Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन?

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हम आपको बता दें कि भारत-रूस व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि भारतीय निर्यात केवल 4.88 अरब डॉलर रहा। यानी व्यापार तेजी से बढ़ा है, मगर संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है।

भारत की कूटनीति इस समय तीन अलग-अलग राजधानियों में एक साथ अपनी बिसात बिछा रही है। मॉस्को में रूस के साथ ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को नई गति देने की कोशिश; बीजिंग में चीन के साथ सबसे संवेदनशील सीमा विवाद को संभालते हुए रिश्तों को स्थिर करने की कवायद और टोक्यो में जापानी पूंजी, तकनीक और विनिर्माण को भारत की विकास गाथा से जोड़ने का अभियान। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की ये यात्राएं बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बहुस्तरीय रणनीति की तीन परस्पर जुड़ी हुई चालें हैं।

जयशंकर का रूस दौरा

सबसे पहले मॉस्को यात्रा की बात करें तो आपको बता दें कि जयशंकर की दो दिवसीय रूस यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत पर अमेरिकी टैरिफ और रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर दबाव बढ़ा हुआ है। मॉस्को में वह रूस के प्रथम उपप्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव के साथ भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग यानि IRIGC-TEC की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता कर रहे हैं और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।

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हम आपको बता दें कि भारत-रूस व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि भारतीय निर्यात केवल 4.88 अरब डॉलर रहा। यानी व्यापार तेजी से बढ़ा है, मगर संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। इसलिए नई दिल्ली अब केवल रूसी तेल खरीदने वाले साझेदार की भूमिका से आगे बढ़कर बाजार पहुंच, निवेश, भुगतान व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी के सवालों को केंद्र में ला रही है।

भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, नॉर्दर्न सी रूट और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर जैसे विकल्पों का महत्व बढ़ जाता है। यह रणनीति दर्शाती है कि भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद भारत अपने पुराने, परखे हुए रणनीतिक साझेदार के साथ ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और संपर्क के विकल्प खुले रखना चाहता है। यह यात्रा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगले महीने संभावित भारत यात्रा से पहले भी हो रही है, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।

अजित डोभाल का चीन दौरा

उधर, मॉस्को में भारत साझेदारी को मजबूत कर रहा है, तो बीजिंग में उसकी प्राथमिकता सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों को सुलझाने में लगी हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल 25वें भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि संवाद के लिए चीन के दौरे पर हैं, जहां उनकी मुलाकात चीन के विदेश मंत्री वांग यी से होनी है। हम आपको याद दिला दें कि साल 2003 में शुरू किया गया यह तंत्र लगभग 3,488 किलोमीटर लंबे सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान के लिए बनाया गया था। 25 दौर की बातचीत के बावजूद अंतिम समाधान दूर है, लेकिन दोनों देश इसे तनाव नियंत्रित करने और संवाद बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। खासकर 2020 के बाद सीमा पर पैदा हुई गंभीर स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत-चीन संबंधों का भविष्य केवल व्यापार या राजनीतिक संपर्क से तय नहीं होगा।

जयशंकर का संदेश भी इसी रणनीतिक सोच को रेखांकित करता है। यानि सीमा पर शांति और स्थिरता, अच्छे संबंधों की पूर्व शर्त है। देखा जाये तो डोभाल की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों पक्ष तनाव कम करने और संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कुछ कदम उठा रहे हैं, लेकिन सीमा का प्रश्न अब भी निर्णायक है। बातचीत का उद्देश्य केवल विवाद को प्रबंधित करना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जगह को तैयार करना भी है जिसमें भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आगे संवाद संभव हो सके। साथ ही डोभाल की यात्रा भी ऐसे समय हो रही है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अगले महीने भारत का दौरा लगभग तय माना जा रहा है।

पीयूष गोयल का जापान दौरा

इसके अलावा, तीसरा मोर्चा टोक्यो में खुलता है, जहां पीयूष गोयल 200 सदस्यीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ जापान पहुंचे हैं। यह प्रतिनिधिमंडल टोक्यो, नागोया और ओसाका में सरकारों और उद्योग जगत के साथ बैठकों के जरिए निवेश, व्यापार और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश करेगा। हम आपको बता दें कि भारत की नजर केवल अधिक जापानी निवेश पर नहीं है। लक्ष्य कहीं बड़ा है। लक्ष्य यह है कि जापानी कंपनियां भारत में केवल बेचें नहीं, बल्कि निर्माण करें, डिजाइन करें, नई तकनीक विकसित करें और भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में इस्तेमाल करें। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और नई प्रौद्योगिकियां इस अभियान के प्रमुख क्षेत्र हैं।

हम आपको बता दें कि जापान ने भारत में एक दशक के दौरान 10 ट्रिलियन येन निवेश का लक्ष्य रखा है। भारत अब चाहता है कि इस दशक के अंत तक देश में सक्रिय जापानी कंपनियों की संख्या दोगुनी हो। नागोया की औद्योगिक और ऑटोमोबाइल क्षमता, टोक्यो की वित्तीय एवं तकनीकी ताकत और ओसाका के नवाचार तंत्र के साथ भारत अपने विनिर्माण भविष्य की नई साझेदारी तलाश रहा है।

मॉस्को, बीजिंग और टोक्यो की इन तीन यात्राओं को एक साथ देखें तो भारत की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। रूस से ऊर्जा और रणनीतिक स्वायत्तता; चीन से सीमा तनाव को नियंत्रित करते हुए सुरक्षा संतुलन; और जापान से पूंजी, तकनीक तथा वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी है। यानि किसी एक धुरी का हिस्सा बने बिना सभी महत्वपूर्ण धुरियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध चलाना। दुनिया जब व्यापार युद्धों, टैरिफ, युद्धों, सप्लाई चेन संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है, तब भारत तीन अलग-अलग राजधानियों में तीन अलग भाषाओं में, लेकिन एक ही संदेश के साथ बात कर रहा है। भारत स्पष्ट कर रहा है कि वह साझेदारी करेगा, दबाव में नहीं झुकेगा; संवाद करेगा, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा; और निवेश चाहेगा, लेकिन केवल बाजार बनने के लिए नहीं बल्कि वैश्विक विनिर्माण और तकनीकी शक्ति बनने के लिए।

बहरहाल, मॉस्को से बीजिंग और टोक्यो तक फैली यह कूटनीतिक त्रिकोणीय चाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका लक्ष्य केवल आज के संकटों को संभालना नहीं, बल्कि 2030 के भारत की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी स्थिति तय करना है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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