विमान भी अपना, एयरपोर्ट भी अपना और अब एयरलाइन भी अपनी! अडानी अब इंडिगो-एयर इंडिया को देंगे टक्कर

अडानी ने उस नियम में ढील देने की मांग की है जो 2006 में दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट्स के प्राइवेटाइज़ेशन के समय लागू किया गया था। यह नियम देश के दो सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स के ऑपरेटरों को किसी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से ज़्यादा हिस्सेदारी रखने से रोकता है।
अडानी ग्रुप ने सरकार से एक नियम में बदलाव की मांग की है। यह नियम अभी दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट के ऑपरेटर्स को किसी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से ज़्यादा हिस्सेदारी रखने से रोकता है। अगर इस बदलाव को मंज़ूरी मिल जाती है, तो इससे ग्रुप के लिए अपनी एयरलाइन शुरू करने और भारत के एविएशन मार्केट में इंडिगो और एयर इंडिया के दबदबे को चुनौती देने का रास्ता खुल सकता है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब ऐसी रिपोर्टें हैं कि सरकार अडानी ग्रुप और GMR एयरपोर्ट्स जैसे एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन बिज़नेस में आने की इजाज़त देने पर विचार कर रही है। इसका मकसद उस मार्केट में कॉम्पिटिशन बढ़ाना है जहाँ इंडिगो और एयर इंडिया मिलकर घरेलू पैसेंजर ट्रैफिक का लगभग 90% हिस्सा संभालते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अडानी ने उस नियम में ढील देने की मांग की है जो 2006 में दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट्स के प्राइवेटाइज़ेशन के समय लागू किया गया था। यह नियम देश के दो सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स के ऑपरेटरों को किसी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से ज़्यादा हिस्सेदारी रखने से रोकता है। माना जा रहा है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की राय ले रहा है कि क्या इस क्लॉज़ में पिछली तारीख से बदलाव किया जा सकता है। ऐसे किसी भी बदलाव के लिए कैबिनेट की मंज़ूरी की ज़रूरत होगी।
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अडानी एयरलाइन क्यों चाहते हैं?
अडानी ग्रुप ने पिछले कुछ सालों में एविएशन वैल्यू चेन में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाई है। आठ एयरपोर्ट चलाने के अलावा, उन्होंने पायलट ट्रेनिंग, एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस और रिपेयर (MRO) और ग्राउंड हैंडलिंग के कारोबार भी खड़े किए हैं। ग्रुप की मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट में 74% हिस्सेदारी है, जबकि दिल्ली एयरपोर्ट में ज़्यादातर हिस्सेदारी GMR एयरपोर्ट्स की है। रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी की नई सोच ब्राज़ील की विमान बनाने वाली कंपनी एम्ब्रेयर (Embraer) के साथ विमान बनाने की प्रस्तावित पार्टनरशिप से भी जुड़ी है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ET को बताया कि ग्रुप को मौजूदा एयरलाइंस से एम्ब्रेयर विमान खरीदने में काफ़ी दिलचस्पी पैदा करने में मुश्किल हुई है। उन्हें लगता है कि अपनी एयरलाइन होने से मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट को कमर्शियली फ़ायदेमंद बनाने में मदद मिल सकती है। रिपोर्ट में अडानी के एक सीनियर एग्ज़ीक्यूटिव ने कहा कि एयरलाइन चलाने में तालमेल (synergies) के फ़ायदे होने में "कोई शक नहीं" है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक कोई पक्का फ़ैसला नहीं लिया गया है और मौजूदा एयरलाइन को खरीदने के लिए अभी कोई ठोस बातचीत नहीं चल रही है। एग्ज़ीक्यूटिव ने कहा कि ग्रुप ने सरकार को सुझाव दिया था कि बिना मालिकाना हक की पाबंदियों वाला एक ऐसा फ़्रेमवर्क बनाया जाए जो काम को आसान बनाए।
सरकार इस पर क्यों विचार कर सकती है
रिपोर्ट में बताए गए सरकारी अधिकारियों के अनुसार, केंद्र सरकार घरेलू एविएशन सेक्टर में ज़्यादा कॉम्पिटिशन को बढ़ावा देना चाहती है, जिस पर अभी इंडिगो और एयर इंडिया का दबदबा है। उनका कहना है कि अच्छी फंडिंग वाली नई एयरलाइन ज़्यादा कॉम्पिटिशन ला सकती है। हालांकि, इस प्रस्ताव का मौजूदा एयरलाइंस की तरफ से कड़ा विरोध होने की उम्मीद है। रिपोर्ट में ज़िक्र किए गए एयरलाइन अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को एयरलाइंस की ओनरशिप की इजाज़त देने से हितों का टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट) हो सकता है। ऐसा खासकर एयरपोर्ट स्लॉट के आवंटन में हो सकता है, जो टेक-ऑफ और लैंडिंग का समय तय करते हैं और व्यस्त एयरपोर्ट्स पर इन्हें कीमती एसेट माना जाता है।
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