Trump के 'फ्रेंडली टेकओवर' प्लान ने दुनियाभर में मचाया हड़कंप! वेनेजुएला-ईरान के बाद अब इस देश से अमेरिका करेगा 64 साल पुराना हिसाब बराबर

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अभिनय आकाश । Mar 12 2026 1:32PM

पिछले 50 सालों से बार-बार कहा गया कि क्यूबा की सरकार गिरने वाली है, लेकिन हर बार यह भविष्यवाणी गलत साबित हुई। अब जब अमेरिका पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध में उलझा हुआ है, तो क्या वाकई वह क्यूबा में नया सैन्य मोर्चा खोल सकता है? आज हम अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों का एमआरआई स्कैन करेंगे। ये कब बिगड़ने शुरू हुए, क्या ये हमेशा से ऐसे थे? मौजूदा स्थिति क्या है?

मिडिल ईस्ट के युद्ध का आज तेरहवां दिन है। लेकिन 2026 ऐसा साल बन चुका है जहाँ एक संकट खत्म नहीं होता कि दूसरा सामने खड़ा मिल जाता है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या अगला मोर्चा क्यूबा बनने वाला है? डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। ट्रंप इसे “फ्रेंडली टेकओवर” यानी शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन बता रहे हैं। लेकिन जमीन पर जो हालात बन रहे हैं, वो किसी भी तरह से शांतिपूर्ण नहीं दिखते। जनवरी से अमेरिका ने क्यूबा पर जो आर्थिक घेराबंदी शुरू की है, उसका असर अब साफ दिखने लगा है। पिछले महीने एक चौंकाने वाली बात सामने आई। क्यूबा को एक भी बैरल तेल नहीं मिला। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई हवाई जहाज़ क्यूबा में उतरने से बच रहे हैं, क्योंकि वहाँ उन्हें वापस उड़ान भरने के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं मिल रहा। अस्पतालों ने भी मजबूरी में गैर-जरूरी ऑपरेशन और इलाज रोक दिए हैं। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल भी है। पिछले 50 सालों से बार-बार कहा गया कि क्यूबा की सरकार गिरने वाली है, लेकिन हर बार यह भविष्यवाणी गलत साबित हुई। अब जब अमेरिका पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध में उलझा हुआ है, तो क्या वाकई वह क्यूबा में नया सैन्य मोर्चा खोल सकता है? आज हम अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों का एमआरआई स्कैन करेंगे। ये कब बिगड़ने शुरू हुए, क्या ये हमेशा से ऐसे थे? मौजूदा स्थिति क्या है? 

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ट्रंप का फ्रेंडली टेक ओवर

जनवरी में जब क्यूबा की स्थिति पर चर्चा हुई थी, तब मामला वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से जुड़ा था। उस समय भी क्यूबा की हालत बहुत खराब थी। रोज़ लंबे ब्लैकआउट, चरमराती अर्थव्यवस्था और कई बार पूरे देश का बिजली ग्रिड गिर जाना। सरकार हर बार किसी तरह अस्थायी मरम्मत करके स्थिति संभाल रही थी। लेकिन असली झटका तब लगा जब वेनेजुएला से आने वाला तेल बंद हो गया। यहीं से क्यूबा की ऊर्जा संकट की असली शुरुआत हुई। दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल मैक्सिको क्यूबा का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया था। मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शेनबाम ने कहा था कि वे पहले से हुए तेल समझौतों को निभाएँगी। उन्होंने इसे मानवीय और संप्रभुता का मामला बताया था। मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शेनबाम ने कहा था कि वे पहले से हुए तेल समझौतों को निभाएँगी। उन्होंने इसे मानवीय और संप्रभुता का मामला बताया था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका की रणनीति साफ दिख रही है। क्यूबा के पास आने वाला हर डॉलर, हर बैरल तेल और हर रास्ता बंद कर देना।

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क्यूबा और अमेरिका की दुश्मनी की कहानी

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के एकलौते राष्ट्रपति नहीं हैं जो क्यूबा पर सख्त हो रहे हैं। क्यूबा और अमेरिका के बीच की दुश्मनी कई दशकों पुरानी है। 1898 में अमेरिका ने स्पेन को हराया। जिसके बाद स्पेन ने क्यूबा पर अपने सभी दावों को छोड़ दिया। इसे अमेरिका को सौंप दिया। साल 1902 में क्यूबा स्वतंत्र हुआ और टॉमस इस्ट्राडा पाल्मा इसके पहले राष्ट्रपति बने। लेकिव प्लैट संशोधन के कारण द्वीप अमेरिकी संरक्षण में रहा और इसके कारण अमेरिका को क्यूबाई मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिला। कुछ साल बाद क्यूबा की राजनीति फिर उथल-पुथल में फँस गई। राष्ट्रपति इस्ट्राडा को इस्तीफा देना पड़ा और होजे मिगुएल गोमेज़ के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद अमेरिका ने क्यूबा में हस्तक्षेप कर दिया। इसके बाद 1909 में अमेरिका की निगरानी में चुनाव कराए गए, जिनमें होजे मिगुएल गोमेज़ राष्ट्रपति बने। लेकिन उनका कार्यकाल भी विवादों से घिर गया और उन पर जल्द ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। 1912 में जब क्यूबा में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ़ अश्वेत समुदाय ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए, तो हालात संभालने के लिए अमेरिकी सेना एक बार फिर क्यूबा में उतरी और आंदोलन को दबाने में मदद की। इसके कुछ साल बाद, 1933 में क्यूबा की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ आया। सेना के अफसर फुलगेन्सियो बतिस्ता के नेतृत्व में तख्तापलट हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति जेरार्डो मचाडो को सत्ता से हटा दिया गया। बतिस्ता का शासन लंबे समय तक चला, लेकिन इसके खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। 1953 में फ़िदेल कास्त्रो ने बतिस्ता सरकार के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत की, हालांकि यह पहली कोशिश सफल नहीं हो पाई। विदेश नीति के विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और क्यूबा के बीच असली टकराव की शुरुआत 1959 में हुई। उसी साल फ़िदेल कास्त्रो की क्रांति सफल हुई और उन्होंने अमेरिका समर्थित सरकार को सत्ता से हटा दिया। शुरुआत में अमेरिका ने कास्त्रो की नई सरकार को स्वीकार कर लिया था। लेकिन हालात तब बदलने लगे जब क्यूबा ने अमेरिका के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी सोवियत संघ से रिश्ते मजबूत करने शुरू किए और उसके साथ व्यापार बढ़ाया। इसके साथ ही क्यूबा सरकार ने अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों को अपने नियंत्रण में ले लिया और अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैक्स लगा दिया। यहीं से दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार पड़ गई और अमेरिका-क्यूबा दुश्मनी की नींव मजबूत हो गई।

जब क्यूबा ने अमेरिका की तख़्तापलट की कोशिश नाकाम कर दी

1961 में अमेरिका ने क्यूबा में फ़िदेल कास्त्रो की सरकार गिराने के लिए एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस ऑपरेशन को इतिहास में “बे ऑफ़ पिग्स इनवेज़न” के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने कास्त्रो सरकार के विरोध में मौजूद क्यूबाई विद्रोहियों और निर्वासित लोगों को सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और आर्थिक मदद दी। योजना यह थी कि ये विद्रोही क्यूबा में हमला करेंगे और जनता का समर्थन मिलते ही कास्त्रो की सरकार गिर जाएगी। लेकिन यह योजना पूरी तरह फेल हो गई। इस असफलता की एक बड़ी वजह यह भी थी कि अमेरिका की ओर से वादा की गई हवाई सहायता समय पर नहीं पहुंच सकी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी थे और इस नाकामी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि को बड़ा झटका लगा। इस घटना के बाद क्यूबा ने अपनी सुरक्षा के लिए सोवियत संघ से नज़दीकियां और बढ़ा लीं। सोवियत संघ को क्यूबा में गुप्त रूप से परमाणु मिसाइलें तैनात करने की अनुमति दे दी गई। अक्टूबर 1962 में अमेरिकी जासूसी विमानों ने इन मिसाइलों का पता लगा लिया। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव अचानक बहुत बढ़ गया और दुनिया परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुंच गई। करीब 13 दिनों तक चले इस संकट के बाद आखिरकार सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने पर सहमति दे दी। क्यूबा के आम लोगों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया और कास्त्रो की सेना ने बेहद तेजी से जवाबी कार्रवाई की। सिर्फ तीन दिनों के भीतर ही इस पूरे अभियान को कुचल दिया गया। इसके बदले में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी ने क्यूबा पर हमला न करने का वादा किया और साथ ही तुर्की में तैनात अमेरिकी मिसाइलें हटाने पर भी सहमति दी।

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अमेरिका इसलिए है दुनिया का दादा

विदेशों में 200 से ज्यादा बेस

पेटागन की बेस स्ट्रक्बर रिपोर्ट और कुछ स्वतंत्र सैन्य विशेषज्ञों के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी सैन्य नेटवर्क है। पेंटागन आधिकारिक तौर पर केवल प्रमुख चेसों की गिनती बताता है। इनकी संख्या करीब 200 के आसपास हो सकती है। लेकिन यदि छोटे पैड्स और लॉजिस्टिक ठिकानों को जोड़ लिया जाए तो विदेशों में यह संख्या 600 के पार पहुंच जाती है। ये बेस दुनिया के लगभग 80 देशों और क्षेत्रों में फैले हुए हैं। सबसे ज्यादा बेस जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया में हैं। 

13 लाख सक्रिय सैनिक

थल सेना : 4,54,000

नौ सेना : 3,34,000

वायु सेना 3,28,000

मरीन कॉप्स 1,72,300

कॉस्ट गार्ड : 50,000

स्पेस फोर्स 10,400

रिजर्व बल 7,90,000

हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा

कई तरह के उनत हथियारों से लैस है अमेरिकी सेना

परमाणु शक्ति: अमेरिका उन चुनिंदा देशों में से है जिसके पास जमीन, हवा और समुद्र तीनों जगहों से परमाणु हमला करने की क्षमता है। सिपरी ईवरचुक के अनुसार इसके पास कुल मिलाकर 5,177 परमाणु वॉरहेड है (2025 में)।

वायु शक्ति: अमेरिका के पास करीब 13,200 सैन्य विमान हैं, जिनमें 2,800 फाइटर प्लेन हैं। दुनिया का सबसे शक्तिशाली स्टील्थ फाइटर प्लेन एफ-22 रैप्टर, एफ-15 ईशल, एफ-18 सुपर हॉर्नेट (नेवी के लिए) जैसे जेट शामिल।

समुद्री शक्ति: इसके पास करीब 290 सक्रिय युद्धपोत हैं। इनके अलावा 11 एपक्राफ्ट कैरियर हैं (एक कैरियर पर 90 से ज्यादा विमान रह सकते हैं)। सगभग 70 से ज्यादा डिस्ट्रॉपर्स और अनेक पनडुब्बियां भी हैं।

बल शक्ति: अमेरिका के पास हजारों की संख्या में मुद्धक टैंक हैं। इनमें मुख्य युद्धक टैंक M1A2 Abrams को संख्या करीच 1,500 हो सकती है। इसे दुनिया के सबसे भारी और अभेद्य टैंकों में से एक माना जाता है।

मिसाइल डिफेंस सिस्टम इसका सबसे लोकप्रिय

मिसाइत डिफेंस सिस्टम है पेट्टिवीट (PAC-3) जो कम एवं मध्यम दूरी की मिसाइलों और डॉन से रक्षा करता है। 'धाड' लंबी दूरी की मिसाइलों को रोकने में सक्षम है।

ट्रंप और बाइडन प्रशासन का क्यूबा पर रुख़

इसके बाद अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने और उनका पहला कार्यकाल शुरू हुआ। ट्रंप ने क्यूबा को लेकर बराक ओबामा सरकार के ज़्यादातर फैसलों को पलट दिया। उन्होंने क्यूबा पर फिर से सख़्ती बढ़ा दी।

क्यूबा की सेना से जुड़ी कंपनियों के साथ व्यापार पर रोक लगा दी गई, अमेरिकी नागरिकों के अकेले क्यूबा यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और क्रूज़ जहाज़ों के साथ-साथ ज़्यादातर उड़ानों को भी बंद कर दिया गया। 2019 में ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा को फिर से आतंकवाद का समर्थन करने वाला देश घोषित कर दिया। इसी दौरान एक और रहस्यमयी मामला सामने आया। क्यूबा में तैनात अमेरिकी और कनाडाई दूतावास के कई कर्मचारियों को अजीब तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ होने लगीं। कुछ लोगों को सुनाई देना कम हो गया, तो कुछ को गंभीर दिमाग़ी परेशानी होने लगी। बाद में इस रहस्यमयी बीमारी को “हवाना सिंड्रोम” नाम दिया गया। इसके बाद जो बाइडन अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बाइडन प्रशासन ने क्यूबा को लेकर कुछ नियमों में आंशिक ढील दी। क्यूबा में रहने वाले परिवारों को अमेरिका से ज़्यादा पैसे भेजने की अनुमति दी गई, क्यूबा के लिए और अधिक उड़ानें शुरू की गईं। लेकिन 2021 में क्यूबा के अंदर हालात फिर बिगड़ गए। खाने-पीने की चीज़ों, दवाओं और बिजली की भारी कमी से परेशान होकर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सरकार ने इन प्रदर्शनों को सख़्ती से दबाया, कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और इंटरनेट सेवाएँ भी बंद कर दी गईं। इन घटनाओं के बाद बाइडन प्रशासन ने क्यूबा पर कुछ नए प्रतिबंध भी लागू कर दिए।

कुल मिलाकर कहें तो इतिहास में जब भी किसी सरकार को जनता के दबाव से गिरते देखा गया है, तो एक कॉमन चीज जो नजर आती है वो हथियार थामने वाले ये तय कर लेते हैं कि अब उनके लिए आदेश देने वाले नेताओं के लिए जान देना जरूरी नहीं रह गया है। इसके अलग अलग पहलु हो सकते हैं। कहीं यह व्यक्तिगत स्वार्थ की वजह से होता है, कहीं विचारधारा या धर्म के प्रति निष्ठा प्रमुख कारक होता है। कहीं परिस्थितियाँ ही लोगों को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती हैं। लेकिन एक बात साफ है कि जब तक किसी राज्य के पास ऐसे लोग हैं जो हथियार उठाकर उसे बचाने के लिए तैयार हैं, तब तक वह सरकार काफी मजबूत स्थिति में रहती है। अब मान लीजिए कि क्यूबा वॉशिंगटन के साथ “ज़ीरो डे” तक कोई समझौता नहीं कर पाता, तो सबसे बड़ी परीक्षा उन लोगों की होगी जो वहाँ बंदूकें पकड़े खड़े हैं। यानी सेना और सुरक्षा बलों की वफादारी की असली परीक्षा। अंत में यही तय करेगा कि आगे क्या होगा? क्या क्यूबा में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन होगा, या फिर एक नई क्रांति शुरू होगी, या फिर यह स्थिति एक और सैन्य हस्तक्षेप की जमीन तैयार करेगी।

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