FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए

केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ।
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा।
हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए।
इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार
हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक "नामित प्राधिकरण" की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है।
वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा।
हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा।
उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है।
देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है।
-नीरज कुमार दुबे
अन्य न्यूज़













