Gyan Ganga: हनुमानजी में दो हृदयों को आपस में जोड़ने की गज़ब की कला है

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 5, 2021   19:04
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Gyan Ganga: हनुमानजी में दो हृदयों को आपस में जोड़ने की गज़ब की कला है

प्रभु ऐसा सोच ही रहे थे कि श्री हनुमान जी कह उठे 'सो सीता कर खोज कराहहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि' अर्थात् सुग्रीव से मित्रता करने से मात्र सुग्रीव को ही लाभ नहीं होगा। अपितु आप को भी होगा। क्योंकि वे अपने करोड़ों वानरों को श्री सीता जी की खोज में लगा देंगे।

विगत अंक में हमने देखा कि श्री हनुमान जी प्रभु श्री राम जी को सुग्रीव तक ले जाने हेतु पूरी तरह कमर कसे हुए हैं। और बातों ही बातों में यह नींव रख दी कि हे प्रभु! आप सुग्रीव को अपना मित्र बना लीजिए। अन्यथा वह दास तो आपका है ही। श्रीराम जी हनुमान जी को निहार कर अपनी किसी विशेष सोच में डूबे हैं। वह सोच यह कि क्यों अनेकों जीव जोड़ने की बजाय सिर्फ तोड़ने में ही विश्वास रखते हैं। हमारी अयोध्या नगरी को ही ले लीजिए। मंथरा को आखिर किस बात की कमी थी। हमने उसे शिशु काल से ही बांचा है। दुराव व विलगता के भाव तो उसमें संस्कारों से ही थे। और अपनी कपट कला का प्रदर्शन वह कितना समय पहले ही कर देती। लेकिन इसके लिए उसे माता कैकेई जैसा उपयुक्त पात्र ही नहीं मिला। उसकी जीवों को मुझसे तोड़ने की कला में महारत तो देखिए कैसे−कैसे उसने कद्रू व विनीता की पौराणिक कथा में भी सौतन भाव वाला विष घोल कर माता कैकेई के मस्तिष्क में भी विष घोल दिया। और इधर श्री हनुमान जी सुग्रीव के हृदय से मेरे प्रति समस्त प्रकार के विष हरने को आतुर हैं। और कैसे हनुमान जी सुग्रीव को मुझे मेरे मित्र के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। क्योंकि मित्रता तो प्रायः बराबर वालों में ही होती है। तो हनुमान जी ने मुझमें और सुग्रीव में आखिर समानता ढूंढ़ ही ली। यह ठीक भी तो है। क्योंकि मुझमें और सुग्रीव में तो अनेकों ही समानताएं विद्यमान भी हैं। हम दोनों ही थोड़ा अधिक सम्मान के हकदार हैं। क्योंकि हमें तो राज सिंहासन पर बिठाने की मात्र केवल घोषणा ही हुई थी। लेकिन सिंहासन पर बैठने से पहले ही हमें अयोध्या से निकलना पड़ा। यद्यपि सुग्रीव तो कुछ दिन सिंहासन पर विराजमान भी हुए थे।

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दूसरा हम दोनों की पत्नियों पर ही परतंत्रता का कष्ट आन पड़ा। मेरी पत्नी रावण के कब्जे में है और सुग्रीव की पत्नी उसके भाई बालि के कब्जे में है। इस कष्ट में भी सुग्रीव मेरे समान न होकर अधिक ही पीड़ित है। क्योंकि सुग्रीव की पत्नी को तो बालि को पति मान कर व्यवहार भी करना पड़ रहा है। यद्यपि मेरी सीता पर तो रावण अभी केवल विवाह हेतु दबाव बनाने तक ही सीमित है। पर सब देखते हुए तो हमें शीघ्र ही सुग्रीव की पीड़ा हर लेनी चाहिए। और ऐसी पीड़ाएं जितनी कोई मित्र से सांझा कर सकता है किसी और से नहीं। 

प्रभु ऐसा सोच ही रहे थे कि श्री हनुमान जी कह उठे 'सो सीता कर खोज कराहहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि' अर्थात् सुग्रीव से मित्रता करने से मात्र सुग्रीव को ही लाभ नहीं होगा। अपितु आप को भी होगा। क्योंकि वे अपने करोड़ों वानरों को श्री सीता जी की खोज में लगा देंगे। देखिए यहाँ श्री हनुमान जी जीव की प्रभु से मित्रता करवाने के लिए जीव के गुणकारी व हितकारी महत्व को रखना बिल्कुल नहीं भूलते। मानों कह रहे हों कि भले मैंने सुग्रीव के लिए दीन व दास शब्द प्रयोग किए लेकिन आपके दास दीन होने के पश्चात भी असीमित बल रखते हैं। और 'दास' तो 'स्वामी' से भी बड़ा होता है। बड़ा इसलिए क्योंकि किसी व्यक्ति को स्वामी होने का पद व अधिकार कब सिद्ध होता है? जब उसका कोई दास अस्तित्व में आता है। जैसे लौकिक दृष्टि में भले ही माँ अपने पुत्रा से सदैव बड़ी ही रहेगी। लेकिन तात्विक दृष्टि ऐसा नहीं कहती। क्योंकि एक स्त्री तब तक माँ नहीं अपितु केवल स्त्री ही रहेगी। जब तक उसकी कोख से शिशु जन्म नहीं ले लेता। शिशु जन्म के साथ ही उस स्त्री को माँ होने का अधिकार प्राप्त होता है। अर्थात् माँ के द्वारा सिर्फ एक शिशु का ही जन्म नहीं हुआ अपितु माँ के अस्तित्व का भी जन्म होता है। श्री हनुमान जी मानों कह रहे हों कि प्रभु सुग्रीव भी कोई छोटा नहीं क्योंकि अगर वह दीन नहीं होता तो आपको भला दीनहीन कौन कहता। वह 'दास' नहीं होता तो आप 'स्वामी' कैसे होते। और सबसे अहम बात पर तो आप ने विचार ही नहीं किया। वह यह कि सुग्रीव आपकी पत्नी सीता जी को ढुंढ़वाने में दिन−रात एक कर देंगे। बस आप चलकर उनसे मित्रता तो कीजिए। श्री हनुमान जी मानों प्रभु के आगे भक्तों का सकारात्मक पक्ष रख रहे थे। वह यह कि प्रभु यहाँ−तहाँ यही बदनाम किया जाता है कि आपकी भक्ति करने पर भक्त को लाभ ही प्राप्त होता है। तो आप अपनी उदाहरण देकर समझा दो कि नहीं भाई केवल भक्त का ही नहीं अपितु हम भगवान को भी जीव से लाभ होता है। देखो श्री सीता जी को ढुंढ़वाकर सुग्रीव जी ने हमें लाभ ही दिया न। 

हालांकि श्री हनुमान जी की सुग्रीव से ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई कि वे सीताजी को ढूंढ़ कर लाएंगे अथवा नहीं। लेकिन हनुमान जी ने यहाँ दावा अवश्य कर दिया है। वास्तव में यह प्रस्ताव या घोषणा माता सीता जी को ढूंढ़ने के संबंध में नहीं थी। मंतव्य तो यह था कि हे प्रभु! मित्रता में तो लेना देना बना होता है। तो हमने आपको बता दिया कि आपका मित्र सुग्रीव आपको श्री सीता जी से जरूर मिलवा देगा। और आपके लिए मित्रता में इससे अधिक सुंदर कोई और उपहार हो ही नहीं सकता। लेकिन ध्यान से प्रभु! बदले में आपका भी तो कर्त्तव्य बनता है न कि अपने मित्र को आप भी कुछ ऐसा दें जिसे पा उसका मानसिक कष्ट कटे और साथ में परम सुख की भी अनुभूति हो। और अर्धांगिनी वियोग का कष्ट भला आपसे अधिक और कौन समझ सकता है। और पुनः अर्धांगिनी का मिलन हो तो वह सुख शब्दों में वर्णित नहीं हो सकता। इसलिए प्रभु हमारे राजा तो आपको यह सहायता करने हेतु तत्पर हैं ही। लेकिन क्या आप भी हैं? अगर नहीं सोचा तो मन ही मन पहले संकल्प लें कि आप भी सुग्रीव की इस पीड़ा का हरण करेंगे।

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और हे प्रभु! सुग्रीव तो दीन है ही। लेकिन आप 'दीनहीन' हैं अथवा नहीं यह सिद्ध होना अभी बाकी है। सुग्रीव की दीनता व हीनता से तो आप परिचित हो ही। और उसके पीछे एक ही मुख्य कारण है उनका बड़ा भाई 'बालि'। जिसने सुग्रीव से राज्य छीन उन्हें वनों में दर−दर भटकने को विवश कर दिया है। अतः आपका सर्वप्रथम व सर्वोपरि कार्य तो यही बनता है कि आप बालि को दण्डित कर सुग्रीव को पुनः राज सिंहासन पर बिठायें व उसकी दीनता व हीनता हर कर अपने 'दीनहीन' होने को सिद्ध करें। बस मेरी यही मेरी याचना है। 

वाह! दो हृदयों को आपस में जोड़ने की श्री हनुमान जी में क्या गज़ब की कला है। प्रभु और जीव में सामंजस्य बिठाने की इस सुंदर गाथा में श्री हनुमान जी ने कहीं भी स्वयं को सर्वोपरि व केन्द्र में नहीं रखा। न ही कोई व्यक्तिगत स्वार्थ ही साधने की कोशिश की। जीव प्रभु से जुड़ कैसे कल्याण को प्राप्त हो बस यही धुन है। आगे श्री हनुमान जी कैसे प्रभु का मिलन करवाते हैं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...

-सुखी भारती







Gyan Ganga: इसलिए बालि का वध करने का प्रण पूर्ण करना चाहते थे प्रभु श्रीराम

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 25, 2021   17:21
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Gyan Ganga: इसलिए बालि का वध करने का प्रण पूर्ण करना चाहते थे प्रभु श्रीराम

बालि को भले ही अपनी उपलब्ध बहिुत श्रेष्ठ लगे कि उसके सामने आने वाले का बल आधा हो जाये लेकिन भगवान श्रीराम जी को यह कतई स्वीकार नहीं था। क्योंकि प्रभु का यह मत ही नहीं है कि आपके सामने भले ही सामने वाले का बल आधा रह जाए।

विगत अंक में हम श्रीराम जी द्वारा बालि वध के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पर मंथन कर रहे थे। प्रसंग निःसंदेह मार्मिक व अर्थपूर्ण है। कोई श्रीराम जी से पूछ ले कि कैकेई ने आपके प्रति निष्ठुरता तभी दिखाई जब उसकी आसक्ति का केन्द्र बिंदु श्री भरत जी थे। श्री भरत ही न होते तो कैकेई भला आपका बनवास क्यों मांगती? तो एक सांसारिक विश्लेषण तो यह भी कहता है कि भरत जी भी श्रीराम जी को वन भेजने हेतु जिम्मेवार हैं। भले ही उनकी व्यक्तिगत कोई भूमिका व भावना नहीं है। लेकिन उनका अस्तित्व होना ही उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका से इनकार नहीं कर रहा। तो ऐसे में क्या श्रीराम जी भरत जी के प्रति वैर भाव पालते हैं? नहीं न! अपितु अथाह प्रेम व स्नेह की रसधरा निरंतर उनके हृदय से बहती रहती है। प्रश्न उठता है कि स्वयं के भाई के प्रति जैसी आपकी प्रीति है ठीक वैसी ही मनोभावना भले सुग्रीव की अपने भाई के प्रति नहीं। लेकिन शत्रुता वाली भी तो बिलकुल नहीं। सुग्रीव जब अपने भाई को दण्डित नहीं करना चाहता तो आपको भला क्या पड़ी है कि बालि वध का अपना प्रण पूर्ण करना ही है।

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तो इसके पीछे एक अन्य कारण यह भी है कि बालि को यह वरदान था कि उसके समक्ष जब भी कोई शत्रु उपस्थित होता था तो शत्रु का बल आधा रह जाता था। और वह बल बालि में प्रवेश कर जाता था। बालि को भले ही अपनी यह उपलब्ध बहिुत श्रेष्ठ लगे लेकिन श्रीराम जी को यह कतई स्वीकार नहीं था। क्योंकि प्रभु का यह मत ही नहीं है कि आपके सामने भले ही सामने वाले का बल आधा रह जाए। आप किसी का बल आधा कर देते हैं तो यह आपकी उपलब्धि नहीं अपितु कमी है। आपके बल की श्रेष्ठता इसी में है कि आप जिसके समक्ष खड़े हो तो आपको देख उसका बल दोगुना हो जाए, वह आसमां छूने लगे। आपको देख भय से कोई आधा रह जाए तो यह आपकी जीत नहीं अपितु हार है। आपको देख कोई सक्षम से अक्षम की स्थिति में आ जाए तो कोई आपके देखने से भी कतराएगा। आपका दर्शन ही अगर भयक्रांत करने वाला है तो आप तो अशुभ हुए। और अशुभ होने को अगर बालि अपनी विशेषता मानता है तो इसका अर्थ बालि मन से बीमार है। मानसिक रोगी है। बल की श्रेष्ठता तो तब है जब आपका बल किसी अति निर्बल व अक्षम व्यक्ति में भी इतना बल भर दे कि वह काल से भी लड़ने को तत्पर हो जाए। और बालि को यह भ्रम कब से हो गया कि मेरा बल मेरे पुरुषार्थ के कारण है।

सज्जनों वास्तविक्ता यद्यपि यह है कि हमारा जितना भी बल व पराक्रम होता है वह सब ईश्वरीय बल के प्रभाव से ही होता है। हमारे बल के पीछे ईश्वरीय बल का ही प्रतिबिंब छुपा होता है। श्री हनुमान जी भी जब अशोक वाटिका उजाड़ देते हैं तो अनेकों राक्षसों का वध कर देते हैं और जब उन्हें ब्रह्मपाश में बांधकर रावण के समक्ष लाया जाता है तो रावण भी श्री हनुमंत जी से कुछ ऐसा ही प्रश्न करता है−

कह लंकेस कवन तैं कीसा।

केहि कें बल छालेहि बन खीसा।।

रावण कहता है कि हे कपि! तूने मेरा बहुत नुकसान किया है। मेरी पूरी वाटिका तूने तहस−नहस करके रख दी। मैं जानना चाहता हूँ कि किसका बल पाकर तूने यह दुस्साहस किया। तो श्री हनुमान जी रावण को यही प्रति उत्तर देते हैं कि−

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। 

तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।

अर्थात् हे रावण! जिनके बल से तुमने समस्त चराचर जगत के जीत लिया है और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हर लाए हो। मैं उन्हीं श्रीराम जी का दूत हूँ। सज्जनों देखा आपने। रावण के पास भी कोई अपना बल नहीं था। अपितु यह बल प्रभु का ही दिया हुआ था। लेकिन रावण ने उस बल का प्रयोग परमार्थ की बजाय स्वार्थ सिद्धि में किया। जिसका घातक परिणाम स्वयं के साथ−साथ समाज ने भी भोगा।

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बालि को लगा कि मैं तो देवताओं के राजा इन्द्र का पुत्र हूँ। राजा का पुत्र आखिर राजा नहीं होगा, तो और क्या होगा। और राजा का बल कोई न स्वीकार करे, भला ऐसे दर्शन ही भूल गया। प्रभु की दृष्टि में ऐसे बल के होने से अच्छा है कि वह मिट ही जाना चाहिए। बालि को मारने की ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा के पीछे एक सुंदर आध्यात्मिक मर्म भी हो। 

हम जानते हैं कि बालि सुग्रीव के पीछे चौबीस घंटे लगा रहा। और सुग्रीव भी बालि से इतना भयभीत है कि उससे बचने के लिए बस भागे ही जा रहा है। सुग्रीव जानता है कि बालि उसे दुनिया के किसी भी कोने में जाकर मार सकता है। लेकिन केवल ऋर्षयमूक पर्वत ही ऐसा स्थान है जहाँ बालि का जाना निषेध है। और उसका बल कार्य नहीं करता। क्योंकि वही स्थान ऋषि की तपोस्थली थी। मार्मिक अर्थ यह है कि बालि वास्तव में 'कर्म' है और सुग्रीव 'जीव।' जीव भला कितना भी दौड़ ले, भाग ले, कर्म उसका पीछा करता वहाँ पहुँच ही जाता है। कर्म से बचा नहीं जा सकता। लेकिन जीव अगर संत के स्थान की शरण लेता है अर्थात् वह स्थान जहाँ सत्संग होता है तो वहाँ बालि अर्थात् कर्म हमें छू भी नहीं पाता। हम उसके प्रभाव से बचे रहते हैं। लेकिन इतने पर भी कर्म टला नहीं है। जब कभी अवसर मिलेगा तो बालि रूपी कर्म अवश्य ही सुग्रीव रूपी जीव को अपना ग्रास बनाने में संकोच नहीं करेगा, बालि को समाप्त करने में जैसे सुग्रीव असमर्थ है ऐसे में सुग्रीव रूपी जीव अगर प्रभु को समर्पित हो जाए तो प्रभु स्वयं प्रण कर लेते हैं कि हे जीव! तू अपने कर्म के प्रति भले कोई भी भाव रखे। भले सकारात्मक या नकारात्मक मैं उसे समाप्त करके रहूंगा। तभी तू मुक्त होगा, और कर्म बंधन से मुक्त होना ही वास्तव में तेरे आनंद का सूत्र है। 

श्रीराम जी बालि वध हेतु आगे क्या लीला करने वाले हैं। जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...जय श्रीराम

- सुखी भारती







Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 23, 2021   16:25
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Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें।

श्री रामजी ने सुग्रीव की बात सुनी तो हँस पड़े क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव का वैराग्य क्षणिक व परिस्थितिजन्य है। परिस्थिति बदलेगी तो सुग्रीव की बैरागी अवस्था भी परिवर्तित हो जाएगी। लेकिन सुग्रीव को प्रभु श्रीराम जी सदा यूं ही बिन पेंदे के लोटे की तरह थोड़ी रखना चाहते थे। जिसमें जिधर चाहो लोटा उधर ही लुढ़क जाता है। उसे स्थिर होना है तो उसका पेंदा अर्थात् आधार होना अति आवश्यक है। वास्तव में विश्वास ही वह आधार है जिस पर एक साधक सदा टिका रह सकता है। इसलिए भगवान ने भी थोड़ी सख्ती दिखा दी कहा कि सुग्रीव देखो तुम्हें अब बदलना होगा। मैं भले ही अब तक वैसा ही करता रहा जैसा तुम कहते व चाहते रहे। लेकिन अब मैं अपने दिए वचन से नहीं मुडूँगा। मेरा कहा अटल होता है मैंने जब यह प्रण ले ही लिया कि मैं बालि को मारूंगा ही मारूंगा और तुम्हें राज्य सिंघासन पर भी अवश्य बिठाऊँगा तो समझ लो कि दोनों प्रसंग घटित होकर ही रहेंगे। इसलिए अब तुम्हें अपने मन की अवस्था मेरे वचनों के अनुसार ही निर्मित करनी पड़ेगी। श्रीराम जी ने सुग्रीव को मानों बड़े तरीके से कह दिया−

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जो कछु कहेहु सत्य सब सोई।

सखा बचन मम मृषा न होई।।

श्रीराम कहते हैं कि हे सुग्रीव निःसंदेह तुम्हारी बातें सत्य की चाशनी में डूबी हैं। लेकिन क्या करूं मैंने जब वचन दे ही दिया है तो इसका अर्थ कि बालि का मरना तो निश्चित ही है। 

श्रीराम जी तो दया के सागर हैं, करूणा निधान हैं, उन्हें किसी के प्रति कोई शत्रुता कहाँ। अगर शत्रुता का भाव उन्हें कण मात्र भी छुआ होता तो श्रीराम मंथरा को तो अवश्य ही दंडित करते। दंड देने की बात तो छोड़िए पूरी रामायण खंड में एक भी ऐसा लघु से लघु प्रसंग भी प्रतीत नहीं होता जिसमें प्रभु श्रीराम मंथरा के लिए कोई कटु शब्द बोलते हों। क्योंकि देखा जाए तो मंथरा ही तो प्रभु श्रीराम जी के बनवास के लिए पृष्ठ भूमि तैयार करती है। कैकेई को भड़काती है और श्रीराम तो अपनी माता कैकेई को भी कभी अपशब्द नहीं कहते। अपने पिता राजा दशरथ पर तो फिर भी असंतोष का कारण बनता था क्योंकि माना कि माता कैकेई तो सौतेली थी उन्हें कोई व्यक्तिगत पीड़ा कैसे होती। परंतु राजा दशरथ तो उनके सौतेले पिता न थे। सायंकाल तो वे घोषणा करते हैं कि सुबह श्रीराम को अयोध्या को सिंघासन पर बिराजमान करेंगे। और सुबह हुई तो निर्णय पलट देते हैं। मात्र निर्णय ही पलटते तो कोई बात न थी, लेकिन यहाँ तो वे सीधा भाग्य ही पलट देते हैं। श्रीराम जी को 14 वर्ष का बनवास दे डाला। पिता वाला कोई स्नेह, प्रेम व दुलार की कोई परंपरा की कोई लाज ही न रखी। कितना अन्याय, अत्याचार व शोषित व्यवहार होने पर भी श्रीराम जी के उनके प्रति व्यवहार, सत्कार व प्यार में कोई त्रुटि नहीं आती अपितु श्रीराम जी कहते हैं कि अरे! किसने कहा कि मुझे मेरे पिता ने अयोध्या का राजपाठ न देकर अन्याय किया। अयोध्या का राजपाठ तो एक सीमित क्षेत्र तक ही था। लेकिन पिता दशरथ ने मुझे इससे कहीं अधिक विशाल व विराट राज्य की वागडोर दी है। और वो राज्य है 'वनों का राज्य।' वे कहते हैं कि−

पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। 

जहं सब भांति मोर बड़ काजू।।

पिता दशरथ ने वनों का राज्य देकर मुझ पर कृपा ही की है। क्योंकि वहीं पर वास्तव में मेरे समस्त कार्य सिद्ध होने हैं। 

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सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें। और अब तो मुझे राजपाठ व धन परिवार की भी चाहना नहीं। क्योंकि सर्वस्व त्याग कर मैं तो आपकी सेवा करने चला हूँ। तो फिर यह झगड़ा झंझट क्यों। तो यह सुन श्रीराम जी को अवश्य ही बालि को मारने की योजना स्थगित कर देनी चाहिए थी। क्योंकि पीड़ित ही अगर आरोपी को दण्डित नहीं करना चाहता तो श्रीराम जी क्यों बलपूर्वक बालि को दंड देना चाहते हैं? इसके पीछे बहुत से सूक्ष्म, अनिवार्य व न्याय संगत कारण हैं। प्रथम कारण बालि का अहंकार था। वानरों की इतिहास गाथा वास्तव में कुछ और ही संदेश समेटे हुए है। वानर जाति का उदय यूं ही अस्तित्व में नहीं आया था। हुआ यूं था कि जब पृथ्वी रावण के पापों व अत्याचारों से त्रास्त थी, तो देवगणों ने ब्रह्मा जी को जाकर प्रार्थना की आप प्रभु को मृत्यु लोक पर अवतरित होने के लिए मनाइए। प्रभु दुष्टों के संहार व धर्म की स्थापना हेतु इस धरा धाम पर अवतार धारण करने हेतु सहमति प्रदान कर देते हैं। देव गणों को लगा कि अब अपना काम तो हो गया। प्रभु अवतार लेंगे और राक्षसों का वध करेंगे। अब हमारा क्या काम! हम जाकर विषय भोग भोगते हैं। देवगण जैसे ही वापिस पलटने लगे तो ब्रह्मा जी ने सबको रोक लिया कि प्रभु से केवल स्वार्थ का रिश्ता रखना कदापि यथोचित नहीं है। आप सबको भी प्रभु की सेवा में धरा पर देह धारण करनी होगी। प्रभु नारायण से नर बनने का साहस रखते हैं तो आप लोगों को कम से कम देवता से वानर रूप धरण करना ही चाहिए−

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बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ। 

सभी देवता वानर रूप धारण कर प्रभु के वन आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाकी सभी वानर तो ठीक निर्वाह कर रहे थे लेकिन बालि को अपने बल का इतना अहंकार हो गया कि वह स्वयं को ईश्वर से भी अधिक बलशाली मान चुका था। वानर देह तो इसलिए धारण की थी कि प्रभु की सेवा करनी है एवं रावण वध में उनका सहयोग करना है। लेकिन कृत्य देखिए कि वह रावण से ही मित्रता किए बैठा है। क्योंकि एक प्रसंग में जब बालि रावण को पराजित कर अपने कांख में दबाकर समस्त विश्व का भ्रमण करता है तो रावण क्षमा याचना करता हुआ बालि की अनेकों स्तुतियां कर उसे रिझाकर अपने पक्ष में कर लेता है। बालि भी आत्म प्रशंसा के वशीभूत होकर उसे अभय दान दे देता है। यद्यपि होना तो यह चाहिए था कि ऐसे दुष्ट को दंडित करे लेकिन बालि को तो धुन थी कि उसके बल व सामर्थ्य का पूरी दुनिया लोहा माने। प्रभु का यश फैले या न फैले इससे उसे कोई सरोकार नहीं था। परंतु अपना यश व कीर्ति सर्वत्र फैलनी चाहिए इसकी उसे बहुत चिंता थी। बल व सामर्थ्य की ही बात की जाए तो हनुमान जी के सामने उसकी क्या बिसात थी। लेकिन श्री हनुमान जी ने भी कभी अपने बल का प्रदर्शन व अहंकार नहीं किया। अपितु इसी प्रतीक्षा में लगे रहे कि हमें प्रभु की सेवा में अपना सर्वस्व लगाना है। बालि एक नहीं अपितु दो−दो गलतियां एक साथ करता है। रावण से तो मित्रता की लेकिन साथ में अपने ही भाई सुग्रीव के साथ शत्रुता पूर्ण व्यवहार करने लगा। प्रभु भला अपने सेवकों व भक्तों के प्रति किसी का शत्रु भाव कैसे स्वीकार कर सकते हैं।

लिहाज़ा प्रभु ने अपना निर्णय यथावत रखा कि मैं बालि को जरूर मारूंगा। मारूंगा भी उसी बाण से जिससे मैंने ताड़ के वृक्षों को काटा था। मानों कह रहे हों कि बालि भी ताड़ के वृक्षों की तरह सीधा अकड़ा खड़ा है। किसी को छाया भी नहीं देता। तो क्यों न व्यर्थ के इस बोझ से पृथ्वी के भार को कम किया जाए। बालि को मारने का दूसरा कारण था वह कारण भी उसके बल के साथ ही जुड़ा था। क्या था वह कारण? हम अगले अंक में विस्तार पूर्वक जानेंगे...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







Gyan Ganga: अर्जुन ने चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछा तो भगवान ने क्या कहा ?

  •  आरएन तिवारी
  •  फरवरी 19, 2021   13:33
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Gyan Ganga: अर्जुन ने चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछा तो भगवान ने क्या कहा ?

अर्जुन कहते हैं- हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, हठी तथा बलवान है, मुझे इस मन को वश में करना, वायु को वश में करने के समान अत्यन्त कठिन लगता है। आप ही कृपा करके इस मन को खींचकर अपने में लगा लें, तो यह लग सकता है।

गीता प्रेमियो ! हवाएँ अगर मौसम का रुख बदल सकती हैं तो दुआएँ भी मुसीबत के पल बदल सकती हैं। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं जो दुआ से मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं जो किस्मत बदल देते हैं।

अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण किस्मत से ही प्राप्त हुए थे, जिन्होंने सबको छोड़कर केवल अर्जुन को चुना और उनको प्रत्यक्ष रूप से गीता सुनाई।  

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं-

पिछले अंक में हमने पढ़ा- भगवान त्रिभुवन के स्वामी हैं तथा हमारे परम हितैषी और सखा हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ अगर हम दृढ़तापूर्वक हरि चिंतन करें, तो भगवान का साक्षात्कार निश्चित है। अब आगे भगवान मनुष्य को अपना उद्धार करने की प्रेरणा देते हैं।

श्री भगवान उवाच    

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ 

मनुष्य को चाहिये कि वह अपने मन के द्वारा ही जन्म-मृत्यु के बन्धन से अपना उद्धार करने का प्रयत्न करे और अपने को निम्न-योनि में न गिरने दे, क्योंकि यह मन ही हमारा मित्र है, और मन ही हमारा शत्रु भी है। आइए ! इस पर थोड़ा विचार करें— ‘मैं’ शरीर नहीं हूँ, क्योंकि शरीर बदलता रहता है और ‘मैं’ वही रहता हूँ। यह शरीर मेरा नहीं है, क्योंकि शरीर पर मेरा वश नहीं चलता। मैं इस शरीर को जैसा रखना चाहूँ वह वैसा नहीं रह सकता, जितने दिन तक रखना चाहूँ उतने दिन तक नहीं रख सकता, जितना सुंदर और सबल बनाना चाहूँ नहीं बना सकता। कौन चाहता है, कि मेरा शरीर बूढ़ा हो किन्तु बूढ़ा होना पड़ता है। इस शरीर पर मेरा कोई अधिकार नहीं। यदि यह मेरे लिए होता तो हमेशा मेरे पास रहता। इस प्रकार शरीर मैं नहीं, मेरा नहीं और मेरे लिए नहीं। यदि मनुष्य इस सच्चाई पर अमल करे, तो उसका अपने आप उद्धार हो जाएगा।

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जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ 

जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, उसको परम-शान्ति स्वरूप परमात्मा पूर्ण-रूप से प्राप्त हो जाता है, उस मनुष्य के लिये सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान एक समान होते है। अर्थात् जिसका शरीर में मैं-पन और मेरा-पन नहीं है वह अनुकूलता और प्रतिकूलता में भी निर्विकार रहता है, क्योंकि वह मानता है कि सुख-दुःख और मान-अपमान तो आते जाते हैं, पर परमात्मतत्व ज्यों का त्यों रहता है। 

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ 

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! जो मनुष्य सभी प्राणियों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणियों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है। श्रीमदभागवत कथा का एक बहुत ही रोचक प्रसंग स्मरण में आता है—

ब्रह्माजी जब गाय-बछड़ों और ग्वाल-बालों को चुराकर ले गए, तब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही गाय-बछड़े और ग्वाल-बाल बन गए। केवल ग्वाल-बाल ही नहीं बल्कि उनके बेंत, सींग, बांसुरी और वस्त्र-आभूषण भी बन गए। यह लीला एक वर्ष तक चलती रही, पर किसी को इसका पता नहीं चला। जब बलराम जी ने ध्यान लगाकर देखा तो उनको गाय-बछड़ों और ग्वाल-बालों के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ही दिखाई दिए। ऐसे ही भगवान का सिद्ध भक्त सब जगह भगवान को ही देखता है। उसके लिए यह जगत सर्वं विष्णुमयं जगत है। कर्मयोगी परमात्मा को नजदीक देखता है, ज्ञानयोगी परमात्मा को अपने में देखता है और भक्तियोगी परमात्मा को सर्वत्र ही देखता है।   

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणियों के हृदय में मुझको देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है। अर्थात् भगवान और भक्त दिखने में तो दो हैं, पर वास्तव में एक ही हैं। भक्त में भगवान हैं और भगवान में भक्त है। भगवान में अत्यंत प्रीति होने के कारण भक्तियोग का साधक भगवान को प्राप्त हो जाता है। 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ 

हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणियों को देखता है, सभी प्राणियों के सुख और दुःख को अपना ही सुख और दुख समझता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये। वह भक्त सभी प्राणियों की आत्मा में भगवान के ही दर्शन करता है, वह सभी शरीरों को अपना शरीर ही मानता है, इसलिए वह दूसरे के दुख से दुखी और दूसरे के सुख से सुखी होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के उत्तर कांड में संत के लक्षण बताते हुए कहते हैं- संत सांसरिक विषय-वासनाओं में लिप्त नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। उन्हें दूसरे का दुख देखकर दुख और सुख देखकर सुख होता है। विषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥ 

अब अर्जुन भगवान से इस चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछते हैं-

                 

अर्जुन उवाच


चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ॥ 

अर्जुन कहते हैं- हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, हठी तथा बलवान है, मुझे इस मन को वश में करना, वायु को वश में करने के समान अत्यन्त कठिन लगता है। आप ही कृपा करके इस मन को खींचकर अपने में लगा लें, तो यह लग सकता है।

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ 

श्री भगवान ने कहा- हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! इसमे कोई संशय नही है कि चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु इसे सभी सांसारिक कामनाओं को त्याग (वैराग्य) और निरन्तर अभ्यास द्वारा वश में किया जा सकता है।

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अर्जुन की माता कुंती बहुत बुद्धिमती तथा सांसरिक भोगों से विरक्त रहने वाली थी। श्रीमद भागवत महापुराण में कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण से विपत्ति का वरदान मांगा था। 

विपद: सन्तु न: शश्वत तत्र तत्र जगत्गुरो। 

भवतो दर्शनं यत् स्यात् अपुन: भवदर्शनम्।।

ऐसा वरदान मांगने वाला इतिहास में बहुत कम मिलता है। यहाँ भगवान अर्जुन को कुंती माता की याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुंती बड़ी विरक्त है, ऐसे ही तुम भी संसार से विरक्त होकर अपने मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगाओ। 

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।

अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ 

अर्जुन ने पुन: पूछा- हे कृष्ण! प्रारम्भ में श्रद्धा-पूर्वक योग में स्थिर रहने वाला किन्तु बाद में चंचल मन होने के कारण योग से विचलित होने वाला असफ़ल-योगी परम-सिद्धि को न प्राप्त करके किस गति को प्राप्त करता है?

श्रीभगवानुवाच

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ 

भगवान कहते हैं— हे अर्जुन! योग में असफ़ल हुआ मनुष्य स्वर्ग के भोगों को भोगता है। पुण्य क्षीण होने और भोगों से अरुचि हो जाने पर वह फिर लौटकर मृत्युलोक में सम्पन्न सदाचारी मनुष्यों के परिवार में जन्म लेता है। भगवान उसकी अधूरी साधना पूरी करने का मौका देने के लिए शुद्ध श्रीमानों के घर में जन्म देते हैं।  

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी







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