RBI की वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों, संस्थानों को नियामकीय ‘सैंडबाक्स’ स्थापित करने की मंजूरी

रिजर्व बैंक ने मंगलवार को स्टार्टअप, बैंक और वित्तीय संस्थानों को खुदरा भुगतान, डिजिटल केवाईसी और संपत्ति प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनूठे उत्पादों के उपयोग के साथ परीक्षण के लिये नियामकीय ‘सैंडबाक्स’ स्थापित करने को मंजूरी दे दी। सामान्य तौर पर नियामकीय सैंडबाक्स (आरएस) से आशय नये उत्पादों या सेवाओं का नियंत्रित नियामकीय माहौल में उपयोग के साथ परीक्षण (लाइव टेस्टिंग) से है।
मुंबई। रिजर्व बैंक ने मंगलवार को स्टार्टअप, बैंक और वित्तीय संस्थानों को खुदरा भुगतान, डिजिटल केवाईसी और संपत्ति प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनूठे उत्पादों के उपयोग के साथ परीक्षण के लिये नियामकीय ‘सैंडबाक्स’ स्थापित करने को मंजूरी दे दी। सामान्य तौर पर नियामकीय सैंडबाक्स (आरएस) से आशय नये उत्पादों या सेवाओं का नियंत्रित नियामकीय माहौल में उपयोग के साथ परीक्षण (लाइव टेस्टिंग) से है। इसके लिये नियामक परीक्षण के सीमित उद्देश्य को लेकर कुछ छूट दे सकता है।
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यह नियामक, नवप्रवर्तन करने वाले, वित्तीय सेवा प्रदाताओं और ग्राहकों को कार्य स्थलों में परीक्षण की अनुमति देता है ताकि नये वित्तीय खोज के लाभ और जोखिम से जुड़े साक्ष्य एकत्रित किये जा सके और जरूरत के अनुसार उसके जोखिम पर अंकुश लगाया जा सके। नियामकीय सैंडबाक्स के लिये रूपरेखा जारी करते हुए आरबीआई ने कहा कि यह व्यवस्था सभी पक्षों के लिये कार्य करते हुए सीखने को प्रोत्साहित करती है। साथ ही नियामकों को उभरती प्रौद्योगिकी के लाभ और जोखिम तथा उसके उपयोग के बारे में प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलते हैं।
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इससे संबंधित प्राधिकरण उस नियामकीय बदलाव या नये नियमन पर सोच समझकर निर्णय कर सकते हैं। नियामकीय सैंडबाक्स वैसे उत्पादों की व्यवहार्यता का परीक्षण कर सकता है जिसके सफल होने की संभावना है।इसके लिये बड़े स्तर पर क्रियान्वयन की जरूरत नहीं होगी। यह इसका एक और बड़ा लाभ है।
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आरबीआई ने नियामकीय सैंडबाक्स के लिये पात्रता मानदंड के बारे में कहा कि इसके लिये वित्तीय प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां पात्र हैं। इसके अंतर्गत स्टार्टअप, बैंक, वित्तीय संस्थान और अन्य कंपनियां आ सकती हैं जो वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कंपनियों को सहायता उपलब्ध कराती हैं। इस व्यवस्था का जोर उन घरेलू बाजारों में उपयोग के लिये नवप्रवर्तन को बढ़ावा देना है जहां नियमन का अभाव है और प्रस्तावित नवप्रवर्तन के लिये नियमन में अस्थायी तौर पर ढील देने की जरूरत है।
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