अपने घरों की ओर भी लौटें घरेलू पर्यटक

tourists
ANI

आज छुट्टियों में हर परिवार अपनी हैसियत के हिसाब से घूमने जा रहा है, लेकिन इनमें से ज्यादातर घूमने के लिए पहले की तरह अपने गांवों की ओर नहीं लौट रहे हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत के घरेलू पर्यटन में साल 2023-24 की तुलना में 2024-25 में करीब 95 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिख रही है।

उदारीकरण के पहले तक गर्मी की छुट्टियों का मतलब, जरूरी सेवाओं को छोड़ सबकी छुट्टियां होती थीं, स्कूल बंद हो जाते थे, अदालतों में जरूरी फौजदारी मामलों को छोड़ सुनवाई रूक जाती थी, और अदालतें बंद हो जाती थीं, तहसीलों में भी सूनापन छा जाता था, बैंकों में भी आधे से ज्यादा लोग गर्मी की छुट्टियां ले लेते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सूचना और संचार क्रांति के कारण पहले की तुलना में बिजली ज्यादा मिलने के चलते अब शहरों को कौन कहें, गांव तक पूरी रात गुलजार हो रहे हैं। इसका असर छुट्टियां मनाने के अंदाज और छुट्टियों के लिए जगह के चयन पर भी पड़ रहा है। 

पहले छुट्टियों का मतलब होता था, नौकरीपेशा लोगों की गांवों में वापसी। गांव में रहने वाले बच्चे छुट्टियों में नानी, मामा, मौसी के घर जाते थे। बहुत हुआ तो कोई तीर्थ यात्रा कर ली गई या शहर में रह रहे रिश्तेदार के यहां यात्रा कर ली गई। 

अब छुट्टियों का मतलब साफ तौर पर बदल गया है। उत्तर भारत के पहाड़ी इलाके हों या फिर मैदानी, ज्यादातर गांव खाली हो चुके हैं। गांवों में वे ही लोग रह रहे हैं, जिनके पास जायदाद ज्यादा है या जिनकी हैसियत नहीं है कि शहर जा सकें। उत्तर भारत के गांवों का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि हर तीसरे घर में या तो ताला लगा है कि उस घर के पांच सदस्यों में से तीन किसी शहर में हैं। शहर बड़ा भी हो सकता है, छोटा भी या बगल का कस्बा भी। जिसको जहां नौकरी मिली, कम से कम उसका परिवार वहीं रह रहा है। सरकारी तंत्र की शिक्षा पर विशेषकर राज्यों की ओर से खूब खर्च हो रहा है। अध्यापक भी तैनात हैं। कागजों में ग्रामीण स्कूलों को सहूलियतें भी खूब दी जा रही हैं, लेकिन गांवों के स्कूलों में उन्हीं के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिनकी माली हालत छोटे स्कूल का खर्च उठाने लायक नहीं है। अन्यथा सभी अपनी हैसियत के मुताबिक महानगर, शहर या बगल के कस्बे के स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। रिकॉर्ड पर ग्रामीण जनसंख्या अब भी करीब दो तिहाई से ज्यादा है। लेकिन हकीकत में इसकी संख्या बेहद कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 68.8 आठ फीसद जनसंख्या गांवों में रहती थी। लेकिन भारत सरकार के हालिया अनुमानों के मुताबिक, करीब 63 प्रतिशत जनसंख्या ही गांवों में रह रही है। लेकिन यहां एक बार फिर ध्यान देने की है कि इसका भी बड़ा हिस्सा शहरों में रह रहा है। भले ही शहर में उसकी रिहायश किसी झुग्गी या किसी झुग्गीनुमा शहरीकृत गांव में हो। औद्योगिक इलाकों में रहने वाले लोगों की रिहायशी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैं, उसकी तुलना में उनका ग्रामीण घर बढ़िया है। फिर भी रोजगार और शिक्षा के लिए कम कमाई के बावजूद ग्रामीण परिवार शहरों में रहने को मजबूर हैं। यह चर्चा लंबी हो सकती है।

इसे भी पढ़ें: मोदी सरकार का बड़ा फैसला, भारत में बदले विदेशियों के वीजा नियम 

आज छुट्टियों में हर परिवार अपनी हैसियत के हिसाब से घूमने जा रहा है, लेकिन इनमें से ज्यादातर घूमने के लिए पहले की तरह अपने गांवों की ओर नहीं लौट रहे हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत के घरेलू पर्यटन में साल 2023-24 की तुलना में 2024-25 में करीब 95 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिख रही है। इस साल 250 करोड़ से ज्यादा लोगों ने घरेलू पर्यटन किया। इन पर्यटकों का पूरा विवरण यानी किस इलाके के कितने पर्यटक किस इलाके में घूमने गए। लेकिन मोटे तौर पर सबसे ज्यादा नए तीर्थस्थलों मसलन काशी के विश्वनाथ कारीडोर, उज्जैन के महाकाल कारीडोर या केदारनाथ आदि की यात्राएं कीं। लेकिन गर्मियों में सबसे ज्यादा लोग पहाड़ों की ओर जा रहे हैं। एक दौर ऐसा भी आता है कि पहाड़ों में लोगों को ठहरने के लिए जगह तक नहीं मिलती, लोग कारों में सड़कों के किनारे ही रहने और अपनी दैनिक क्रिया करने को मजबूर हो जाते हैं। स्पष्ट है कि ये पर्यटक इन जगहों पर जाकर वहां खर्च भी कर रहे हैं। इसका आर्थिक फायदा उन्हीं इलाकों को मिल रहा है। 

यहीं पर एक सवाल उठता है कि अगर इन पर्यटकों में से एक हिस्सा अपने गांवों की यात्रा करेगा तो वह जो खर्च करेगा, उस खर्च से उसके गांव-परिवार के आसपास की आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। इसका असर यह होगा कि उन इलाकों में आर्थिक विकास बढ़ेगा। आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से उन इलाकों की सूरत भी सुधरेगी। 

भारतीय परंपरा में व्यक्ति के विकास के लिए पूरे परिवेश के योगदान को स्वीकार किया जाता रहा है। इसीलिए व्यक्ति की कमाई और उपलब्धि में उसके परिवेश और परिवार का हिस्सा माना जाता रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शतक वर्ष में पंच परिवर्तन की जो सैद्धांतिकी और कार्ययोजना स्वीकार की है, उसका दूसरा अंग कुटुंब प्रबोधन है। संघ के पंच परिवर्तन में भारतीय संस्कृति की उस अवधारणा को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है, जिसमें परिवार सिर्फ सामाजिक संस्था नहीं माना जाता, बल्कि संस्कार की प्रयोगशाला के रूप में स्वीकार्य है। आर्थिक उदारीकरण के बाद जीवन में यांत्रिकता बढ़ी है। इसकी वजह से आपसी संवाद भी घटा है। उपभोक्तावाद को बढ़ावा तो खैर मिला है, इससे परिवार टूट रहे हैं। ऐसे में कुटुंब यानी परिवार प्रबोधन की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ जाती है। इसीलिए संघ ने अपने 'परिवार प्रबोधन अभियान' के तहत देशभर में मिलकर भोजन करने, साप्ताहिक पारिवारिक संवाद की परंपरा को बढ़ावा देने, पारिवारिक सांस्कृतिक आयोजन करने जैसी कोशिशें तेज कर दी हैं। घरेलू पर्यटन के तहत अगर लोगों को छुट्टियों में उनके ही गांवों में कुछ दिन गुजारने के लिए अगर प्रेरित किया जाए तो यह कुटुंब प्रबोधन का विस्तार होगा। अगर घरेलू पर्यटन को पर्यटकों को उनके मूल गांवों, ढाणियों और कस्बों की ओर मोड़ा जाएगा तो उनके साथ उनके बच्चे भी अपने गांवों जाएंगे, इससे शहरों में रह रहे बच्चों का अपनी मूल भूमि और कुटुंब से जुड़ाव बढ़ेगा। फिर हो सकता है कि भविष्य में वे अपने गांवों से कहीं ज्यादा गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे। इससे सामाजिक संबंधों पर जहां सकारात्मक असर पड़ेगा, वहीं लोगों का अपनी माटी, अपने परिवार और अपने समाज से रिश्ता और गहरा होगा। चूंकि वे अपने गांव नियमित अंतराल पर लौटते रहेंगे, छुट्टियों का हिस्सा अपने गांवों में गुजारेंगे तो उनके जरिए उनके अपनी माटी और इलाके में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। 

पड़ोसी देश चीन ने आर्थिक मंदी के दौर में घरेलू खर्च और स्ट्रीट कारोबार को बढ़ावा देने की नीति पर काम किया। इससे घरेलू पर्यटन को वहां बढ़ावा मिला, घरेलू स्तर पर खर्च भी बढ़ा, इसका अच्छा प्रभाव चीन की घरेलू आर्थिकी पर पड़ा। अब तो बसंत के मौसम में चीन की सरकार लोगों को अपने गांवों की यात्रा करने के लिए लंबी छुट्टियां देती हैं। उस दौरान लोग अपने मूल निवास, गांव, कस्बे आदि की यात्रा करते हैं। अपने गांव वाले घरों के लिए तब वे खरीददारी भी करते हैं। तब ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। इसका असर है कि चीन के स्ट्रीट कारोबार में तेजी आई है। भारत में भी इस तरीके को स्वीकार किया जा सकता है। 

बेशक चार दशक पहले जैसी गर्मी की छुट्टियों का माहौल नहीं है। फिर भी लोग छुट्टियां मनाने जा रहे हैं, उनका रूझान पहाड़ों की तरफ ज्यादा है। इससे पहाड़ों में पर्यटकों के चलते कचरा भी बढ़ रहा है। अगर ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिले तो पहाड़ भी सांस ले सकेंगे, उनके यहां कचरे का बोझ कम होगा और उन ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जो आर्थिक गतिविधियों की दौड़ में किंचित पीछे हैं। इससे परिवार का प्रबोधन भी होगा। पारिवारिक रिश्ते मजबूत होंगे। 

- उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
All the updates here:

अन्य न्यूज़