आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज या नाजायज है? चिंतन कीजिए

इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ता की अपरिपक्व भाषा और समकालीन “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर एक तल्ख टिप्पणी की और परजीवी तक कह डाला। लिहाजा इसको भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह टिप्पणी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया आधारित आक्रामक विमर्श की ओर संकेत करती है।
इसलिए इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है। बावजूद इसके सीजेआई की टिप्पणी कई मायनों में जायज मानी जा सकती है, क्योंकि आज भारत सहित दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि यदि किसी संस्था का निर्णय किसी राजनीतिक या वैचारिक समूह के पक्ष में नहीं जाता, तो पूरी संस्था की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। इससे संस्थागत विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी चलता है।
मीडिया माध्यमों का अनुभव बताता है कि हाल के वर्षों में न्यायपालिका पर “पक्षपात”, चुनाव आयोग पर “सरकारी प्रभाव”, मीडिया पर “प्रोपेगेंडा”, और जांच एजेंसियों पर “राजनीतिक उपयोग” जैसे आरोप लगातार तेज हुए हैं, जो दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क रहता है कि कई बार आलोचना के नाम पर संस्थाओं को जानबूझकर बदनाम करने का अभियान चलाया जाता है। ऐसे माहौल में सीजेआई का यह कहना कि “पूरे सिस्टम पर हमला” लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है, एक संतुलित चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है।
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हालांकि, इस टिप्पणी का दूसरा स्याह पक्ष भी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना करना नागरिकों और विपक्ष का अधिकार है। यदि किसी संस्था के निर्णयों, कार्यशैली या पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें “सिस्टम पर हमला” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। चूंकि स्वस्थ लोकतंत्र में जवाबदेही और आलोचना दोनों जरूरी हैं। न्यायपालिका स्वयं कई ऐतिहासिक फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार को लोकतंत्र का मूल तत्व बता चुकी है।
दरअसल समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना तथ्यों और संवैधानिक बहस की जगह व्यक्तिगत हमलों, दुष्प्रचार, ट्रोलिंग या संस्थाओं को पूरी तरह अवैध बताने तक पहुंच जाती है। इससे जनता का भरोसा टूटता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इसलिए सीजेआई की टिप्पणी को पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता और इसे आलोचना-विरोधी बयान भी नहीं माना जाना चाहिए।
वस्तुतः इसका सार सत्य यह है कि संस्थाओं की आलोचना हो, लेकिन तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा के साथ। असहमति हो, लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने वाली भाषा से बचा जाए। संस्थाएं भी पारदर्शिता, निष्पक्षता और आत्मसुधार बनाए रखें, ताकि जनता का विश्वास मजबूत रहे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा संतुलन यही है कि संस्थाओं का सम्मान भी बना रहे और उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होती रहे।
जहां तक विद्रूप होती व्यवस्था के कड़वे सच से सामना की बात है तो बेरोजगार युवाओं के भीतर यह भावना तेजी से बढ़ती जा रही है कि व्यवस्था में अवसर समान नहीं हैं। जब भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक संरक्षण, जातीय ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय पक्षपात या आर्थिक प्रभाव की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से निराशा और आक्रोश पैदा होता है। बांग्लादेश और नेपाल में हुई जेन-जेड क्रांति और नेतृत्व परिवर्तन के पीछे भी यही आरोप थे। यही कारण है कि कई युवा यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि योग्यता के बजाय “पहचान”, “संपर्क” या “प्रभाव” ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए, तो मेहनत और प्रतिभा का मूल्य क्या रह जाता है। आखिर ऐसी व्यवस्था को लोकतंत्र और संविधान की आड़ में कबतक झेला जाएगा?
लेकिन इस प्रश्न को संतुलन से समझना जरूरी है। चूंकि भारत जैसे विशाल और विविध समाज में कुछ नीतियां—जैसे- सामाजिक न्याय, आरक्षण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या कल्याणकारी योजनाएं—ऐतिहासिक असमानताओं को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। लिहाजा, समस्या तब पैदा होती है जब इनका उपयोग वास्तविक सुधार के बजाय राजनीतिक लाभ, वोट बैंक या सत्ता-सुरक्षा के साधन के रूप में होने लगे। तब योग्य युवाओं को लगता है कि व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है।
बहरहाल, आज बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी पीड़ा केवल नौकरी की कमी नहीं, बल्कि “समान अवसर पर भरोसे का संकट” है। उनकी शिकायतें मुख्यतः इन बिंदुओं पर केंद्रित हैं- भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और भाई-भतीजावाद, लंबे समय तक भर्तियों का अटकना, योग्यता की तुलना में पहचान आधारित लाभ का अनुभव, निजी क्षेत्र में भी नेटवर्क और प्रभाव की भूमिका और बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सीमित अवसर। लिहाजा, यह आक्रोश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चेतावनी भी है।
ऐसे में यदि युवाओं को लगे कि मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिलेगा, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी सरकार और व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह- भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाए, पेपर लीक और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करे, कौशल आधारित रोजगार बढ़ाए, शिक्षा और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाए, अवसरों को अधिक निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धात्मक बनाए तथा सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में मेरिट को मजबूत करे। साथ ही यह भी जरूरी है कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ आवाज लोकतांत्रिक और रचनात्मक तरीके से उठे।
यद्यपि पूरे संविधान, लोकतंत्र या किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पैदा करना समाधान नहीं बनता। बल्कि वास्तविक सुधार संस्थागत दबाव, जन-जागरूकता, न्यायिक हस्तक्षेप, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही से आता है। चूंकि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि यही वर्ग व्यवस्था से पूरी तरह निराश हो जाए, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संकट भी बन सकता है। इसलिए “योग्यता आधारित अवसर” और “सामाजिक न्याय”- दोनों के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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