स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारों ने ध्यान दिया होता तो आज देश को यह सब नहीं देखना पड़ता

स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारों ने ध्यान दिया होता तो आज देश को यह सब नहीं देखना पड़ता

सरकारों को आगे अपना पूरा ध्यान चिकित्सा तंत्र को मजबूत करने पर लगाना चाहिये। बड़े शहरों, महानगरों से लेकर एक छोटे गांव ढाणी के उप स्वास्थ्य केंद्र तक को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस किया जाना चाहिए ताकि फिर कभी लोगों को चिकित्सा के अभाव में जान नहीं गंवानी पड़े।

भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का प्रकोप जारी है। कोरोना महामारी के साथ ही इसके साइड इफेक्ट भी होने लगे हैं। कोरोना से ठीक हो रहे कई लोगों को ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस, येला फंगस जैसी कई अन्य संक्रामक बीमारी जकड़ने लगी हैं। इन बिमारियों की चपेट में आने से लोग विकलांग होने लगे हैं। कई लोगों ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी है। तो कई लोगों को अन्य तरह की शारीरिक अपंगता झेलनी पड़ रही है।

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मई माह के प्रथम सप्ताह में तो कोरोना पॉजिटिव आने वाले लोगों की संख्या प्रतिदिन चार लाख से भी अधिक पहुंच गई थी। पिछले कुछ दिनों में घटकर दो लाख से कम हो रही थी। मगर इन दिनों फिर आंकड़ा दो लाख से पार पहुंचने लगा है। इस समय कोरोना संक्रमित होने वालों से अधिक संख्या कोरोना से रिकवर होने वालों की है। जो सरकार व चिकित्सकों के लिए राहत भरी खबर है। हालांकि राज्य सरकारों द्वारा अपने प्रदेशों में लॉकडाउन लगाया गया है, जिसके बाद ही कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में कमी आई है। देश के प्रायः सभी राज्यों में लॉकडाउन चल रहा है। कोरोना मरीजों की संख्या कम आने का कारण लॉकडाउन है या जांच में कमी है यह कहना तो मुश्किल है। मगर लोगों के घरों से बहुत कम निकलने के कारण कोरोना का सामुदायिक प्रसार जरूर कम हुआ है।

देश में कोरोना संक्रमित मिलने के आंकड़ों में जहां कमी आई है। वहीं कोरोना से मरने वालों की संख्या अभी तक कम नहीं हो पायी है। कोरोना से हर दिन बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है जो सभी के लिए बड़ी चिंता का कारण है। देश में कोरोना से होने वाली मौतों पर जब तक प्रभावी ढंग से नियंत्रण नहीं हो पाता। तब तक यह कहना मुश्किल होगा कि कोरोना संक्रमण का प्रसार कम हो गया है। गत वर्ष कोरोना की पहली लहर में इस बार की तुलना में मरने वालों की संख्या बहुत कम थी। इस बार कोरोना से बड़ी तादाद में लोगों के मरने से आमजन में भय व्याप्त हो रहा है।

कोरोना से अब तक दुनिया में करीबन 35 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। अमेरिका में सबसे अधिक है 6 लाख लोगों की, दूसरे स्थान पर ब्राजील में चार लाख 52 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है जहां 3 लाख 21 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में अब तक कुल दो करोड़ 77 लाख लोग पॉजिटिव हो चुके हैं। जिनमें से 2 करोड़ 51 लाख यानी 99 प्रतिशत लोग रिकवर हो चुके हैं। भारत में अभी भी 22 लाख कोरोना के एक्टिव केस हैं।

भारत में कोरोना का कहर पिछले 3 महीनों में सबसे अधिक रहा है। इस दौरान सबसे अधिक कोरोना के संक्रमित केस मिले। वहीं मरने वालों की भी संख्या सर्वाधिक रही है। मरने वालों की संख्या के आंकड़ों पर नजर डालें तो अकेले मई माह में ही एक लाख से अधिक कोरोना पॉजिटिव लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं अप्रैल माह में 48875, मार्च में 5765, फरवरी में 2767, जनवरी में 5410, दिसंबर 2020 में 11359, नवंबर 2020 में 15510, अक्टूबर में 23411, सितंबर में 33273, अगस्त में 28884, जुलाई में 1941, जून में 12002, मई में 4200, अप्रैल में 1119 व मार्च 2020 में 35 लोगों की कोरोना से मौत हुई थी।

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देश में कोरोना से सर्वाधिक मौतें अप्रैल और मई महीने में हुई हैं। इन 2 महीनों में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या में एकाएक वृद्धि होने से अस्पतालों में ऑक्सीजन, वेंटिलेटर व अन्य जीवन रक्षक दवाइयों की बहुत कमी महसूस की गई। ऑक्सीजन गैस नहीं मिलने व दवाइयों के अभाव में हजारों लोगों की मौत हो गई। कोरोना के दौरान पिछले दो महीनों में देश में चिकित्सा को लेकर जिस तरह से अफरा-तफरी का माहौल देखा गया। उसकी पहले किसी ने शायद ही कल्पना की होगी। 21वीं सदी के विकासशील भारत में ऑक्सीजन गैस के अभाव में मरते लोगों को देखकर हर किसी की रूह कांप गई। सरकारी स्तर पर किए गए बड़े-बड़े दावों की पिछले दो माह में ही पोल खुल गई। सरकारी तंत्र हाथ पर हाथ धरे किंकर्तव्यविमूढ़ बन कर बैठा रहा। राजनेता एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे। वहीं अस्पतालों में लोग बेमौत मरते रहे।

देश में कोरोना से सबसे अधिक मौत महाराष्ट्र में 92 हजार लोगों की हुई है। वहीं कर्नाटक में करीबन 27 हजार, दिल्ली में 24 हजार, तमिलनाडु में 22 हजार, उत्तर प्रदेश में 20 हजार, पश्चिम बंगाल में 15 हजार, पंजाब में 14 हजार, छत्तीसगढ़ में 12 हजार 800, आंध्र प्रदेश में 10 हजार 500, गुजरात में 9700 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। उपरोक्त सभी प्रदेश देश के विकसित राज्यों में शुमार होते हैं। जब देश के विकसित राज्यों की ऐसी हालत है तो पिछड़े प्रदेशों की तो कल्पना करना ही बेमानी होगा। कोरोना संक्रमण के समय देश की जनता को अच्छी तरह से पता चल गया कि देश में अब तक जितनी भी सरकारें बनी हैं वह सिर्फ बड़े-बड़े वादे, दावे ही करती रही है। वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं हुआ है। विशेषकर चिकित्सा के क्षेत्र में तो हमारा देश अभी शून्य की स्थिति से ही ऊपर नहीं उठ पाया है।

आजादी के 74 साल बाद भी देश में ऑक्सीजन गैस के भाव में लोगों का मरना किसी दिवास्वप्न से कम नहीं है। बड़े शहरों, महानगरों में जितने भी अस्पताल थे वह सब कोरोना की दूसरी लहर में पस्त हो गए। लोगों को पता चल गया कि देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में भी लोगों की जान बचाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। जब बड़े शहरों में ही बुरी स्थिति है तो गांव के तो हाल और भी खराब हैं। गांव के प्राथमिक, सामुदायिक चिकित्सा केंद्रों पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहता है। वहां जब भी कोई गंभीर मरीज आता है तो उसको बड़े अस्पताल में रेफर कर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं। प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों को ढंग से प्राथमिक उपचार भी नहीं मिल पाता है।

देश में चिकित्सा कर्मियों की बड़ी कमी है जिन्हें पूरा करने के लिए सरकार हर बार दावा तो करती है मगर उसे पूरा नहीं करती है। अस्पतालों में वर्षों से बहुत से पद रिक्त पड़े रहते हैं। सरकारी तंत्र उन पर नियुक्ति करने की तरफ कोई ध्यान नहीं देता हैं। राजनेताओं का ध्यान तो बस विकास के नाम पर सड़क, पुल, रेल, बस, भवन, नहर, बांध निर्माण की तरफ ही रहता है। यदि सरकारें पिछले 74 सालों में चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार की तरफ थोड़ा भी ध्यान देतीं तो आज हमें इस तरह की बदतर स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। मगर राजनेताओं को तो उन कामों को करवाने में अधिक रुचि रहती है जिनमें उनको वाहवाही मिले और आर्थिक दृष्टि से भी उनके हित में रहे। इसी कारण चिकित्सा महकमा हमेशा उपेक्षित ही पड़ा रहता है। सरकारों को आगे अपना पूरा ध्यान चिकित्सा तंत्र को मजबूत करने पर लगाना चाहिये। बड़े शहरों, महानगरों से लेकर एक छोटे गांव ढाणी के उप स्वास्थ्य केंद्र तक को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस किया जाना चाहिए ताकि फिर कभी लोगों को चिकित्सा के अभाव में जान नहीं गंवानी पड़े।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं।)