Gyan Ganga: जाने-अनजाने में भी लिया गया प्रभु का नाम सभी पापों से मुक्त करा देता है

Gyan Ganga: जाने-अनजाने में भी लिया गया प्रभु का नाम सभी पापों से मुक्त करा देता है

अरे! धर्मराज की आज्ञा का निषेद्ध करने वाले तुम लोग कौन हो, कहाँ से आए हो, किसने भेजा है? शुकदेव जी कहते है- परीक्षित यम के दूतों और भगवान के दूतों में “धर्म क्या है अधर्म क्या है” विषय पर बहुत देर तक विवाद हुआ।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं। 

पिछले अंक में परीक्षित के पूछने पर परमहंस श्री शुकदेव जी महाराज ने अठाइस नरकों का विस्तार से वर्णन किया। आइए अब आगे की कथा प्रसंग के क्रम में परम मंगलमय भगवत स्वरूप श्रीमदभागवत पुराण के अंतर्गत षष्ठ स्कन्ध में प्रवेश करते हैं। 

नर्क की भयावह घोर यातना का वृतांत सुनने के पश्चात परीक्षित ने सवाल किया हे प्रभों ! अब आप मुझे यह उपाय बताइये जिसके करने से मनुष्य को भयंकर नर्क मे न जाना पड़े। श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं—

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परीक्षित ! मनुष्य तन, मन और वचन से पाप कर्म करता है, यदि वह उन पापों का इसी जन्म में प्रायश्चित न कर ले, तो मरने के बाद उसे अवश्य ही उन भयंकर यातनापूर्ण नरकों में जाना पड़ता है।

सकृन्मन: कृष्ण पदारविंदयो: निवेशितम तद्गुणरागी यैरीह 

न ते यममंपाशभृतश्च तद्भटान स्वपनेSपिपश्यंती हि चीर्णनिष्कृता: ॥

परीक्षित! जिसने मन रूपी भौरे को भगवान कृष्ण के चरणामृत का पान करा लिया वे सपने में भी यमराज के दूतों को नहीं देखते, फिर नर्क की बात ही क्या है। इस विषय मे ब्राह्मण अजामिल की कथा प्रसिद्ध है।

ब्राह्मण अजामिल की कथा :- 

कान्यकुब्जे द्विज: कश्चित दासीपतिरजामिल:।

नाम्ना नष्ट सदाचारो दास्या: संसर्ग दूषित:॥ 

कान्य कुब्ज नगर में (जो आज का कानपुर है) एक दासी पति ब्राह्मण रहता था, उसका नाम अजामिल था। दासी के संसर्ग से उसका सदाचार नष्ट हो गया था। वह लूट-पाट करके अपने परिवार का पेट भरता था। इस प्रकार उसकी उम्र अठासी साल की हो गई। बूढ़े अजामिल के दस पुत्र थे। सबसे छोटे का नाम नारायण था। वृद्ध अजामिल अपने छोटे बेटे नारायण से बड़ा प्रेम करता था। उसकी तोतली बोली सुनकर खुश होता था। अपने बच्चे के प्रेम में इतना पागल हो गया था कि उसे पता ही नहीं चला कि मौत सिर पर आ पहुँची है। एक दिन वह नारायण के बारे में  सोच-विचार कर ही रहा था कि अचानक यमदूत उसे लेने के लिए आ गए। काले-काले भैसे पर सवार भयानक टेढ़े-मेढ़े मुंह वाले यम के दूतों को देखकर व्याकुल हो गया। वह ज़ोर-ज़ोर से अपने बेटे नारायण को पुकारने लगा। नारायण की आवाज वैकुंठ में बैठे भगवान को सुनाई दी। भगवान ने अपने पार्षदों को अजामिल की रक्षा हेतु भेजा। यमराज के दूत अजामिल के सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। भगवान के दूतों ने बलपूर्वक रोका। 

‘के यूयम प्रतिषेधारो धर्मराजस्य शासनम”

कस्य वा कुत आयाता: कस्मादस्य निषेधत:। 

किं देवा उपदेवा वा यूयम् किं सिद्धसत्तमा: ॥ 

अरे! धर्मराज की आज्ञा का निषेद्ध करने वाले तुम लोग कौन हो, कहाँ से आए हो, किसने भेजा है? शुकदेव जी कहते है- परीक्षित यम के दूतों और भगवान के दूतों में “धर्म क्या है अधर्म क्या है” विषय पर बहुत देर तक विवाद हुआ। अंत मे भगवान के दूतों ने कहा- 

एतेनहयघोनोSस्यकृतमस्यादघनिष्कृतम्   

यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम्॥ 

हे यमदूतों ! इस अजामिल ने अपने कई जन्मों के पापों का पूरा-पूरा प्रायश्चित कर लिया है। जिस समय इसने “नारायण” इन चार अक्षरों का उच्चारण किया उसी समय इसके सारे पाप धूल गए। मरते समय इसने भगवान के नाम का उच्चारण किया है, इसलिए तुम लोग अजामिल को यमलोक नहीं ले जा सकते। शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित भगवान के नाम का इतना महत्व है कि एक बार के नाम लेने से भगवान ने अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मौत के मुंह से बचा लिया। जाने-अनजाने में भी लिया गया प्रभु का नाम सभी पापों से मुक्त करा देता है।

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अजामिल की कथा हम सबको यही संदेश देती है कि जिसने “हरि” ये दो अक्षर एक बार भी उच्चारण कर लिए वह मोक्ष का अधिकारी हो गया। नारायण का नाम मुक्ति के साथ-साथ चतुर्वर्ग फल (धर्म, अर्थ, काम मोक्ष) का भी साधन है। 

शास्त्रकार कहते हैं—

न गंगा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम।  

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षर द्वयम॥    

भगवान के पार्षदों का थोड़ी देर के लिए ही सत्संग हुआ। इतने से ही अजामिल के मन में  संसार के प्रति वैराग्य हो गया और वे हरिद्वार चले गए, वहाँ गंगा तट पर भगवान का भजन करते हुए चतुर्भुज नारायण का साक्षात दर्शन पाने के बाद अपना शरीर त्याग दिया।

लोक-भाषा में गाया जाने वाला यह भजन उपरोक्त कथन की भलीभाँति पुष्टि करता है।  

कइसे रीझी लें रिझाइलें कौना गुनवा से 

कौना गुनवा से हो भगवन ----------------

रहा अजामिल का बेटा नारायण सबसे प्यारा 

दौड़ नारायण मुझे बचाओ मरते बार पुकारा 

झट सुदर्शन ले के धाइलें कौना गुनवा से 

कौना गुनवा से हो भगवन ----------------

न खईल तू हलवा पूड़ी दुर्योधन घर जा के, 

बासी साग विदुर घर खईल खूबे प्रेम लगा के 

भोगवा छिलका के लगाइले कौना गुनवा से 

कौना गुनवा से हो भगवन ----------------

भरल सभा मे लाज बचवल आ के तू द्रौपदी के 

दुर्योधन के धूल चटवल हंकल रथ अर्जुन के 

दिहल पूतना के सरगवा कौना गुनवा से 

कौना गुनवा से हो भगवन ----------------

जय श्री कृष्ण -----                                              

क्रमश: अगले अंक में --------------

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ----------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । 

- आरएन तिवारी