दोस्त रूस से तेल खरीदते थे, खरीदते रहेंगे, भारत का ये रूप देख अमेरिका को भी बोलना पड़ा- 30 दिन की राहत और ले लो

अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा 17 अप्रैल को जारी एक सामान्य लाइसेंस के अनुसार, प्रतिबंधित जहाजों सहित टैंकरों पर लदे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को 17 अप्रैल को पूर्वी समयानुसार 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 9:31 बजे) या उससे पहले अधिकांश देशों द्वारा 16 मई तक खरीदा और प्राप्त किया जा सकता था।
भारत और रूस के बीच होने वाले कच्चे तेल कारोबार का क्या होगा? क्या अमेरिका अपनी प्रतिबंध से छूट जारी रखेगा? क्या भारत उस छूट के आधार पर रूस से तेल खरीदेगा? इस सवाल के जवाब में जो जवाब भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने जो जवाब दिया है वो वाकई में भारत की तरफ से एक बड़ा बयान है क्योंकि उन्होंने यह साफ कर दिया है कि हालात कैसे भी हो कोई वेबर हो या ना हो भारत अपना तेल रूस से खरीदता रहेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि भारत का रुख पूरी तरह से अडिग है कि भारत अपनी आयात रणनीति पूरी तरह से सुसंगत रखता है और अपनी जरूरत के हिसाब से तेल खरीद करता है। ऐसे में रूस पर अमेरिकी छूट के संबंध में उन्होंने यह जोर दिया कि पहले भी रूस से खरीदारी जारी थी और छूट से पहले भी छूट के दौरान भी और अब भी यह खरीद जारी रहेगी।
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रूस से तेल खरीद
दरअसल लगातार यह सवाल उठ रहे थे कि भारत क्या रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा क्योंकि अमेरिकी वेवर की मियाद खत्म हो रही थी। ऐसे में पहले रूस की तरफ से यह कहा गया था कि वह भारत को कच्चे तेल की सप्लाई कम नहीं होने देगा। भारत को जितना कच्चा तेल चाहिए रूस उतना सप्लाई करने के लिए तैयार था। ऐसे में भारत की तरफ से यह स्टेटमेंट का आना साफ तौर पर यह बताता है कि अब अमेरिका तेल के मामले में कोई प्रतिबंध लगाए या ना लगाए। भारत रूस से अपनी तेल खरीद की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक उसकी जरूरतें वहां से पूरी हो रही हैं और जनता के हित को ध्यान में रखकर जिस तरीके से तेल खरीद की जाती है जिससे तेल की कीमतें स्थिर होती रहे। वह भारत की प्राथमिकता में रहेगा। इस बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए प्रतिबंधों में दी गई छूट को बढ़ाने का फैसला किया है। अमेरिका की यह समय सीमा शनिवार को खत्म हो गई थी। रॉयटर्स के मुताबिक यह फैसला कई देशों की ओर से रूसी तेल खरीदने के लिए और समय मांगने के बाद लिया गया है। सूत्रों ने बताया है कि अमेरिका इस छूट को 30 दिनों के लिए और बढ़ाएगा। गौरतलब है कि रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार भारत ने इससे पहले कहा था कि वह अमेरिकी छूट के बावजूद मॉस्को से कच्चा तेल खरीद रहा है और व्यावसायिक व्यवहार्यता और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इसका आयात जारी रखेगा। हालांकि, इस छूट से भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल का भारी आयात जारी रखना आसान हो गया है। रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका की ओर से दी गई छूट की अवधि खत्म होने पर क्या किया जाएगा, इस सवाल पर सुजाता ने कहा कि 'छूट की अवधि से पहले भी रूसी तेल खरीदा जा रहा था, उस दौरान भी खरीदा जा रहा था और अब भी खरीदा जा रहा है, क्योंकि यह कंपनियों के कमर्शल फैसले से जुड़ी बात है।' हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि 'देश में कच्चे तेल की कोई तंगी नहीं है। इसकी सप्लाई का पूरा इंतजाम किया गया है। छूट मिले या न मिले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
LPG पर OMC की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को देश में पेट्रोल-डीजल और LPG की बिक्री पर हो रहा रहा नुकसान कीमतें बढ़ाए जाने के बाद नीचे आया है, लेकिन अब भी यह काफी ऊंचे स्तर पर है। पेट्रोलियम एंड नैचरल गैस मिनिस्ट्री में जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने कहा कि पेट्रोल-डीजल और LPG पर OMC की रोजाना की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये है। शर्मा ने यह भी कहा कि रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी छूट रहे या न रहे, भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई पर कोई आंच नहीं आएगी। पेट्रोल-डीजल के दाम 3-3 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए जाने से पहले पिछले हफ्ते तेल और गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि OMC को 1000 करोड़ रुपये रोजाना की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। क्या सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान की सरकार भरपाई करेगी, इस पर सुजाता ने कहा कि कंपनियों को राहत पैकेज देने का फिलहाल कोई प्लान नहीं है। उन्होंने आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जा सकने के बारे में कहा, 'इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते।' इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, दाम बढ़ाए जाने के बाद भी OMC को पेट्रोल पर करीब 11 रुपये/लीटर और डीजल पर 39 रुपये/लीटर की अंडर रिकवरी है।
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अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने क्या कहा
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने यह कदम वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में स्थिरता लाने और सबसे कमजोर देशों को ऊर्जा संकट से बचाने के लिए उठाया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए बेसेंट ने लिखा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग एक अस्थायी 30 दिनों का सामान्य लाइसेंस जारी कर रहा है ताकि सबसे कमजोर देशों को समुद्र में फंसे हुए रूसी तेल तक अस्थायी रूप से पहुंचने की क्षमता मिल सके। यह विस्तार उन्हें अतिरिक्त लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) देगा, और हम इन देशों की जरूरत के हिसाब से उन्हें विशेष लाइसेंस देने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह सामान्य लाइसेंस भौतिक कच्चे तेल के बाजार को स्थिर करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि तेल सबसे अधिक ऊर्जा-संवेदनशील देशों तक पहुंचे। इससे चीन की रियायती तेल का भंडारण करने की क्षमता कम हो जाएगी और मौजूदा आपूर्ति को सबसे जरूरतमंद देशों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।
अमेरिका ने क्यों उठाया ये कदम
अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा 17 अप्रैल को जारी एक सामान्य लाइसेंस के अनुसार, प्रतिबंधित जहाजों सहित टैंकरों पर लदे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को 17 अप्रैल को पूर्वी समयानुसार 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 9:31 बजे) या उससे पहले अधिकांश देशों द्वारा 16 मई तक खरीदा और प्राप्त किया जा सकता था। OFAC द्वारा संशोधित सामान्य लाइसेंस के माध्यम से इस छूट को अब 17 जून तक बढ़ा दिया गया है। अप्रैल में भी यह छूट समाप्त हो गई थी, लेकिन अमेरिका ने कुछ दिनों बाद इसे बढ़ा दिया था, वह भी पहले यह घोषणा करने के बाद कि इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। मार्च में जारी की गई प्रारंभिक छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी, लेकिन बाद में 17 अप्रैल को इसका नवीनीकरण किया गया था। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, मई के मध्य तक छूट बढ़ाने का निर्णय संभवतः रूसी कच्चे तेल खरीदने वाले देशों के दबाव के बाद लिया गया था ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण खाड़ी देशों में तेल की कमी की आंशिक भरपाई की जा सके। इस बार भी यही स्थिति हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन इस तरह की छूटों को अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी और इसके परिणामस्वरूप अमेरिका में घरेलू ईंधन की कीमतों में होने वाली वृद्धि को रोकने के प्रयासों का हिस्सा मानता है, खासकर इस साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए। लेकिन इस छूट की अमेरिका के विभिन्न वर्गों द्वारा आलोचना की गई है। आलोचकों का तर्क है कि इससे मॉस्को को भारी लाभ हो रहा है, जिसका उपयोग वह यूक्रेन में अपने युद्ध प्रयासों को वित्त पोषित करने के लिए करेगा। पश्चिम एशिया में अमेरिका ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के दौरान ईरान से तेल और ईंधन की खरीद पर दी गई इसी तरह की छूट के खिलाफ भी इसी तरह के तर्क दिए गए थे। वाशिंगटन ने रूसी छूट को दो बार बढ़ाया है, लेकिन उसने ईरानी छूट का नवीनीकरण नहीं किया है।
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भारत ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता रहा है
हाल के महीनों में भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) जो देश के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरा है; जबकि इसका दीर्घकालिक औसत लगभग 40% रहा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) युद्ध के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही नाममात्र रह गई है, जिससे इस आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा प्रभावी रूप से बंद हो गया है। मॉस्को से अधिक तेल आयात ने इराक और कुवैत जैसे देशों से होने वाले पश्चिम एशियाई तेल के नुकसान की आंशिक रूप से भरपाई की है। रूस नई दिल्ली के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। फरवरी में, भारतीय रिफाइनरियों ने 1 मिलियन bpd से कुछ अधिक रूसी कच्चे तेल का आयात किया था, जो कि 2025 के 2 मिलियन bpd से अधिक के उच्च स्तर (पीक) का लगभग आधा था। मात्रा में इस भारी गिरावट के बावजूद, फरवरी में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा, जो उसके कुल तेल आयात के लगभग पांचवें हिस्से (20%) के बराबर था। इसके बाद, कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म 'केपलर' के टैंकर डेटा के अनुसार, पश्चिम एशिया में भीषण युद्ध और प्रतिबंधों में छूट (मिलने के कारण, मार्च में रूस से तेल आयात लगभग दोगुना होकर 2 मिलियन bpd हो गया। यह उस महीने के लिए भारत के कुल तेल आयात का लगभग 45% था, जबकि दूसरी ओर पश्चिम एशिया से होने वाला आयात धराशायी हो गया। अप्रैल में रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर 1.6 मिलियन bpd रह गया, जिसका मुख्य कारण नयारा एनर्जी रिफाइनरी का मेंटेनेंस (रखरखाव) के लिए बंद होना था, जो रूसी कच्चे तेल की बड़ी उपभोक्ता है। मई में अब तक रूसी कच्चे तेल का आयात फिर से लगभग 2 मिलियन bpd पर पहुँच गया है।
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