देश पर आर्थिक संकट तो आए लेकिन राष्ट्र निर्माताओं ने कड़े फैसले लेकर उन्हें दूर किया

Economic crisis
कमलेश पांडे । Feb 09, 2022 11:43AM
खास बात यह कि कल्याणकारी अर्थशास्त्र पर अपने काम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने और पहचाने जाने वाले, अमर्त्य सेन, जो 1970 के दशक से भारत, अमेरिका और यूके में काम कर रहे हैं, को 1998 में आर्थिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला।

आजादी से लेकर आजतक की भारतीय अर्थव्यवस्था के सफर पर जब हमलोग सूक्ष्म दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि तेजी से औद्योगीकरण की खोज ने, कृषि क्षेत्र से धन का एक बड़ा पुनर्वितरण किया था। वैसे तो दूसरी पंचवर्षीय योजना में कृषि परिव्यय को लगभग आधा करके 14 प्रतिशत कर दिया गया था। इसका असर उत्पादन पर पड़ा।लिहाजा देश में खाने की किल्लत और बढ़ गई, साथ ही महंगाई भी बढ़ गई। 

वहीं, खाद्यान्नों के आयात ने बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार को समाप्त कर दिया। चक्रवर्ती "राजाजी" राजगोपालाचारी, जो कभी नेहरू के मित्र-आलोचक थे, आर्थिक स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक थे। इसलिए अर्थव्यवस्था में राज्य की अत्यधिक भागीदारी के सवाल पर उनका प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से मतभेद हो गया। यद्यपि 27 मई 1964 को, नेहरू की मृत्यु हो गई। लेकिन, तब और बाद के वर्षों में की गई आलोचनाओं के बावजूद, उन्होंने एक आधुनिकतावादी के रूप में अपनी विरासत को मजबूत किया था।

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परिवर्तित समय के साथ एक दौर ऐसा भी आया जब नेहरू के मंत्रिमंडल में बिना पोर्टफोलियो के मंत्री लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 को एक भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में सफल हुए। यह वह दौर था जब चीन के साथ दो वर्ष पहले यानी सन 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध ने भारत की आर्थिक कमजोरी को अनवरत रूप से उजागर कर दिया था। लिहाजा लगातार भोजन की कमी और कीमतों में वृद्धि ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को आश्वस्त किया कि भारत को केंद्रीकृत योजना और मूल्य नियंत्रण से दूर जाने की जरूरत है। 

यही वजह है कि पीएम शास्त्री ने कृषि पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया, निजी उद्यम और विदेशी निवेश के लिए एक बड़ी भूमिका स्वीकार की, और तत्कालीन योजना आयोग की भूमिका को कम कर दिया। 1965 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत ने उन्हें 25 साल बाद हुए आर्थिक सुधारों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया।या यूं कहिये कि राजनीतिक राजधानी दी। जैसा कि पी.एन. धर ने इंदिरा गांधी, द 'इमरजेंसी' एंड इंडियन डेमोक्रेसी में लिखा है।

दरअसल, खाद्य सुरक्षा पर शास्त्री का ध्यान इस तथ्य से आकर्षित हुआ कि 1960 के दशक में, भारत बड़े पैमाने पर अकाल के कगार पर था। वहीं, अमेरिका से खाद्य सहायता आयात, जिस पर देश निर्भर था, भारत की विदेश नीति की स्वायत्तता को गहरे से प्रभावित करने लगा था। यही वजह है कि उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों और अधिकारियों को कुछ बेहतर करने को प्रोत्साहित किया। यह वह दौर था जब आनुवंशिकीविद् एम.एस. स्वामीनाथन, नॉर्मन बोरलॉग और अन्य वैज्ञानिकों के साथ, गेहूं के उच्च उपज वाले किस्म के बीजों के साथ कदम रखा, जिसे हरित क्रांति के रूप में जाना जाने लगा। स्वामीनाथन अब भारत को सतत विकास की ओर ले जाने के पक्षधर हैं। वह पर्यावरण की दृष्टि से स्थायी कृषि, स्थायी खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता के संरक्षण का समर्थन करते हैं। वह इसे "सदाबहार क्रांति" कहते हैं।

वहीं, हरित क्रांति की सफलता के बाद, शास्त्री ने अपना ध्यान डेयरी क्षेत्र, विशेष रूप से गुजरात के आणंद में वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में सहकारी आंदोलन की ओर लगाया। उन्होंने कैरा डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड को श्वेत क्रांति की शुरुआत करते हुए अपने काम का विस्तार करने में मदद की। इसके बाद के वर्षों में, सरकार के ऑपरेशन फ्लड ने दूध उत्पादन में तेजी से वृद्धि की। वाकई डेयरी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पूरी तरह से सहकारी आंदोलन के माध्यम से हासिल की गई थी, जो पूरे देश में 1.2 करोड़ से अधिक डेयरी किसानों तक फैल गई है। यही वजह है कि दशकों बाद, आणंद में सहकारी किसानों द्वारा शुरू किया गया ब्रांड अमूल बाजार में अग्रणी दुग्ध उत्पाद के रूप में बना हुआ है।

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एक वह भी दौर आया जब भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं को संक्षिप्त रूप से निलंबित कर दिया, और इसके बजाय 1966 और 1969 के बीच वार्षिक योजनाएँ तैयार की गईं। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि देश लंबी अवधि में संसाधन देने की स्थिति में नहीं था। चीन के साथ युद्ध, तीसरी योजना के निचले स्तर के विकास के परिणाम, और पाकिस्तान के साथ युद्ध को वित्तपोषित करने के लिए पूंजी के विचलन ने अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया था। वहीं, 1966-67 के मौसम में महत्वपूर्ण मानसूनी बारिश ने एक बार फिर अपना प्रभाव खो दिया था, जिससे भोजन की कमी और बढ़ गई थी और मुद्रास्फीति में तेज वृद्धि हुई थी। लिहाजा खाद्यान्न आयात करने या विदेशी सहायता लेने की निरंतर आवश्यकता ने भी भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर जोखिम उत्पन्न कर दिया। फलतः 1960 और 1970 के दशक में, इंदिरा गांधी ने अपने समाजवादी आदर्शों के भीतर रहते हुए ही आर्थिक विकास को गति देने के प्रयास में कई नीतियों का संचालन किया। 

सच कहा जाए तो 1960 का दशक भारत के लिए कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का दशक था। क्योंकि महज 3 वर्ष के अंतराल पर हुए दो-दो युद्धों- भारत-चीन युद्ध 1962 और भारत-पाक युद्ध 1965 ने जनता के लिए काफी कठिनाइयाँ पैदा की थीं। नेहरू और शास्त्री की त्वरित उत्तराधिकार में मृत्यु ने राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी थी और कांग्रेस के भीतर भी सत्ता के लिए जॉकींग शुरू कर दी थी।वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा किये गए रुपये के अवमूल्यन के कारण सामान्य मूल्य वृद्धि हुई थी। परिणाम यह हुआ कि 1967 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस एक छोटे से बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और पार्टी ने सात राज्यों में सत्ता खो दी। जवाब में, श्रीमती गांधी ने 20 जुलाई 1969 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। इस कदम का मुख्य उद्देश्य कृषि के लिए बैंक ऋण में तेजी लाना था। क्योंकि तब बड़े व्यवसायों ने ऋण प्रवाह के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। इसलिए उन्होंने कृषक और उनपर आश्रित वर्ग के हित साधन के लिए उक्त कदम उठाए।

समझा जाता है कि बैंकिंग क्षेत्र को समाजवाद के लक्ष्यों के साथ जोड़ने के उद्देश्य से इंदिरा गांधी के कठोर कदम ने उन्हें जनता का प्रिय बना दिया था। क्योंकि बैंक राष्ट्रीयकरण ने कृषि ऋण को बढ़ावा देने और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण देने में मदद की। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाएं खोलने के लिए बैंकों द्वारा किए गए पहल से वित्तीय बचत में उछाल आया। हालांकि प्रतिस्पर्धा के बिना ही ऋणदाता आत्मसंतुष्ट हो गए। इसके अलावा, राजनीतिक रूप से प्रभावित उधार निर्णयों ने क्रोनी कैपिटलिज्म को जन्म दिया। क्योंकि इन बैंकों ने परियोजना मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए प्रतिस्पर्धा की। यही वजह है कि आज, राज्य के स्वामित्व वाले बैंक लगभग ₹10-ट्रिलियन के बुरे ऋणों के पहाड़ के नीचे चरमरा रहे हैं, जो कुल ड्यूड ऋणों का लगभग 90 प्रतिशत  है। बताया जाता है कि बैंकिंग अर्थव्यवस्था में किये गए इस तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप की कीमत उन्हें और देश दोनों को चुकानी पड़ी बाद के वर्षों में।

इतिहास साक्षी है कि 6 जून 1966 को, इंदिरा गांधी ने भारतीय रुपये का 57 प्रतिशत तेजी से अवमूल्यन करने का कठोर कदम उठाया। रुपया 4.76 से गिरकर 7.50 प्रति अमेरिकी डॉलर पर आ गया। यह भारत के महत्वपूर्ण भुगतान संतुलन संकट का मुकाबला करने के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण बदलाव था। क्योंकि उस दौर में विदेशी निवेश के प्रति देश की उदासीनता और निर्यात क्षेत्र की उपेक्षा का मतलब था कि यह देश लगातार व्यापार घाटे में चल रहा था। जबकि रुपये के अवमूल्यन का उद्देश्य विदेशी मुद्रा तक सीमित पहुंच के बीच निर्यात को बढ़ावा देना है। इसके बजाय, इसने मुद्रास्फीति को गति दी, जिसकी व्यापक आलोचना भी हुई। करने वाले जानकारों ने भी की। वहीं, भारत के इस कदम का असर दूसरे देशों पर भी पड़ा। ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात, जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी खाड़ी रुपये का इस्तेमाल करते थे, को अपनी मुद्राओं के साथ आना पड़ा।

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यही वजह है कि उनकी कई अप्रासंगिक नीतियों से क्रोधित भारतीयों ने इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने के लिए दंडित किया। वहीं, 1977 के चुनाव के बाद जनता पार्टी सत्ता में आई। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अवैध संपत्ति पर कार्रवाई में ₹1,000, ₹5,000 और ₹10,000 के नोटों की कानूनी-निविदा स्थिति वापस ले ली। हड़तालों के वैधीकरण, गांधी द्वारा गैरकानूनी घोषित और ट्रेड यूनियनों की बहाली ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। आपातकाल के दौरान प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके जॉर्ज फर्नांडिस को उद्योग मंत्री बनाया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि आईबीएम और कोका-कोला विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम का अनुपालन करते हैं, जबकि अनिवार्य है कि विदेशी निवेशक भारतीय उद्यमों में 40 प्रतिशत से अधिक का स्वामित्व नहीं रख सकते। इसलिए  दोनों बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपना परिचालन बंद कर दिया।

वहीं, अंतर्निहित अंतर्विरोधों से ग्रसित सन 1977 की जनता पार्टी की सरकार को 1980 में निबटाकर इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं। इस बार उनमें एक बड़ा बदलाव दिखाई दिया। सन 1970 के दशक तक वामपंथी झुकाव वाली लोकलुभावन श्रीमती गांधी ने अबकी बार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ऋण को सुरक्षित करने के लिए बड़े-टिकट वाले आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) में संक्षेप में ही सही पर अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के उद्देश्य से उपायों की एक श्रृंखला शुरू करने का संकल्प लिया। इसका मतलब था- मूल्य नियंत्रण को हटाना, राजकोषीय सुधारों की शुरुआत, सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार, आयात शुल्क में कमी, और घरेलू उद्योग का लाइसेंस रद्द करना, या दूसरे शब्दों में कहें तो लाइसेंस राज को समाप्त करना।

खास बात यह कि कल्याणकारी अर्थशास्त्र पर अपने काम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने और पहचाने जाने वाले, अमर्त्य सेन, जो 1970 के दशक से भारत, अमेरिका और यूके में काम कर रहे हैं, को 1998 में आर्थिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिला। वह लंबे समय से भारत के विकास के उस मॉडल के आलोचक रहे हैं जो पिरामिड के निचले हिस्से की जरूरतों को नजरअंदाज करता है। अब हार्वर्ड में एक प्रोफेसर, जिनकी लोकप्रिय पुस्तकों जैसे द आर्गुमेंटेटिव इंडियन ने अर्थशास्त्र को आम पाठक के लिए सुलभ बना दिया। उन्होंने साबित किया कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद जीवन स्तर का आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं था, एक ऐसी खोज जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक का निर्माण हुआ, जो अब देशों के कल्याण की तुलना करने का सबसे आधिकारिक स्रोत है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में एक और सकारात्मक मोड़ तब दिखाई दिया, जब राजीव गांधी, प्रशिक्षण और पेशे से एक पायलट, ने अक्टूबर 1984 में अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला। वह तब महज 40 वर्ष के थे, और एक युवा भारत की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते थे। यदि भारत को विदेशी सहायता और ऋण पर अपनी निर्भरता को छोड़ना है तो उन्होंने आर्थिक सुधार की आवश्यकता को पहचाना। उन्होंने एक साफ-सुथरे राजनेता वी.पी. सिंह, टेक्नोक्रेट सैम पित्रोदा और बाजार अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भारतीय अर्थव्यवस्था को जनोनुकूल बनाने और सबके लिए लाभकारी बनाने के उपाय ढूंढने और उसे लागू करने को कहा। लिहाजा, 1985-86 के बजट में सरकार ने कंपनियों के लिए प्रत्यक्ष करों को कम किया और आयकर के लिए छूट की सीमा बढ़ा दी। इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें व्यापक रूप से देश में सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार क्रांतियों की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है।

एक बात और, सन 1983 में गुड़गांव में असेंबली लाइन से पहली मारुति कार लुढ़क गई। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नवंबर में दिल्ली के हरपाल सिंह को इसकी चाबी सौंपी थी। यह एक ऐसी परियोजना थी जो विवादों में घिरी थी- इंदिरा के बेटे संजय गांधी द्वारा परिकल्पित, लेकिन इतनी खामियों से ग्रस्त कि सरकार ने वाहन के उत्पादन के लिए जापान के सुजुकी के साथ एक संयुक्त उद्यम पर हस्ताक्षर किए। यह एक वास्तविक लोगों की कार थी- ईंधन कुशल, सस्ती और चलाने में आसान, जबकि भारतीय उस समय तक इस्तेमाल की जाने वाली भद्दी कारों से बहुत दूर रहे। हालांकि, समय और जरूरत दोनों बदली। मारुति 800 और इसकी मांग ने एक नए भारतीय मध्यम वर्ग के उदय का संकेत दिया। तब यह माना गया कि इसी तरह की क्रांति के लिए विमानन को बाधित करने में लगभग 20 साल लगेंगे। मारुति 800 अपने विभिन्न अवतारों में 1983 और 2014 के बीच भारत की सबसे अधिक बिकने वाली कारों में से एक थी, जबकि इसे बंद कर दिया गया था।

सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत ने कभी भी शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण को प्रोत्साहित नहीं किया है। इसके व्यवसायियों, नियामकों और सरकार ने उन्हें रोकने के लिए मिलकर काम किया है। जैसा कि भारत सरकार ने 1982-83 में अधिक विदेशी धन प्राप्त करने के लिए पूंजी बाजार में ढील दी। विशेष रूप से अनिवासी भारतीयों से, लंदन स्थित लॉर्ड स्वराज पॉल ने घरेलू रासायनिक निर्माण कंपनी डीसीएम श्रीराम और इंजीनियरिंग समूह एस्कॉर्ट्स में खुले बाजार से महत्वपूर्ण शेयर हासिल किए। प्रमोटरों के परिवारों की बहुत छोटी जोत थी, लेकिन महत्वपूर्ण मंडलियों में उनका प्रभाव बहुत बड़ा था। इसलिए, वे पॉल के शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण को टालने में सफल रहे। यह एक पैटर्न है जिसे अक्सर देखा गया है।

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वहीं, साल 1984 की भोपाल गैस त्रासदी ने बड़े पैमाने पर औद्योगिक दुर्घटनाओं की वास्तविक संभावना और नियामक निरीक्षण के महत्व को सामने लाया। इस त्रासदी के केंद्र में -जिसका प्रभाव अभी भी स्थानीय आबादी द्वारा महसूस किया जाता है- यूएस-आधारित यूनियन कार्बाइड था, जो अब डॉव केमिकल्स के स्वामित्व में है। 2 दिसंबर की रात, संयंत्र से कम से कम 40 टन जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ, जिससे कम से कम 4,000 लोग मारे गए और हजारों लोगों को स्थायी रूप से अक्षम कर दिया गया। यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन अध्यक्ष वारेन एंडरसन विवादास्पद परिस्थितियों में भारत से भागने में सफल रहे। इस बीच, पीड़ितों को हर्जाने में एक छोटा सा हिस्सा दिया गया।

देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था की गंभीर विशेषता हमेशा इसका उच्च राजकोषीय घाटा रहा है- सरकार द्वारा अपनी आय से अधिक खर्च करने का परिणाम। सरकारी खर्च का अधिकांश हिस्सा उधार की ब्याज लागत को चुकाने पर होता है; रक्षा, पेंशन, भोजन, उर्वरक और ईंधन की खपत पर सब्सिडी देना;और आवास, गरीबी, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर निर्देशित योजनाएं। सरकार की पूंजी का एक बड़ा हिस्सा उसकी अपनी कंपनियों और होल्डिंग्स में बंद रहता है, जिसे वह बेचने में असमर्थ है। भारतीय अर्थव्यवस्था, इस प्रकार, खराब का पीछा करते हुए अच्छी पूंजी और साहसिक सुधारों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से पीड़ित है।

बता दें कि सन 1960 में हार्वर्ड से अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाली पहली एशियाई महिला पद्मा देसाई को भारत की पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था की आलोचना के लिए जाना जाता है। भारत की औद्योगिक और व्यापार नीतियों पर पति और साथी अर्थशास्त्री जगदीश भगवती के साथ सह-लेखक के रूप में उनकी 1970 के दशक की पुस्तक का 1970 के दशक में भारत में पेशेवर सोच और नीति निर्माण पर गहरा प्रभाव पड़ा। डॉ मनमोहन सिंह, 2000 के दशक में यानी वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री बनने के बाद, यहां तक कह दिया था कि "जब 1991 में हमारी सरकार ने हमारी औद्योगिक और व्यापार नीतियों में व्यापक सुधार किए, तो हम केवल उन विचारों को लागू कर रहे थे जो जगदीश और पद्मा ने लगभग दो दशक पहले लिखे थे। इससे समझा जा सकता है कि नीतिगत जनहितकारी बदलाव लाने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था एक अरसे से विद्वान राजनेता की तलाश कर रही थी, जिसे तब डॉ मनमोहन सिंह ने पूरा ही नहीं कर दिया, बल्कि 10 वर्षों तक पीएम के रूप में उस भारत पर राज किया, जिसकी सशक्त आर्थिक नींव सन 1991 में उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में रखी थी।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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