हिंदी भाषा को सियासी नहीं, जमीनी हकीकत के नजरिए से आंकिए

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कमलेश पांडे । Sep 14 2026 10:57AM

खासकर भारतीय अभिजात्य वर्ग यानी अंग्रेजी दां लोगों के इशारे पर दक्षिण-पश्चिम-पूर्वी भारतीय भाषाओं यथा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषियों में हिंदी के प्रति जो भाषाई सौतियाडाह दिखाई देती है, उससे स्थिति और जटिल हो जाती है।

भारत में हिंदी भाषा को लेकर चलने वाली राजनीति और उसकी जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर है, जो लगातार गहराता चला गया। हालांकि अब इसे पाटने और इससे लेकर गाहे बगाहे उत्पन्न होते रहने वाले मतभेदों को दूर करने की जरूरत है। एक तरफ जहां हिंदी को राजनीतिक ध्रुवीकरण और भाषाई अस्मिता के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, वहीं व्यावहारिक धरातल पर इसकी स्थिति बिल्कुल अलग नजर आती है। इसलिए जनसामान्य के नजरिए से ही इसका सम्यक समाधान अपेक्षित है।

खासकर भारतीय अभिजात्य वर्ग यानी अंग्रेजी दां लोगों के इशारे पर दक्षिण-पश्चिम-पूर्वी भारतीय भाषाओं यथा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषियों में हिंदी के प्रति जो भाषाई सौतियाडाह दिखाई देती है, उससे स्थिति और जटिल हो जाती है। यदि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषी भी पंजाबी, बंग्ला और गुजराती भाषा-भाषियों की तरह हिंदी के प्रति सहज, सहनशील और जागरूक रहें तो भारत के हिंदी व प्रतिस्पर्धी भाषाई विवाद को न्यूनतम किया जा सकता है।

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# देश में हिंदी भाषा को लेकर जारी सियासत के कुछ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:- 

पहला, 'एक राष्ट्र, एक भाषा' का नैरेटिव: केंद्र की राजनीति में अक्सर हिंदी को पूरे देश की संपर्क भाषा (Link Language) या राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है।

दूसरा, गैर-हिंदी राज्यों का विरोध: तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंदी को 'थोप जाने' (Hindi Imposition) का मुद्दा बनाकर क्षेत्रीय दल अपनी राजनीति को मजबूत करते हैं।

तीसरा, वोट बैंक और ध्रुवीकरण: उत्तर भारत में हिंदी प्रेम का कार्ड खेलकर मतदातों को लुभाया जाता है, जबकि दक्षिण में 'हिंदी विरोध' क्षेत्रीय पहचान और भाषाई स्वाभिमान को बचाने का बड़ा जरिया बन जाता है।

# जहां तक संवैधानिक और व्यावहारिक हकीकत की बात है तो इसके विभिन्न आयामों और उनकी वैधानिक व व्यावहारिक स्थिति पर गौर करना लाजिमी है:- 

पहली, राष्ट्रीय भाषा (National Language) : भारतीय संविधान में हिंदी को 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा प्राप्त है (अनुच्छेद 343), 'राष्ट्रभाषा' का नहीं। भारत की 22 आधिकारिक भाषाएं समान हैं। 

दूसरी, जनसंख्या और पहुंच : 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 43.6% भारतीयों की मातृभाषा हिंदी (और उसकी बोलियां) है। यह देश की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा है। 

तीसरी, बाजार की हकीकत : राजनीति भले ही विरोध करे, लेकिन बॉलीवुड, ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म, डिजिटल मीडिया और कॉर्पोरेट विज्ञापन दक्षिण और पूर्व के राज्यों में भी हिंदी में ही फल-फूल रहे हैं। 

चौथी, रोजगार की चुनौती : हिंदी भाषी राज्यों के युवा उच्च शिक्षा, विज्ञान और कॉर्पोरेट नौकरियों के लिए आज भी अंग्रेजी पर ही निर्भर हैं। हिंदी पट्टी में शिक्षा की गुणवत्ता का अभाव एक बड़ी चुनौती है। 

# हिंदी भाषा से जुड़ी मुख्य जमीनी सच्चाई इस प्रकार है जिन्हें नजरअंदाज करने से नीतिगत उलझने बढ़ेंगी

एक, भाषा थोपने से जुड़ा डर: गैर-हिंदी भाषी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि केंद्रीय परीक्षाओं और नौकरियों में हिंदी को प्राथमिकता दी गई, तो उनके युवाओं के अवसर सीमित हो जाएंगे।

दो, बोलियों का नुकसान: अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली और गढ़वाली जैसी समृद्ध बोलियों को हिंदी के व्यापक छत्र के नीचे समेटने से उनकी अपनी भाषाई विविधता कमजोर हो रही है।

तीन, अंग्रेजी का दबदबा: हिंदी की राजनीति करने वाले नेताओं के अपने बच्चे भी अक्सर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं, जिससे आम जनता के लिए रोजगार आधारित शिक्षा का अंतर बना रहता है।

सच कहूं तो हिंदी भाषा भारत को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है, लेकिन इसे किसी राजनीतिक एजेंडे या अनिवार्यता के बजाय आपसी संवाद और बाजार की जरूरत के तहत स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना ही देश के बहुभाषी ताने-बाने को मजबूत रख सकता है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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