विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश का आकर्षक केंद्र बन चुका है भारत, सिंगापुर से सम्बन्ध हुए प्रगाढ़

विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश का आकर्षक केंद्र बन चुका है भारत, सिंगापुर से सम्बन्ध हुए प्रगाढ़

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निगरानी में भारत 1,200 से अधिक सरकारी वित्त पोषित अनुसंधान संस्थानों, सक्रिय नीति तंत्र, उद्योग और शिक्षाविदों के बीच सहयोग के साथ नवाचार अर्थव्यवस्था के युग को लेकर खुद को तैयार कर रहा है।

भारत अब विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश का एक आकर्षक केंद्र बन चुका है। मेक इन इंडिया अभियान की मदद से भारत हाई-टेक विनिर्माण का केंद्र बनने की राह पर है। क्योंकि वैश्विक दिग्गज या तो भारत में विनिर्माण संयंत्र लगा रहे हैं या लगाने की प्रक्रिया में हैं, जो भारत के एक अरब से अधिक उपभोक्ताओं के बाजार और उनकी बढ़ती क्रय शक्ति से आकर्षित हैं। 

ऐसा इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निगरानी में भारत 1,200 से अधिक सरकारी वित्त पोषित अनुसंधान संस्थानों, सक्रिय नीति तंत्र, उद्योग और शिक्षाविदों के बीच सहयोग के साथ नवाचार अर्थव्यवस्था के युग को लेकर खुद को तैयार कर रहा है। भारत नवाचार के निरंतर बढ़ते पथ पर है और उभरती हुई तकनीकियां जैसे ब्लॉक चेन, नैनो टेक्नोलॉजी, क्वांटम कंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नवाचार के केंद्र में हैं।

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भारत शीर्ष 25 नवोन्मेषी देशों के संघ में शामिल होना चाहता है। एनएसएफ डेटाबेस के हिसाब से वैज्ञानिक प्रकाशन के देशों में भारत तीसरे स्थान पर है। वैश्विक नवाचार सूचकांक (जीआईआई) के अनुसार इसने वैश्विक स्तर पर शीर्ष 50 नवीन अर्थव्यवस्थाओं में (46वें रैंक पर) जगह बनाई है। इसने पीएचडी की संख्या, उच्च शिक्षा प्रणाली के आकार के साथ-साथ स्टार्ट-अप की संख्या के मामले में भी तीसरा स्थान हासिल किया है। 

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने सामाजिक न्याय, सशक्तिकरण, समावेश और पारदर्शिता हासिल करने के लिए तकनीकी को एक माध्यम बनाया है। सरकार तकनीकी का उपयोग कर अंतिम छोर तक सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करती है। वहीं, डीएसटी लोगों के बीच वैज्ञानिक प्रवृत्ति को विकसित करने और उसे बढ़ावा देने के लिए ठोस प्रयास कर रहा है। वह देश में अनुसंधान व नवाचार अभियान का नेतृत्व कर रहा है। 

इस दिशा में भारत के द्वारा कई मिशन मोड कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, जैसे- राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन, अंतर्विषयक साइबर भौतिक प्रणालियों पर राष्ट्रीय मिशन (आईसीपीएस), क्वांटम कम्प्यूटिंग और संचार, सुपरकम्प्यूटिंग, सुपरकम्प्यूटिंग पर राष्ट्रीय मिशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी आदि, ताकि इस अभियान का सहयोग किया जा सके। 

देखा जाए तो पिछले 75 वर्षों में भारत विकासपरक यात्रा से गुजरा है, जिसने इसकी वैश्विक राष्ट्रों के बीच एक अलग आर्थिक और राजनीतिक पहचान बनाने में मदद की है। इसलिए आज जब भारत अपनी आजादी का 75वां वर्ष मना रहा है, वह अपने लिए अगले 25 वर्षों के निमित्त रोडमैप @100 तैयार कर रहा है ताकि वर्ष 2047 तक जीवन के सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिक व तकनीकी नवाचारों द्वारा प्रगति हासिल अथवा निर्धारित की जा सके। इस दिशा में भी रोड मैप तैयार किया जाएगा। 

केंद्र सरकार, सरकारी निकायों, उद्योग जगत के दिग्गजों, तकनीकी विशेषज्ञों, प्रमुख शिक्षाविदों की उपस्थिति के साथ ज्ञान और नवाचार अर्थव्यवस्था, नए सहयोग और साझेदारी बनाने, दोनों देशों के लिए विकास के प्रचुर अवसरों के युग की शुरुआत करने के लिए उभरती तकनीकी का लाभ उठाने जैसे क्षेत्रों में अगले कदमों के संदर्भ में हालिया शिखर सम्मेलन से पहले से ही बहुत उम्मीदें हैं। 

वहीं, भारत ने नए अवसरों का पता लगाने के लिए स्कूल स्तर से ही नवाचार पर कई मिशन शुरू किए हैं। बेशक नवाचार में निवेश के लिए जोखिम भी ज्यादा है, लेकिन इस क्षेत्र में प्रतिफल भी बहुत अधिक हैं। वाकई सामाजिक चुनौतियों से निपटने के लिए नवाचार महत्वपूर्ण है। इसलिये कौशल विकास, ई-गवर्नेंस, स्मार्ट सिटी, डिजिटल मोबिलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भारत-सिंगापुर संयुक्त उपक्रम का आह्वान किया गया है।

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वहीं, भारत सरकार के नए सहयोग और साझीदार बनाने की रणनीति के तहत ही आसियान देशों में सिंगापुर भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रमुख स्रोत है। आंकड़ों से पता चलता है कि सिंगापुर में लगभग 9,000 भारतीय कंपनियां पंजीकृत हैं और सिंगापुर से 440 से अधिक कंपनियां भारत में पंजीकृत हैं। सिंगापुर की कंपनियां कई स्मार्ट शहरों, शहरी नियोजन, लॉजिस्टिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भाग ले रही हैं। सिंगापुर कई राज्यों के साथ टाउनशिप के लिए मास्टर प्लान तैयार करने के लिए काम कर रहा है। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत और सिंगापुर के बीच अच्छी तरह से स्थापित विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के संबंध हैं। तभी तो इसरो ने 2011 में सिंगापुर का पहला स्वदेश निर्मित सूक्ष्म उपग्रह और 2014-15 के दौरान 8 और उपग्रहों को लॉन्च किया। इन संबंधों में समय-समय पर नए आयाम जुड़ते जाते हैं। बता दें कि भारत और सिंगापुर के बीच गत दिनों एक समझौता ज्ञापन और कार्यान्वयन समझौता संपन्न हुआ जो भारत-सिंगापुर में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सहयोग को मजबूत करेंगे। यह हमारे उद्योग और अनुसंधान संस्थानों को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से संबंधित नए उत्पादों को संयुक्त रूप से विकसित करने में सक्षम बनाएगा। 

जहाँ तक भारत और सिंगापुर के बीच द्विपक्षीय व्यापार का सवाल है तो 2020 से 2021 तक 19.8 अरब डॉलर से 35 फीसदी बढ़कर 26.8 अरब डॉलर हो गया। सिंगापुर द्वारा बेंगलुरु में स्थापित ग्लोबल इनोवेशन एलायंस (जीआईए) नोड महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। इसी तरह एसएमई और स्टार्ट-अप के लिए भारतीय शहरों में और अधिक जीआईए नोड्स स्थापित किए जाएंगे, ताकि सिंगापुर को एशिया और विश्व में संचालन के लिए एक स्प्रिंगबोर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। 

वहीं, दोनों देशों के बीच भविष्य के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्रों जैसे स्मार्ट शहरों के लिए एआई का उपयोग कर डी-टेक, विमानन और परिवहन क्षेत्रों में कार्बन शमन प्रौद्योगिकियों के लिए क्लीन-टेक और जीनोम और जैव सूचना विज्ञान अनुसंधान पर संयुक्त परियोजनाओं को भी हरी झंडी दिखाई गई। निःसन्देह, विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश का आकर्षक केंद्र बन रहे भारत की उपलब्धि हरेक भारतीय और उसके मित्र देशों के लिए गर्व की बात है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार