दशकों तक अमेरिकी सुरक्षा के भरोसे बैठे रहे खाड़ी देश अब अपना माथा पीट रहे

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ANI

ओमान के सूत्रों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता आगे बढ़ रही थी और कई मांगों पर सहमति भी बन चुकी थी। ऐसे में युद्ध की नौबत टाली जा सकती थी। हालांकि हाल की घटनाओं ने हालात को जटिल बना दिया है, फिर भी संवाद की राह पूरी तरह बंद नहीं हुई है।

दशकों तक खाड़ी के समृद्ध अरब देशों ने अपनी सुरक्षा की बागडोर अमेरिका के हाथों में सौंप रखी थी। तेल की दौलत, चमकते महानगर और वैश्विक निवेश के दम पर उन्होंने अपने आपको स्थिरता और सुरक्षित ठिकाने के रूप में प्रस्तुत किया। पर अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि खाड़ी की चमकदार इमारतों के पीछे असुरक्षा की दरारें गहरी हो चुकी हैं।

ईरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों पर जिस तेजी और तीव्रता के साथ हमले किए उससे अमेरिका के भरोसे बैठा हर देश चौंक गया है। भले ही अमेरिका और इजरायली हमलों से ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा हो और सैकड़ों लोग मारे गए हों, लेकिन असली सवाल यह है कि इस टकराव में ज्यादा दांव पर किसका लग हुआ है? देख जाए तो संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश आर्थिक रूप से कहीं अधिक संवेदनशील स्थिति में हैं। पश्चिम एशिया लगभग साढ़े चार लाख करोड़ डॉलर की सकल घरेलू उत्पाद वाली विशाल आर्थिक पट्टी है। दुबई के किसी आलीशान होटल पर मिसाइल गिरने की तस्वीरें ही निवेशकों के भरोसे को चकनाचूर करने के लिए काफी हैं।

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1990 के दशक के खाड़ी युद्ध का दौर अलग था। तब पश्चिम एशिया की पहचान मुख्य रूप से तेल और गैस उत्पादक क्षेत्र की थी। दुनिया को ऊर्जा चाहिए थी और युद्ध समाप्त होते ही व्यापार फिर पटरी पर लौट आता था। लेकिन आज की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा गैर तेल क्षेत्रों पर आधारित है। ओमान में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत, कतर में 66 प्रतिशत और सऊदी अरब में 57 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। वित्त, अचल संपत्ति, पर्यटन और वैश्विक सेवाओं में इन देशों ने भारी निवेश किया है। दुबई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों की सूची में दुनिया के अग्रणी शहरों में शामिल हो चुका है। इन देशों ने अपने आपको स्थिर, सुरक्षित और निवेश के लिए अनुकूल केंद्र के रूप में गढ़ा है। पर जब ड्रोन और मिसाइलों की खबरें सुर्खियां बनती हैं, तब यह पूरी छवि दरकने लगती है। भले ही अधिकतर हमले रोके जा रहे हों, लेकिन निवेशक, पर्यटक और प्रवासी श्रमिक भयभीत होते हैं। खाड़ी की समृद्धि का बड़ा आधार यही प्रवासी श्रमिक हैं, जिनमें लाखों भारतीय भी शामिल हैं। उनके जरिए अरबों डॉलर की धनराशि भारत सहित कई देशों में भेजी जाती है। यदि युद्ध की आशंका बढ़ती है तो यह आर्थिक धारा भी प्रभावित होगी।

ओमान के सूत्रों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता आगे बढ़ रही थी और कई मांगों पर सहमति भी बन चुकी थी। ऐसे में युद्ध की नौबत टाली जा सकती थी। हालांकि हाल की घटनाओं ने हालात को जटिल बना दिया है, फिर भी संवाद की राह पूरी तरह बंद नहीं हुई है। खाड़ी के शासकों को अब खुलकर संघर्ष विराम के लिए पहल करनी होगी। केवल अमेरिका पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं दिख रहा।

भारत के लिए भी यह समय निर्णायक है। ऊर्जा सुरक्षा, दस लाख से अधिक भारतीय कामगारों की मौजूदगी और भारी धन प्रेषण के कारण भारत का सीधा हित इस क्षेत्र से जुड़ा है। भारत की संतुलित कूटनीति और दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता उसे मध्यस्थ की भूमिका में ला सकती है।

अमेरिका ने दावा किया है कि वह अभियान को कुछ ही सप्ताह में समेट सकता है, लेकिन पश्चिम एशिया इतने लंबे इंतजार का जोखिम नहीं उठा सकता। हर बीतता दिन निवेश और स्थिरता पर चोट कर रहा है। खाड़ी देशों को अब निर्णायक, आक्रामक और स्पष्ट पहल करनी होगी। यह केवल सीमाओं की लड़ाई नहीं, बल्कि आर्थिक भविष्य और वैश्विक साख की जंग है। यदि समय रहते शांति की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो चमकते महानगरों की रोशनी पर बारूद का साया और गहरा हो सकता है।

नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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