संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल

इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सत्ता को तहस-नहस करने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने एक बहाना बनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से इराक भेजे गए वैज्ञानिकों और पर्यवेक्षकों ने कथित रूप से रिपोर्ट दी कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार हैं।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अपदस्थ करके हथकड़ियों में उनके देश से उठाकर न्यूयॉर्क में लाने की घटना को लेकर भारत की संतुलित प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। अमेरिका से व्यापारिक रिश्तों को लेकर जारी बातचीत के बीच अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना राष्ट्रीय कूटनीतिक लिहाज से सही नहीं कही जाएगी। वैसे भी ट्रंप जैसे राष्ट्राध्यक्ष के दौर में तो कड़ी प्रतिक्रिया अपने राष्ट्रीय हितों को संकट में डालने जैसा ही माना जाएगा। लेकिन जिस तरह भारत के लोगों ने इस कार्रवाई के विरोध में प्रतिक्रिया जताई है, उसे भी भारतीय लोक की स्वाभाविक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना जाना चाहिए। भारतीय लोक स्वभाव से ही लोकतांत्रिक है और उसे लोकतांत्रिक सत्ताओं का सैनिक कार्रवाई के जरिए उखाड़ना पसंद नहीं रहा है। भारतीय लोक का मानस कमजोर के पक्ष में खड़े होने का रहा है। इसलिए अधिसंख्य भारतीय प्रतिक्रियाएं निकोलस मादुरो के पक्ष और अमेरिका के विरोध में है।
अमेरिकी कार्रवाई ने दो तरह प्रस्थापनाएं की हैं। पहली यह कि ताकतवर के लिए कुछ भी करना संभव है। वह उसे नियमों और कानूनों की परिभाषा में बांध सकता है। दुनिया लाख चिल्लाती रहे कि किसी राष्ट्राध्यक्ष की सत्ता को उखाड़ फेंकना और उसे गिरफ्तार करके अपने कानूनों के दायरे में लाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, लेकिन इसका अमेरिका की सेहत पर फिलहाल कोई असर नहीं पड़ने जा रहा। अमेरिका ने एक तरह से इतिहास को ही दोहराया है। अमेरिका अपने हितों के खिलाफ जिस देश को सिर उठाते देखता है, उसके खिलाफ उसे सैनिक, कूटनीतिक और आर्थिक कार्रवाई करने में देर नहीं लगती। इस मौके पर जार्ज बुश सीनियर के दौर को याद किया जाना चाहिए। कुवैत में इराकी सेना की कार्रवाई के खिलाफ उन्होंने खाड़ी युद्ध छेड़ दिया था। बेशक इस युद्ध की आग में झुलसने के चलते वे सत्ता में दोबारा वापसी नहीं कर पाए। लेकिन उनके अधूरे कार्य को उनके बेटे जार्ज बुश जूनियर ने पूरा किया। बेशक इसके लिए मुस्लिम चरमपंथियों और ओसामा बिन लादेन के कुख्यात संगठन अलकायदा ने मौका मुहैया कराया।
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इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सत्ता को तहस-नहस करने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने एक बहाना बनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से इराक भेजे गए वैज्ञानिकों और पर्यवेक्षकों ने कथित रूप से रिपोर्ट दी कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार हैं। अमेरिका की नजर में सद्दाम तानाशाह थे,इस लिहाज से ये हथियार मानवता के लिए घातक हो सकते थे।फिर क्या था,संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव की आड़ में अमेरिका और ब्रिटेन ने इराकी शासन के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। अमेरिका की अगुआई वाली सेनाओं के हमले में इराक तहस-नहस हो गया। सद्दाम गिरफ्तार कर लिए गए, उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया और उन्हें व्यापक नरसंहार का दोषी ठहराते हुए फांसी पर लटका दिया गया। बाद के दिनों में बीबीसी ने रिपोर्ट दी कि जिन घातक रासायनिक हथियारों को खत्म करने के नाम पर इराक पर मित्र देशों की सेनाओं ने हमला किया, असलियत में ऐसे हथियार तो इराक के पास थे ही नहीं। बीबीसी को यह खबर लीक करने का शक हथियार जांचने पहुंचे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की टीम के सदस्य रहे ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम केली पर किया गया। बीबीसी के कई अधिकारियों और पत्रकारों को इस खबर के लिए अपनी नौकरी गवांनी पड़ी। एक सुबह टहलने गए विलियम केली भी रास्ते में मृत पाए गए। इराक में अमेरिकी तर्ज का लोकतंत्र स्थापित तो हो गया है,लेकिन क्या वहां शांति आ पाई है? कुछ ऐसा ही यक्ष प्रश्न वेनेजुएला को लेकर उभरने वाला है। सवाल यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप की कार्रवाई के बाद वेनेजुएला में जो सत्ता स्थापित हुई है, क्या वह सही मायने में लोकतंत्र स्थापित करके वहां नशा के कारोबार को रोक पाएगी। नशे के कारोबार की बात इसलिए की जा रही है, क्योंकि ट्रंप ने मादुरो पर बड़ा आरोप लगाया है कि वे नशे के कारोबार को बढ़ावा दे रहे थे, जिससे अमेरिकी हितों को चोट पहुंच रही थी। हालांकि उनके इस आरोप को अमेरिका की ही उपराष्ट्रपति रहीं कमला हैरिस ने नकारा है। उनका कहना है कि ट्रंप की कार्रवाई की मूल वजह के पीछे तेल का खेल है।
वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है। अनुमान है कि यह भंडार करीब 303 अरब बैरल है। लेकिन कच्चे तेल के उत्पादन में वह बहुत पीछे है। वैश्विक स्तर पर तेल उत्पादकों की जो सूची है, उसमें वेनेजुएला 21वें स्थान पर है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उत्पादन के लिए वेनेजुएला के पास बुनियादी ढांचे की बेहद कमी है। इसके साथ ही मादुरो की सत्ता के चलते यहां लगातार अमेरिकी प्रतिबंध लगे हैं। इसकी वजह से वह उत्पादन नहीं कर पा रहा है। अमेरिकी प्रतिबंध के पहले तक भारत वेनेजुएला का दूसरे नंबर का तेल आयातक था। भारत की अमेरिकी कार्रवाई को लेकर संतुलित प्रतिक्रिया की एक बड़ी वजह भारतीय तेल कंपनियों का फंसा यहां पैसा है। कच्चे तेल के उत्पादन के लिए भारतीय तेल कंपनियों ने यहां निवेश कर रखा है। भारत के करीब नौ हजार करोड़ रूपए यहां फंसे हैं। उम्मीद की जा रही है कि बदली परिस्थितियों में भारत को यह रकम मिल सकती है या फिर तेल का आयात बढ़ सकता है। बहरहाल अमेरिका में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसका मानना है कि मादुरो की गिरफ्तारी के पीछे ट्रंप की कोशिश अपने परिवार के नियंत्रण वाली तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाना है।
अमेरिकी कार्रवाई ने एक सवाल यह भी उठाया है कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ की अब भी जरूरत है। इस कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता एक बार फिर सवालों के घेरे में है। संयुक्त राष्ट्रसंघ को ट्रंप के अमेरिका ने एक बार फिर अंगूठा दिखाया है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके महासचिव की एक मात्र भूमिका बयान देने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने की रस्म तक सिमटी नजर आ रही है। अब दुनिया को सोचना होगा कि क्या ताकतवर ही दुनिया को चलाएंगे। क्या दुनिया में कमजोर राष्ट्रों, उनकी संप्रभुता और उनकी स्वतंत्रता का महत्व नहीं रहेगा। दिलचस्प यह है कि अमेरिका खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरूआ मानता है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने लोकतंत्र की वह दुहाई देता रहता है। बेशक अंदरूनी स्तर पर उसके यहां लोकतंत्र मजबूत हो, लेकिन उसका मजबूत लोकतंत्र दुनिया में तानाशाही का माध्यम भी है, इसे भी दुनिया को देखना और समझना होगा।
अमेरिकी कार्रवाई ने एक बार परमाणु अस्त्रों की प्रासंगिकता को भी साबित किया है। सवाल यह है कि यदि वेनेजुएला भी छोटा ही सही,परमाणु ताकत होता तो क्या अमेरिकी सेना वहां ऐसी कार्रवाई कर पाती? निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। परमाणु निरस्त्रीकरण के समर्थकों को इस विषय में सोचना होगा। अमेरिकी कार्रवाई से स्पष्ट है कि आज परमाणु हथियार संबंधित राष्ट्र की शांति और सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। यूक्रेन इसका उदाहरण है। अगर उसके पास भी परमाणु ताकत होती तो रूस शायद ही उसके खिलाफ कार्रवाई करने की हिमाकत दिखा पाता?
अमेरिकी कार्रवाई के बाद दुनिया का एक वर्ग मानने लगा है कि ट्रंप के अगले निशाने पर उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग हैं। लेकिन यह सोचने वालों को नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियार से संपन्न है। उस पर हाथ डालने से अमेरिकी हाथ जलने का अंदेशा ज्यादा है। वैसे भी अमेरिका ने जहां भी कार्रवाई की है, इतिहास गवाह है कि ज्यादातर जगहों पर उसे देर से ही सही, मुंह की खानी पड़ी है। अफगानिस्तान, वियतनाम आदि इसके उदाहरण हैं।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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