भगवान Dhanvantari के अमृत कलश और 14 दिव्य रत्नों से जुड़ा है Dhanteras का पावन पर्व

Samudra Manthan
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार क्षीर सागर में हुए समुद्र मंथन से 14 दिव्य रत्न निकले थे। इनमें हलाहल विष, कामधेनु, ऐरावत और महालक्ष्मी समेत कार्तिक त्रयोदशी पर भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। समुद्र मंथन की इस पावन घटना से ही धनतेरस पर्व की शुरुआत हुई, जो त्याग, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

हर साल धनतेरस का पर्व दीपावली के ठीक दो दिन पहले यानी की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 06 नवंबर 2026 को धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। भागवत पुराण और अन्य हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक असुरों और देवताओं ने अमरता का वरदान पाने के लिए और अमृत को प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया था।

तब समुद्र मंथन से एक-एक करके 14 दिव्य रत्न निकले थे, जिनका अपना अलग महत्व होता है। इतना ही नहीं समुद्र मंथन से धनतेरस का पर्व शुरू हुआ। इस दिन नई वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। इस पर्व को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको समुद्र मंथन से निकलने वाले दिव्य रत्नों और उनके महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।

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हलाहल विष

समुद्र मंथन से पहली वस्तु हलाहल विष निकली थी। यह विष इतन ज्यादा शक्तिशाली था, जिससे तीनों लोक एक बार में नष्ट हो सकते थे। इससे देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। तब महादेव ने इस विष को अपने कंठ में धारण किया और वह नीलकंठ कहलाए। महादेव का इस विश को धारण करना त्याग और बलिदान का प्रतीक है।

कामधेनु गाय

समुद्र मंथन से दूसरे रत्न के रूप में कामधेनु गाय निकली थी। कामधेनु एक दिव्य गाय था। जोकि किसी भी व्यक्ति या देवताओं की इच्छा की पूर्ति करने वाली है। कामधेनु न सिर्फ धन-धान्य प्रदान करती है, बल्कि सुख-समृद्धि का भी आशीर्वाद देती है।

उच्चैःश्रवा घोड़ा

समुद्र मंथन से तीसरे रत्न के रूप में उच्चै:श्रवा घोड़ा निकला। यह घोड़ा दिव्य था और सात मुख वाला था और इस घोड़े की गति अपार थी। उच्चै:श्रैवा घोड़े का वर्ण श्वेत था और इसको पाने की इच्छा देवताओं और असुरों दोनों की थी। अंत में यह घोड़ा दैत्यों के राजा बलि को मिला था।

ऐरावत हाथी

समुद्र मंथन के चौथे रत्न के रूप में ऐरावत हाथी निकला। इस हाथी का वर्ण सफेद था। ऐरावत हाथी की दिव्यता को देखकर न सिर्फ देवता बल्कि असुर भी हैरान रह गए थे। यह हाथी देवराज को मिला।

कौस्तुभ मणि

समुद्र मंथन में 5वें रत्न के रूप में कौस्तुभ मणि निकली थी। जिसको सभी मणियों में श्रेष्ठ माना जाता है। समुद्र मंथन से निकलने वाला यह रत्न अद्वितीय और बेहद चमकदार था। इस मणि का प्रकाश पूरे ब्रह्मांड में फैल गया। कौस्तुभ मणि जगत के पालनहार भगवान विष्णु के मस्तक में शोभायमान हुआ।

कल्पवृक्ष

समुद्र मंथन से छठे रत्न के रूप में कल्प वृक्ष निकला था। यह इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष था। इस वृक्ष को स्वर्गलोक में स्थापित किया गया।

अप्सरा रंभा

समुद्र मंथन से 7वें रत्न के रूप में सुंदर अप्सरा रंभा प्रकट हुई थीं। अप्सरा रंभा अपने अद्वितीय सौंदर्य के लिए जानी जाती थीं और उनको देवराज इंद्र के दरबार में स्थान मिला।

महालक्ष्मी

समुद्र मंथन से 8वें दिव्य रत्न के रूप में महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। महालक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति रूप में स्वीकार किया। महालक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि के देवी माना जाता है।

वारुणी मदिरा

समुद्र मंथन से 9वें रत्न के रूप में वारुणी मदिरा निकली थी, जिसको देवताओं ने लेने से मना तक जिया, जिसके बाद उसे असुरों के पास स्थान मिला था। इसके वितरण से यह शिक्षा मिलती है, वस्तु व्यक्ति की प्रवृत्ति के हिसाब से उसके पास पहुंचती है।

चंद्रमा

समुद्र मंथन से 10वें रत्न के रूप में चंद्रमा प्रकट हुआ था। चंद्रमा की शीतलता आज भी है और इसको भगवान शिव ने मस्तक पर धारण किया।

शारंग धनुष

समुद्र मंथन से 11वें रत्न के रूप में शारंग धनुष निकला था। जोकि भगवान विष्णु ने धारण किया था। शारंग धनुष धारण करने वाले को अजेय माना जाता है और यह श्रीहरि के गुणों के अनुरूप था।

पांचजन्य शंख

समुद्र मंथन से 12वें रत्न के रूप में पांचजन्य शंख निकला था। जिसको भगवान श्रीकृष्ण ने अपने हाथों में धारण किया था। इसी शंख के नाद के साथ महाभारत के युद्ध का आगाज हुआ था। पांचजन्य शंख को विजय का प्रतीक माना जाता है।

भगवान धन्वंतरि

समुद्र मंथन से 13वें रत्न में भगवान धन्वंतरि अवतरित हुए और उनके हाथ में अमृत कलश था। जिस दिन भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे, उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि था। जिसको धनतेरस के नाम से जाना जाने लगा था। वहीं भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक भी माना जाता है।

अमृत कलश

समुद्र मंथन के 14वें रत्न में अमृत कलश निकला था। उस अमृत को भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को मोहिनी रूप रखकर पिलाया था।

जानिए धनतेरस का समुद्र मंथन से संबंध

समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, अमृत और विष दोनों ही जीवन के अनुभवों का प्रतीक है। जहां पर विष कठिनाइयों और त्याग की याद दिलाता है, तो वहीं अमृत आशा, सेहत और कल्याण का संदेश देता है।

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