1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के जुल्मो सितम की कहानी

By स्व. कुलदीप नायर | Publish Date: Aug 9 2019 12:53PM
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के जुल्मो सितम की कहानी
Image Source: Google

फ्लेचर नाम के एक अधिकारी के आदेश पर स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन के करीब 130 नेताओं को फांसी चढ़ा दिया गया। जिन लोगों को फांसी नहीं दी गई उन्हें जबरन पेड़ पर चढ़ाया गया और संगीनों से मार दिया गया।

भारत अंग्रेजों के साम्राज्यवादी शासन से मुक्ति की वर्षगाँठ मनाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे मौके पर उत्तर प्रदेश के धूल धूसरित शहर को याद करना उचित होगा जिसने 1942 में कुछ दिनों तक देश के आजाद होने की घोषणा करने के परिणाम भुगते। चित्तू पांडे के नेतृत्व में बलिया का सार्वभौम गणतंत्र करीब सात दिनों तक, तब तक अस्तित्व में रहा जब तक अंग्रेजों के नेतृत्व में आई सेना ने फिर से अपना नियंत्रण कायम नहीं कर लिया और अत्याचार का ऐसा सिलसिला चलाया जिसे उन लोगों के वंशज अभी तक याद रखे हैं जिनके साथ बलात्कार, पिटाई, गोलीबारी हुई, जिन्हें गोली से भून कर और आगजनी में मार दिया गया।
 
फ्लेचर नाम के एक अधिकारी के आदेश पर स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन के करीब 130 नेताओं को फांसी चढ़ा दिया गया। जिन लोगों को फांसी नहीं दी गई उन्हें जबरन पेड़ पर चढ़ाया गया और संगीनों से मार दिया गया। पेड़ वाली सजा से बच गए लोगों को जेल ले जाया गया और पैर से उल्टा लटका दिया गया। उन्हें भूखा मरने को छोड़ दिया गया। उलटा लटकने की सजा से बचे लोगों को जेल की फर्श पर एक साथ बिठाया गया और उन्हें ऐसी चपाती खिलाई गई कि वे पेचिश का शिकार हो गए।
बलिया औपनिवेशिक शासन की वास्तविकता से हमारी पहचान कराता है जिसमें भारतीयों जैसे 'छोटी नस्ल' के लोगों को गोरे शासकों के हाथों ऐसे दुख सहने पड़े जो कल्पना से बाहर हैं। इन यातनाओं में कुछ ऐसी थीं जिनके परिणामस्वरूप मौत भी हो जाती थी, चाहे यह संगीन से चीर डालना हो या अंत में बर्फ की सिल्लियों पर घंटों लिटाने की यातना हो, ये सभी उनसे अलग नहीं थी जो नाजियों के हाथों यहूदियों ने सही।
 
अंतर सिर्फ इतना है कि जर्मनी के आउसविज जैसे स्थानों पर जो हुआ उन्हें दस्तावेजों में ठीक से दर्ज किया गया है और यातना शिविरों में जो कुछ हुआ उसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दी गई। अगर मित्र−राष्ट्र (जर्मनी के खिलाफ लड़ने वाले राष्ट्र) या नाजियों के बाद का जर्मनी हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उन्हें सजा दिला नहीं पाए तो इजरायल के आधुनिक राष्ट्र ने इसे किया।


 
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने वाली बलिया जैसी जगहों में किए गए अत्याचारों को दस्तावेजों में अभी तक पूरी तरह दर्ज नहीं किया जा सका है। आज तक कोई नहीं जानता कि कमिश्नर फ्लेचर के साथ क्या हुआ और क्या उसे कभी ढेर सारे निर्दोष नागरिकों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया।
 
इन दिनों कुछ इतिहासकारों के बीच यह बताने का फैशन है कि 200 सालों का औपनिवेशिक शासन उतना बुरा नहीं था और भारत ने जितना खोया उससे ज्यादा उसे मिला, पहले ईस्ट इंडिया कंपनी, जो तथाकथित भलेमानुस व्यापारियों के लिबास में ठगों का गिरोह था, के साथ मेलजोल और फिर ब्रिटिश सरकार से आमने−सामने होकर।


 
व्यवहार में, कंपनी और सरकार की क्रूरता और शोषण में ज्यादा फर्क नहीं था। एक छोटा उदाहरण काफी है। ब्रिटिश सरकार का ही एक प्रतिनिधि था जिसने महाराजा रणजीत सिंह के बेटे और उत्तराधिकारी, दलीप सिंह को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया। ये ब्रिटिश सरकार के ही अधिकारी थे, जिसमें लार्ड डलहौजी शामिल था, जिन्होंने लाहौर के खजाने की लूट का नेतृत्व किया और छोटी उम्र के दलीप सिंह पर दंतकथा बने कोहिनूर हीरे को महारानी विक्टोरिया को व्यक्तिगत रूप से भेंट करने के लिए दबाव डाला। आज यही कोहिनूर ब्रिटेन के राजा के ताज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
'गोरों' के शासन के लाभ के मुद्दे पर लौटें। यह तर्क दिया जाता है कि आखिरकार अंग्रेज ही थे जिन्होंने भारतीयों की अंग्रेजी भाषा से पहचान कराई, देश में ढांचागत विकास किया, चाहे वह शहरों में नल का पानी, बिजली या नालियों की सुविधा हो या रेलवे और डाक−तार की नींव रखना हो। फिर यह अंग्रेज ही थे जिन्होंने महत्वपूर्ण धार्मिक तथा समाजिक सुधार किया, जैसे 1929 में सती तथा बाल विवाह का खात्मा और 1850 में विधवा विवाह का कानून लाना।
 
लेकिन भारतीय सभ्य व्यक्तियों की तरह व्यवहार करने में सक्षम थे। जब अठारहवीं सदी में व्यापार के नाम पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना नियंत्रण कम किया तो इसके अधिकारी किसानों से मिलने वाले टैक्स का तीन गुना वसूलते थे। ये टैक्स भयंकर अकाल के समय में भी बना रहता था। स्थानीय शासकों के समय में यह कितना अलग था और विपदा के समय टैक्स माफ हो जाता था। यह जानने लायक बात है कि दो सौ साल बाद बलिया में आजादी के आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश प्रशासन के साथ कैसा व्यवहार किया। अंग्रेज अधिकारियों को और उनके स्थानीय चापलूसों को इकट्ठा किया गया और शांतिपूर्वक शहर के सिविल तथा मिलिट्री क्षे़त्र को अलग करने वाली रेल लाइन के पार ले जाकर छोड़ दिया गया। किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाई गई।
 
इससे भी ज्यादा प्रेरणादायक बात है हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पूरी एकता बनी हुई थी। निश्चित ही था, जब ब्रिटिश वापस आए तो उन्होंने हर तरह के अत्याचार किए। वे नहीं चाहते थे कि बलिया में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए और उन्होंने उन लोगों को गोली मार कर हत्या कर दी जिन्होंने ऐसा करने की कोशिश की। शहर के धुंधलके से एक मुसलिम नौजवान आया और उसने एक झंडा लहराने की कोशिश की जो यूनियन जैक नहीं था तो उसे मार दिया गया। बलिया के लोग अभी भी इस पर गर्व करते हैं कि झंडा के जमीन पर गिरने के पहले एक दूसरे स्वयंसेवक ने राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक को सहारा देने का बीड़ा उठाया। करीब 11 लोग, एक के बाद एक अंग्रेज राज के सैनिकों की ओर से मारे गए।
महत्व की बात यह है कि बलिया के नागरिकों के विद्रोह के तेवर के बारे में ब्रिटिश मीडिया में कभी कुछ प्रकाशित नहीं हुआ। यह द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हुआ जब विंस्टन चर्चिल प्रधानमंत्री थे। युद्ध जैसे ही खत्म होने को आया, उन्होंने कहा कि ब्रिटेन कभी भी भारतीय साम्राज्य को नहीं छोड़ेगा।
 
उनकी रिकॉर्ड की हुई टिप्पणी है, ''मैं भारतीयों से नफरत करता हूं। वे जानवर जैसे लोग हैं, जिनका धर्म जानवरों जैसा है।'' महात्मा गांधी के बारे में भी उनकी इसी तरह की आहत करने वाली टिप्पणी थी'' यह देखना खतरनाक और उबकाई देने वाला है कि गांधी, एक राजद्रोही बैरिस्टर जो वैसे फकीर का नाटक कर रहा है जिसका रूप पूरब में काफी जाना−पहचाना है, सम्राट−राजा के प्रतिनिधि से बराबरी में बातचीत करने के लिए वायसराय के महल की सीढ़ियों पर अधनंगा चढ़ रहा है, इसके बावजूद कि वह सिविल नाफरमानी का अभियान संगठित कर रहा है और चला रहा है।'' चर्चिल यह अंदाजा नहीं लगा पाए कि बलिया ने ऐसी आग जलाई थी जिसने पांच साल बाद अपनी चपेट में लेकर भारत तथा इसके बाहर ब्रिटिश राज को नष्ट कर दिया।
 
-स्व. कुलदीप नायर
नोटः स्व. कुलदीप नायर जी ने यह आलेख प्रभासाक्षी के लिए वर्ष 2016 में लिखा था। भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगाँठ पर इसे हमने पुनः प्रकाशित किया है- संपादक
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video