दुनियाभर में अपना लट्ठ गाड़ने पर क्यों तुले हैं 'चौधरी' ट्रंप? Latin America के देशों में क्यों मची है खलबली?

Donald Trump
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क्यूबा पर ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिका अब भी शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर नहीं आया है। क्यूबा को कमजोर बताकर वह यह संकेत देना चाहते हैं कि वेनेजुएला से उसका आर्थिक सहारा टूट चुका है और अब दबाव डालने का सही समय है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूरी दुनिया को चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि क्यूबा आर्थिक रूप से टूटने के कगार पर है, ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है और अगर ईरान में सरकार ने जनता पर दमन तेज किया तो अमेरिका कड़ा जवाब देगा। यही नहीं वेनेजुएला की राजधानी पर अमेरिकी हमले को लेकर उन्होंने खुले तौर पर कहा कि हम ही प्रभारी हैं और यह अभियान शांति के लिए था। कोलंबिया को भी ट्रंप ने चेतावनी दी है और भारत को भी रूसी तेल खरीदने पर शुल्क बढ़ाने की धमकी दी है। देखा जाये तो ट्रंप के इन बयानों और कार्रवाइयों ने अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति को फिर उजागर कर दिया है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र में भी वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की वैधता पर बहस तेज हो गई है और दुनिया एक बार फिर दो ध्रुवों में बंटती दिख रही है।

अमेरिका यह दावा कर रहा है कि उसने अपराधी को पकड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि अपराध तय करने का अधिकार किसने दिया। क्या दुनिया में केवल एक ही देश न्यायाधीश है। क्या लोकतंत्र की परिभाषा अब बंदूक की नली से तय होगी। अगर यही नियम है, तो कल किसी और देश की बारी भी आ सकती है। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। जहां ताकतवर देश खुलेआम कमजोर देशों की सरकारें गिराने लगे हैं। आज मादुरो जेल में है। कल कोई और होगा। सवाल यह नहीं कि मादुरो सही था या गलत। सवाल यह है कि क्या दुनिया अब बंदूक के कानून से चलेगी। अगर इसका जवाब हां है, तो यह केवल वेनेजुएला की हार नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था की हार होगी।

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यह भी साफ दिख रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति अब धमकी की भाषा बोल रही है। वह हर मंच से खुद को शांति दूत बताने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके कदम लगातार युद्ध और हस्तक्षेप की ओर बढ़ते दिखते हैं। क्यूबा, कोलंबिया और ग्रीनलैंड को लेकर उनकी ताजा धमकियां उस सोच का हिस्सा हैं जिसमें अमेरिका खुद को पूरी दुनिया का निर्णायक मानता है।

क्यूबा पर ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिका अब भी शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर नहीं आया है। क्यूबा को कमजोर बताकर वह यह संकेत देना चाहते हैं कि वेनेजुएला से उसका आर्थिक सहारा टूट चुका है और अब दबाव डालने का सही समय है। अमेरिका के लिए क्यूबा सिर्फ एक द्वीप नहीं बल्कि वैचारिक चुनौती रहा है। अगर अमेरिका क्यूबा पर सीधे हमले की कोशिश करता है तो यह लैटिन अमेरिका में भारी अस्थिरता ला सकता है। इससे अमेरिका विरोधी भावनाएं और तेज होंगी और रूस तथा चीन को दखल का नया मौका मिलेगा।

वहीं, ट्रंप का कोलंबिया को धमकी देना बताता है कि अमेरिका अब अपने पुराने सहयोगियों को भी नहीं बख्श रहा। वेनेजुएला प्रकरण के बाद लैटिन अमेरिका में हालात पहले ही तनावपूर्ण हैं। कई देश अमेरिकी दबाव से थक चुके हैं। वेनेजुएला पर हमले को क्षेत्र के कई देशों ने संप्रभुता पर हमला माना है। अमेरिका पहले भी चिली, निकारागुआ और पनामा जैसे देशों में दखल देता रहा है। कभी तख्तापलट के जरिए तो कभी आर्थिक प्रतिबंधों से। आज भी वही नीति नए शब्दों में लौट आई है।

दूसरी ओर, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का बयान दरअसल आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दिखाता है। ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए सामरिक दृष्टि से अहम है। यहां से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। लेकिन किसी क्षेत्र को जरूरत बताकर हथियाने की सोच उपनिवेशवादी मानसिकता का उदाहरण है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर दबाव बढ़ाता है तो यह यूरोप और नाटो के भीतर भी दरार पैदा कर सकता है।

वहीं ईरान को लेकर ट्रंप की चेतावनी यह दिखाती है कि अमेरिका खुद को विश्व का पुलिसमैन मानता है। ईरान के आंतरिक मामलों में इस तरह की धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना है। यह संदेश दिया जा रहा है कि जो भी सरकार अमेरिका की लाइन से हटेगी उसे बल प्रयोग से सुधारा जाएगा। इससे पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव और भड़क सकता है।

उधर, भारत के साथ अमेरिका के रणनीतिक संबंधों के बावजूद ट्रंप की धमकियां बताती हैं कि उनकी दोस्ती भी शर्तों पर टिकी है। भारत को रूसी तेल खरीदने पर चेतावनी देकर वह यह साबित करना चाहते हैं कि अमेरिकी हित सर्वोपरि हैं। यह दबाव नीति भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को चुनौती देती है और बताती है कि अमेरिका साझेदारी को बराबरी का नहीं बल्कि नियंत्रण का जरिया मानता है।

हम आपको यह भी बता दें कि वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले को दुनिया ने अलग-अलग नजर से देखा है। वेनेजुएला का कहना है कि यह सीधी आक्रामकता है जबकि अमेरिका इसे शांति अभियान बता रहा है। वहीं संयुक्त राष्ट्र में इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठे हैं। कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कहा है। इस हमले ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक तरफ अमेरिका और उसके समर्थक हैं तो दूसरी तरफ वह देश हैं जो संप्रभुता और बहुपक्षीय व्यवस्था की बात कर रहे हैं।

इसके अलावा, वेनेजुएला के बाद लैटिन अमेरिका में अमेरिका विरोधी भावना और मजबूत हुई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका आज भी मोनरो सिद्धांत के नाम पर पूरे महाद्वीप को अपना हिस्सा मानता है। ट्रंप ने खुद कहा कि यह हमारा गोलार्ध है। यह बयान साफ करता है कि अमेरिका अब भी क्षेत्रीय वर्चस्व की पुरानी सोच से बाहर नहीं निकला है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो नेता रोज शांति की बात करता है और नोबेल शांति पुरस्कार पर अपना दावा करता है वही युद्ध क्यों छेड़ता जा रहा है? इसका जवाब ट्रंप की घरेलू राजनीति में छिपा है। दरअसल आक्रामक राष्ट्रवाद उनके समर्थकों को जोश देता है। हर नया टकराव उन्हें मजबूत नेता के रूप में पेश करता है। शांति उनके लिए लक्ष्य नहीं बल्कि नारा है।

बहरहाल, डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति आज धमकी, दबाव और बल प्रयोग का मिश्रण बन चुकी है। क्यूबा, कोलंबिया, ग्रीनलैंड, ईरान, भारत और वेनेजुएला सभी इस नीति के अलग-अलग शिकार हैं। यह रवैया दुनिया को सुरक्षित नहीं बल्कि और अस्थिर बना रहा है। अगर यही सिलसिला चला तो अमेरिका खुद को अलग थलग पाएगा और वैश्विक व्यवस्था और कमजोर होगी। शांति की बात करने वाले हाथों में जब मिसाइल हो तो दुनिया को सतर्क हो जाना चाहिए।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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