चीन सामरिक चुनौती के रूप में सामने हो तो ''हाउडी मोदी'' का महत्त्व और बढ़ जाता है

चीन सामरिक चुनौती के रूप में सामने हो तो ''हाउडी मोदी'' का महत्त्व और बढ़ जाता है

एक नरेंद्र वे थे जो सौ साल से भी पहले 1893 में शिकागो गए थे और जिन्होंने अमेरिका में दिए अपने सम्बोधन के माध्यम से विश्व में भारत के धर्म और अध्यात्म का डंका बजाया था जिसकी अनुगूंज अभी तक सुनायी देती है।

इतिहास जब बनता है तो कुछ इस तरह अचानक और अप्रत्याशित रूप से कि विश्व स्तब्ध होकर देखता रह जाता है। अमेरिका के प्रसिद्ध नगर ह्यूस्टन में 'हौडी मोदी' यानी 'आप कैसे हैं मोदी जी', का कार्यक्रम अमेरिका के इतिहास ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास की ऐसी बेजोड़ घटना रही जिस पर आने वाले लम्बे समय तक चर्चा होगी।

पचास हज़ार लोगों की भीड़ को एक साथ सम्बोधित करना यह कभी किसी पश्चिमी देश का बड़े से बड़ा नेता भी सोच नहीं सकता। वहां इस प्रकार की विशाल विराट जनसभाओं का कोई विचार ही नहीं है। सौ पांच सौ की सभा बहुत अच्छी मानी जाती है और संख्या यदि हज़ार दो हज़ार के ऊपर चली गयी तो उसको ऐतिहासिक कह दिया जाता है।

अमेरिका में रहने वाले, अधिकतर वहां के निवासी भारतीयों की संख्या पचीस लाख से अधिक है। उनमें से अधिकाँश वैज्ञानिक, इंजीनयर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट के शिखर प्रमुख हैं। आज अमेरिका में सर्वाधिक आय और सर्वोच्च तकनीकी एवं अन्य सर्वाधिक वेतन वाले पद भारतीय मूल के अमेरिकियों के पास हैं। उनके पास इसी कारण राजनीतिक और संसदीय निर्णयों को प्रभावित करने की भी क्षमता होनी चाहिए जो धीरे-धीरे वे प्राप्त कर रहे हैं। उनकी तुलना केवल यहूदी समाज से की जा सकती है जिनकी संख्या साठ से अस्सी लाख तक बताई जाती है लेकिन मीडिया और राजनीति पर उनका अपनी संख्या से भी कई गुना ज्यादा प्रभाव है।

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मोदी की ह्यूस्टन सभा में राष्ट्रपति ट्रम्प की सहभागिता न तो अचानक है और न ही केवल सौजन्यता। इसके बहुत गहरे कूटनीतिक और सामरिक अर्थ हैं। यह विराट और विश्वव्यापी प्रसिद्धि वाला अभूतपूर्व कार्यक्रम उस समय हो रहा है जब भारत ने मोदी और शाह के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को नया रूप, नया स्वर और नया वैधानिक दर्जा दिया है। इस पर पाकिस्तान केवल खिसियानी बिल्ली की तरह होकर रह गया है।

पूरे मुस्लिम राष्ट्रों के बीच इस सभा का बहुत गहरा असर होने वाला हैं तथा पाकिस्तान पहले से ज्यादा मुस्लिम देशों तथा पश्चिमी देशों के मध्य अलग थलग हो जायेगा। केवल चीन के भरोसे कब तक पाकिस्तान चलेगा ? 

लेकिन सबसे बड़ी बात होगी कि विश्व्यापी भारतीय समाज का सम्मान और अभिमान ही नहीं उनका मनोबल भी असीम आकाश तक पहुंचेगा। हर भारतीय, चाहे वह चीन में है या अफ्रीका और पूर्वी एशिया में, ह्यूस्टन की सभा से प्रभावित और रोमांचित है। और ऐसा ही उनकी मेजबान देश पर असर होगा। विदेश स्थित भारतीयों का कद अपने अपने देश में बढ़ने का सीधा असर न केवल उनकी अपनी आर्थिक स्थिति में नए अवसरों की उपस्थिति में होगा बल्कि भारत के सामरिक संबंधों पर भी उस सबका सकारात्मक परिणाम होगा।

जैसे प्रथमतया, चीन के साथ हमारे सम्बन्ध

यह बात अचानक महसूस नहीं होती कि भारत अमेरिका दोस्ती का ह्यूस्टन अध्याय उस समय रचा जा रहा है जब सिर्फ पंद्रह दिन बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। उनकी यात्रा से ठीक पहले भारत और अमेरिका के मध्य अभूतपूर्व मित्रता का यह अध्याय सामरिक महत्त्व से भी बढ़ कर है। चीन ने न केवल कश्मीर के मामले में अनावश्यक रूप से प्रकटतया पकिस्तान का साथ दिया बल्कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में भी ले गया जहाँ चीन के अलावा सब देशों ने भारत का साथ दिया और चीन के अर्थहीन प्रस्ताव को वीटो कर दिया। चीन के अखबार भी भारत के विरुद्ध लिखते आ रहे हैं। यह सब बातें और मसूद अज़हर के मामले में पहले आनाकानी तथा बड़ी देर के बाद उसको आतंकवादी घोषित करने की एक औपचारिक घोषणा के लिए समर्थन भी सबको याद है। इस परिदृश्य में ह्यूस्टन की सभा वास्तव में विश्वव्यापी भारतीय प्रभाव के विस्तार तथा चीन की परेशानियों के बढ़ते जाने का ही पैमाना है।

चीन के साथ न केवल हमारे सीमा सम्बन्धी विवाद हैं बल्कि आयात निर्यात में भी अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनमें भारत को गहरी आर्थिक क्षति होती है। चीन के साथ भारत का साठ अरब डालर से ज्यादा व्यापार असंतुलन है अर्थात् भारत के साथ लगभग अस्सी अरब डालर के वार्षिक आयात निर्यात में साठ अरब डालर का सामान हम चीन से ले रहे हैं और केवल बीस अरब डॉलर का भारतीय सामान वहां जा रहा है। 

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इस असंतुलन और कूटनीतिक तौर पर प्रच्छन्न पाकिस्तान समर्थन, हमें चीन के प्रति आशंकित रखता है। ऐसी कूटनीतिक प्रस्थिति में ह्यूस्टन की सभा केवल मोदी मोदी के नारों और भारतीय समुदाय की प्रसन्नता का ही इजहार नहीं बल्कि भारत की वैश्विक सामरिक मजबूती के बढ़ने जाने का भी परिचायक है। चीन सामरिक चुनौती के रूप में जब सामने हो तो ह्यूस्टन का महत्त्व और बढ़ जाता है। 

एक नरेंद्र वे थे जो सौ साल से भी पहले १८९३ में शिकागो गए थे और जिन्होंने अमेरिका में दिए अपने सम्बोधन के माध्यम से विश्व में भारत के धर्म और अध्यात्म का डंका बजाया था जिसकी अनुगूंज अभी तक सुनायी देती है।

एक नरेंद्र यह हैं जो ह्यूस्टन में भारत की शक्ति और सामर्थ्य के साथ भारत के सवा अरब लोगों के नए सपनों और नए हिन्दुस्थान की गूँज से विश्व को अचंभित कर पाये। नियति के संकेत समझने में देर भले ही हो परन्तु भूल नहीं होनी चाहिए।

-तरुण विजय