भगवान श्रीकृष्ण की नगरी Dwarka कल्पना नहीं हकीकत है, समुद्र और जमीन की गहराइयों में उतर कर सबूत सामने लायेगी ASI

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देखा जाये तो सदियों तक द्वारका को मिथक कहकर खारिज किया गया, उसे आस्था का विषय कहकर इतिहास की किताबों से बाहर रखा गया। लेकिन अब वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आने लगे हैं। साथ ही धार्मिक दृष्टि से द्वारका का महत्व असाधारण है।

भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में द्वारका का नाम केवल एक नगर भर नहीं है, बल्कि यह आस्था, विश्वास और सभ्यता की निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। अब वही द्वारका एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हम आपको बता दें कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्राचीन द्वारका की खोज को नए सिरे से, अधिक गहराई और गंभीरता के साथ आगे बढाने का निर्णय लिया है। इस बार यह अभियान केवल सतही अध्ययन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन और समुद्र दोनों में गहन खुदाई के जरिये इतिहास की दबी हुई परतों को उजागर करने का प्रयास होगा।

हम आपको बता दें कि अब तक हुए सीमित अध्ययनों में समुद्र के भीतर पत्थर की संरचनाएं, दीवारनुमा अवशेष और मानव बसावट के संकेत मिल चुके हैं। लेकिन इन संकेतों को निर्णायक प्रमाण में बदलने के लिए ASI अब आधुनिक तकनीक, उन्नत उपकरण और विशेषज्ञों की बहुविषयक टीम के साथ आगे बढ़ रहा है। इस नए अभियान का केंद्र गोमती नदी का मुहाना, समुद्री किनारे के वे हिस्से जहां अब तक खुदाई नहीं हुई, और बेट द्वारका जैसे क्षेत्र होंगे।

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मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ASI के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह खुदाई केवल धार्मिक मान्यताओं की पुष्टि का प्रयास नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह समझना है कि प्राचीन द्वारका में जीवन कैसा था, वहां का शहरी ढांचा कैसा रहा होगा, व्यापार और संस्कृति किस स्तर पर थी और किस ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत यह नगर समुद्र में विलीन हुआ। यह अभियान भारत के समुद्री इतिहास, तटीय सभ्यता और प्राचीन नगर नियोजन की समझ को भी नया आयाम देगा।

देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारका की समुद्री विरासत पर पहले ही सार्वजनिक रूप से ध्यान आकर्षित कर चुके हैं। हम आपको याद दिला दें कि साल 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अरब सागर की उथली लहरों के भीतर गहराई तक उतरकर प्राचीन द्वारका नगरी के अवशेषों के पास हाथ जोड़े थे तब पूरा भारत मंत्रमुग्ध हो उठा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्र के भीतर स्थित उस स्थल पर स्कूबा डाइविंग करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की नगरी को अपनी आंखों से देखा था, उसे प्रणाम किया था और इसे “दिव्य अनुभव” बताया था। उस दृश्य ने हजारों वर्षों से मौन इतिहास को एक जीवंत रूप में सामने ला दिया था। अब ASI की यह नई पहल इस विषय को ठोस ऐतिहासिक विमर्श में बदलने जा रही है।

देखा जाये तो सदियों तक द्वारका को मिथक कहकर खारिज किया गया, उसे आस्था का विषय कहकर इतिहास की किताबों से बाहर रखा गया। लेकिन अब वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आने लगे हैं। साथ ही धार्मिक दृष्टि से द्वारका का महत्व असाधारण है। यह वह भूमि है जिसे भगवान श्रीकृष्ण की कर्मभूमि माना जाता है। पुराणों और महाभारत में वर्णित द्वारका कोई साधारण नगर नहीं थी, बल्कि एक समृद्ध, सुव्यवस्थित और शक्तिशाली नगरी थी। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने मथुरा त्याग कर समुद्र तट पर इस नगर की स्थापना की थी ताकि अपने लोगों को निरंतर आक्रमणों से बचा सकें। यह निर्णय केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी क्रांतिकारी था।

द्वारका सप्तपुरी में गिनी जाती है और चारधाम परंपरा में इसका स्थान सर्वोच्च है। यहां स्थित द्वारकाधीश मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवंतता का अनुपम उदाहरण है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं, केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि उस इतिहास से जुडने के लिए जो पीढ़ियों से उनकी चेतना में प्रवाहित होता रहा है।

आज जब ASI समुद्र की गहराइयों में उतरने की तैयारी कर रहा है, तो वह केवल पत्थर और दीवारें खोजने नहीं जा रहा। वह उस स्मृति को खोजने जा रहा है जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। यह खोज उन प्रश्नों को चुनौती देती है जो कहते रहे कि भारत का प्राचीन इतिहास कल्पना पर आधारित है। द्वारका की खुदाई यह साबित करने की दिशा में कदम है कि हमारी परंपराएं, हमारे ग्रंथ और हमारी आस्थाएं किसी शून्य से नहीं उपजीं, बल्कि ठोस सामाजिक और भौगोलिक यथार्थ पर आधारित थीं।

यहां एक तीखा प्रश्न भी खड़ा होता है। यदि किसी अन्य सभ्यता से जुड़ा नगर समुद्र में डूबा मिलता, तो क्या उसे वैश्विक इतिहास की महान खोज नहीं कहा जाता। फिर द्वारका के साथ संकोच क्यों? क्या इसलिए कि यह भारत की धार्मिक चेतना से जुड़ी है। ASI की यह पहल उस मानसिकता पर भी प्रहार है जो भारतीय इतिहास को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखती रही।

देखा जाये तो धार्मिक महत्व के साथ-साथ द्वारका सांस्कृतिक स्वाभिमान का विषय भी है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत केवल आक्रमणों और पराजयों की कहानी नहीं है, बल्कि नगर निर्माण, समुद्री व्यापार और सभ्य जीवन की भी गौरवशाली परंपरा रहा है। द्वारका की खोज उस आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करती है जो हमें अपने अतीत से कटने नहीं देता।

बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि द्वारका की खुदाई केवल अतीत को जानने का प्रयास नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का साहसिक कदम है। यह धर्म और विज्ञान के टकराव की नहीं, बल्कि उनके संवाद की कहानी है। यदि यह खोज अपने लक्ष्य तक पहुंचती है, तो यह केवल इतिहास की किताबों में एक नया अध्याय नहीं जोड़ेगी, बल्कि भारत की आत्मा को वह सम्मान लौटाएगी जिसकी वह सदियों से प्रतीक्षा कर रही है।

-नीरज कुमार दुबे

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