Gyan Ganga: वचन पालन और सत्य में से किसी एक को चुनने पर श्रीकृष्ण ने दिया बड़ा सुंदर संदेश

Gyan Ganga: वचन पालन और सत्य में से किसी एक को चुनने पर श्रीकृष्ण ने दिया बड़ा सुंदर संदेश

भीष्म ने वचन दिया था कि जो भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठेगा, मैं उसी का साथ दूंगा, उसी के पक्ष मे युद्ध करूँगा। परिणाम यह हुआ कि दुर्योधन जैसे दुष्ट के गद्दी पर बैठने के बाद भी वह केवल प्रतिज्ञा पालन के लिए सत्य को पराजित करने के लिए उठ खड़े हुए।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुम:॥ 

प्रभासाक्षी के धर्म प्रेमियों !

पिछले अंक में हमने युधिष्ठिर भीष्म संवाद की कथा पढ़ी थी। भीष्म पितामह ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भगवान के मुसकुराते मुखमंडल के दर्शन करते हुए अपने वचनों के सुमन भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित किए थे।

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आइए ! अब आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं। 

स्तुति करते हुए पितामह ने कहा– हे प्रभो! इस चोले को छोड़ने से पूर्व केवल एक ही इच्छा बाकी रह गई है। “अपनी क्वारी बेटी का विवाह कर दूँ। मरने के पूर्व कोई भी काम अधूरा नहीं छोडना चाहिए।'' भगवान मुस्कुराए, कहा- विवाह तो तुम्हारा ही नहीं हुआ है। तुम्हारी बिटिया कहाँ से आ गई? जिसकी चिंता तुमको पड़ी है। भीष्म ने कहा ‘इति मति’ ये जो मेरी बुद्धि है न, इसी को मैंने अपनी बेटी बना लिया है। श्रीकृष्ण ने पूछा तुम्हारी बेटी कितनी पढ़ी लिखी है, क्या योग्यता है? भीष्म ने कहा ऐसी बेटी दुनिया मे कहीं नहीं मिलेगी। सबसे बड़ी विशेषता है ‘वितृष्णा’ मेरी बुद्धि रूपी बेटी मे तृष्णा नहीं है। इस संसार में ऐसा कोई नहीं, जिसमे तृष्णा न हो। किसी मे लोकेषणा, तो किसी में वितेषणा और किसी में सुतेषणा। तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसा कौन है, जिसकी बुद्धि तृष्णा से मलीन न हो गई हो?

सूत वित्त लोक ईषणा तिन्ही, केही के मति इन्ह किन्ह न मलिनी। 

भीष्म जी कहते हैं- कि ऐसी निर्मल मति का पति ढूंढ़ने से नहीं मिला। लेकिन आपको देखकर लगता है कि मेरी निर्मल मति का पति मिल गया। हे प्रभो! इसे स्वीकार करो। मैं आपको समर्पित करता हूँ।

भीष्म कहते हैं कि हे प्रभो! तमाल वृक्ष के समान आपके साँवले शरीर पर पीताम्बर ऐसा लहरा रहा हो मानो नीले आकाश मे सूर्य की रश्मियां चमक रहीं हो। मुझे याद आता है वह क्षण जब अर्जुन आपको आदेश देता था। 

सेनयो उभयोरमध्ये रथं स्थापय मे च्युत। 

अर्जुन रथी और आप सारथी। मैं बीच मे आ गया। अर्जुन ने देखा, जिन्होंने मुझे चलना सिखाया, जिनकी गोदी में खेलता था, उन्हीं के साथ युद्ध करना पड़ेगा। आपने गीता का उपदेश देकर अर्जुन को युद्ध में प्रवृत्त किया। आपने कौरव सेना की ओर दृष्टिपात करके उनकी आयु छिन ली। हे प्रभो मैंने प्रतिज्ञा की थी कि आपको शस्त्र ग्रहण कराकर ही छोडूंगा। 

आजु जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊँ,

तौ लाजौ गंगा जननी को शांतनु सुत न कहौऊँ --------

आपने मेरी प्रतिज्ञा रखने के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी, और रथ का पहिया लेकर मुझ पर टूट पड़े। मुझे मारने के लिए आप इतने वेग से दौड़े कि आपके कंधे से दुपट्टा गिर गया। पृथ्वी काँपने लगी। पृथ्वी क्यों काँप गई, दुपट्टा क्यों गिर गया, इस पर संतों ने अलग-अलग अपने विचार प्रकट किए हैं। एक संत कहते हैं—कि पृथ्वी ने देखा कि ये अपनी प्रतिज्ञा भूल भी जाते हैं, अभी-अभी इन्होने प्रतिज्ञ की थी, कि मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा और रथ का पहिया लेकर दौड़ पड़े। मेरी प्रतिज्ञा तो बहुत पुरानी है। कहीं उसे भी न भूल गए हों। इसलिए पृथ्वी को आश्वस्त करने के लिए अंतर्यामी प्रभु ने अपने दुपट्टे को आदेश दिया, जाओ उसे समझाओ घबराए नहीं, मुझे उसकी प्रतिज्ञा याद है मैं भूला नहीं हूँ और सत्य की रक्षा करने मे यदि प्रतिज्ञा भुला भी दी जाए तो ठीक है। भीष्म ने वचन दिया था कि जो भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठेगा, मैं उसी का साथ दूंगा, उसी के पक्ष मे युद्ध करूँगा। परिणाम यह हुआ कि दुर्योधन जैसे दुष्ट के गद्दी पर बैठने के बाद भी वह केवल प्रतिज्ञा पालन के लिए सत्य को पराजित करने के लिए उठ खड़े हुए। प्रतिज्ञा मैंने (कृष्ण) भी की थी लेकिन जब देखा कि भीष्म के प्रहार से सत्य पराजित हो रहा है, तब चक्र उठा लिया। भीष्म के प्रश्न पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा था, वचन पालन और सत्य की जीत में से जब एक को चुनने की स्थिति आए तो मैंने सत्य को चुना वचन पालन को त्याग दिया।

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अरे! मैं तो इसीलिए आया ही हूँ। ये तो भक्त और भगवान के बीच लीला चल रही है। इस प्रकार स्तुति करने के बाद भीष्म ने मन, वचन और दृष्टि की समस्त वृतियों को श्रीकृष्ण में लीन कर दिया और परम धाम को पधारे। आइये ! हम भी प्रभु की स्तुति करें। 

देहांत काले तुम सामने हो, मुरली बजाते मन को लुभाते 

यही गीत गाते मैं तन नाथ त्यागूँ, हे नाथ नारायण वासुदेव।        

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।। 

गोविंद मेरी यह प्रार्थना है, भूलूँ नहीं नाम कभी तुम्हारा 

निष्काम होके मैं दिन-रात गाउँ हे नाथ नारायण वासुदेव।।

जब छोड़ चलूँ इस दुनिया को होठो पे नाम तुम्हारा हो 

चाहे स्वर्ग मिले या नर्क मिले हृदय में वास तुम्हारा हो।

तन श्याम नाम की चादर हो जब गहरी नींद मे सोया रहूँ 

कानों मे मेरे गुंजित हों कान्हा बस नाम तुम्हारा हो॥ 

सभी शांत हो गए, स्वर्ग में देवता दुंदुभि बजाने लगे फूलों की वर्षा होने लगी। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु प्राप्त थी किन्तु उनको भी यहाँ से जाना पड़ा। भागवत महापुराण का एक बड़ा सुंदर-सा संदेश। यह जिंदगी सदा हमारा साथ नहीं देती, पता नहीं कब हमारा साथ छोड़ दे। आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर।

क्रमश: अगले अंक में--------------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

- आरएन तिवारी