भारत-न्यूजीलैंड FTA से निर्यातकों और MSME के लिए नए रास्ते, CII ने दिया फायदा उठाने का सुझाव

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भारतीय उद्योग परिसंघ ने घरेलू निर्यातकों और विशेष रूप से एमएसएमई इकाइयों को 20 अक्टूबर से लागू हुए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते का अधिकतम लाभ उठाने को कहा है। सीआईआई की राष्ट्रीय समिति के चेयरमैन संजय बुधिया के अनुसार यह समझौता भारतीय सामानों को न्यूजीलैंड में शुल्क-मुक्त पहुंच दिलाएगा। इससे इंजीनियरिंग, रसायन, दवा और कपड़ा जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों को सीधे तौर पर मजबूती मिलेगी।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने घरेलू निर्यातकों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को हाल ही में लागू द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते का अधिकतम लाभ उठाने के लिए न्यूजीलैंड के खरीदारों से संपर्क करने, उत्पाद-विशिष्ट मूल नियमों पर गौर करने और निर्यात संवर्धन मिशन जैसी योजनाओं का लाभ उठाने का आह्वान किया है। दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश संबंधों को बढ़ावा देने के लिए 20 अक्टूबर को मुक्त व्यापार समझौता लागू किया। सीआईआई की निर्यात पर राष्ट्रीय समिति के चेयरमैन और ‘पैटन इंटरनेशनल लिमिटेड’ के प्रबंध निदेशक (एमडी) संजय बुधिया ने कहा कि न्यूजीलैंड व्यापक ओशिनिया और प्रशांत द्वीप बाजारों तक पहुंचने का माध्यम भी बन सकता है।

ओशिनिया, प्रशांत महासागर और उसके आसपास फैले हुए द्वीपों और भू-खंडों का एक भौगोलिक क्षेत्र है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं निर्यातकों, खासकर एमएसएमई से आग्रह करता हूं कि वे जल्द कदम उठाएं, न्यूजीलैंड के खरीदारों से संपर्क करें, उत्पाद-विशिष्ट मूल नियमों की जांच करें और निर्यात संवर्धन मिशन जैसी योजनाओं का पूरा लाभ उठाएं। न्यूजीलैंड व्यापक ओशिनिया और प्रशांत द्वीप बाजारों तक पहुंचने का माध्यम भी बन सकता है।’’ बुधिया ने कहा कि यह समझौता भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड में सभी शुल्क श्रेणियों में शुल्क-मुक्त पहुंच प्रदान करता है।

इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा, चमड़ा एवं जूते-चप्पल जैसे उत्पादों पर पहले 10 प्रतिशत तक लगने वाला शुल्क अब शून्य हो गया है। इस समझौते से इंजीनियरिंग सामान, रसायन, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों सहित कई उद्योगों को लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही कपड़ा और चमड़ा जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भी फायदा होगा।

उन्होंने कहा कि स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता उपायों (एसपीएस) और व्यापार में तकनीकी बाधाओं (टीबीटी) से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल बनाने, इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणन तथा अच्छी विनिर्माण प्रथाओं (जीएमपी) और अच्छी नैदानिक प्रथाओं (जीसीपी) की निरीक्षण रिपोर्ट को स्वीकार करने से अनुपालन लागत घटाने में भी मदद मिलेगी।

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