वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की 'असाधारण' रफ्तार! 2026 में 6.6% की दर से बढ़ेगा भारत, अमेरिकी शुल्कों का नहीं होगा असर?

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2026 में 6.6% की शानदार वृद्धि दर दर्ज करेगा। वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत का प्रदर्शन 'असाधारण' रहने की उम्मीद है। निजी खपत और सरकारी निवेश में मजबूती के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते अमेरिकी शुल्कों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विशेष असर नहीं पड़ेगा।
भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इस गति को बनाए रखने के लिए अच्छी स्थिति में है। 2047 तक - अपनी आज़ादी के सौवें साल तक - उच्च मध्यम-आय वाला देश बनने की महत्वाकांक्षा के साथ, देश आर्थिक विकास, स्ट्रक्चरल सुधारों और सामाजिक प्रगति की मज़बूत नींव पर आगे बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2026 में 6.6% की शानदार वृद्धि दर दर्ज करेगा। वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत का प्रदर्शन 'असाधारण' रहने की उम्मीद है। निजी खपत और सरकारी निवेश में मजबूती के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते अमेरिकी शुल्कों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विशेष असर नहीं पड़ेगा।
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इसमें कहा गया है कि भारत ‘‘ चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में असाधारण रूप से उच्च वृद्धि’’ दर्ज करेगा। मजबूत निजी उपभोग एवं मजबूत सार्वजनिक निवेश से अमेरिकी शुल्क के उच्च प्रभाव की काफी हद तक भरपाई हो जाएगी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आर्थिक वृद्धि दर 2025 में अनुमानित 7.4 प्रतिशत से घटकर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। विभाग ने साथ ही कहा कि भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
इसमें कहा गया है, ‘‘ निजी उपभोग में मजबूती, सार्वजनिक निवेश में वृद्धि, हालिया कर सुधार एवं कम ब्याज दरों से निकट भविष्य में वृद्धि को समर्थन मिलने की उम्मीद है। हालांकि, यदि मौजूदा दरें बनी रहती हैं तो अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च शुल्क 2026 में निर्यात प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं क्योंकि भारत से होने वाले कुल निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत है।’’
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संयुक्त राष्ट्र विकास एजेंसी (यूएन डीईएसए) के आर्थिक विश्लेषक तथा नीति प्रभाग की वैश्विक आर्थिक निगरानी इकाई के वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं प्रभारी अधिकारी इंगो पिटर्ले ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र बना रहेगा जिसकी दर 5.6 प्रतिशत रहेगी।
इस वृद्धि में सबसे अधिक योगदान ‘‘ भारत का रहेगा जहां मजबूत घरेलू मांग, अच्छी फसल से समर्थित मुद्रास्फीति में कमी और निरंतर नीतिगत समर्थन वृद्धि को गति दे रहे हैं।’’ यूएन डीईएसए के आर्थिक विश्लेषक एवं नीति प्रभाग के निदेशक शांतनु मुखर्जी ने कहा कि भारत के निर्यात बाजारों का यूरोपीय संघ और पश्चिम एशिया की ओर विविधीकरण हुआ है।
मुखर्जी ने भी दोहराया कि भारत में ‘‘ वृद्धि के घरेलू कारक असाधारण रूप से मजबूत रहे हैं ’’ और इस समय भारत से होने वाले सबसे मजबूत निर्यातों में से एक सेवाओं का निर्यात है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर के 2025 में 2.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है और यह 2026 में थोड़ा घटकर 2.7 प्रतिशत हो सकती है। इसके बाद 2027 में इसके बढ़कर 2.9 प्रतिशत होने का अनुमान है जो वैश्विक महामारी से पहले (2010-2019) के औसत 3.2 प्रतिशत से काफी कम है।
यूरोप, जापान और अमेरिका में वृद्धि दर मोटे तौर पर स्थिर रहने के साथ ही मध्यम गति से बढ़ने का अनुमान है। मौद्रिक या राजकोषीय सहायता से मांग को निरंतर समर्थन मिलता रहेगा। चीन, भारत और इंडोनेशिया सहित कई बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में मजबूत घरेलू मांग या लक्षित नीतिगत उपायों के कारण ठोस वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है। इसमें बताया गया कि अमेरिका को देशों के माल निर्यात के मूल्य में भी बदलाव आया है।
चीन से आई भारी गिरावट (विशेष रूप से लैपटॉप और स्मार्टफोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों की) की भरपाई वियतनाम और अन्य दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) की अर्थव्यवस्थाओं से आयात में वृद्धि से हुई। इसमें साथ ही कहा गया है, ‘‘ भारत ने वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति को भी मजबूत किया है।
इसके अलावा IMF की अप्रैल 2025 की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की GDP के साथ जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और अगले 2.5 से 3 सालों में जर्मनी को तीसरे स्थान से हटाने के लिए तैयार है, जिसका अनुमानित GDP 2030 तक 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होगा। विकास की गति ने और भी ज़्यादा चौंकाया, 2025-26 की दूसरी तिमाही में GDP छह-तिमाही के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई, जो लगातार वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं के बीच भारत के लचीलेपन को दर्शाता है। मज़बूत निजी खपत के नेतृत्व वाले घरेलू कारकों ने इस विस्तार को समर्थन देने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
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