विचारधारा और सिद्धांतों के प्रति आजीवन अडिग रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया

By प्रभात झा | Publish Date: Oct 8 2018 11:55AM
विचारधारा और सिद्धांतों के प्रति आजीवन अडिग रहीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया
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राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने भारतीय राजनीति में महिला के नाते देश में एक आदर्श कायम किया। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक उनकी यात्रा में उनेक उतार-चढ़ाव आए, पर उन्होंने अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण रहा उसे कभी नहीं छोड़ा।

“राजमाता विजयाराजे सिंधिया“ सरलता, सहजता और संवेदनशीलता की त्रिवेणी थीं। भारतीय राजनीति में उन्होंने मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा की सरकार को जब गिराया था और जनसंघ के विधायकों के समर्थन से स्व. गोविंद नारायण सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था, तभी से लोग राजनैतिक तौर पर राजमाता की ताकत का एहसास करने लगे थे। उन्हें लोग राजमाता के नाम पर अवश्य जानते थे, पर जिस दिन उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की सरकार पलटी थी और गठबंधन की सरकार बनाई थी, उसी समय लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर लेंगी।
 
हुआ भी यही, और राजमाता ने जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की। अटलजी और आडवाणीजी से चर्चा कर भारतीय जनसंघ की राजमाता से लोकमाता की ओर अग्रसर होने लगीं। उनका कुशाभाऊ ठाकरे से बहुत लगाव था। वे उन्हें पुत्रवत मानती थीं। उन्होंने बिना कुशाभाऊ ठाकरे से पूछे कभी कोई राजनैतिक निर्णय नहीं लिया। कुशाभाऊ ठाकरे भी उनका बहुत सम्मान करते थे।
 


राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र स्व. माधवराव सिंधिया और राजमाता के तत्कालीन सहयोगी स्व. महेन्द्र सिंह कालूखेडा, दोनों ही जनसंघ से चुनाव लड़े। राजमाता ने स्व. माधवराव सिंधिया को पहली बार सांसद का चुनाव भारतीय जनसंघ से लड़ाया और वे भारतीय जनसंघ के सांसद बने। इसी तरह महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा भी जनसंघ से ही निर्वाचित हुए, स्व. माधवराव सिंधिया सदैव अपनी माता जी के साथ रहे।
 
धीरे-धीरे राजमाता जनसंघ की नेता के नाते पूरे देश में उनका अखंड दौरा प्रारम्भ हुआ। भारतीय जनसंघ को एक सशक्त महिला नेत्री मिली। राजमाता पूरी तरह अपने चुनाव चिह्न “दीए“ को लेकर गांव-गांव पहुंचने लगीं। भारतीय जनसंघ की वैचारिक पृष्ठभूमि तेजी से तैयार होने लगी। इस बीच देश में स्व. इंदिराजी ने आपातकाल लगा दिया। इस दौरान “राजमाता' को इंदिराजी ने बुलाया और कहा कि आप बीस सूत्रीय का समर्थन करें। इंदिराजी की इस बात पर राजमाता उनके सामने खड़ी हो गईं, उन्होंने इंदिरा जी से साफ तौर कहा कि “मैं'' जीवन में कांग्रेस के बीस सूत्रीय का समर्थन नहीं करूंगी। आप इंदिराजी चाहे जो करें। “मैं जनसंघ की विचारधारा को नहीं छोडूंगी।'' राजमाता ने आगे कहा कि मैं जेल जाना पंसद करूंगी-लेकिन आपातकाल जैसे काले कानून का कभी समर्थन नहीं करूंगी। विचारधारा के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता और समर्पण ही देश में और दल में उन्हें रातों रात ऊंचाई पर ले गयी। धीरे-धीरे उनका संपर्क अनेक वरिष्ठ लोगों से होने लगा।
 
राजमाता जेल गईं, पर इंदिरा जी के सामने झुकी नहीं। इसी बीच आपातकाल के भय से स्व. माधवराव सिंधिया भारत छोड़कर चले गए, उन्होंनें “माँ'' की तरह हिम्मत नहीं दिखाई। लोगों का मानना है कि “वे'' घबड़ा गए, यहीं पर राजमाता ने कहा कि मुझे ऐसा लगा रहा था 'भैया’ माधवराव भी इंदिराजी के आगे नहीं झुकेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। पता नहीं स्व. माधवराव सिंधिया कहां चले गए, सन् 1977 में चुनाव हुए तो स्व. माधवरावजी जनसंघ के बजाए गुना से लोकसभा चुनाव निर्दलीय लड़े। वहीं जब जनता पार्टी चली गई तो स्व. माधवराव सिंधियाजी कांग्रेस में चले गए, राजमाता को अच्छा नहीं लगा। उनका कहना था कि जिस इंदिराजी ने उन्हें 19 महिने जेल की कालकोठरी में बिना वजह डाल दिया था, और मुझे यातनाएं दी थीं, ऐसी इंदिराजी की पार्टी में “भैया'' को नहीं जाना था।


 
सन् 1980 में राजमाता को जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने आग्रह किया कि “वे'' स्व. इंदिरा गांधी के विरुद्ध जनता पार्टी की ओर से रायबरेली से लोकसभा चुनाव लड़ें। राजमाता ने कहा कि जो पार्टी तय करे। राजमाता रायबरेली गईं और स्व. इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ीं। वे पीछे नहीं हटीं। वे चुनाव हार गईं। लेकिन उन्होंने संगठन के निर्णय को बिना किसी विरोध के शिरोधार्य किया। संगठन निष्ठ होने को यह अनुपम उदाहरण है।
 
जनता पार्टी की सरकार केन्द्र में बनी। उस समय तत्कालीन नेताओं को अनेक सरकारी पद दिये गये। पर राजमाता ने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने सदैव संगठन को ही महत्व दिया। राजमाता धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ती चली गईं। एक ऐसा क्षण आया कि राजमाता को बैंक बैलेंस से अपना पैसा निकालने पर तत्कालीन कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने आपातकाल में रोक लगा दी थी। राजमाता ने विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन महासचिव अशोक सिंघल को विहिप के लिए एक लाख रूपये दान देने की घोषणा कर दी। वे जेल चली गईं। आपातकाल हटा और राजमाता जेल से बाहर आयीं तो उन्होंने अशोक सिंघल से कहा कि मुझे आपको अशोक जी एक लाख रूपये देने हैं। लेकिन मेरे खाते पर रोक लगी है। मैं खाता ऑपरेट नहीं कर सकती। अतः आप एक काम करें कि यह मेरी हीरे की अंगूठी है, इसे कहीं देकर एक लाख रूपये ले लें। यह बात मैं इसलिए कह रही हूं कि मैंने आपको वचन दिया था। स्व. अशोक सिंघल ने कहा कि राजमाताजी आपका इतना कहना ही हमें प्रेरणा देता है। इसी बीच श्रीमती यशोधरा राजे ने अम्मा महाराज से कहा कि “अम्मा'' आप ये क्या कर रही हैं। यह तो आपकी अंगुली में महाराज साहब की निशानी है। आप चिंता नहीं करें हम विहिप को यह राशि दे देंगे। इस पर राजमाता ने यशोधरा राजेजी से कहा की वचन की प्रतिबद्धता मेरे लिए पहले है, इसलिए मैं यह आग्रह कर रही हूँ। राजमाता की इस घटना को जब हम याद करते हैं तो मन भाव विभोर हो जाता है। साथ ही लगता है कि उनकी अपने वचन के प्रति कितनी बड़ी प्रतिबद्धता थी। यह आज के कार्यकर्ताओं को भी विचार करना चाहिए। वचन की प्रतिबद्धता से व्यक्ति के चरित्र को समाज स्वीकरता है।


 
राजमाता के भाषण लिखने का मुझे सौभाग्य मिला। उनके निजि सचिव सरदार संभाजी राव आंग्रे मुझसे स्वदेश में आने पर विषय बता देते थे और हम भाषण तैयार कर देते थे। राजमाता सात्विक और आध्यात्मिक थीं। हमने राम जन्म भूमि आंदोलन में राजमाता की निडरता, समर्पण और साहस को करीब से उस समय देखा जब मैं राम जन्मभूमि की रिपोर्टिंग करने अयोध्या गया था।
 
राजमाता की सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता का अनुपम उदाहरण उस समय आया, जब स्व. माधवराव सिंधिया जनसंघ छोड़कर कांग्रेस में चले गए। उन्हें बहुत दुख हुआ ऐसे अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरा एक बेटा मुझे छोड़कर चला गया। लेकिन आज भाजपा के लाखों बेटे मेरे साथ हैं। उनके जीवन के एक नहीं अनेक उदाहरण ऐसे हैं, जो हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।
 
एक बार प्रख्यात वकील श्री राम जेठमलानी के मुकदमे में ग्वालियर हाईकोर्ट आए। उनके आगमन पर कांग्रेस के लोगों ने उन पर पथराव किया। जेठमलानी के सिर में चोट आयी। उस समय राम जेठमलानी भाजपा में थे। राजमाता को जब ज्ञात हुआ तो वे भाजपा का झंडा लेकर स्वयं ग्वालियर के इंदरगंज थाने में हजारों कार्यकर्ताओं के साथ पहुंचीं और रिपोर्ट दर्ज करायी। उन्होंने अपने ऊपर कभी भी राजघराने या राजशाही को हावी नहीं होने दिया। वे राजमाता होते हुए सदैव लोकमाता के मार्ग पर चलीं। यही कारण है कि देश ने उन्हें लोकमाता के रूप में स्वीकार किया।
 
राजमाताजी वात्सल्य की धनी थीं। वे ममतामयी थीं। उन्हें एक बार जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की दृष्टि से सन् 1972 में स्वयं अटलजी और आडवाणीजी उनके पास आए, राजमाता से दोनों नेताओं ने चर्चा की। राजमाता ने कहा कि मुझे एक दिन का समय चाहिए। राजमाता आध्यात्मिक भी थीं। वे दतिया पीताम्बरा पीठ गईं, अपने गुरु जी से चर्चा की और लौटीं तो उन्होंने अटलजी और आडवाणीजी से कहा कि वे भारतीय जनसंघ की सेवा एक कार्यकर्ता के रूप में सदैव करती रहेंगी। उन्हें पदों के प्रति कभी आकर्षण नहीं रहा।
 
राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने भारतीय राजनीति में महिला के नाते देश में एक आदर्श कायम किया। उनकी राष्ट्रहित के प्रति जागरूकता ने ही उन्हें राजमाता से लोकमाता बनाया। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक उनकी यात्रा में उनेक उतार-चढ़ाव आए, पर उन्होंने अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण रहा उसे कभी नहीं छोड़ा। भारतीय राजनीति में उनकी आदर्श भूमिका के कारण ही केन्द्र सरकार और मध्य प्रदेश की सरकार ने साथ ही भाजपा संगठन ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया। राजमाता के प्रति सरकार और संगठन का यह निर्णय स्वयं जाहिर करता है कि राजमाता का कृतत्व कितना महान था। महानता और उदारता ही उनकी पूंजी थी।
                                                                 
प्रभात झा
(लेखक राज्यसभा सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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