China के मुकाबले India की रक्षा तैयारी कितनी मजबूत है? संसाधन और ताकत के मामले में कौन-सा देश आगे है?

सबसे पहले सैन्य संख्या की बात करें तो चीन के पास लगभग बीस लाख सक्रिय सैनिक हैं जबकि भारत के पास करीब चौदह से पंद्रह लाख के बीच सक्रिय सेना है। पहली नजर में यह अंतर बड़ा लगता है, लेकिन युद्ध केवल संख्या से नहीं जीता जाता।
एशिया की भू राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां दो महाशक्तियां आमने सामने हैं। एक तरफ विस्तारवादी मंशा से आगे बढ़ता चीन है और दूसरी तरफ तेजी से आत्मनिर्भर और आक्रामक रणनीति अपनाता भारत है। सवाल यह नहीं कि कौन ज्यादा ताकतवर है, बल्कि सवाल यह है कि अगर टकराव हुआ तो कौन भारी पड़ेगा। तथ्य बताते हैं कि चीन अभी भी संसाधनों और संख्या के मामले में आगे है, लेकिन भारत ने पिछले एक दशक में जो रणनीतिक बदलाव किए हैं, उन्होंने इस अंतर को तेजी से कम किया है।
सबसे पहले सैन्य संख्या की बात करें तो चीन के पास लगभग बीस लाख सक्रिय सैनिक हैं जबकि भारत के पास करीब चौदह से पंद्रह लाख के बीच सक्रिय सेना है। पहली नजर में यह अंतर बड़ा लगता है, लेकिन युद्ध केवल संख्या से नहीं जीता जाता। भारत के पास अर्धसैनिक बलों का विशाल ढांचा है जो युद्ध की स्थिति में बड़ी ताकत बन सकता है।
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हथियारों और तकनीक की बात करें तो वायु शक्ति के मामले में तस्वीर साफ तौर पर चीन के पक्ष में झुकी हुई नजर आती है। कुल सैन्य विमान बेड़े में चीन के पास लगभग 3300 से अधिक विमान हैं, जबकि भारत के पास करीब 2229 विमान हैं। यानी संख्या के लिहाज से चीन को स्पष्ट बढ़त हासिल है। अगर केवल लड़ाकू विमानों की बात करें तो यह अंतर और भी चौड़ा हो जाता है। चीन के पास करीब 2000 से 2100 लड़ाकू विमान हैं, जबकि भारत के पास लगभग 550 से 600 के बीच फाइटर जेट हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि सीधे हवाई टकराव की स्थिति में चीन की संख्या आधारित ताकत भारी पड़ सकती है। हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। भारत की वायुसेना केवल संख्या पर नहीं, बल्कि संतुलित संरचना, मल्टी रोल क्षमता और रणनीतिक तैनाती पर आधारित है, जो उसे हर हालात में जवाब देने लायक बनाती है।
इसके अलावा यह भी तथ्य अहम है कि भारत इस अंतर को तेजी से कम करने की दिशा में आक्रामक कदम उठा चुका है। भारत ने फ्रांस के साथ बड़े स्तर पर रक्षा करार करते हुए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दी है, जो विमानवाहक पोतों पर तैनात होंगे और समुद्री युद्ध क्षमता को मजबूत करेंगे। इसके साथ ही भारत 114 नए मल्टी रोल राफेल लड़ाकू विमानों के बड़े सौदे की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है, जो वायुसेना की ताकत को नई ऊंचाई पर ले जाएगा। इतना ही नहीं, फ्रांस के साथ संयुक्त उत्पादन, हेलिकॉप्टर निर्माण और मिसाइल सिस्टम के सह उत्पादन जैसे समझौते भी किए जा रहे हैं, जिससे भारत न केवल अपनी वायु शक्ति बढ़ा रहा है बल्कि आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। वायु शक्ति बढ़ाने के लिए भारत कई अन्य देशों से भी खरीद के मुद्दे पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत का युद्ध अनुभव चीन से कहीं अधिक व्यावहारिक है। खासकर ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध की बात करें तो भारतीय सेना का अनुभव लद्दाख और सियाचिन जैसे क्षेत्रों में चीन से कहीं आगे है। यह वह मोर्चा है जहां आंकड़े नहीं बल्कि जमीनी हकीकत जीत तय करती है।
इसके अलावा, जमीनी युद्ध की स्थिति में हिमालय भारत के लिए एक प्राकृतिक किला बन जाता है। चीन की भारी सेना और उपकरण इस इलाके में उतने प्रभावी नहीं रह जाते जितने खुले मैदान में होते हैं। भारतीय सेना ने दशकों तक इन परिस्थितियों में खुद को ढाला है, जबकि चीन को इस तरह की चुनौतियों का सीमित अनुभव है।
वहीं तोपखाने और तैनाती की बात करें तो भारत की स्थिति कई मामलों में मजबूत है। ऊंचाई पर तेजी से हथियार पहुंचाने और उन्हें संचालित करने की क्षमता भारत की बड़ी ताकत है।
नौसेना के क्षेत्र में तस्वीर थोड़ी अलग है। चीन की नौसेना आकार में बड़ी है, लेकिन भारत की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक बढ़त देती है। हिंद महासागर में भारत का प्रभाव चीन के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। भारत के पास विमानवाहक पोत हैं और समुद्री मार्गों पर उसकी पकड़ मजबूत है। युद्ध की स्थिति में यह क्षेत्र चीन की आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है।
अब बात आती है आधुनिक युद्ध की, जहां असली खेल साइबर और अंतरिक्ष में हो रहा है। इस क्षेत्र में चीन ने तेजी से बढ़त बनाई है। साइबर हमले, उपग्रह तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में चीन आगे है। भारत ने इस दिशा में कदम जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन अभी काफी दूरी तय करनी बाकी है। यही वह क्षेत्र है जो आने वाले समय में युद्ध की दिशा तय करेगा।
देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह मुकाबला केवल दो देशों के बीच नहीं है। यह पूरे एशिया में शक्ति संतुलन की लड़ाई है। भारत अब केवल सीमा की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, कनेक्टिविटी परियोजनाएं और वैश्विक साझेदारियां इस दिशा में साफ संकेत देती हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्र प्रथम नीति ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। इस नीति का सीधा असर रक्षा क्षेत्र में दिख रहा है। भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि खुद उत्पादन करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सीमा क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास, सेना को आधुनिक हथियारों से लैस करना और वैश्विक स्तर पर रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना इस नीति के प्रमुख स्तंभ हैं। इसका परिणाम यह है कि भारत अब जवाबी रणनीति अपनाने की स्थिति में आ चुका है।
बहरहाल, यह एक तथ्य है कि चीन अभी भी संसाधनों, बजट और तकनीक में आगे है। लेकिन भारत ने अपनी कमजोरियों को ताकत में बदलना शुरू कर दिया है। भूगोल, अनुभव और रणनीतिक सोच भारत को इस मुकाबले में मजबूती देते हैं। अगर टकराव होता है तो यह एकतरफा नहीं होगा। भारत अब वह देश नहीं है जो दबाव में झुक जाए। यह एक ऐसा राष्ट्र बन चुका है जो चुनौती को स्वीकार करता है और जवाब देने की क्षमता रखता है। डोकलाम और गलवान दिखा चुके हैं कि भारत अब चीन के मुकाबले में पीछे नहीं, बल्कि बराबरी पर खड़ा है।
-नीरज कुमार दुबे
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