सौ वर्षों से राष्ट्रसेवा में लीन RSS का पंजीकरण प्रमाणपत्र मांग रहे कांग्रेस नेताओं से कुछ सवाल

असल में कांग्रेस की समस्या संघ के पंजीकरण से नहीं, संघ के प्रभाव से है। जिस संगठन ने बिना सरकारी धन, बिना विदेशी सहायता और बिना सत्ता के सहारे सौ वर्षों तक राष्ट्रजीवन को दिशा दी हो, उससे कांग्रेस की बेचैनी स्वाभाविक है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगियों ने एक बार फिर वही पुराना शोर उठाया है कि संघ पंजीकृत क्यों नहीं है? कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे का पत्र और उसके बाद खड़ा किया गया राजनीतिक कोलाहल इस बात का प्रमाण है कि संघ विरोधियों के पास न तथ्य बचे हैं, न तर्क। वह केवल विवाद पैदा करना चाहते हैं, क्योंकि जिस संगठन को जनता का भरोसा और समाज का समर्थन हासिल हो, उसे बदनाम करने का सबसे आसान तरीका संदेह फैलाना होता है।
लेकिन इस बार संघ ने भी स्पष्ट और सीधा उत्तर दिया है। मोहन भागवत ने साफ कहा, “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।” यह उस पूरी मानसिकता पर प्रहार है जो मानती है कि भारत की हर सांस्कृतिक चेतना को सरकारी मुहर से ही वैधता मिलेगी। भागवत ने कहा कि संघ 1925 में स्थापित हुआ था। क्या तब अंग्रेजों से जाकर पंजीकरण कराया जाता? साथ ही स्वतंत्रता के बाद भी भारत के संविधान ने कभी यह अनिवार्य नहीं किया कि हर स्वैच्छिक संगठन सरकारी रजिस्टर में दर्ज हो तभी वह अस्तित्व में रह सकता है।
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असल में कांग्रेस की समस्या संघ के पंजीकरण से नहीं, संघ के प्रभाव से है। जिस संगठन ने बिना सरकारी धन, बिना विदेशी सहायता और बिना सत्ता के सहारे सौ वर्षों तक राष्ट्रजीवन को दिशा दी हो, उससे कांग्रेस की बेचैनी स्वाभाविक है। संघ ने चरित्र निर्माण किया, अनुशासन दिया, समाज को जोड़ा, सेवा का संस्कार दिया और राष्ट्रवाद को जीवन का व्यवहार बनाया। दूसरी ओर कांग्रेस का एक हिस्सा वर्षों तक विदेशी शक्तियों के सामने वैचारिक समर्पण करता रहा। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौते करने वाली राजनीति आज संघ से राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांग रही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है। यह नागरिकों का मौलिक अधिकार है। संविधान कहीं नहीं कहता कि हर सामाजिक संगठन को पहले सरकार के सामने सिर झुकाकर अनुमति लेनी होगी। सोसाइटी कानून, न्यास कानून और अन्य व्यवस्थाएं केवल कानूनी सुविधाओं के लिए हैं, अस्तित्व के लिए नहीं।
संघ के पंजीकरण प्रमाणपत्र को देखने की चाह रखने वाले प्रियांक खरगे, पवन खेड़ा और कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में मंत्री होना कानून से ऊपर होना नहीं होता। किसी मंत्री की व्यक्तिगत इच्छा कानून नहीं बन जाती। यदि कानून में अनिवार्यता नहीं है, तो केवल राजनीतिक नफरत के कारण किसी संगठन को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। यही विधि का शासन है, यही संविधान की आत्मा है।
संघ को समझने के लिए उसकी मूल प्रकृति को समझना आवश्यक है। संघ कोई पारंपरिक कार्यालयी संस्था नहीं, बल्कि समाज आधारित आंदोलन है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने इसे सदस्यता कार्ड, शुल्क और कागजी ढांचे की बजाय शाखा, संस्कार और स्वयंसेवा के आधार पर खड़ा किया। आज भी कोई व्यक्ति शाखा में जाकर स्वयंसेवक बन सकता है। यही कारण है कि संघ समाज के बीच रहता है, किसी फाइल में बंद नहीं रहता। संघ अपने आरम्भकाल से ही सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ता रहा है। संघ में औपचारिक सदस्यता और कठोर संस्थागत नियंत्रण नहीं होता। शाखाएं अपने संसाधनों से चलती हैं और संगठन का संचालन सामाजिक सहभागिता से होता है।
इतिहास यह भी बताता है कि संघ को बार-बार राजनीतिक दमन का सामना करना पड़ा। महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध लगाया गया, आपातकाल में हजारों स्वयंसेवक जेल भेजे गए, बाबरी प्रकरण के बाद भी हमला हुआ। लेकिन हर बार संघ और अधिक मजबूत होकर निकला। इसका कारण यह था कि संघ की जड़ें सत्ता में नहीं, समाज में हैं। मोहन भागवत ने भी याद दिलाया कि सरकारें संघ पर प्रतिबंध लगाती रहीं, इसका अर्थ ही यह है कि सरकारें संघ के अस्तित्व और प्रभाव को मानती रही हैं।
देखा जाये तो संघ विरोधी बार बार पारदर्शिता और कराधान का मुद्दा उठाते हैं। लेकिन वह जानबूझकर न्यायालयों के निर्णयों को नजरअंदाज करते हैं। “गुरु दक्षिणा” को लेकर न्यायालयों ने पारस्परिकता के सिद्धांत को स्वीकार किया था। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट माना कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान करयोग्य आय नहीं माना जा सकता। संघ ने कभी कानून से छूट नहीं मांगी। उसने केवल वही स्वीकार किया जो कानून कहता है। कानून जहां लागू होता है, वहां संघ के सहयोगी संगठन विधिवत पंजीकृत हैं, लेखा परीक्षण कराते हैं और अपने प्रतिवेदन भी प्रकाशित करते हैं।

यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का पाखंड खुलकर सामने आता है। दशकों तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज संघ से पारदर्शिता मांग रही है, जबकि स्वयं उसके इतिहास पर आपातकाल, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और विदेशी प्रभाव के आरोप लगे हुए हैं। जो दल लोकतंत्र को कुचलने के लिए आपातकाल थोप सकता है, वह आज लोकतांत्रिक मूल्यों का उपदेश दे रहा है। यह राजनीतिक हास्य से अधिक कुछ नहीं।
मोहन भागवत ने बिल्कुल सही कहा कि संघ खुलकर काम करता है, किसी गुप्त संगठन की तरह नहीं। लाखों शाखाएं, हजारों सेवा प्रकल्प, शिक्षा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता, वनवासी कल्याण, गौ सेवा, पर्यावरण संरक्षण, संघ का हर कार्य समाज के सामने है। यदि संघ में कुछ छिपा होता तो वह सौ वर्षों तक सार्वजनिक जीवन में इतने व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता।
दरअसल संघ की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसने राष्ट्रवाद को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा। जब भी देश पर संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहले खड़े दिखाई दिए। विभाजन के समय राहत कार्य हो, प्राकृतिक आपदाएं हों, महामारी का दौर हो या सीमा पर सैनिकों के परिवारों की सहायता, संघ के कार्यकर्ता हर जगह सक्रिय रहे। यही कारण है कि भारत का सामान्य नागरिक संघ को कागजी संस्था नहीं, राष्ट्रीय चेतना का प्रहरी मानता है।
संघ को लेकर सबसे अधिक भ्रम उन लोगों में है जो भारत को केवल सत्ता और चुनाव की नजर से देखते हैं। संघ सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए काम करता है। यही कारण है कि वह राजनीतिक उतार चढ़ाव से अप्रभावित रहता है। मोहन भागवत ने हाल में कहा था कि संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला संगठन भी है। यह कथन बिल्कुल सही है। जिन लोगों ने कभी शाखा देखी ही नहीं, वह संघ पर सबसे अधिक आरोप लगाते हैं।
देखा जाये तो आज आवश्यकता इस बात की है कि संघ को राजनीतिक चश्मे से नहीं, उसके कार्यों से देखा जाए। यदि कोई संगठन बिना सरकारी सहायता के, बिना विदेशी धन के और बिना सत्ता के दबाव के सौ वर्षों तक राष्ट्रसेवा करता है, तो उसकी वैधता किसी सरकारी रजिस्टर से नहीं, जनता के विश्वास से तय होती है।
कांग्रेस और संघ विरोधियों को यह समझ लेना चाहिए कि संघ को डराकर, बदनाम करके या कानूनी भ्रम फैलाकर कमजोर नहीं किया जा सकता। संघ की शक्ति कागजों से नहीं, करोड़ों स्वयंसेवकों के समर्पण से आती है। उसका अस्तित्व किसी मंत्री की कृपा पर नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर आधारित है। जो सौ वर्षों से राष्ट्र को सब कुछ दे रहा हो, उसे अपना परिचय देने की जरूरत नहीं पड़ती। राष्ट्र स्वयं उसका परिचय बन जाता है।
साथ ही संघ को किसी वंशवादी राजनीति से चरित्र प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। जिस संगठन ने सौ वर्षों तक बिना सत्ता, बिना सरकारी संरक्षण और बिना विदेशी सहारे के राष्ट्रजीवन को दिशा दी हो, उसकी पहचान किसी सरकारी मुहर से नहीं होती। संघ का परिचय उसके करोड़ों स्वयंसेवकों की तपस्या है, उसकी शाखाओं का अनुशासन है, उसकी सेवा का विस्तार है और भारत माता के प्रति उसका अखंड समर्पण है। राजनीतिक दल सत्ता से बनते और मिट जाते हैं, लेकिन संघ जैसी राष्ट्रशक्ति पीढ़ियों तक समाज की चेतना में जीवित रहती है। संघ को मिटाने के सपने देखने वाले आते जाते रहे, लेकिन संघ आज भी उतना ही दृढ़, उतना ही प्रभावशाली और उतना ही राष्ट्रनिष्ठ खड़ा है, क्योंकि उसका आधार सत्ता नहीं, भारत की सनातन आत्मा है।
बहरहाल, जिस संगठन के स्वयंसेवक प्रतिदिन यही मंत्र जपते हों, “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें ना रहें”, उससे अपना पंजीकरण कराने को कहना कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक हताशा ही नहीं, बल्कि उनकी बेवकूफी भी प्रदर्शित करता है।
-नीरज कुमार दुबे
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