Gyan Ganga: जब अर्जुन ने भगवान से कहा, आपके समान कोई उत्तम श्रेष्ठ नहीं है

Gyan Ganga: जब अर्जुन ने भगवान से कहा, आपके समान कोई उत्तम श्रेष्ठ नहीं है

भगवान के शरीर में वर्तमान, भूत और भविष्य तीनों बातें मौजूद थीं इसलिए भगवान कहते हैं, जो कुछ देखना चाहते हो देख लो। अर्जुन को और क्या देखना था? अर्जुन के मन में संदेह था कि युद्ध में जीत किसकी होगी? मेरी या दुर्योधन की? इसलिए भगवान कहते हैं, कि वह भी तुम चाहो तो देख लो।

इस संसार में दुख भोगने वाला आगे चलकर सुखी हो सकता है लेकिन दूसरों को दुख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। पिछले अंक में हमने पढ़ा कि, भगवान ने अर्जुन को सुखी और प्रसन्न करने के लिए अपनी विभूतियों का विशद वर्णन किया। आइए ! अब हम गीता के एकादश अध्याय में प्रवेश करते हैं, जहां भगवान अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं। 

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ ।

यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ 

भगवान की कृपा का अनुभव करके अर्जुन भावविभोर हो उठे और प्रसन्नता से बोले -– हे प्रभों ! मुझ पर कृपा करके आपने जो परम-गोपनीय अध्यात्मिक विषयक ज्ञान दिया है, उस उपदेश से मेरा यह मोह दूर हो गया है। 

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।

त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्‌ ॥ 

हे कमलनयन ! मैंने आपसे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति तथा प्रलय और आपकी अविनाशी महिमा का भी वर्णन विस्तार से सुना हैं। अब आगे के श्लोक में अर्जुन विराटरूप के दर्शन के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।  

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।

 द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ 

अर्जुन कहते हैं- हे पुरुषोत्तम ! मेरी दृष्टि में इस संसार में आपके समान कोई उत्तम श्रेष्ठ नहीं है, आप सर्वोत्तम हैं। हे परमेश्वर ! मै आपके ऐश्वर्य-युक्त रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ। 

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।

योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌ ॥ 

 हे प्रभु ! यदि आप उचित समझते हैं, कि मैं आपके उस रूप को देखने में समर्थ हूँ,  तब हे योगेश्वर ! आप कृपा करके मुझे अपने उस अविनाशी विश्वरूप के दर्शन दीजिये। 

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(भगवान द्वारा विश्वरूप का वर्णन)

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।

  नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ 

अर्जुन की नम्रतापूर्वक की हुई प्रार्थना सुनकर भगवान अर्जुन को विश्वरूप देखने के लिए आज्ञा देते हुए कहते हैं - हे पार्थ ! अब तुम मेरे सैकड़ों-हजारों अनेक प्रकार के अलौकिक रूपों को और अनेक प्रकार के रंगो वाली आकृतियों को देखो। 

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।

बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ 

हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! तू मुझमें अदिति के बारह पुत्रों को, आठों वसुओं को, ग्यारह रुद्रों को, दोनों अश्विनी कुमारों को, उनचासों मरुतगणों को और इसके पहले कभी किसी के द्वारा न देखे हुए उन अनेकों आश्चर्यजनक रूपों को भी देख। 

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌ ।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ॥ 

निद्रा पर विजय प्राप्त करने के कारण अर्जुन को गुड़ाकेश कहा जाता है। भगवान कहते हैं कि हाथ में घोड़ों की लगाम और चाबुक लेकर तुम्हारे सामने बैठे हुए मेरे इस शरीर में एक स्थान में चर-अचर सृष्टि सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देखो और अन्य कुछ भी देखना चाहते हो उन्हे भी देख लो। 

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भगवान के शरीर में वर्तमान, भूत और भविष्य तीनों बातें मौजूद थीं इसलिए भगवान कहते हैं, जो कुछ देखना चाहते हो देख लो। अर्जुन को और क्या देखना था? अर्जुन के मन में संदेह था कि युद्ध में जीत किसकी होगी? मेरी या दुर्योधन की? इसलिए भगवान कहते हैं, कि वह भी तुम चाहो तो देख लो। 

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ॥ 

भगवान कहते हैं हे अर्जुन ! तुम अपनी इन आँखो से मेरे इस अलौकिक रूप को नहीं देख सकते क्योंकि चर्मचक्षु की शक्ति सीमित है, इसलिये मैं तुझे दिव्य  दृष्टि देता हूँ, जिससे तुम मेरी इस ईश्वरीय योग-शक्ति को आसानी से देख सको। अब आगे के श्लोक में संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं । 

(संजय द्वारा धृतराष्ट्र के समक्ष विश्वरूप का वर्णन)

संजय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌ ॥ 

संजय ने कहा - हे राजन्‌ ! इस प्रकार कहकर परम-शक्तिशाली योगी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्य-युक्त अलौकिक विश्वरूप दिखलाया। 

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अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌ ।

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌ ॥ 


दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ।

सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌ ॥ 

इस विश्वरूप में अनेकों मुँह, अनेकों आँखे, अनेकों आश्चर्यजनक दिव्य-आभूषणों से सुसज्जित, अनेकों दिव्य-शस्त्रों को उठाये हुए, दिव्य-मालाऎँ, वस्त्र को धारण किये हुए, दिव्य गन्ध का अनुलेपन किये हुए, सभी प्रकार के आश्चर्यपूर्ण प्रकाश से युक्त, असीम और सभी दिशाओं में मुख किए हुए सर्वव्यापी परमेश्वर को अर्जुन ने देखा। विराट रूप से प्रकट हुए भगवान के मुख और नेत्र सब के सब दिव्य हैं। 

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ 

यदि आकाश में एक हजार सूर्य एक साथ उदय हो तो उनसे उत्पन्न होने वाला वह प्रकाश भी उस सर्वव्यापी परमेश्वर के प्रकाश की शायद ही समानता कर सके, क्योंकि सूर्य में जो तेज है, वह भी भगवान से ही आया हुआ है। हजारों सूर्य का प्रकाश लौकिक है जबकि भगवान का प्रकाश अलौकिक है।  

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ 

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं- हे राजन ! पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से अलग-अलग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को, सभी देवताओं को, चौरासी लाख योनियाँ, चौदह भुवन आदि अनेक विभागों में विभक्त जगत को भगवान श्रीकृष्ण के उस दिव्य शरीर में एक स्थान पर ही स्थित देखा। 

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ 

संजय कहते हैं हे राजन ! भगवान का विराट स्वरूप देखकर अर्जुन आश्चर्यचकित और  हर्ष से रोमांचित हो गए। भगवान की विलक्षण कृपा देखकर अर्जुन का ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदले में क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ? मेरे पास तो कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो मैं अर्पण कर सकूँ। मैं तो केवल मस्तक झुकाकर प्रणाम ही कर सकता हूँ। अत: अर्जुन भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम करके स्तुति करने लगे। 

                         अर्जुन उवाच 

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌ ।

ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌ ॥ 

अर्जुन ने कहा - हे भगवान श्रीकृष्ण! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को तथा अनेकों विशेष प्राणियों  को एक साथ देख रहा हूँ, और कमल के आसन पर स्थित ब्रह्मा जी को, शिव जी को, समस्त ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ। तात्पर्य यह है कि अर्जुन मृत्यु लोक में बैठे हुए ही देवलोक, ब्रह्मलोक, वैकुंठ, कैलास आदि लोकों का दर्शन कर रहे हैं। यह सब जो कुछ भी कहने सुनने में आता है वह सब भगवान के एक अंश में विद्यमान है। सम्पूर्ण सृष्टि उनसे ही उत्पन्न होती है, उनमें ही रहती है और उनमें ही लीन हो जाती है पर वे भगवान वैसे के वैसे ही रहते हैं। लोगों को समझाने के लिए कबीरदास जी अपने भजन में कहते हैं---   

कबीरा जब हम पैदा हुए,

जग हँसे,हम रोये ।

ऐसी करनी कर चलो,

हम हँसे,जग रोये ॥

चदरिया झीनी रे झीनी

राम नाम रस भीनी

चदरिया झीनी रे झीनी

अष्ट-कमल का चरखा बनाया,

पांच तत्व की पूनी ।

नौ-दस मास बुनन को लागे,

मूरख मैली किन्ही ॥

चदरिया झीनी रे झीनी...

जब मोरी चादर बन घर आई,

रंगरेज को दीन्हि ।

ऐसा रंग रंगा रंगरे ने,

के लालो लाल कर दीन्हि ॥

चदरिया झीनी रे झीनी...

चादर ओढ़ शंका मत करियो,

ये दो दिन तुमको दीन्हि ।

मूरख लोग भेद नहीं जाने,

दिन-दिन मैली कीन्हि ॥

चदरिया झीनी रे झीनी...

ध्रुव -प्रह्लाद सुदामा ने ओढ़ी चदरिया,

शुकदेव  ने निर्मल कीन्हि ।

दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी,

ज्यूँ की त्यूं धर दीन्हि ॥

चदरिया झीनी रे झीनी ।

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु

जय श्री कृष्ण

- आरएन तिवारी 







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