अपने अभिनय से किरदार को जीवंत बना देतीं थी ललिता पवार

By अमृता गोस्वामी | Publish Date: Feb 23 2019 6:53PM
अपने अभिनय से किरदार को जीवंत बना देतीं थी ललिता पवार
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ललिता पवार का जन्म इंदौर के अंबा मंदिर में हुआ था इसलिए उनका नाम अंबिका रखा गया जो बाद में ललिता कर दिया गया। इनके पिता का नाम लक्ष्मण राव सगुन और माता का नाम अनुसूया था।

ललिता पवार बॉलीवुड का एक ऐसा नाम है जिनकी चर्चा उनकी फिल्मों में हीरोइन से ज्यादा होती थी। ललिता पवार को हालांकि फिल्मों में प्यार और मुहब्बत के लिए तो नहीं जाना जाता पर लोग इन्हें इनकी निगेटिव रोल के लिए निभाई दमदार भूमिका के लिए काफी जानते हैं। निगेटिव रोल में ललिता पवार की भूमिका इतनी सशक्त होती थी, लगता था कि यह अभिनय नहीं बल्कि सच्चाई है।
 
ललिता पवार का जन्म इंदौर के अंबा मंदिर में हुआ था इसलिए उनका नाम अंबिका रखा गया जो बाद में ललिता कर दिया गया। इनके पिता का नाम लक्ष्मण राव सगुन और माता का नाम अनुसूया था। ललिता पवार संपन्न घराने से थीं किन्तु 1916 में जब इनका जन्म हुआ उस समय लड़कियों की पढ़ाई पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता था। ललिता पवार ने जो थोड़ी बहुत पढ़ाई की वह घर पर ही की।
 


 
11 बरस की उम्र में ललिता अपने पिता और और छोटे भाई शांताराम के साथ पुणे आई, जहां उन्हें आर्यन फिल्म कंपनी के स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग देखने का मौका मिला। ललिता की फिल्मों में रूचि को देखते हुए फिल्म के निर्देशक नाना साहेब सरपोतदार ने उन्हें बाल भूमिकाएं करने का ऑफर दिया। यहां से ललिता के फिल्मी सफर की शुरूआत अंबा की जगह ललिता नाम से हुई।
 
यह समय था जब मूक फिल्में बना करती थीं। ललिता की पहली फिल्म पतितोद्धार मूक फिल्म थी जो 1927 में बनी। इसके बाद ललिता ने कई मूक फिल्मों में काम किया। जब बोलती फिल्मों का जमाना आया तब ललिता को फिल्म मिली हिम्मते मर्दां, इस फिल्म में ललिता ने एक गाना भी गाया था ‘नील आभा में प्यारा गुलाब रहे, मेरे दिल में प्यारा गुलाब रहे।’ जो उस समय का काफी हिट सांग रहा।
ललिता ने बॉलीवुड की कुछ थ्रिलर फिल्मों में भी काम किया जिनमें हीरोइनों को स्टंट करते दिखाया जाता था। मस्तीखोर माशूक और भवानी तलवार, प्यारी कटार और जलता जिगर, कातिल कटार इत्यादि उनकी कुछ ऐसी ही प्रारंभिक फिल्में थीं। जब जमाना पौराणिक फिल्मों का आया तो ललिता पवार को इन फिल्मों में भी काफी काम मिला और उनके किरदार को लोगों ने खूब सराहा। 
 
1941 में मराठी फिल्मों के मशहूर उपन्यासकार विष्णु सखाराम खांडेकर की कहानी पर बनी फिल्म अमृत में ललिता ने मोची का किरदार निभाया। उनका यह रोल इतना सजीव था कि अपनी जाति बताने के लिए ललिता को अपना जाति प्रमाण पत्र बनवाना पड़ा।
 


1942 में ललिता की जिन्दगी में अचानक एक बड़ा मोड़ आया जिसने उनके हीरोइन के कॅरियर को खत्म कर दिया। 1942 में फिल्म जंग-ए-आजादी में वे भगवान दादा के साथ काम कर रही थीं। इस फिल्म के एक सीन में भगवान दादा को ललिता को थप्पड़ मारना था। थप्पड़ ललिता को इतनी जोर का लगा कि वो वहीं गिर गईं जिससे उनके शरीर के दाहिने हिस्से में लकवा हो गया। 
 
कुछ समय विराम के बाद ललिता ने 1944 में वापस फिल्मों में एंट्री की पर अब हीरोइन के तौर पर नहीं, बल्कि चरित्र रोल में। 1944 में रामशास्त्री की फिल्म में क्रूर सास बनकर और 1948 में गृहस्थी फिल्म से ललिता ने रूपहले पर्दे पर वापस अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। शांताराम की ही फिल्म ‘दहेज’ में भी ललिता पवार कठोर सास बनी। एक के बाद एक कई फिल्मों में कठोर, दुःख पहुंचाने वाली सास के रूप में भूमिकाएं करते हुए ललिता पवार की पहचान क्रूर सास के रूप में स्थापित हो गई। 
 
1955 में राजकपूर की फिल्म श्री 420 में ललिता पवार ने नरम दिल की औरत का रोल भी किया, इसमें वे केलेवाली बनी थीं और राजकपूर उन्हें दिलवाली कहते थे। अपने इस रोल में वे बहुत फेमस हुईं। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म अनाड़ी में ललिता पवार ऊपर से क्रूर पर अंदर से नरम मिसेज डिसूजा बनी, उनकी इस अदाकारी के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
 
जब फिल्म सौ दिन सास के लिखी जा रही थी तब क्रूर सास के रोल के लिए लोगों के दिमाग में एक ही नाम था कि इस फिल्म में सास के किरदार में वे ही नजर आएंगी और हुआ भी वही। यह फिल्म काफी हिट रही। इस फिल्म के बाद जब भी कोई बहू अपनी सास से दुःखी होती, सास को ललिता पवार कहकर संतुष्ट हो लेती। ललिता पवार ने लगभग 700 फिल्मों में काम किया।
 
ललिता पवार की एक और भूमिका जो हमेशा याद की जाती है वह थी टीवी पर रामानंद सागर के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण में मंथरा का उनका रोल। टेढ़ी सी चाल चलकर मंथरा का किरदार उन्होंने इतना बखूबी निभाया कि मंथरा के पात्र को हर घर में बच्चा बच्चा भी जानने लगा। ललिता पवार की अन्तिम फिल्म सुनील शेट्टी और पूजा बत्रा की भाई थी।
ललिता पवार की जिन्दगी का अंतिम समय काफी कष्टप्रद बीता उन्हें जबड़े का कैंसर हो गया था और इसके बाद उनकी हालत लगातार गिरती गई। अपनी तबियत और अंतिम परिस्थितियों को देखकर कई बार ललिता पवार मजाक में कहती थीं कि शायद इतने खराब रोल की सजा भुगत रही हूं। पर, असल जिंदगी में वे बहुत ही नरम दिल की महिला थीं। 
 
24 फरवरी 1998 को 82 साल की उम्र में पुणे के अपने बंगले आरोही में ललिता पवार की मौत हो गई। श्रद्धांजलि ललिता पवार को जिन्होंने फिल्मी पर्दे पर अपनी भूमिकाएं इतनी शिद्दत से निभाईं कि दर्शकों के मस्तिष्क पटल पर उनकी यादें सदा के लिए अमर हो गईं। 
 
अमृता गोस्वामी

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