London में Dhruv Rathee और Washington में 6 अमेरिकी सांसदों ने थामी भारत विरोधी अभियान की कमान

Dhruv Rathee
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सवाल उठता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है?

भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने और दुनिया भर में भारत को कटघरे में खड़ा करने का खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलाइब, एलेनॉर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि वे भारत दौरे पर छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और कथित हिरासतों का मुद्दा उठाएं। यहां सवाल उठता है कि भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकले इन सांसदों को आखिर किसने हक दिया कि वे हमारे देश के आंतरिक मामलों में दखल दें? भारत की समस्याओं पर इतनी चिंता दिखाने वाले इन नेताओं से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी यह चिंता चुनिंदा मुद्दों पर ही क्यों जागती है और भारत के मामले में वे हर बार उंगली उठाने के लिए सबसे आगे क्यों खड़े नजर आते हैं? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र पर उंगली उठाने वाले इन जनप्रतिनिधियों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय आचरण की पड़ताल कौन करेगा?

वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इन अमेरिकी नेताओं ने भारत की नीतियों पर सवाल उठाए हों। प्रमिला जयपाल ने 2019 में भी जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंधों और हिरासतों को लेकर भारत से जवाब मांगा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उस समय उनके आकलन को अनुचित बताते हुए उनसे मुलाकात करने तक में रुचि नहीं दिखाई थी। अप्रैल 2022 में इल्हान उमर के पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के दौरे पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मामला बताया था। इल्हान उमर का तो अक्सर भारत विरोधी रवैया सामने आता ही रहता है।

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सवाल उठता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है?

अब बात ध्रुव राठी की। जर्मनी में रहने वाले इस यूट्यूबर ने लंदन पहुंचकर पार्लियामेंट चौक में महात्मा गांधी की प्रतिमा के निकट 18 अक्टूबर को प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। उन्होंने भारत में कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है और विदेशों में लोगों से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया है। यहां सवाल उठता है कि अगर ध्रुव राठी के पास वोट चोरी के सबूत थे तो वह उन्होंने अपने भारत दौरे के दौरान पुलिस या कोर्ट को क्यों नहीं दिये? क्यों वह वापस विदेश भाग गये? हर बात पर विदेशों में ढिंढोरा पीटना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चुनावी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश करना आखिर किस बात का संकेत है? चुनावी प्रक्रिया से शिकायत होना अलग बात है, लेकिन अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए पूरी चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाना और दुनिया भर में भारत के लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगाने की कोशिश करना अलग बात है। देखा जाये तो आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सबूतों के दम पर साबित करना ही असली कसौटी है!

सवाल यह भी है कि ध्रुव राठी आखिर विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ इतना बड़ा अभियान किसके दम पर चला रहे हैं? लंदन में प्रदर्शन, विदेशी मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश और देश की राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम, क्या यह सब महज संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? विदेशी फंडिंग के आरोपों को झुठलाने वाले ध्रुव राठी को बताना चाहिए कि इस पूरे अभियान का पैसा कहां से आ रहा है, इसे कौन चला रहा है और इसके पीछे किसके हित जुड़े हैं? आखिर कौन है जो भारत की छवि को विदेशों में नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे अभियानों को ताकत दे रहा है?

साथ ही लंदन में भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में भारतीयों का मैदान में उतरना उन लोगों के लिए करारा जवाब है, जो विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि विदेशों में रहने वाले भारतीय कोई उनके इशारे पर चलने वाली भीड़ नहीं हैं। इस देश से प्यार करने वाले लाखों भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में हों, तिरंगा उठाना और अपनी सरकार के समर्थन में आवाज बुलंद करना जानते हैं। भारत के खिलाफ नारे लगाने वाले ही लोकतंत्र के ठेकेदार नहीं हैं; भारत के समर्थन में खड़े होने वालों को भी अपनी बात कहने का पूरा हक है। करोड़ों भारतीयों के वोट से बनी सरकार का फैसला विदेशों में बैठे कुछ लोगों के शोर-शराबे से नहीं बदला जा सकता। भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह फैसला भारत की जनता करेगी, कोई विदेशी ताकत नहीं!

इसके अलावा, यह भी बड़ी हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को भारत के मामलों में दखल देने की इतनी जल्दी रहती है कि वे किसी भी आरोप पर चिंता जताने से पहले पूरी सच्चाई जानने की जहमत तक नहीं उठातीं! 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान हिरासतों की खबरों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने चिंता जताई, तो भारत ने भी साफ-साफ जवाब दे दिया कि देश के आंतरिक मामलों में इस तरह की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भी भारत ने इन टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए अपने संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस का हवाला दिया। सवाल यह है कि मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली इन वैश्विक संस्थाओं को दुनिया के हर मामले में एक जैसी तत्परता क्यों नहीं दिखती? भारत के मामले में बिना पूरी तस्वीर समझे बयान देने की जल्दी और दूसरे मामलों में चुप्पी...आखिर यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा? जब संस्थाएं चुनिंदा मुद्दों पर ही जागेंगी और अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग तराजू रखेंगी, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे ही। यही रवैया उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है और दुनिया भर में लोगों के मन में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ये संस्थाएं सचमुच मानवाधिकारों की रक्षा कर रही हैं या चुनिंदा राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती जा रही हैं?

उधर, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं पर बिना पूरी जानकारी के उंगली उठाने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। भारत कोई ऐसा देश नहीं है कि कोई भी विदेशी संस्था या नेता उठे और बिना सोचे-समझे हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगे! भारत के अपने कानून हैं, अपनी अदालतें हैं और अपना संवैधानिक ढांचा है। लिहाजा, भारत पर सवाल उठाने वालों को पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए, फिर बयानबाजी करनी चाहिए। भारत को बदनाम करने की कोशिश करने वालों को यह समझना होगा कि हर आरोप पर जवाब मिलेगा और तथ्यों के दम पर मिलेगा।

बहरहाल, जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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