सिर्फ आंकड़ेबाजी और शाब्दिक हमदर्दी से मजदूरों की हालत नहीं सुधरेगी

  •  राजेश कश्यप
  •  मई 21, 2020   09:53
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सिर्फ आंकड़ेबाजी और शाब्दिक हमदर्दी से मजदूरों की हालत नहीं सुधरेगी

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस की वजह से देश के लगभग 40 करोड़ असंगिठत मजदूरों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है और गरीबी के भयंकर दुष्चक्र में फंसा सकती है।

देश में मजदूरों की हालत अति दुःखद एवं विडम्बनापूर्ण है। मजदूरों पर संकीर्ण सियासत और शर्मनाक संवेदनहीनता अति निन्दनीय एवं असीम पीड़ादायक है। कोरोना की त्रासदी ने करोड़ों मजदूरों के परिवारों को खून के आंसू रोने पर विवश कर दिया है। इन बेबस मजदूरों के घावों पर मरहम लगाने की बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। इस संकटकाल में मजदूरों की यह नारकीय स्थिति चीख चीखकर पूछ रही है कि उनका कसूर क्या है और इसका असली कसूरवार कौन है? लॉकडाउन के नियमों का अक्षरशः पालन करने के बावजूद मजदूरों को क्यों सड़क और रेल की पटरियों पर अपनी जान गंवानी पड़ रही है? अपने खून-पसीने से बड़े-बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों और पूंजीपति लोगों की किस्मत चमकाने वाले मजदूरों की किस्मत में सिर्फ भुखमरी, प्रताड़ना और सिसकियां ही क्यों लिखी हैं? आखिर क्यों शोषण, छलावा और विवशता मजदूरों की नियति बन गई है? क्या मजदूर होना गुनाह है? क्या मेहनतकश लोगों के जीवन में कभी उजाला आ पायेगा? ऐसे ही अनेक सुलगते सवाल हैं जो इस समय सड़कों पर बदहाल और नारकीय दौर से गुजर रहे मजदूरों के बेबस चेहरों को देखकर स्वतः विस्फोटित हो रहे हैं।

यह कटु सत्य है कि आज मजदूर वर्ग आर्थिक व भावनात्मक रूप से बुरी तरह टूट चुका है। जिनके लिए वे घर छोड़कर काम करने आए, उन्हीं ने बुरे वक्त में दुत्कार दिया और अनेक तरह से प्रताड़ित किया। जिस समय राज्य व केन्द्र सरकारों से सहानुभूति एवं सहयोग की आवश्यकता थी, उन पर पुलिस का कहर टूटा। जिस समय उन्हें रोटी, पानी और आवास की सुविधाओं की आवश्यकता थी, उस समय उन्हें सड़कों पर भूखे-प्यासे अपने मासूम बच्चों के साथ अपनी जिन्दगी दांव पर लगानी पड़ी। जिस समय उनके जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों को लेने की आवश्यकता थी, उस समय सैंकड़ों मजदूरों को अकाल मौत के मुंह में समाने के लिए विवश होना पड़ा। कितनी बड़ी विडम्बना का विषय है कि आज मजदूरों को राजनीतिक तौर पर हमदर्दी की आवश्यकता है, लेकिन देशभर में संकीर्ण राजनीति के जरिए मजदूरों के साथ घिनौना मजाक किया जा रहा है।

सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि मजदूरों की समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं और भविष्य भी भयंकर संकटमय दिखाई दे रहा है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस की वजह से देश के लगभग 40 करोड़ असंगिठत मजदूरों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है और गरीबी के भयंकर दुष्चक्र में फंसा सकती है। ऐसे में केन्द्र व राज्य सरकारों को देश के श्रमिकों की सुध पूरी गम्भीरता के साथ लेने की आवश्यकता है। सिर्फ आंकड़ेबाजी और शाब्दिक हमदर्दी से मजदूरों की हालत सुधरने वाली नहीं है। तत्काल प्रभाव से मजदूरों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उनके अन्दर आत्मविश्वास और भावनात्मक लगाव बनाए रखने की आवश्यकता है।

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इस समय श्रमिक वर्ग के हित में कई प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्ष 2019 में जारी आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल श्रम शक्ति में 93 प्रतिशत हिस्सा असंगठित मजदूरों का है। इसका मतलब लगभग 41.85 करोड़ श्रमिक असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। लेकिन, विडम्बना का विषय है कि जिस असंगठित श्रम शक्ति का देश की इकोनोमी बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ है, उसी की हालत आज पूरे देश में अत्यन्त दयनीय और चिंताजनक है। इसके साथ ही इन श्रमिकों को पंजीकृत न होने और बैंक खाते के न होने से केन्द्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित होना पड़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 17 प्रतिशत मजदूरों के पास बैंक खाते नहीं हैं और 14 प्रतिशत के पास राशन कार्ड तक उपलब्ध नहीं है। इसके साथ ही यह चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया है कि 62 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों को सरकार की कल्याणकारी व आपातकालीन योजनाओं की समुचित जानकारी ही नहीं है। इसके साथ ही 37 फीसदी मजदूरों को यह ही मालूम नहीं है कि सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे उठाया जाए? क्या यह सरकारी तंत्र की निष्क्रियता नहीं है कि वह मजदूरों को अपने हकों का ज्ञान ही नहीं है?

देश में बड़े पैमाने पर मजदूरों को पंजीकृत नहीं किया गया है क्योंकि अधिकतर पंजीकृत श्रमिकों को ही कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हासिल हो पाता है। एक अनुमान के अनुसार इस समय पंजीकृत मजदूरों की संख्या मात्र 3.5 करोड़ के आसपास ही है। आधिकारिक तौर पर 30 सितम्बर, 2018 को यह संख्या 3.16 लाख थी। मजदूरों को उनके अधिकारों और कल्याणकारी कदमों से अच्छी तरह अवगत करवाया जाना चाहिए। खासकर, प्रवासी मजदूरों के प्रति अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रवासी मजदूरों को सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक देश में 45 करोड़ घरेलू प्रवासी हैं। वर्ष 2017 के आर्थिक सर्वे के अनुसार 10 से अधिक लोग दूसरे राज्यों में अपनी रोजी-रोटी कमाने जाते हैं।

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बेहद विडम्बना का विषय है कि बड़े पैमाने पर श्रमिकों को न तो न्यूनतम मजदूरी मिल पा रही है और न ही उन्हें वैतनिक अवकाश अथवा सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल पा रहा है। श्रम मंत्रालय द्वारा वर्ष 2015 में तैयार एक रिपोर्ट के अनुसार कृर्षि और गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वाले 82 प्रतिशत मजदूरों के पास कोई लिखित अनुबन्ध नहीं होता। 77.3 प्रतिशत कामगारों को सही समय पर न तो उचित वेतन मिलता है और न ही समुचित अवकाश मिलता है। इसके साथ ही 69 प्रतिशत श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा का भी लाभ नहीं पाता। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने नया ‘वेजेज कोड बिल’ तैयार किया। इसे ‘न्यूनतम मजदूरी कानून’ की संज्ञा दी गई।

श्रम और रोजगार मामलों के राज्यमंत्री संतोष गंगवार ने 30 जुलाई, 2019 को संसद में ‘वेजेज कोड बिल’ पेश करते हुए दावा किया था कि इस बिल से 50 करोड़ संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी का अधिकार मिल जाएगा। इसके साथ ही बताया गया कि असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को चाहे वे खेतीहर हों या ठेला चलाने वाले अथवा सफाई या पुताई करने वाले हों या फिर सिर पर बोझा ढ़ोने वाले या ढाबों व घरों में काम करने वाले हों, सभी को इस कानून का लाभ मिलेगा। सरकार ने मजदूरी की न्यूनतम दर 178 रूपये प्रतिदिन और 4628 रूपये प्रतिमाह तय किया। लेकिन, बताया जा रहा है कि मोदी सरकार ने मजदूरों की न्यूनतम दर तय करने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने केन्द्र सरकार को मजदूरों के लिए न्यूनतम दर 375 रूपये प्रतिदिन और 18000 रूपये प्रतिमाह तय करने की सिफारिश की थी। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर मोदी सरकार ने मजदूरों के हितों पर बड़ी निर्ममता से कैंची क्यों चलाई? इसके बावजूद भी लगभग 33 प्रतिशत मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पा रही है।

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देश की आर्थिक असमानता भी श्रमिकों की दयनीय दशा के लिए जिम्मेदार है। हाल ही में ऑक्सफैम की ‘टाइम टू केयर’ रिपोर्ट के अनुसार भारत के शीर्ष एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश के 70 प्रतिशत लोगों के कुल धन से चार गुना धन है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 63 अरबपति लोगों का कुल धन देश के वार्षिक बजट 2018-19 के बजट से भी अधिक बनता है। दूसरी तरफ देश के गरीबों और मजदूरों की हालत दनि-प्रतिदिन अति दयनीय होती चली जा रही है। वर्ष 2011 में किए गए सामाजिक सर्वेक्षण के अनुसार गाँवों में रहने वाले लगभग 67 करोड़ लोग 33 रूपये प्रतिदिन पर जीवन-निर्वाह करते हैं। इसके साथ ही एक किसान परिवार की औसत आय मात्र 60 रूपये प्रतिदिन रह गई है। वर्ष 2013 की राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 9 करोड़ किसान परिवारों में से 75 प्रतिशत के पास डेढ़ एकड़ से भी कम कृषि योग्य भूमि रह गई है। ऐसे में केन्द्र व राज्य सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की सख्त आवश्यकता है।

-राजेश कश्यप

(वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं समाजसेवी)

टिटौली (रोहतक)







सुरक्षा परिषद में मिला भारत को महत्वपूर्ण स्थान, आतंक पर पाक की कसेगी नकेल

  •  राकेश सैन
  •  जनवरी 16, 2021   14:53
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सुरक्षा परिषद में मिला भारत को महत्वपूर्ण स्थान, आतंक पर पाक की कसेगी नकेल

पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद ने यह बात मानी है कि यह पाकिस्तान के लिए अच्छा समाचार नहीं है क्योंकि तालिबान सेंक्शन कमेटी और काउंटर टेररिज़्म कमेटी, जिसकी भारत 2022 में अध्यक्षता करेगा ये दोनों पाकिस्तान के मूलभूत हित हैं।

दिल्ली में चल रहे कथित किसान आंदोलन के नाम पर हो रही सस्ती राजनीति व मीडिया का पूरा ध्यान इस पर होने के कारण देशवासियों का ध्यान भारत को मिली अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर नहीं गया कि दुनिया में बदलती परिस्थितियों के चलते पाकिस्तान का टेंटुआ अब भारत के हाथों में आता दिखाई दे रहा है। दुनिया में आतंकवाद, तालिबान का पोषण करने सहित अनेक मुद्दों पर फैसले करने में भारत की भूमिका महत्त्वपूर्ण होने जा रही है और पाकिस्तान पशोपेश में है कि नई परिस्थितियों से बचे तो बचे कैसे ? संयुक्त राष्ट्र में भारत के पास सुरक्षा परिषद् की तीन समितियों की अध्यक्षता का जिम्मा मिला है। इनमें तालिबान प्रतिबंध समिति (सेंक्शन कमेटी), आतंकरोधी समिति और लीबिया प्रतिबंध समिति शामिल हैं।

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बीबीसी लंदन में सहर बलोच की रिपोर्ट के अनुसार, काउंटर टेररिज़्म और तालिबान सेंक्शन कमेटी दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनके तहत भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को परेशान कर सकता है और साथ ही उस पर और प्रतिबंध भी लगवा सकता है। तालिबान सेंक्शन कमेटी उन देशों की सूची तैयार करती है, जो तालिबान का आर्थिक रूप से समर्थन करते हैं, या उनके साथ किसी और तरह से सहयोग करते हैं। इसके आधार पर, दुनिया भर के 180 से अधिक देश अपने कानूनों में संशोधन करते हैं और उन लोगों के नाम को प्रतिबंधित संगठनों और व्यक्तियों की सूची में जोड़ दिया जाता है। इसके बाद उन पर मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय सहायता पर बनने वाले कानून लागू होते हैं। संयुक्त राष्ट्र की इन कमेटियों के मामले आधिकारिक रूप से संचालित होते हैं और ये इन्हें लागू कराते आ रहे हैं।

जैसा कि सभी जानते हैं कि पाकिस्तान इस समय दो से तीन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें से एक फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ का आगामी ऑनलाइन सत्र है। यह टास्क फोर्स मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादियों को वित्तीय सहायता की रोकथाम करने वाली एजेंसी है। अक्तूबर 2020 में पाकिस्तान ने एफएटीएफ की 27 सिफारिशों में से 21 को पूरा कर लिया था, लेकिन शेष छह सिफारिशों को टास्क फोर्स ने बहुत महत्वपूर्ण माना है। इसकी समय सीमा फरवरी 2021 में पूरी होगी। पाकिस्तान को भय है कि भारत अपनी पूरी ताकत लगा कर उसे एफएटीएफ की काली सूची में शामिल करवा सकता है। इसके तहत भारत पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता भी रुकवा सकता है।

पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद ने इस पत्रकार को बताया कि यह पाकिस्तान के लिए अच्छा समाचार नहीं है क्योंकि तालिबान सेंक्शन कमेटी और काउंटर टेररिज़्म कमेटी, जिसकी भारत 2022 में अध्यक्षता करेगा ये दोनों पाकिस्तान के मूलभूत हित हैं। भारत इन दोनों मुद्दों पर पाकिस्तान का विरोध करता रहा है। अब भारत को पिछले दरवाजे से अफगान शांति प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिल गया है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिका और तालिबान के बीच और दूसरी तरफ अफगान सरकार और अफगान तालिबान के बीच, बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत इन मूलभूत हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है।

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ज्ञात रहे कि साल 1996 में भारत ने कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेरर के तहत आतंकवाद की वित्तीय सहायता और आतंकवाद की रोकथाम पर विस्तृत बात करने की कोशिश की थी और भारत एक बार फिर से इसे लागू कराने की पूरी कोशिश करेगा। तालिबान कमेटी पर संयुक्त राष्ट्र के गैरस्थायी सदस्य इन कमेटियों की अध्यक्षता करते आ रहे हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद् भी अक्सर उन देशों को चुनती है जो पड़ोसी नहीं हैं और अकसर क्षेत्र के बाहर के देशों को अध्यक्षता करने का अवसर दिया जाता है। लेकिन अब जब भारत को तालिबान सेंक्शन कमेटी का अध्यक्ष चुना गया है यह भारत सरकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात है।

चाहे देश का आंतरिक मामला हो या बाहरी आतंकवाद के मोर्चे पर भारत विशेषकर मोदी सरकार का बहुत सख्त दृष्टिकोण रहा है। मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुनिया को 'गुड टैरेरिज़्म-बैड टेरेरिज़्म' के बीच अंतर न करने व आतंकवाद की व्याख्या करने पर जोर देते रहे हैं। अभी पिछले साल 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान मोदी ने आतंकवाद को लेकर दुनिया को भारतीय दृष्टिकोण से अवगत करवाया था और आतंकवाद के स्रोत पर कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया था। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक व एयर स्ट्राईक आदि बहुत-सी कार्रवाइयां हैं जो साबित करती हैं कि मोदी सरकार ने केवल ऐसा कहा ही नहीं बल्कि करके भी दिखाया है। अब कूटनीतिक क्षेत्र में भारत को जो सफलता हासिल हुई है उससे आतंकवाद और इसको स्तनपान करवाने वाले पाकिस्तान का टेंटुआ भारत के हाथों आता दिखाई दे रहा है।

-राकेश सैन







स्वदेशी तेजस विमानों से भारतीय रक्षा उद्योग बढ़ेगा तेजस्विता की उड़ान

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 15, 2021   12:54
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स्वदेशी तेजस विमानों से भारतीय रक्षा उद्योग बढ़ेगा तेजस्विता की उड़ान

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह स्वदेशी रक्षा-उत्पादों के लिये सक्रिय हैं, अपनी दूरगामी सोच एवं निर्णायक क्षमता से उन्होंने तेजस के स्वदेशी विमानों की खरीद की स्वीकृति को बाजी पलटने वाला बताया। पूर्व में 40 तेजस विमानों की खरीद से पृथक है 83 तेजस विमानों की खरीद का निर्णय।

सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की ओर से निर्मित किये जाने वाले हल्के लड़ाकू विमान की खरीद को मंजूरी देकर भारत के स्वदेशी रक्षा उद्योग को तेजस्विता एवं स्वावलंबन की नयी उड़ान दी है। पिछले साल भारतीय वायु सेना ने 48 हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत के इन 83 तेजस विमानों की खेप की खरीद के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसे स्वीकृति मिलना नये भारत, आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है। नरेन्द्र मोदी सरकार की आत्मनिर्भर भारत की पहल के क्रम में रक्षा मंत्रालय ने अनुकरणीय कदम उठाया है। स्वदेशी आयुध सामग्री एवं रक्षा उत्पादों के निर्माण से विदेशों से आयात पर रोक लगेगी, जो न केवल आर्थिक दृष्टि से किफायती साबित होगी बल्कि भारत दुनिया में एक बड़ी ताकत बनकर भी उभरेगा।

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यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि भारत की गिनती दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाले देशों में होती है। दूसरी ओर पाक व चीन की सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों में लगातार इजाफा हुआ है। वहीं विगत में हर बड़े रक्षा सौदों में बिचैलियों की भूमिका को लेकर जो विवाद उठते रहे हैं, उसका भी पटाक्षेप हो सकेगा। साथ ही जहां भारत में रक्षा उद्योग का विकास होगा, वहीं देश में रोजगार के अवसरों में आशातीत वृद्धि हो सकेगी, भारत का पैसा भारत में रहेगा।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह स्वदेशी रक्षा-उत्पादों के लिये सक्रिय हैं, अपनी दूरगामी सोच एवं निर्णायक क्षमता से उन्होंने तेजस के स्वदेशी विमानों की खरीद की स्वीकृति को बाजी पलटने वाला बताया। पूर्व में 40 तेजस विमानों की खरीद से पृथक है 83 तेजस विमानों की खरीद का निर्णय। इन विमानों की स्वीकृति इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत में निर्मित ये लड़ाकू विमान वायुसेना की कसौटी पर खरे उतरे हैं, यह एक शुभ एवं नये विश्वास का अभ्युदय है कि हम सेना की जरूरतों के लिये अब दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहेंगे। इसके लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार कोशिशों एवं संकल्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि सधे हुए कदम से आगे बढ़ते जायें तो संभव है भविष्य में भारत हथियारों के निर्यातक देशों में भी शुमार हो जाये।

भारत में आजादी के बाद से ही सरकारी स्तर पर सेनाओं की जरूरत का सामान आयुधशालाओं में निर्मित होता रहा है, लेकिन सरकार की दोहरी नीतियों, आधुनिकीकरण के अभाव, नेताओं के स्वार्थ तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी न हो पाने के कारण हम रक्षा उत्पादों के मामले में दूसरे देशों पर ही निर्भर रहे। हमारा देश में हथियारों की खरीद की दृष्टि से दूसरे देशों की निर्भरता का एक बड़ा कारण विदेशी कम्पनियों से मिलने वाला कमीशन भी रहा है। मोदी की पहल एवं राजनाथ सिंह की सूझबूझ एवं तत्परता से मौजूदा वक्त में रक्षा उत्पादों के स्वदेशीकरण से सेना को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलने लगी है। इसी का परिणाम है राजनाथ सिंह द्वारा लिया गया 101 रक्षा उत्पादों के आयात पर रोक का निर्णय।

भारत की बड़ी विडम्बना एवं विवशता यह भी रही है कि वह उन देशों में गिना जाता रहा है, जो अपनी तमाम रक्षा सामग्री का आयात करता रहा है, इस पराधीन स्थिति से मुक्ति एवं आयातक से निर्यायक बनने की सुखद स्थिति में पहुंचने के लिये अभी बड़े एवं प्रभावी निर्णय लेने एवं उन्हें क्रियान्वित करने की जरूरत है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि भारत की गिनती सामर्थ्यवान, विकसित एवं शक्ति सम्पन्न देशों में होने लगेगी। भारत रक्षा उत्पादों की दृष्टि से शक्तिशाली एवं आत्मनिर्भर हो सकेगा। दुनिया की एक बड़ी ताकत बनकर उभरने के लिये भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपनी रक्षा जरूरतों को स्वयं पूरा करने में सक्षम बनेगा और किसी भी राजनीति आग्रह-पूर्वाग्रह एवं भ्रष्टाचार को इसकी बाधा नहीं बनने देगा। तेजस लड़ाकू विमानों का संदेश है सरकार और कर्णधारों को कि शासन संचालन में एक रात में (ओवर नाईट) ही बहुत कुछ किया जा सकता है। अन्यथा ''जैसा चलता है- चलने दो'' की पूर्व के नेताओं की मानसिकता और कमजोर नीति ने रक्षा-क्षेत्र की तकलीफें बढ़ाईं एवं हमें पराधीन बनाये रखा हैं। ऐसी सोच वाले व्यक्तियों को अपना राष्ट्र नहीं दिखता, उन्हें विश्व कैसे दिखता। वर्तमान सरकार का धन्यवाद है कि उन्हें देश भी दिख रहा है और विश्व भी।

भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा बजट वाला देश होने के बावजूद अपने 60 प्रतिशत हथियार प्रणालियों को विदेशी बाजारों से खरीदता है, जबकि भारत की तुलना में पाकिस्तान ने अपनी हथियार प्रणालियां ज्यादा विदेशी ग्राहकों को बेची हैं। इन स्थितियों की गंभीरता को देखते हुए भारत सैन्य उत्पादों के स्वावलम्बन की ओर कदम बढ़ा रहा है तो यह देश की जरूरत भी है और उचित दिशा भी है। इसी दृष्टि से रक्षा मंत्रालय द्वारा जिन उत्पादों के आयात पर रोक लगाने का निर्णय किया गया है, उनमें सामान्य वस्तुएं ही नहीं वरन सैन्य बलों की जरूरतों को पूरा करने वाली अत्याधुनिक तकनीक वाली असॉल्ट राइफलें, आर्टिलरी गन, रडार व ट्रांसपोर्ट एयरक्राप्ट एवं लड़ाकू विमान आदि रक्षा उत्पाद भी शामिल हैं। आगामी छह-सात सालों में घरेलू रक्षा उद्योग को लगभग चार लाख करोड़ के अनुबंध दिये जायेंगे, जिसमें पारंपरिक पनडुब्बियां, मालवाहक विमान, क्रूज मिसाइलें व हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी शामिल होंगे। वर्तमान वित्त वर्ष में घरेलू रक्षा उद्योग के लिये 52 हजार करोड़ रुपए के पृथक बजट का प्रावधान किया गया है। सेना में हथियारों की आपूर्ति बाधित न हो, इसलिये इसे चरणबद्ध तरीके से वर्ष 2020 से 2024 के मध्य क्रियान्वित करने की प्लानिंग है। इस रणनीति के तहत सेना व वायु सेना के लिये एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये तथा नौसेना के लिये एक लाख चालीस हजार करोड़ के उत्पाद तैयार किये जाने की योजना है।

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हमें मौजूदा तथा भविष्य की रक्षा जरूरतों का गहराई से आकलन करना होगा। इसकी वजह यह भी है कि रक्षा उत्पादों के क्षेत्र में तकनीकों में तेजी से बदलाव होता रहता है। सभी उत्पादों की आपूर्ति निर्धारित समय सीमा में हो और सेना की जरूरतों में किसी तरह का कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। देश की रक्षा के मुद्दे पर किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। इसके लिये जरूरी है कि तीनों सेनाओं और रक्षा उद्योग के मध्य बेहतर तालमेल स्थापित हो। इसके लिये कारगर तंत्र विकसित किया जाना भी जरूरी है। अभी अन्य उत्पादों के बारे में भी मंथन की जरूरत है, जिनका निर्माण देश में करके दुर्लभ विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। साथ ही यह भी जरूरी है कि देश रक्षा उत्पाद गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरे क्योंकि यह देश की सुरक्षा का प्रश्न है और हमारे सैनिकों की जीवन रक्षा का भी।

सरकारी नीतियों, बजट एवं कार्ययोजनाओं की धीमी रफ्तार का ही परिणाम है कि तेजस को विकसित करने में करीब तीस वर्ष लग गये। इसी तरह रक्षा क्षेत्र की अन्य परियोजनाएं भी लेट-लतीफी एवं सरकारी उदासीनता का शिकार होती रही हैं। इस तरह की स्थितियों का होना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी हम सेना की सामान्य जरूरतों के साधारण उपकरण और छोटे हथियार भी देश में निर्मित करने में सक्षम नहीं हो पाये हैं। निःसंदेह तेजस एक कारगर एवं गुणवत्तापूर्ण लड़ाकू विमान साबित हो रहा है, लेकिन यह तथ्य भी हमारे ध्यान में रहना जरूरी है कि उसमें लगे कुछ उपकरण एवं तकनीक दूसरे देशों की हैं। हमारा अगला लक्ष्य उसे पूरी तरह स्वदेशी और साथ ही अधिक उन्नत एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने का होना चाहिए। यह तभी संभव है कि हमारे विज्ञानियों और तकनीकी विशेषज्ञों को भरपूर प्रोत्साहन एवं साधन दिये जायें। यदि भारत दुनिया की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होते हुए अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी छाप छोड़ सकता है और हर तरह की मिसाइलों के निर्माण में सक्षम हो सकता है तो फिर ऐसी कोई वजह नहीं कि अन्य प्रकार की रक्षा सामग्री तैयार करने में पीछे रहे। वर्तमान मोदी सरकार ने जहां स्वदेशी रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिये उन्नत एवं प्रोत्साहनपूर्ण नीतियों को निर्मित किया है वहीं उचित बजट का भी प्रावधान किया है। अब समय है उनके सकारात्मक नतीजें जल्दी ही सामने आयें। भारत न सिर्फ आयात के विकल्प के उद्देश्य से रक्षा उत्पादों का निर्माण करे, बल्कि भारत में निर्मित रक्षा उत्पादों का निर्यात अन्य देशों को करने के लिए भी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाये।

-ललित गर्ग







जनरल नरवणे के नेतृत्व में सेना ने जो काम कर दिखाया है, उस पर पीढ़ियाँ गर्व करेंगी

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  जनवरी 14, 2021   11:20
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जनरल नरवणे के नेतृत्व में सेना ने जो काम कर दिखाया है, उस पर पीढ़ियाँ गर्व करेंगी

सेनाध्यक्ष पद पर जनरल मनोज मुकुंद नरवणे आये। जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ऐसे सेनाध्यक्ष रहे जिनको पहले ही साल में तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने एक कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी छाप छोड़ी है।

दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में शुमार भारतीय सेना आज अपना स्थापना दिवस धूमधाम से मना रही है। भारतीय सेना के शौर्य की जहाँ तक बात है तो उसे पूरी दुनिया कई बार देख ही चुकी है, लेकिन कोरोना काल में सेना ने जिस प्रकार राहत अभियानों में बढ़-चढ़कर मदद की वह अपने आप में दुनियाभर के सैन्य बलों के लिए अनुकरणीय है। कोरोना की आहट होते ही भारतीय सेना ने ऑपरेशन नमस्ते शुरू कर महामारी से लड़ने की शुरुआत की और सरकार की ओर से चलाये जा रहे राहत कार्यों में योगदान देने में जुट गयी लेकिन इस कठिन समय में भी पाकिस्तान और चीन ने जिस प्रकार मिलकर भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया उसका भी भारतीय सेना ने दुश्मन को मुँहतोड़ ही नहीं बल्कि हर अंग तोड़ जवाब दिया। भारतीय सेना ने चीन को सिर्फ चेताया ही नहीं बल्कि चौंकाया भी है। सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और पाकिस्तानी आतंकवादियों को भारतीय सीमा में घुसते ही मार गिराने के भारतीय सुरक्षा बलों के रुख से जैसे पाकिस्तान के सामने यह पूरी तरह स्पष्ट है कि भारत इस्लामाबाद की आतंक संबंधी नीति को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा उसी तरह पिछले एक साल में चीन के सामने भी यह स्पष्ट हो गया है कि भारत को दबाया नहीं जा सकता, झुकाया नहीं जा सकता, डराया नहीं जा सकता और पीछे हटाया नहीं जा सकता। चीन को अच्छी तरह समझ आ गया है कि भारत आंखों में आंखें डाल कर बात भी करता है और यदि हालात बिगड़ते हैं तो दुश्मन को सिर्फ अपने बाजुओं की ताकत से ही चित कर सकता है।

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पिछले साल के शुरू में देश को पहले सीडीएस के रूप में बिपिन रावत मिले और सेनाध्यक्ष पद पर जनरल मनोज मुकुंद नरवणे आये। जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ऐसे सेनाध्यक्ष रहे जिनको पहले ही साल में तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने इस एक साल में ही कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी छाप छोड़ी है। दुनिया के सबसे बड़े बलों में शुमार भारतीय सेना का नेतृत्व आसान बात नहीं है। आइये जरा डालते हैं एक नजर पिछले एक वर्ष में सेना के समक्ष पेश आईं चुनौतियों पर और उसे मिली उपलब्धियों पर।

ऑपरेशन नमस्ते

देश में पिछले वर्ष के शुरू में जब कोरोना वायरस की आहट हुई तो सेना ने ऑपरेशन नमस्ते शुरू किया। इस अभियान के तहत जवानों को मास्क लगाने, सामाजिक दूरी बनाये रखते हुए कार्यों को अंजाम देने आदि के बारे में निर्देशित किया ही गया साथ ही सेना ने तमाम जगह क्वारांटीन सेंटर भी बनाये जोकि सभी के लिए काफी लाभकारी रहे। सेना ने इसके साथ ही केंद्र तथा विभिन्न राज्यों की सरकारों की ओर से चलाये जा रहे कोरोना रोधी अभियानों में हरसंभव मदद की।

सीमा पार आतंकवाद पर कड़ा प्रहार

पाकिस्तान को कड़ा संदेश देते हुए सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत सीमापार से प्रायोजित आतंकवाद को कभी बर्दाश्त नहीं करेगा और देश के पास किसी भी आतंकी गतिविधि से निपटने के लिए अपने चुने हुए समय और स्थान पर सटीक पलटवार करने का अधिकार सुरक्षित है। अब जनरल नरवणे ऐसा कह रहे हैं तो यह सिर्फ बयान भर नहीं समझा जाना चाहिए। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को बार-बार उसकी हिमाकतों का तगड़ा जवाब देकर दिखाया भी है। यही कारण है कि इस्लामाबाद के मन में सर्जिकल स्ट्राइक का इतना खौफ बैठ गया है कि वह दिन-रात भय से कांपा रहता है। हालांकि कोरोना वायरस महामारी के बावजूद पाकिस्तान अपनी राज्य नीति के तहत एलओसी पर बिना किसी उकसावे के संघर्षविराम का उल्लंघन करता आ रहा है और कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए भी प्रयास करता रहा है। लेकिन सेना ने संघर्षविराम उल्लंघनों का जवाब पाकिस्तानी चौकियां उड़ा कर दिया और घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों का भेजा उड़ा कर पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं का दिल दहला दिया।

पाकिस्तान भले कितने ही प्रयास कर ले लेकिन कश्मीर घाटी में अब आतंकवाद के पाँव उखड़ने लगे हैं। पिछले वर्ष सर्वााधिक बड़ी संख्या में आतंकवादी और आतंकवादी संगठनों के आला कमांडर मारे गये। पूरा साल यह स्थिति बनी रही कि आतंकी संगठनों के चीफ का पद लगभग खाली ही रहा क्योंकि इस पर बैठने वाला कुछ समय ही जिंदा रह पाया। सेना का मानवीय चेहरा भी कश्मीर घाटी के लोगों ने विभिन्न ऑपरेशन्स के दौरान फिर देखा जब नागरिकों के जीवन के लिए जवानों ने अपनी कुर्बानी दी। सेना की ओर से चलाये जाने वाले सद्भावना मिशनों का ही कमाल है कि कश्मीरी युवा बड़ी संख्या में मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। सेना की भर्तियों में भाग लेने के लिए कश्मीरी युवाओं की भीड़ लग रही है। इसके अलावा कोरोना काल में जिस तरह सेना ने रोजगार संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर चलाये उससे युवाओं में कौशल बढ़ा है। लॉकडाउन के दौरान सेना की ओर से कश्मीर में जरूरतमंदों की हरसंभव मदद की गयी, राशन बांटा गया, चिकित्सा संबंधी जरूरतें पूरी की गयीं, युवाओं को खेलों से जोड़ा गया, नशे के खिलाफ अभियान के दौरान युवाओं के बीच जागरूकता फैलायी गयी। आज स्थानीय स्तर पर ऐसे हालात हैं कि यदि कोई बहकावे में आकर आतंकी गतिविधियों में लिप्त भी हो जाता है तो सेना के आग्रह पर अमूमन वापस लौट भी आता है।

चीनी चौधराहट को चुटकी में चटकाया

जनरल एमएम नरवणे के नेतृत्व वाली भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जिस तरह से चीनी सेना का अत्यंत बहादुरी के साथ सामना किया और उन्हें वापस जाने को मजबूर किया, उसकी कल्पना तक चीन ने नहीं की होगी। भारतीय सेना ने इस साल जो उपलब्धि हासिल की है उस पर देश की आने वाली पीढ़ियों को गर्व होगा। विस्तारवादी चीन की मंशाओं पर पानी फेरना आसान नहीं है लेकिन भारतीय सेना ने यह कार्य करके दिखाया और हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। गलवान में हमारे बलवानों ने जो शौर्य और साहस दिखाया उसके लिए उन्हें बारम्बार सलाम। हमारे 20 जवान उस संघर्ष में शहीद हो गये लेकिन चीनी आक्रामकता का जवाब देते हुए वह जिस तरह चीनी सैनिकों को मारते-मारते मरे हैं वह हमारे शहीदों को सदा के लिए अमर कर गया। चीन ने कोरोना महामारी के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर यथास्थिति बदलने की जो भी कोशिशें की वह सभी भारतीय सेना ने विफल कर दीं। भारतीय सेना द्वारा पिछले साल अगस्त में पैंगोंग झील से लगे कुछ ऊंचाई वाले इलाकों पर कब्जा किये जाने से चीन चौंक गया और भारत को उस पोजिशन का लाभ मिला।

भारत और चीन गतिरोध खत्म करने के लिए अब तक 8 दौर की बातचीत कर चुके हैं लेकिन हल नहीं निकला है और दोनों देशों की सेनाएं भयंकर ठंड और विषम परिस्थितियों के बावजूद आमने-सामने हैं। शायद चीन ने ठंड के इस मौसम में भारतीय सेना की परीक्षा लेने की सोची होगी, यदि ऐसा है तो भारतीय सेना उस परीक्षा में पूरी तरह पास हो चुकी है। भारतीय सेना के पास अपार साहस और कुछ भी कर दिखाने की हिम्मत तो पहले से ही थी लेकिन अब उसके पास विषम परिस्थितियों में भी पूरी तैयारी के साथ रहने के लिए साजोसामान भी है। जनरल नरवणे के नेतृत्व में भारतीय सेना ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा भंडारण कार्यक्रम चलाया जोकि पूर्वी लद्दाख में ठंड के मौसम के लिए था क्योंकि भीषण ठंड के दौरान जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं उस समय के लिए जवानों की हर चीज की व्यवस्था करना जरूरी था। भीषण सर्दी से मुकाबले की तैयारी भारतीय सेना ने पिछले साल जुलाई से ही शुरू कर दी थी। सैनिकों के लिए खास कपड़े और टेंट खरीदे गए जिनमें शून्य से 40 डिग्री नीचे के तापमान में आराम से रहा जा सकता है।

40 फीट तक बर्फ पड़ने के समय किसी भी सैनिक का इन इलाकों में ज्यादा समय तक तैनात रहना शारीरिक तौर पर काफी कठिन है लेकिन मोदी सरकार सैनिकों की हर जरूरत का खास ख्याल रख रही है। इसलिए एक बड़े अभियान के तहत राशन, केरोसिन हीटर, खास कपड़े, टेंट्स और दवाइयों को पूरी सर्दी के लिए समय से ही जमा कर लिया गया था। बेहद ठंडे मौसम में सैनिकों के इस्तेमाल के लिए खास कपड़ों के 11000 सेट अमेरिका से खरीदे गये। हाई ऑल्टेट्यूड और सुपर हाई ऑल्टेट्यूड में तैनात सैनिकों के लिए गरम रहने वाले टैंटों के अलावा लद्दाख में तैनात सभी सैनिकों के लिए स्मार्ट कैंप भी समय से तैयार कर लिए गए थे जिनमें बिजली, पानी, कमरे को गर्म रखने वाले हीटर, स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। भारतीय सेना ने अपने सबसे बड़े सैन्य भंडारण अभियान के तहत पूर्वी लद्दाख में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगभग चार महीनों की भीषण सर्दियों के मद्देनजर बलशाली टैंकों, तोपों, सैन्य वाहनों, भारी हथियार, गोला-बारूद, ईंधन के साथ ही खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पूरी कर चीन की चौधराहट को चौंका दिया। यही नहीं इस वर्ष ठंड संबंधी दुश्वारियों की वजह से घायल होने वाले सैनिकों की तादाद भी पहले की अपेक्षा ज्यादा नहीं है जबकि इस बार तैनाती बड़ी संख्या में है। भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए सेनाध्यक्ष समय-समय पर पूर्वी लद्दाख का दौरा भी कर रहे हैं, तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं और जरूरतों को पूरा करने के निर्देश भी दे रहे हैं। इसके अलावा लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दौलत बेग ओल्डी और डेपसांग जैसे अनेक अहम इलाकों तक सैनिकों की आवाजाही के लिए अनेक सड़क परियोजनाओं पर काम तेज करवाया गया है।

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सेना प्रमुख ने देश को आश्वस्त किया है हम जब तक अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों और उद्देश्यों को नहीं प्राप्त कर लेते तब तक पकड़ बनाकर रखने के लिए तैयार हैं और भारतीय सैनिक न सिर्फ लद्दाख के क्षेत्र में बल्कि एलएसी से लगे सभी क्षेत्रों में उच्च स्तर की सतर्कता बरत रहे हैं। जनरल नरवणे ने कहा है कि भारतीय सेना की संचालनात्मक तैयारी बेहद उच्च स्तर की है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि यह वैसी ही है जैसी पहले थी और यथास्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। सेनाध्यक्ष के इस बयान ने उन तमाम राजनीतिक आरोपों पर विराम लगा दिया है जिसके तहत तरह-तरह की बातें कही जा रही थीं। 

सेना की उड्डयन शाखा में शामिल होंगी महिला पायलट

जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक बड़ी पहल के तहत भारतीय सेना ने अपनी उड्डयन शाखा में महिला पायलटों की शामिल करने का फैसला किया है और माना जा रहा है कि इसके पहले बैच का प्रशिक्षण जुलाई में शुरू हो जायेगा। इस बारे में स्वयं जनरल नरवणे ने कहा कि उन्होंने एक महीने पहले सेना की उड्डयन शाखा में महिलाओं को शामिल करने का निर्देश जारी किया था। फिलहाल सेना की उड्डयन शाखा में महिलाओं को सिर्फ एयर ट्रैफिक कंट्रोल और ग्राउंड ड्यूटी में लगाया जाता है। सेना प्रमुख की पहल पर एडजुटेंट जनरल शाखा, सैन्य सचिव शाखा और उड्डयन निदेशालय में सहमति बन गयी है कि उड़ान भरने वाली शाखा में पायलट के रूप में महिला अफसरों की भर्ती की जा सकती है। माना जा रहा है कि अगला सत्र जुलाई से शुरू होगा और महिला अफसरों को पायलट प्रशिक्षण में शामिल किया जाएगा। एक साल के प्रशिक्षण के बाद वह पायलट के तौर पर फ्रंट लाइन पर ड्यूटी कर सकेंगी।

सैन्यकर्मियों के बीच मानसिक तनाव को कम करने के भरसक प्रयास

सेना ने इस चुनौतीपूर्ण वर्ष में अपने जवानों की सेहत का भी खास ख्याल रखा। कई बार ऐसे हालात हो जाते हैं कि मानसिक तनाव से जूझ रहे जवान आत्महत्या कर लेते हैं इसको देखते हुए विभिन्न अभियान चलाये गये। सैनिकों में तनाव की समस्या को दूर करने के लिए परामर्श भेजने सहित अन्य कई कदम उठाए गए। सेनाध्यक्ष की पहल पर बल ने जवानों के बीच तनाव के कारणों का अध्ययन किया और उनकी समस्याएं दूर करने के प्रयास किये गये और किये भी जा रहे हैं। साथ ही वरिष्ठ अधिकारी इस मुद्दे पर कंपनी कमांडर और कमांडिंग स्तर के अधिकारियों के नियमित संपर्क में बने हुए हैं। देखा जाये तो सेना के बारे में बिना आधार के भी कई बार रिपोर्टें प्रकाशित कर दी जाती हैं और विवाद खड़ा कर उस रिपोर्ट को वापस ले लिया जाता है। हाल ही में प्रमुख सैन्य थिंक टैंक यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (यूएसआई) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय सेना के आधे से ज्यादा सैनिक गंभीर तनाव की स्थिति में मालूम होते हैं और दुश्मनों की गोली के मुकाबले आत्महत्या, आपसी झगड़े और अन्य अप्रिय घटनाओं में हर साल ज्यादा सैनिकों की जान जा रही है। इस रिपोर्ट पर विवाद हुआ और बाद में यूएसआई की वेबसाइट से इस रिपोर्ट को हटा लिया गया।

पूर्वोत्तर में शांति

पूर्वोत्तर में शांति व्यवस्था बनाये रखने में और उग्रवादी तत्वों पर लगाम लगाने में सेना की बड़ी भूमिका रहती है। पिछले एक वर्ष में देखें तो असम सहित पूर्वोत्तर के अन्य भागों में शांति बनाये रखने में सेना का अनुकरणीय योगदान रहा। सीमायी राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी उच्च स्तर की सतर्कता बनाये रखने की बात हो, बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाने की बात हो, सभी में सेना बढ़-चढ़कर कार्य करती रही। ओडिशा, बंगाल सहित जहाँ-जहाँ चक्रवाती तूफान आये वहाँ-वहाँ जवान राहत अभियानों में भी उतरे। यही नहीं चाहे नगालैंड के जंगली क्षेत्र में आग बुझाने की बात हो या अन्य प्रकार के सामाजिक कार्य, सेना ने सभी में आगे बढ़कर कार्य किया।

आत्मनिर्भर भारत

जब भारत आत्मनिर्भरता की राह पर कदम बढ़ा चला है तो सेना कहां पीछे रहने वाली है। पिछले वर्ष फरवरी माह में उत्तर प्रदेश की राजधानी में डिफेंस एक्सपो भी आयोजित किया गया जिसमें विदेशी कंपनियों ने देशी कंपनियों के रक्षा उत्पादों को देखा और सराहा। इस दौरान कई विदेशी कंपनियों से रक्षा अनुबंध भी हुए। इसके अलावा सेना ने छोटे से लेकर बड़े हथियारों तक की ऐसी सूची बनाई है जिनको घरेलू स्तर पर रक्षा साजोसामान बनाने वाली कंपनियों से ही खरीदा जायेगा। यही नहीं हाल ही में सेना की ओर से जो नये ऑर्डर दिये गये हैं उनमें 80 प्रतिशत तक भारतीय रक्षा कंपनियों को दिये गये हैं। स्वयं सीडीएस बिपिन रावत इस बारे में उद्योग संगठनों की बैठकों को संबोधित कर उनका हौसला बढ़ा चुके हैं।

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आगे की चुनौती

भारतीय सेना को पाकिस्तान और चीन की मिलिभगत को देखते हुए ‘दो मोर्चों’ पर संभावित खतरे के परिदृश्य से निपटने के लिए सदैव तैयार रहना होगा। साथ ही नये युग की जो तकनीकी संबंधी चुनौतियां हैं उनसे भी निबटने के लिए अपनी शक्ति को बढ़ाना होगा। सरकार को भी चाहिए कि सेना के आधुनिकीकरण के लिए भी जो भी बजटीय सहयोग और समर्थन चाहिए वह उसे प्रदान करती रहे। वैसे स्वयं सेनाध्यक्ष ने बताया है कि कोरोना काल में जब सभी मंत्रालयों को पैसा संभाल कर खर्च करने के निर्देश थे तब सेना के लिए कोई रोकटोक नहीं थी और उसे अपनी हर जरूरत का सामान समय पर मिलता रहा। सेनाध्यक्ष के रूप में जनरल नरवणे ने पड़ोसी देशों के अलावा उत्तर कोरिया और सऊदी अरब समेत कई अन्य देशों की यात्रा कर उन देशों के साथ भारत के रक्षा संबंध मजबूत बनाये, भारतीय सेना का अन्य देशों के साथ संयुक्त अभ्यास अभियान को आगे बढ़ाकर हमारे जवानों का कौशल और बढ़ाया, इस प्रकार के कार्यों को आगे भी किये जाते रहने की जरूरत है।

बहरहाल, हम सभी की भी यह जिम्मेदारी है कि जब हमारी सेना के वीर जवान सीमा पर और दुर्गम पहाड़ियों में डटे हुए हैं तो उनका हौसला बढ़ाने के लिए जो कुछ हो सकता है वह करते रहें। जिस विश्वास, दृढ़ता, प्रतिबद्धता और वीरता के साथ हमारे जवान डटे हुए हैं उसी दृढ़ता के साथ हमें हमारे जवानों के साथ खड़े रहने की जरूरत है।

जय हिन्द

-नीरज कुमार दुबे







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