीन्द्र पुरी समेत साधु-महात्मा और नागा संन्यासी चल रहे थे। इस शोभायात्रा की भव्यता और साधु-संतों का दर्शन करने के लिए सैंकड़ों की संख्या में लोग मौजूद थे। पेशवाई को देखने के लिए सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं का हुजूम खड़ा था। लोग पेशवाई पर फूल वर्षा कर साधु-संतों का स्वागत कर रहे थे।
 
श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़े की पेशवाई
 
हाथी-घोड़े और बैंड बाजे के साथ श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़ा की पेशवाई निकली। पेशवाई में सोने-चांदी के हौदों पर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर और अन्य साधु संत सवार थे। पेशवाई निकालने से पूर्व अखाड़े के साधु संतों ने दारागंज स्थित अखाड़ा परिसर में अखाड़े के आराध्य देवता गणपति भगवान और ध्वजा की पूजा अर्चना की जिसके बाद पेशवाई निकाली गई। पेशवाई के बांध पर पहुंचने पर मेला प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों ने आचार्य महामंडलेश्वर श्री स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती महाराज का माला पहना कर स्वागत किया। इस अखाड़े की पेशवाई में सबसे आगे हाथी-घोड़े की सवारी करते हुए साधु संत निकले और इसके बाद अखाड़े की ध्वजा थी जिसके पीछे नागा संन्यासियों का समूह चला। नागा संन्यासियों के बाद आराध्य देवता भगवान गणपति की पालकी थी। पालकी के पीछे श्री शम्भू पंचायती अटल अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर श्री स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती महाराज और महामंडलेश्वर श्री स्वामी महेश्वरानंद पुरी जी महाराज सोने के हौदे पर विराजमान थे। पेशवाई में महामंडलेश्वर श्री स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी जी महाराज और बड़ी संख्या में साधु संत शामिल थे।
 

 
श्री पंचायती निरंजनी अखाड़े की पेशवाई
 
हाथी, घोड़े, ऊंट और बैंड बाजे के साथ श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा की पेशवाई निकली। पेशवाई में सोने-चांदी के हौदों पर अखाड़ा के महामंडलेश्वर और अन्य साधु संत सवार थे। पेशवाई निकालने से पूर्व अखाड़े के साधु संतों ने भारद्वाजपुरम स्थित बाघम्बरी गद्दी मठ में अखाड़े के आराध्य देवता भगवान शंकर के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय निरंजन देव और ध्वजा की पूजा अर्चना की जिसके बाद पेशवाई निकाली गई। पेशवाई के बांध पर पहुंचने पर मंडलायुक्त आशीष गोयल, मेलाधिकारी विजय किरण आनंद, एसएसपी कुम्भ मेला केपी सिंह और अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा के सचिव एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्री महंत नरेंद्र गिरि का फूल मालाओं से स्वागत किया। इस अखाड़े की पेशवाई में सबसे आगे हाथी-घोड़े और ऊंट की सवारी करते हुए साधु संत निकले और इसके बाद अखाड़े की ध्वजा थी जिसके पीछे नागा संन्यासियों का समूह चला। नागा संन्यासियों के बाद आराध्य देवता भगवान कार्तिकेय की पालकी थी जिसके बाद अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर श्री स्वामी बालकानंद गिरि जी महाराज सोने के हौदे पर विराजमान थे।
 
- नीरज कुमार दुबे

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