देश की प्रगति पर ब्रेक लगा रहा है ट्रैफिक जाम

Traffic jams
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दिल्ली में यातायात जाम से संबंधित आर्थिक नुकसान 2030 तक 14.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। अकेले यातायात जाम के कारण ईंधन की बर्बादी से प्रतिदिन लाखों डॉलर का नुकसान हो सकता है, जिससे शहर में पहले से ही गंभीर वायु गुणवत्ता की समस्या और भी बढ़ जाएगी।

देश आधारभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। हर तरफ हाल—बेहाल है। देश के राजनीतिक दल ऐसी सुविधाएं के प्रति गंभीर नहीं हैं। यही वजह है कि इन सुविधाओं की कमी से देश का हर साल अरबों रुपयों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। राजनीतिक दल और सरकारें ऐसी सुविधाओं की कमी के लिए एक—दूसरे को कोस कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स 2025 के अनुसार बेंगलुरु दुनिया में दूसरा सबसे ज़्यादा जाम वाला शहर है। रैंकिंग में सिर्फ मैक्सिको सिटी ऐसा शहर है, जहां ट्रैफिक की स्पीड बेंगलुरु से कम है। पांचवें स्थान पर महाराष्ट्र का पुणे शहर है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बेंगलुरु के जाम के कारण लोगों को एक साल में 168 घंटे गंवाने पड़े। यह समय 7 दिन और 40 मिनट के बराबर है। 

बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीएजी) के सर्वे के अनुसार, सुबह 7 से 9 और शाम को 6 से 8 को पीक समय माना गया है। इस दौरान आने-जाने में औसत से डेढ़ गुना अधिक समय लगता है। इस सर्वे में कोलकाता की स्थिति सबसे खराब थी। बेंगलुरु दूसरे पायदान पर रहा। सबसे ज्यादा वाहनों की संख्या के बावजूद बेहतर सड़कों के चलते दिल्ली की स्थिति बेहतर रही। रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली में निजी वाहन से चलने वालों की संख्या सबसे अधिक 45 फीसदी रही, जबकि बेंगलुरु में यह आंकड़ा 38 फीसदी रहा। सार्वजनिक वाहनों के प्रयोग के मामले में मुंबई ने बाजी मारी, जिसके बाद कोलकाता का नंबर रहा। इस मामले में बेगलुरू सबसे निचले पायदान पर रहा जहां ट्रैफिक जाम आम हो गया है। 

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भारत के प्रमुख चार शहरों- दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में ट्रैफिक जाम के चलते हर साल 1.47 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। एक हालिया स्टडी में खुलासा हुआ है कि ट्रैफिक जाम के कारण बेंगलुरु को लगभग हर साल 20,000 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान होता है। भारत की सिलिकॉन वैली का सपना देखने वाले इस शहर में हर साल हजारों लोग आते हैं। पिछले 15 सालों में शहर की आबादी तेजी से बढ़ी है। अब यहां करीब 1.5 करोड़ लोग रहते हैं। सड़कों पर एक करोड़ से अधिक गाड़ियां हैं। गाड़ियों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने एक बयान में कहा था कि साल 2027 तक शहर में वाहनों की संख्या यहां की आबादी से ज्यादा होगी। 

दिल्ली में यातायात जाम से संबंधित आर्थिक नुकसान 2030 तक 14.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। अकेले यातायात जाम के कारण ईंधन की बर्बादी से प्रतिदिन लाखों डॉलर का नुकसान हो सकता है, जिससे शहर में पहले से ही गंभीर वायु गुणवत्ता की समस्या और भी बढ़ जाएगी। र‍िपोर्ट में पता चला कि कर्मचारियों ने काफी समय ट्रैफिक में फंसकर बिताया, जिससे उत्पादकता में काफी नुकसान हुआ। स्टडी का अनुमान है कि ट्रैफिक संबंधी बाधाओं के कारण अकेले आईटी सेक्टर को लगभग 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्यमों पर ट्रैफिक जाम के प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। ये व्यवसाय डिलीवरी शेड्यूल को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप शिपमेंट में देरी होती है और ग्राहक असंतुष्ट होते हैं। बदले में इसका शहर की अर्थव्यवस्था पर तेजी से प्रभाव पड़ता है, जिससे लगभग 3,500 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

भारत में वर्ष 2000 से मोटर वाहन उपयोग में भारी वृद्धि हुई है और हर 5-6 वर्षों में नए वाहनों की संख्या दोगुनी हो जाती है। हालांकि महामारी के कारण कुछ समय के लिए यह वृद्धि रुक गई, लेकिन मोटर वाहन उपयोग में तेजी से सुधार हुआ और 2023-24 में औसतन प्रतिदिन 58,000 नए वाहन पंजीकृत हुए, जिनमें से 52,000 निजी वाहन थे। दिल्ली में, इसी अवधि में औसतन 6.4 लाख वाहन पंजीकृत हुए और औसतन प्रतिदिन नए वाहन पंजीकृत हुए, जिनमें से लगभग 1,750 नए वाहन थे। यातायात जाम बढ़ने का एक कारण 'कारों की अत्यधिक संख्या' है। 

ट्रैफिक में वाहनों के खड़े रहने से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 3% बर्बाद हो जाता है। महानगर यातायात के कारण जाम से ग्रस्त हो गए हैं, जिसका 10% ईंधन की खपत के कारण बर्बाद होता है। जहां वाहन ट्रैफिक में खड़े होते हैं, वहां प्रदूषण का एक क्षेत्र बन जाता है, जिसमें कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी गैसें होती हैं, जिन्हें मापा जा सकता है। यातायात जाम का प्रदूषण पर सीधा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि रुके हुए वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन सुचारू रूप से चल रहे यातायात की तुलना में 3 से 7 गुना अधिक हो सकता है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड की बड़ी मात्रा उत्सर्जित होती है, जिससे स्थानीय वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा होता है।

साल 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की शहरी जनसंख्या 31.16% थी, जो विश्व बैंक के 2022 के अनुमान के अनुसार शहरी जनसंख्या 2020 तक बढ़कर 35% हो चुकी है। शहरीकरण की यह गति आने वाले वर्षों में और तेज होगी, जिससे महानगरों में वाहनों की संख्या भी बढ़ेगी। दिल्ली में 2023 तक लगभग 1.2-1.3 करोड़ पंजीकृत वाहन थे,

पर्यावरण प्रदूषण भी ट्रैफिक जाम की एक गंभीर परिणति है। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। ट्रैफिक जाम के कारण वाहनों से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि होती है, जिससे वायु गुणवत्ता खराब होती है और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं। 

इस समस्या के समाधान के लिए कई प्रभावी रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं। सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत करना अनिवार्य है। अधिक शहरों में मेट्रो नेटवर्क, इलेक्ट्रिक बसों और साइकिल ट्रैक को बढ़ावा देना चाहिए। भारत में हाई-ऑक्यूपेंसी व्हीकल लेन का प्रावधान किया जा सकता है, जिससे एक से अधिक यात्रियों वाले वाहनों को प्राथमिकता मिले और कार-पूलिंग को प्रोत्साहन मिले। सड़कों के बुनियादी ढांचे में सुधार भी आवश्यक है। फ्लाईओवर, मल्टी-लेवल पार्किंग और स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल जैसी सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए। मुंह बाएं खड़ी ट्रैफिक जाम की समस्या के लिए तत्काल युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वक्त में यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी।

- योगेन्द्र योगी

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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