अमेरिका-तालिबान वार्ता टूटने से भारत रहा फायदे में, पर अभी सतर्क रहना जरूरी

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यदि अमेरिका, तालिबान और पाकिस्तान के साथ बीच चल रही यह शांति वार्ता मूर्त रूप ले लेती तो अमेरिका अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल लेता और भारत के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो जाता।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ लंबे समय से चल रही अफगानिस्तान शांति वार्ता अचानक रद्द करते हुए दावा किया है कि अमेरिका ने हाल ही में तालिबान पर जितने कठोर प्रहार किए हैं उतने पिछले 10 वर्षों में नहीं किए गए। अमेरिका ने 9 दौर पूरे कर चुकी शांति वार्ता रद्द करने का यह कदम काबुल में पिछले सप्ताह हुए हमले की जिम्मेदारी तालिबान द्वारा लेने के बाद उठाया है। इस हमले में अमेरिका का एक सैनिक भी मारा गया था। इस वार्ता के रद्द होने से अमेरिका या पाकिस्तान को भले ही नुकसान हुआ हो, लेकिन इसमें अफगानिस्तान का कोई नुकसान नहीं है और भारत को भी इससे कुछ राहत मिली है। दरअसल अमेरिका तालिबान के साथ शांति वार्ता कर रहा था और दोनों पक्ष एक समझौते के प्रति आशान्वित थे, जिसके तहत अमेरिका को अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की कटौती करनी थी और तालिबान इस बात की गारंटी देनी थी कि अफगनिस्तान की धरती को वह कभी भी आतंकी गतिविधियों के लिए फिर से इस्तेमाल नहीं करेगा।

ट्रंप का अब साफ कहना है कि तालिबान ने गलती कर दी है, हम अफगानिस्तान से निकलना चाहते थे, लेकिन अब उचित समय पर ही जाएंगे। ट्रंप ने इसके साथ ही एक नया शासकीय आदेश जारी कर दिया है जो आतंकवाद और आतंकवादी गतिविधियों को धन मुहैया कराने वालों पर लगाम लगाने, उनकी पहचान करने, उन्हें प्रतिबंधित करने और दुनियाभर में आतंकवाद के साजिशकर्ताओं को रोकने की देश की क्षमता को बढ़ाएगा। ट्रंप ने 9/11 की पूर्वसंध्या पर यह नया शासकीय आदेश जारी किया और तुरंत ही इसका इस्तेमाल करने हुए अमेरिकी प्रशासन ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान सहित 11 आतंकवादी समूहों के 20 से अधिक सदस्यों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। उल्लेखनीय है कि 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर भीषण आतकंवादी हमले हुए थे। इसके बाद ही अफगानिस्तान में तालिबान का पतन शुरू हुआ था। आज 18 साल बाद भी करीब 14,000 अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में तैनात हैं। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो बल वहां मौजूद हैं और इस पर अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं और इस तैनाती का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है। ट्रंप प्रशासन पर खर्चे कम करने और अफगानिस्तान से बाहर निकलने का दबाव है लेकिन ऐसी स्थिति में वहां से निकलेंगे तो अब तक की मेहनत और भारी भरकम खर्चे पर पानी फिर जायेगा।

इस वार्ता के रद्द होने से निश्चित रूप से भारत को बड़ी राहत मिली है। इसके कई कारण हैं। एक तो भारत ही नहीं अफगानिस्तान की सरकार का भी मानना रहा है कि आतंक फैलाने वाले तालिबान से किसी तरह की बातचीत का कोई औचित्य नहीं है। यदि अमेरिका, तालिबान और पाकिस्तान के साथ यह शांति वार्ता मूर्त रूप ले लेती तो अमेरिका अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल लेता और भारत के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो जाता। अमेरिका के चले जाने पर पाकिस्तान की मदद से तालिबान अफगानिस्तान में फिर मजबूती से खड़ा हो जाता और वहां अरबों डॉलर की जो भारतीय परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं या पूरी होने के कगार पर हैं उनको नुकसान पहुँचाता। यही नहीं भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में जो भारी निवेश किया है उसके भी खतरे में पड़ने की संभावना बढ़ जाती। पाकिस्तानी सेना के जो बल अभी अफगान में अमेरिका को मदद दे रहे हैं वह वहां से कश्मीर पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बुला लिये जाते। इसके अलावा पाकिस्तान तालिबानी जिहादियों का इस्तेमाल भी भारत के खिलाफ कर सकता था। इसके अलावा अफगानिस्तान में निर्वाचित सरकार का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता क्योंकि वहां शासन-प्रशासन में तालिबान हावी हो जाता।

खैर, अब जब वार्ता रद्द हो चुकी है तो अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी और नाटो सेना को बेहद सतर्क रहना होगा क्‍योंकि तालिबान ने अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा है कि वार्ता बंद करने पर अमेरिका को अफसोस होगा। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने कहा है, ‘‘हमारे पास अफगानिस्तान में कब्जे को खत्म करने के दो तरीके थे, एक जिहाद और लड़ाई थी, दूसरा बातचीत था।’’ मुजाहिद ने कहा, ‘‘अगर ट्रंप बातचीत बंद करना चाहते हैं तो हम अपना पहला तरीका अपनाएंगे और वे शीघ्र इस पर अफसोस करेंगे।’’ तालिबान ने अपनी धमकी पर अमल करना शुरू भी कर दिया है। अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले के 18 साल पूरे होने के दिन अफगानिस्तान में अमेरिकी दूतावास पर एक रॉकेट हमला किया गया और उसके बाद से हमलों का सिलसिला लगातार जारी है।

भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वार्ता में शामिल नहीं था इसलिए उसे तालिबान से कोई सीधा खतरा तो नहीं है लेकिन उसे चौकन्ना रहना होगा क्योंकि जिस तरह से बम धमाके बढ़ रहे हैं उसकी चपेट में कोई भी आ सकता है। खासतौर पर तालिबान 28 सितंबर को होने वाले अफगानिस्तान राष्‍ट्रपति चुनाव को बाधित करने का पूरा-पूरा प्रयास करेगा। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति का इस मुद्दे पर बड़ा सधा हुआ बयान आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि ''हमने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि वास्तविक शांति तालिबान के अफगानिस्तान के लोगों को मारना बंद करने, संघर्षविराम स्वीकार करने और अफगानिस्तान सरकार के साथ सीधे बातचीत करके ही स्थापित की जा सकती है।’’ इस मुद्दे पर चीन का रुख है कि अमेरिका तथा तालिबान अफगानिस्तान में शांति का मार्ग प्रशस्त करें तो नाटो देशों का अफगानिस्तान से बाहर निकलने का इंतजार अब बढ़ गया है। बहरहाल...पहले से ही चुनौतियों से जूझ रहे अफगानिस्तान की चुनौतियां और बढ़ गयी हैं और जिस तरह से वहां निर्दोषों की जान जा रही है उससे तो लगता है कि शांति अभी इस देश के लिए दूर का सपना ही है।

-नीरज कुमार दुबे

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