Annamalai को किनारे कर BJP ने कोई सियासी चाल चली है या पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है?

K Annamalai
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साथ ही अन्नामलाई को लेकर सियासी हलचल उस वक्त और तेज हो गई जब उन्हें केरल के कन्नूर में चल रहे प्रचार अभियान के बीच अचानक चेन्नई लौटने का निर्देश दिया गया, जहां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम बैठक तय की गयी थी।

तमिलनाडु की सियासत में इस समय जो उबाल दिख रहा है, उसने राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई को विधानसभा चुनाव की सूची से बाहर रखे जाने ने न केवल पार्टी के अंदर बल्कि पूरे राजनीतिक गलियारे में तीखी बहस छेड़ दी है। सवाल यह नहीं है कि उन्हें टिकट क्यों नहीं मिला, बल्कि यह है कि क्या उन्हें सुनियोजित तरीके से किनारे किया गया है?

हम आपको बता दें कि शुक्रवार को नई दिल्ली से जारी उम्मीदवारों की सूची में 27 नाम शामिल थे, लेकिन अन्नामलाई का नाम गायब रहा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने इसे सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व का फैसला बताया तो वहीं केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया कि अन्नामलाई को व्यापक रणनीति के तहत पूरे तमिलनाडु में प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है, न कि किसी एक सीट तक सीमित रखा गया है। लेकिन इस एक वाक्य ने जवाब देने की बजाय कई सवाल खड़े कर दिये।

साथ ही अन्नामलाई को लेकर सियासी हलचल उस वक्त और तेज हो गई जब उन्हें केरल के कन्नूर में चल रहे प्रचार अभियान के बीच अचानक चेन्नई लौटने का निर्देश दिया गया, जहां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम बैठक तय की गयी थी। प्रधानमंत्री के साथ अन्नामलाई की बैठक के बाद इस तरह के संकेत मिले हैं कि पार्टी उन्हें पर्दे के पीछे एक बड़े चुनावी चेहरे के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है, खासकर तब जब गठबंधन के तहत भाजपा को 27 सीटों पर ही चुनाव लड़ना है।

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हम आपको बता दें कि अन्नामलाई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी कड़ी मेहनत से पार्टी को तमिलनाडु में जमीन से उठाकर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया। खास बात यह है कि उनके प्रशंसक और समर्थक सिर्फ तमिलनाडु में ही नहीं बल्कि देशभर में हैं और उनको एक प्रतिभाशाली नेतृत्व के रूप में देखते हैं। इसलिए अन्नामलाई को उम्मीदवारी नहीं मिलने पर हर कोई हैरान है।

हालांकि तमाम तरह की चर्चाओं पर विराम लगाते हुए खुद अन्नामलाई ने दावा किया है कि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला पहले ही पार्टी को लिखित रूप में दे दिया था। उन्होंने कहा है कि वह पूरे राज्य में एनडीए के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करना चाहते हैं, न कि किसी एक सीट तक सीमित रहना चाहते हैं। लेकिन राजनीति के जानकार इस बयान को पूरी सच्चाई मानने को तैयार नहीं हैं। अंदरखाने की खबरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।

हम आपको बता दें कि असल खेल गठबंधन का है। एक साल पहले ही अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया था और यह कदम सीधे तौर पर अन्नाद्रमुक के साथ रिश्ते सुधारने की रणनीति से जोड़ा गया। अन्नाद्रमुक प्रमुख एडप्पडी के. पलानीस्वामी की शर्त साफ थी कि जब तक अन्नामलाई किनारे नहीं होंगे, गठबंधन संभव नहीं है। ऐसे में पार्टी ने अपने सबसे आक्रामक चेहरे को ही पीछे कर दिया।

अब समीकरण देखिए। अन्नाद्रमुक को एक सौ अठहत्तर सीटें, भाजपा को सत्ताइस और अन्य सहयोगियों को बाकी सीटें दी गईं। यह बंटवारा साफ संकेत देता है कि भाजपा ने तमिलनाडु में अपने विस्तार की रणनीति को फिलहाल गठबंधन के दबाव में ढाल दिया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जातीय समीकरण भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अन्नामलाई और पलानीस्वामी दोनों एक ही समुदाय से आते हैं। इस समुदाय का प्रभाव पश्चिमी तमिलनाडु में मजबूत है और यही क्षेत्र चुनावी दृष्टि से निर्णायक माना जाता है। अन्नामलाई का तेजी से उभरना अन्नाद्रमुक के लिए सीधी चुनौती बन गया था। ऐसे में उन्हें सीमित करना राजनीतिक मजबूरी बन गया।

इसके चलते पिछले एक साल में अन्नामलाई की भूमिका लगातार कम होती गई। उन्हें पहले प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया, फिर चुनाव प्रबंधन समिति से बाहर रखा गया और अंततः उन्हें सिर्फ छह सीटों की जिम्मेदारी दी गई। यह किसी भी बड़े नेता के लिए स्पष्ट संकेत होता है कि उसकी पकड़ कमजोर की जा रही है।

अन्नामलाई संकेतों को समझ गये थे इसलिए फरवरी 2026 में उन्होंने छह सीटों की जिम्मेदारी से भी खुद को अलग कर लिया और इसके लिए वजह बताई पिता की तबीयत। लेकिन अंदर की खबर यह थी कि उन्हें इतने सीमित दायरे में बांधे जाने से नाराजगी थी। विधानसभा चुनाव में उनके करीबी नेताओं को भी टिकट नहीं दिया गया, जिससे यह संदेश और मजबूत हुआ कि यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे गुट को किनारे करने की रणनीति है।

अब जरा अन्नामलाई के राजनीतिक सफर पर नजर डालिए। उन्होंने अपने कार्यकाल में जिस तरह आक्रामक राजनीति की, उसने उन्हें युवा मतदाताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। चाहे द्रविड दलों पर तीखे हमले हों, या भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ जारी की गई फाइलें, उन्होंने हर मुद्दे को आक्रामक अंदाज में उठाया। उन्होंने राज्यभर में यात्रा कर कार्यकर्ताओं को जोड़ा, बड़े जनसमूह जुटाए और पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़ाया। हालांकि लोकसभा चुनाव में सीटें नहीं मिलीं, लेकिन वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी ने यह दिखाया कि जमीन पर बदलाव हो रहा है।

यही वजह है कि उनका अचानक हाशिए पर जाना कई लोगों को पच नहीं रहा। पार्टी के अंदर भी दो राय साफ दिख रही है। एक धड़ा मानता है कि यह दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जबकि दूसरा मानता है कि इससे कार्यकर्ताओं का उत्साह प्रभावित हो सकता है। अब सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अन्नामलाई की गैरमौजूदगी चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगी? वह भी तब जब खुद पार्टी के कई नेता मानते हैं कि उनकी रैलियों में भारी भीड़ जुटती है और युवाओं में उनकी मजबूत पकड़ है।

बहरहाल, अन्नामलाई ने भले ही खुद को एक कार्यकर्ता बताते हुए सभी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने का ऐलान किया हो, लेकिन सियासत में प्रतीकात्मक संदेश भी उतना ही मायने रखता है जितना वास्तविक कदम। उनको टिकट नहीं मिलना विपक्ष को हमला करने का मौका दे चुका है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने वाला है। देखा जाये तो तमिलनाडु का चुनाव अब सिर्फ सीटों का खेल नहीं रह गया है। यह नेतृत्व, अहंकार, रणनीति और संतुलन की लड़ाई बन चुका है। और इस लड़ाई के केंद्र में खड़े हैं अन्नामलाई, जो भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, लेकिन पूरी राजनीति उनके इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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