जल संचयन की जिम्मेदारी से लोगों ने पल्ला झाड़ लिया इसलिए बढ़ी है मुश्किल

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  अक्टूबर 7, 2019   12:49
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जल संचयन की जिम्मेदारी से लोगों ने पल्ला झाड़ लिया इसलिए बढ़ी है मुश्किल

आम व्यक्ति और समुदायों ने अब जल संचयन व उसके उचित प्रबंधन से अपने हाथ खींच लिए हैं और देश में सरकार को यह जिम्मेदारी सौंप दी है, जबकि पहले किसी भी सरकार द्वारा लोगों को पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता था।

जल ही जीवन है, जल जीवन का अमृत है इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना करना भी संभव नहीं है। आज समय की मांग है कि हम सभी को वर्तमान व भावी पीढ़ियों के लिये जल संरक्षण व उसके उचित प्रबंधन पर तेजी से कार्य करना होगा। आज देश में प्राकृतिक स्वच्छ जल स्रोतों का अस्तित्व तेजी से सिमटता जा रहा है और देश में अंधाधुंध भूजल दोहन के चलते अब यह स्थिति हो गयी है कि नदियों की गोद में आबाद क्षेत्रों में भी स्वच्छ पेयजल की किल्लत होने लगी हैं। वैसे तो हमारे देश में भविष्य में भीषण पेयजल संकट और लातूर जैसे हालत पैदा न हों, इसके लिए समय रहते ही केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के स्तरों पर देश में विभिन्न जल परियोजनाएं शुरू कर दी हैं और देश के अधिंकाश जल बोर्ड ने वर्षा जल संचयन और जल प्रबंधन करके स्वच्छ जल के उपलब्ध स्रोतों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन अभी ये सब प्रयास नाकाफी हैं हम सभी आम देशवासियों को इसके लिए सरकार के साथ कंधा से कंधा मिलकर लगातार सामूहिक प्रयास धरातल पर करने होंगे। तब ही देश में भविष्य में जल संकट की इस ज्वंलत समस्या का कोई स्थाई समाधान हो पायेगा। हालातों पर नजर डालें तो पिछले लगभग सौ वर्षों के दौरान विश्व में जल संचयन व प्रबंधन के मामले में लोगों की आदत में दो बड़े बदलाव समय के साथ हुए हैं।

पहला- आम व्यक्ति और समुदायों ने अब जल संचयन व उसके उचित प्रबंधन से अपने हाथ खींच लिए हैं और देश में सरकार को यह जिम्मेदारी सौंप दी है, जबकि पहले किसी भी सरकार द्वारा लोगों को पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता था। आम जनमानस पानी का संचयन व इंतजाम स्वयं करता था। जो चलन विश्व में अब पूर्ण रूप से समाप्त हो गया हैं।

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दूसरा- वर्षा जल के इस्तेमाल और इकट्ठा करने के आसान तरीकों में अब काफी कमी आई है, जबकि अब बांधों के माध्यम से नदियों और नल व नलकूपों के माध्यम से भूजल का बहुत तेजी के साथ रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए दोहन किया जाने लगा और इन्हें ही सभी लोगों को जल प्रदान करने का मुख्य स्त्रोत बना दिया गया। आंकड़ों के अनुसार नदियों और जलाशयों का जल वर्षा के जल का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र है। जबकि उन पर सभी को पानी पिलाने का दबाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, यह स्थिति भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

वैसे भी जल संकट आज के पूरे विश्व की मुख्य चिंता का विषय है, इस गम्भीर समस्या का हमको समय रहते निदान करना होगा। प्रकृति हमको निरंतर वायु, जल, प्रकाश, फल, फूल, कंदमूल, खनिज संपदा आदि बिना किसी भेदभाव के दे रही है, लेकिन हम अव्यवस्थित विकास की अंधी दौड़ में लगातार प्राकृतिक संतुलन को अपने ही हाथों से बिगाड़ते जा रहे हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि हम प्रकृति के द्वारा दी गयी वस्तुओं का सही ढंग से उपयोग करते हुए, जल संचयन के लिए समय रहते जाग जायें क्योंकि-

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

पानी गये न उबरे, मोती, मानुष, चून॥

अब समय आ गया कि हमको जल की अहमियत को बिना एक पल गंवाये समझ कर उसका भविष्य के लिए संचयन शुरू करना होगा। तब ही हमारी आने वाली पीढ़ियों को जल संकट से बचाया जा सकता है। 

भारत में हालात- देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के चलते जल की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती मांग के चलते भारत में भी पानी का संकट हर वर्ष नयी चुनौतियां पैदा कर रहा है, जिस पर यदि तत्काल ध्यान न दिया गया तो स्थिति बेहद भयावह व विस्फोटक हो सकती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में विश्व की 18 प्रतिशत से अधिक आबादी है, लेकिन विश्व का केवल 4 प्रतिशत नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भूक्षेत्र का 2.4 प्रतिशत भूक्षेत्र उपलब्ध है।

आज देश के हालात यह हैं कि लगभग 55 प्रतिशत कुएँ पूरी तरह सूख चुके हैं, पिछले दस वर्षों में भूजल स्तर में बहुत तेजी से कमी दर्ज की गई है, जलाशय सूख रहे हैं और नदियों में पानी के बहाव में दनि-प्रतिदिन कमी आ रही है। यह स्थिति तब है जब देश में प्रतिवर्ष 1170 मिमी. औसतन वर्षा होती है, जोकि विश्व के बहुत सारे देशों से बहुत अधिक है व पश्चिम अमेरिका से 6 गुना अधिक है। भारत के शहरी क्षेत्रों के हालात यह है कि अधिकांश लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया करना सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। वहीं अब तो बढ़ते जल प्रदूषण के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में भी 70 प्रतिशत लोग प्रदूषित जल पीने के लिए विवश हैं। लगभग 33 करोड़ लोग देश में ऐसी जगह रहने को मजबूर हैं जहाँ हर साल सूखा पड़ता है। भारत में 85 प्रतिशत पानी कृषि कार्य, 10 प्रतिशत उद्योगों और 5 प्रतिशत घरेलू कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। देश में पानी की मांग 2030 तक दोगुना हो जाने की संभावना है। देश में वर्ष 1994 में पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 6000 घनमीटर थी, जो वर्ष 2000 में 2300 घनमीटर रह गई तथा वर्ष 2025 तक इसके और घट कर 1600 घनमीटर रह जाने का अनुमान है। देश में होने वाली कुल वर्षा के 5 प्रतिशत जल का भी यदि संचयन कर लिया जाए तो देश के करोड़ लोगों, कृषि व उद्योगों की सालभर की पानी की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। 

वर्षा जल संचयन व प्रबंधन की आवश्यकता क्यों- पहले देश की जनसंख्या कम थी और सभी लोगों की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए शुद्ध जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। लेकिन उस समय भी देश में पानी का महत्व कम नहीं था। हालात यह थे कि देश व विश्व में पेयजल व कृषि भूमि की सिंचाई के लिए लड़ाइयां तक होती रही हैं। अब जिस तरह से निरंतर बढ़ती जनसंख्या तथा बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण की वजह से धरती पर तेजी से स्वच्छ जल की कमी महसूस की जा रही है, वह सोचनीय स्थिति है। इस मसले पर कुछ विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि अगर समय रहते पानी के संचयन, उचित प्रबंधन करके उपयोग करना, पुनः उपयोग और बेहतर इस्तेमाल के कारगर उपाय नहीं किए गए तो अगला विश्व-युद्ध जल के लिए हो सकता है।

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देश में बढ़ते जल संकट को देखकर अब समय आ गया है कि हम सभी को समझना होगा कि धरती पर पेट भरने के लिए भोजन, सांस लेने के लिए ऑक्सीजन के बाद जल एक ऐसा पदार्थ है जिसकी वजह से ही पृथ्वी पर जीवन मौजूद है। जीवन के लिए जल बहुत महत्वपूर्ण है, इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन फिर भी सरकार से लेकर के आम जनमानस तक जल को स्वच्छ रखने, उसके संचयन करने व उचित प्रबंधन को लेकर पूर्ण रूप से जागरूक नहीं है। आज देश में हालात यह हैं कि हम लोगों के रोजमर्रा के गलत तरीकों के चलते स्वच्छ जल का बहुत गम्भीर संकट उत्पन्न होने लगा है। आज देश में गुजरते समय के साथ-साथ बहुत ही तेजी के साथ स्वच्छ ताजे पानी के स्रोत दिन-प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं। इस संकट को लेकर संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट संकेत मिले हैं कि यदि स्वच्छ जल संचयन की वर्तमान स्थिति में जल्द ही कोई सकारात्मक बदलाव धरातल पर नहीं किया जाता है और सही ढंग से उचित जल प्रबंधन व जल प्रदूषण के निवारक उपायों पर ध्यान नहीं दिया जाता है तो वर्ष 2050 तक दुनियाभर में ताजे पानी के स्रोत बहुत ही तेजी से समाप्त होने शुरू हो जाएंगे। अपने देश भारत में इस स्थिति से बचने के लिए आज समय की मांग के अनुसार हमको वर्षा जल के संचयन व उसके उचित प्रबंधन के लिए तत्काल कारगर ठोस पहल धरातल पर करनी होगी तब ही आने वाली पीढ़ियों के लिए हम स्वच्छ पेयजल का संग्रहण करके उनको जीवन दे सकते हैं।

वैसे भी अब वह समय आ गया है कि जब हम सभी को समझना होगा कि वर्षा जल संचयन एक बहुत ही दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसके लिए हमको समय रहते ही प्रयास करने होंगे। तब ही हम वर्षा जल संचयन कि इस दीर्घकालिक प्रक्रिया से भविष्य के विभिन्न उद्देश्यों के लिए और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्षा जल को संरक्षित कर उसका उपयोग कर सकते है। देशभर में आये दिन जगह-जगह व्याप्त गम्भीर जल संकट की स्थिति से निपटने के लिए वर्षा जल को बड़ी मात्रा में बचाने का अब समय आ गया है। वैसे तो हमारे गांवों में वर्षा जल संचयन कभी रोजमर्रा की परंपरा का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। हम लोग पानी की एक-एक बूंद की बर्बादी को बहुत बड़ा पाप समझते थे, हमारे लिए जल भगवान का साक्षात स्वरूप होता था। लेकिन तेजी से होते शहरीकरण के चपेटे में हमारे गांवों के भी आ जाने से जल केवल अब एक उपभोग की एक वस्तु मात्र बन गया है, जिसके चलते अब गांवों में भी भूजल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। आज हमारे गांवों में भी वर्षा जल संचयन व उसका प्रबंधन दिन-प्रतिदिन बहुत तेजी से कम होता जा रहा है और शहर में तो धन कमाने की दौड़ में चंद जिम्मेदार लोगों को छोड़कर किसी को भी जल संचयन की चिंता नहीं है। यह हालात भविष्य के भारत के लिए ठीक नहीं हैं। 

आपको बता दें कि आंकड़ों के अनुसार विश्व के सबसे ज्यादा बारिश होने वाले क्षेत्रों में हमारा देश भारत भी शामिल है, हमारे देश में हर वर्ष बर्फ पिघलने और वर्षा जल के रूप में औसतन 4000 अरब घन मीटर जल प्राप्त होता है, जिसमें से काफी पानी बिना किसी उपयोग के व्यर्थ में बह कर नदी-नालों के द्वारा समुद्र में चला जाता है जिसमें वर्षा जल का भाग अधिकांश होता है। जल संचयन व उसके प्रबंधन के लिए आज हमको इजराइल जैसे छोटे देश से सीखना होगा जहाँ वर्षा का औसत बहुत कम है, वहाँ भी सरकार व आम जनता के जागरूक होने व उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के चलते लोगों का जीवन सुचारू रूप से चल रहा है। वहाँ जल प्रबंधन तकनीक व प्रबंधन के तरीक़े अति विकसित होकर लोगों को जल की कमी का आभास नहीं होने देते हैं, अपितु आज इजरायल उन्नत तकनीक से जल संचयन व प्रबंधन के चलते कृषि क्षेत्र से भी कई बहुमूल्य उत्पादों का निर्यात करके खूब विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है। तो अंतरिक्ष तक अपनी तकनीक का डंका बजवाने वाला भारत यह कार्य क्यों नहीं कर सकता !

वर्षा जल संचयन क्या है-

वर्षा के जल को किसी खास माध्यम से संचय करने या इकट्ठा करने की प्रक्रिया को वर्षा जल संचयन कहा जाता है। वर्षा जल संचयन रोजमर्रा के जीवन में विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग में किए जाने वाले वर्षा के जल को इकट्ठा करने और उसको संग्रहित करने की एक विधि है जिससे कि उस जल का उपयोग भविष्य में भी किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम बारिश के पानी को इकट्ठा करके भविष्य की अपनी जरूरत के समय आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं। वर्षा के पानी को एक निर्धारित किए हुए स्थान पर जमा करके हम वर्षा जल संचयन कर सकते हैं और भूजल को रिचार्ज कर सकते हैं जिससे भू-जल के गिरते स्तर पर रोक लगायी जा सकती है और स्वच्छ भूजल के स्रोतों को बचाया व बढ़ाया जा सकता है। 

वर्षा जल संचयन की आवश्यकता क्यों- वर्षा जल संचयन की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में जल की कमी एक बड़ा संकट बनती जा रही है। जिसका सबसे बड़ा कारण भूजल के जलस्तर का लगातार नीचे जाना भी है। इसके लिये बारिश के समय जो वर्षा जल बहकर सागर में मिल जाता है, उसका संचयन करके व उचित प्रबंधन करके भूजल का पुनर्भरण किया जाना बहुत आवश्यक है, ताकि भविष्य के लिए भूजल संसाधनों का संवर्धन हो पाये। आंकड़ों के अनुसार आज अकेले भारत में ही व्यवहार्य भूजल भण्डारण का आकलन 214 बिलियन घन मी. (बीसीएम) के रूप में किया गया है जिसमें से 160 बीसीएम की पुन: प्राप्ति हो सकती है। इस जल संकट की ज्वंलत समस्या का एक मात्र समाधान जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन है। पशुओं के पीने के पानी की उपलब्धता, फसलों की सिंचाई के विकल्प के रूप में वर्षा जल संचयन प्रणाली को विश्वव्यापी तौर पर अपनाया जाता रहा है। वर्षा जल संचयन प्रणाली उन सभी स्थानों के लिए उचित है, जहां प्रतिवर्ष न्यूनतम 200 मिमी वर्षा होती हो। जिसके संचयन के लिए भारत में अपार संभावनाएं हैं।

वर्षा जल संचयन के कारगर तरीके- वर्षा जल संचयन करने के कई आधुनिक व पुरातन तरीके हैं। इनमें से कुछ तरीके वर्षा जल का संचयन करने में बहुत ही कारगर साबित हुए हैं, जिनमें से कुछ तरीकों को तो हम सदियों से अपनाते आये हैं। इन तरीकों से संचयन किए हुए वर्षा जल का हम उचित ढंग से प्रबंधन करके उसको घरेलू, कृषि व व्यावसायिक उपयोग में लाकर भूजल के गिरते स्तर पर लगाम लगा सकते हैं व भूजल के स्रोतों को बचा सकते हैं। इसके लिये हम विभिन्न तकनीकों को अपनाते हुए मुख्य रूप से दो तरीकों से वर्षा जल का संचयन करके उसका भविष्य में उपयोग करते हैं।

1- सतह अपवाह वर्षा जल संचयन) शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बहने वाले वर्षा जल को नदी, नालों व नालियों में बहाने देने की बजाय, भूजल स्तर या जलवाही स्तर तल पर एकत्रित किया जा सकता है। इस तरीक़े के द्वारा हम भविष्य में उपयोग के लिये सतह के जल को एक जगह इकट्ठा करते हैं। बरसात के दिनों में सतह से बारिश के पानी को इकट्ठा करना बहुत ही असरदार और पारंपरिक प्राचीन तकनीक है। इस तकनीक में छोटे-बड़े तालाबों, जगह-जगह भूमिगत टैंकों, चैक डैम, छोटे-बड़े बांध में आदि में वर्षा जल का संचयन करके उसका भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरीक़े के द्वारा वर्षा जल का संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके काफी भूजल की बचत की जा सकती है।

2- गिरते भूजल के स्तर को रोकने के लिए भूमिजल का पुनर्भरण करना)- हमारे देश में भूमिजल का पुनर्भरण तकनीक जल संग्रहण का एक नया आधुनिक तरीका है और प्रायः इसके लिये निम्न प्रकार की संरचनाओं (ढांचों) का प्रयोग किया जाता है-

भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग के द्वारा- वर्षा जल सीधे इमारतों की छतों से रेन वाटर हार्वेस्टिंग वाली जगह पर बने टैंक में एकत्र किया जाता है जोकि धीरे-धीरे भूमि के अंदर जाकर भूजल का पुनर्भरण (रिचार्ज) करके भूजल के स्तर को बहाल करने में मदद करता है।

गड्ढे- पुनःभरणगड्ढे या पिट्स को उथले जलभृत के पुनर्भरण के लिये बनाया जाता है। जिसके द्वारा भूजल के स्तर को रिचार्ज करके भविष्य में सही रखा जा सकता है।

जलभृत- यह रेत, पथरीली या चट्टानों की बनी मिट्टी की छिद्रनीय परतें हैं जिनसे प्रचुर मात्रा में जल को उपयोग करने के लिये निकाला जा सकता है। इनका निर्माण एक से दो मीटर की चौड़ाई में और एक से 1.5 मीटर की गहराई में किया जाता है और जिनको रेत, मिट्टी, कंकड़ों से भी भर दिया जाता है।

खाइयाँ- इनका तब निर्माण होता है, जब पारगम्य (भेद्य) चट्टानें उथली गहराई पर उपलब्ध होती हैं। खाई 0.5 से 1 मीटर चौड़ी, 1 से 1.5 मीटर गहरी और 10 से 20 मीटर की लम्बी हो सकती है। इसकी चौड़ाई, लंबाई और गहराई जल व स्थान की उपलब्धता पर निर्भर है। इनको पाटने के लिये फिल्टर सामग्री का प्रयोग होता है।

खुदे हुए कुएँ- कुएँ का पुनःभरण ढाँचे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यह आवश्यक है कि पानी को कुएँ में डालने से पहले उसको फिल्टर (छानने वाले यंत्रों) से गुजारना चाहिये जिससे भूजल प्रदूषित ना हो सके।

हाथ से संचलित पंप (हैंडपंप)- यदि जल की उपलब्धता सीमित हो, तो मौजूदा हैंडपंपों को उथले/गहरे जलभृतों को पुनर्भरित करने के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है। इनमें जल को छानने के यंत्रों द्वारा प्रवाहित करना जरूरी है। इससे पुनःभरण के काम आने वाले कुंओं में अवरोधन नहीं होगा।

पुनःभरण कुएँ- अधिक गहरे जलकोषों के पुनःभरण के लिये 100 से 300 मिमी. व्यास के पुनःभरण कुंओं का प्रायः निर्माण किया जाता है। इनमें जल को फिल्टर उपकरणों से अवरोधन को रोकने की दृष्टि से पारित किया जाता है।

पुनःभरण शाफ्ट- उथले जलकोषों के पुनःभरण के लिये इनका निर्माण होता है। (ये मिट्टी की गीली सतह से नीचे स्थित है)। इन पुनःभरण शाफ्टों का 0.5 से 3 मीटर का व्यास है और ये 10 से 25 मीटर गहराई के हैं। ये शाफ्ट पत्थरों और मोटी रेत से भरा होता है।

बोर कुंओं के पार्श्व शाफ्ट- उथले एवं गहरे जलभृतों के पुनःभरण के उद्देश्य से, पानी की उपलब्धता से संबंधित, 1.5 मीटर से 2 मीटर चौड़े और 10 से 30 मीटर लम्बे पार्श्व शाफ्टों का एक या दो बोर कुओं के संग निर्माण होता है। पार्श्व शाफ्ट के पीछे पत्थर और मोटी रेत बिछी होती है। 

ये वो कुछ तरीक़े हैं जिनके द्वारा हम वर्षा जल का संचयन कर सकते हैं।

वर्षा जल संचयन व उसके प्रबंधन के लाभ- विश्व में जिस तरह से बहुत तेजी के साथ बढ़ते प्रदूषण व ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनिया भर में जलवायु को बहुत अधिक क्षति पहुंच रही है, उसके चलते आजकल सभी जगह सही मात्रा में बारिश का होना अप्रत्याशित हो गया है। आज जहाँ एक तरफ भारी बारिश की मार के चलते लोगों को जानमाल का नुकसान होता है, वहीं दूसरी तरफ सूखे के हालात के चलते भी जानमाल का नुकसान होता हैं। इस नुकसान को कम करने में वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन बहुत कारगर है। भारी वर्षा से प्रभावित बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में वर्षा जल संचयन करके हम बाढ़ की समस्या को कम करके जानमाल की रक्षा कर सकते हैं, जबकि वर्षा जल संचयन करके हम जलीय दुर्लभ क्षेत्रों में जल उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। जल प्रबंधन का यह नवीकरणीय स्रोत जल से संबंधित उन सभी प्रमुख समस्याओं पर काबू पाने में मदद कर सकता है, जो समस्याएं न केवल अभी के लिए दुनिया को परेशान कर रही हैं बल्कि जो भविष्य में भी वैश्विक आबादी और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। जिससे बचने के लिए वर्षा जल संचयन व उसके प्रबंधन पर सरकार के साथ अब आम जनता को भी पूर्व की भांति ध्यान देना होगा, क्योंकि बूंद-बूंद जल मिलकर ही सागर बनता है। उसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए हम सभी को मिलजुलकर सामुहिक प्रयास करने होंगे, जिससे हमें भविष्य में बहुत लाभ होगा।

अगर हम वर्षा जल का संचयन ज्यादा से ज्यादा अलग-अलग जगहों में इकट्ठा करके करें, जैसे बांधों में, कुंओं और तालाबों आदि में तो अच्छा रहेगा। अलग-अलग जगहों में पानी का संचयन करने के कारण जमीन पर बहकर व्यर्थ जाने वाले वर्षा जल की मात्रा में कमी आती है जिससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को रोकने में व भूजल को रिचार्ज करने में स्वाभाविक रूप से मदद मिलती है। जिसके चलते भविष्य में हमारे जानमाल के नुकसान में कमी आ सकती है व जल पर होने वाले खर्च को कम किया जा सकता है। इसके कुछ लाभ इस प्रकार हैं-

वर्षा जल संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके हम घरेलू काम के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी बचा सकते हैं और इस पानी को अपने पालतू जानवरों के लिए, कपड़े साफ करने के लिए तथा घर साफ करने के लिए और नहाने आदि में इस्तेमाल कर सकते हैं। देश के औद्योगिक संस्थानों में वर्षा जल संचयन करके संचित किया हुआ वर्षा जल का उपयोग कम्पनी में करके हम भविष्य के लिए स्वच्छ भूजल की बचत कर सकते हैं।

जल की किल्लत वाले क्षेत्रों में और उन क्षेत्रों में जहां पानी को भी लोग बेचा करते हैं, ऐसी जगह वर्षा के महीने में जल संचयन करके गर्मी के महीने में पानी की कमी को कुछ प्रतिशत तक कम करा जा सकता है। गांवों में वर्षा जल संचयन के द्वारा ज्यादा से ज्यादा पानी एकत्र किया जा सकता है जिससे सिंचाई करके किसान अपनी फसलों की सिंचाई पर होने वाले खर्च को भी बचा सकते हैं और इसकी मदद से ज्यादा बोरवेल वाले क्षेत्रों में भूजल के स्तर को गिरने से रोका जा सकता है, क्योंकि सबसे अधिक जल कृषि क्षेत्र में ही इस्तेमाल होता है। वर्षा जल संचयन किसानों के लिए सबसे कारगर साबित हो सकता है क्योंकि वर्षा के पानी को बचा कर ज्यादातर किसान गर्मियों के महीने में बहुत ही आसानी से पानी की किल्लत को दूर कर सकते हैं।

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आज की दुनिया अत्याधुनिक है, ऐसे में लोगों के बढ़ती जनसंख्या के कारण आज विश्व के हर एक क्षेत्र में बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण हो रहा है। यह बात तो साधारण है कि इन इमारतों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा पानी का उपयोग हो रहा है। ऐसे में वर्षा जल संचयन के माध्यम से बचाए हुए पानी को इन इमारतों के निर्माण में लगा कर कई प्रतिशत स्वच्छ पानी को बचा सकते हैं।

पूरे वर्ष लोग आसपास के जमीन में कचरा फेंकते हैं और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां अपने कारखानों से निकली हुए जहरीले या रासायनिक पानी को पास के क्षेत्रों में निकाल देते हैं। परंतु मुश्किल तब आती है जब बारिश का महीना आता है क्योंकि बारिश होने पर वही रासायनिक पदार्थ और कचरा जमीन पर बहते हुए पानी से मिलता है और लोगों के खेतों, तालाबों और कुंओं में जाकर गिरता है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा वर्षा के पानी को जमीन पर ना बहने देकर उसे किसी अन्य स्थान पर इकट्ठा करके हम उपयोग में ला सकते हैं और अपने आसपास के जल स्रोतों को भी इन जहरीले रासायनिक तत्वों से दूर रख सकते हैं।

हमको समझना होगा कि आज वर्षा जल का संचयन व उसका उचित प्रबंधन करके, हम ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल का इस्तेमाल करके भविष्य के लिए स्वच्छ जल के स्रोतों व भूजल को ज्यादा से ज्यादा बचा सकते हैं। हम लोग अपनी रोजमर्रा की आदतों में कुछ बदलाव करके भविष्य के लिए जल संचयन करके आने वाली पीढ़ियों पर उपकार कर सकते हैं। जीवन में जल के महत्व पर कुछ चंद पंक्तियां कहना चाहूँगा-

जीवन में जरूरी है जल,

नहीं चल सकता इसके बिना जीवन का एक भी पल,

ना करो जल की एक-एक बूंद को भी व्यर्थ और बर्बाद,

जल संचयन करके करो पीढ़ियों के भविष्य को आबाद।।

-दीपक कुमार त्यागी

(स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार)







साक्षात्कारः कानूनविद् से समझिये- क्या सुप्रीम कोर्ट कृषि कानून को रद्द कर सकता है?

  •  डॉ. रमेश ठाकुर
  •  जनवरी 18, 2021   13:49
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साक्षात्कारः कानूनविद् से समझिये- क्या सुप्रीम कोर्ट कृषि कानून को रद्द कर सकता है?

भारतीय संविधान के तहत, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और कानून की व्याख्या करने की शक्ति है। संविधान न्यायालयों को किसी कानून के निर्धारण का निर्देश देने की या रद्द करने की शक्ति नहीं देता है।

किसानों का आंदोलन केंद्र सरकार के लिए चुनौती बन गया है। रोकने के लिए सरकार हर तरीके की कोशिशें कर चुकी है। लेकिन किसान टस से मस नहीं हो रहे। किसान-सरकार के बीच बढ़ते गतिरोध को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट की भी एंट्री हो चुकी है। कोर्ट ने फिलहाल सरकार के बनाए तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा दी है। आगे क्या कोर्ट के माध्यम से कोई हल निकल सकेगा? या फिर आंदोलन यूं ही चलता रहेगा। इन्हीं तमाम सवालों का पिटारा लेकर डॉ. रमेश ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे से कानूनी पहलूओं पर विस्तृत बातचीत की। पेश बातचीत के मुख्य हिस्से।  

सवालः सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी से कुछ हल निकलेगा?

केंद्र और किसानों के बीच गतिरोध के लिए सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के लिए शीर्ष अदालत का हस्तक्षेप दोनों पक्षों के हित में है। सुप्रीम कोर्ट की समिति के चार सदस्य कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और प्रमोद कुमार जोशी हैं, साथ ही शेतकरी संगठन के अनिल घनवत और भारतीय किसान यूनियन के एक गुट के नेता भूपिंदर सिंह मान हैं जिन्होंने खुद को अलग कर लिया है। समिति के सभी सदस्य विशेषज्ञ हैं और बुद्धिजीवी हैं। वह किसानों की भलाई के लिए भी काम करते आए हैं और मुझे लगता है इस मामले में भी वह निष्पक्ष जांच करेंगे, ताकि वह स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों की चीजों को स्पष्ट कर पाएं और दोनों पक्षों से तथ्यों पर विचार करके रिपोर्ट बनाएंगे ताकि अदालत एक सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंच सके।

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सवालः कानूनों के हिसाब से क्या केंद्र सरकार के बनाए कानून को न्यायालय निरस्त कर सकता है?

उत्तर- न्यायालयों के पास संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है जब तक कि उसके प्रावधान असंवैधानिक न हों। कोर्ट भारत में कानून बनाने वाली संस्था नहीं है। कानून बनाना संसद और राज्य विधानसभाओं का काम है। बहुत प्रसिद्ध निर्णय गेंदा राम बनाम एमसीडी में कहा गया है, यह शक्तियों के पृथक्करण के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करने के लिए कहा जा सकता है जो बताता है कि कार्यकारी, विधायिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए। भारतीय संविधान के तहत, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और कानून की व्याख्या करने की शक्ति है। संविधान न्यायालयों को किसी कानून के निर्धारण का निर्देश देने की या रद्द करने की शक्ति नहीं देता है।

सवालः तीनों कृषि कानूनों पर लगाई सुप्रीम कोर्ट की लगाई रोक को कैसे देखते हैं आप?

उत्तर- सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है। मैं शीर्ष अदालत के फैसले का पूरी तरह से सम्मान करता हूं, भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े ने कहा कि शीर्ष अदालत भी तीन कृषि कानूनों की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करने के लिए एक समिति का गठन कर रही है। तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता के बारे में याचिकाओं का जत्था दाखिल किया गया है। अब समिति मौके पर जाएगी और किसान, प्रदर्शनकारियों के विचार प्राप्त करने की कोशिश करेगी और दोनों पक्षों की समीक्षा करेगी और उचित अनुसंधान और निष्कर्षों के बाद समिति अदालत को रिपोर्ट सौंपेगी, फिर अदालत उचित कदम उठाएगी।

सवालः कमेटी में शामिल सदस्यों के नाम पर किसान नेताओं का विरोध भी हो रहा है? 

उत्तर- हां, विरोध करने वाले भ्रमित हैं, यहां तक कि समिति के सभी सदस्य बुद्धिजीवी हैं, जो सामाजिक हैं। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, लंबे समय से कृषि सुधारों के पैरोकार रहे हैं, इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा। बलबीर सिंह राजेवाल, जो पंजाब में भारतीय किसान यूनियन के अपने गुट के प्रमुख हैं, वह किसानों की वास्तविक समस्या को समझेंगे क्योंकि वह किसानों और उपभोक्ताओं के कल्याण के लिए लगातार काम कर रहे हैं, अन्य सदस्य भी अच्छी तरह से योग्य और अनुभवी हैं और उनकी नियुक्ति मुख्य नयायाधीश और भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सभी परिदृश्यों के बारे में अच्छी तरह से वाकिफ होने के बाद की गयी है, इसलिए समिति जो भी रिपोर्ट बनाएगी बिना पक्षपात और बिना किसी गतिरोध के सभी पहलुओं की निष्पक्षता से जांच करके बनाएगी।

सवालः आप क्या सोचते हैं केंद्र का निर्णय कृषि हित में है?

उत्तर- देखिये, ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट में जा चुका है। न्यायालय का फैसला सर्वोच्च होगा। तीनों कानून के कुछ फायदे ये हैं कि किसान एक स्वतंत्र और अधिक लचीली प्रणाली की ओर बढ़ेंगे। मंडियों के भौतिक क्षेत्र के बाहर उपज बेचना किसानों के लिए एक अतिरिक्त विस्तृत चैनल होगा। नए बिल में कोई बड़ा कठोर बदलाव नहीं लाया गया है, केवल मौजूदा सिस्टम के साथ काम करने वाला एक समानांतर सिस्टम है। इन बिलों से पहले, किसान अपनी उपज पूरी दुनिया को बेच सकते हैं, लेकिन ई-एनएएम प्रणाली के माध्यम से। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन, जो विरोध के तहत तीन बिलों में से एक है, किसानों के डर को दूर करता है कि किसानों से खरीदने वाले व्यापारियों को ऐसे स्टॉक रखने के लिए दंडित किया जाएगा जो अधिक समझा जाता है और किसानों के लिए नुकसान पहुंचाता है।

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सवालः कानून अच्छे हैं, तो फिर सरकार किसानों को समझाने में विफल क्यों हुई?

उत्तर- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 सितंबर को एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि एमएसपी की व्यवस्था बनी रहेगी और सरकारी खरीद जारी रहेगी। वहीं कृषि मंत्री ने कहा था कि पिछली सरकारों ने वास्तव में एमएसपी के लिए एक कानून लाना अनिवार्य नहीं समझा। मौजूदा एपीएमसी प्रणाली में, किसानों को एक व्यापारी (मंडियों के माध्यम से) के लिए जाना अनिवार्य है ताकि उपभोक्ताओं और कंपनियों को अपनी उपज बेच सकें और उन्हें अपनी उपज के लिए न्यूनतम विक्रय मूल्य प्राप्त हो। यह बहुत ही पुरानी प्रणाली थी जिसने व्यापारियों और असुविधाजनक बाजारों के नेतृत्व में एक कार्टेल के उदय को प्रभावित किया है जिसके कारण किसानों को उनकी उपज के लिए एमएसपी (बहुत कम कीमत) का भुगतान किया जाता है। बावजूद इसके मुझे लगता है सरकार किसानों को कानून के फायदों के संबंध में ठीक से बता नहीं पाई। कुछ भी हो आंदोलन का हल अब निकलना चाहिए।

-जैसा डॉ. रमेश ठाकुर से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा।







गुणवत्ता में सबसे श्रेष्ठ है कश्मीरी केसर, अब पूरी दुनिया में बिखरेगी महक

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  जनवरी 16, 2021   12:52
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गुणवत्ता में सबसे श्रेष्ठ है कश्मीरी केसर, अब पूरी दुनिया में बिखरेगी महक

केसर की खेती बड़ी मेहनत का काम है। कश्मीरी केसर को कश्मीरी मोगरा के नाम से जाना जाता है और सामान्यतः 80 फीसदी फसल अक्टूबर-नवंबर में तैयार हो जाती है। केसर के नीले-बैंगनी रंग के कीपनुमा फूल आते हैं और इनमें दो से तीन नारंगी रंग के तंतु होते हैं।

आतंकवादी गतिविधियों और अशांति का प्रतीक बनी कश्मीर की वादियों की केसर की महक अब देश-दुनिया के देशों में महकेगी। पिछले दिनों यूएई भारत खाद्य सुरक्षा शिखर सम्मेलन में कश्मीरी केसर को प्रस्तुत किया गया है और यूएई में जिस तरह से कश्मीरी केसर को रेस्पांस मिला है उससे आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया सहित दुनिया के देशों में कश्मीरी केसर की अच्छी मांग देखने को मिलेगी। कश्मीरी केसर का दो हजार साल का लंबा इतिहास है और इसे जाफरान के नाम से भी जाना जाता है और खास बात यह है कि केसर को दूध में मिलाकर पीने के साथ ही दूध से बनी मिठाइयों में उपयोग और औषधीय गुण होने के कारण इसकी बहुत अधिक मांग है। जानकारों का कहना है कि केसर में 150 से भी अधिक औषधीय तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर, आर्थराइट्स, अनिद्रा, सिरदर्द, पेट के रोग, प्रोस्टेट, कामशक्ति बढ़ाने जैसे अनेक रोगों में दवा के रूप में उपयोग किया जाता है। प्रेगनेंट महिलाओं को गोरा बच्चा हो इसके लिए केसर का दूध पीने की सलाह भी परंपरागत रूप से दी जाती रही है। यों भी कहा जा सकता है कि मसालों की दुनिया में केसर सबसे महंगे मसाले के रूप में भी उपयोग होता है।

कश्मीर में केसर की खेती को पटरी पर लाने के प्रयासों में तेजी लाई गई है। पिछली जुलाई में ही कश्मीर की केसर को जीआई टैग यानी भौगोलिक पहचान की मान्यता मिल गई है। दरअसल आतंकवादी गतिविधियों के चलते कश्मीर के केसर उत्पादक किसानों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा है। कश्मीर के केसर की दुनिया में अलग ही पहचान रही है। पर आंतकवाद के कारण केसर के बाग उजड़ने लगे तो दुनिया के देशों में कश्मीर के नाम पर अमेरिकन व अन्य देशों की केसर बिकने लगी। कश्मीर की केसर को सबसे अच्छी और गुणवत्ता वाली माना जाता है। हालांकि ईरान दुनिया का सबसे अधिक केसर उत्पादक देश है। वहीं स्पेन, स्वीडन, इटली, फ्रांस व ग्रीस में भी केसर की खेती होती है। पर जो कश्मीर के केसर की बात है वह अन्य देशों की केसर में नहीं है। केसर को जाफरान भी कहते हैं और खास बात यह है कि केसर का पौधा अत्यधिक सर्दी और यहां तक की बर्फबारी को भी सहन कर लेता है। यही कारण है कि कश्मीर में केसर की खेती परंपरागत रूप से होती रही है। पर आतंकवादी गतिविधियों और अशांति के कारण केसर की खेती भी प्रभावित हुई और केसर के खेत बर्बादी की राह पर चल पड़े।

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यह तो सरकार ने जहां एक और कश्मीर में शांति बहाली के प्रयास तेज किए उसके साथ ही कश्मीर की केसर की खेती सहित परंपरागत खेती और उद्योगों को बढ़ावा देने के समग्र प्रयास शुरू किए। सरकार ने केसर के खेती को प्रोत्साहित करने और कश्मीर में 3715 हैक्टेयर क्षेत्र को पुनः खेती योग्य बनाने के लिए 411 करोड़ रु. की परियोजना स्वीकृत की जिसमें से अब तक 2500 हैक्टेयर क्षेत्र का कायाकल्प किया जा चुका है। माना जा रहा है कि इस साल कश्मीर में केसर की बंपर पैदावार हुई है। दरअसल कश्मीर की केसर के नाम पर अमेरिकन केसर बेची जाती रही है। कश्मीर में पुलवामा, पांपोई, बड़गांव, श्रीनगर आदि में केसर की खेती होती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार 300 टन पैदावार की संभावना है तो कश्मीर की केसर बाजार में एक लाख साठ हजार से लेकर तीन हजार रुपए प्रतिकिलो तक के भाव मिलने से किसानों को इसकी खेती में बड़ा लाभ है।

हालांकि केसर की खेती बड़ी मेहनत का काम है। कश्मीरी केसर को कश्मीरी मोगरा के नाम से जाना जाता है और सामान्यतः 80 फीसदी फसल अक्टूबर-नवंबर में तैयार हो जाती है। केसर के नीले-बैंगनी रंग के कीपनुमा फूल आते हैं और इनमें दो से तीन नारंगी रंग के तंतु होते हैं। मेहनत को इसी से समझा जा सकता है कि एक मोटे अनुमान के अनुसार करीब 75 हजार फूलों से 400 ग्राम केसर निकलती है। इसे छाया में सुखाया जाता है। सरकार ने हालिया दिनों में इसकी ग्रेडिंग, पैकेजिंग आदि की सुविधाओं के लिए पंपोर में अंतरराष्ट्रीय स्तर का पार्क विकसित किया है। इस पार्क में केसर को सुखाने और पैकिंग के साथ ही मार्केटिंग की सुविधा भी है जिससे केसर उत्पादक किसानों को सीधा लाभ मिलने लगा है।

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आतंक का पर्याय बने कश्मीर के लिए इसे शुभ संकेत ही माना जाएगा कि कश्मीर पटरी पर आने लगा है और कश्मीरी केसर को जीआई टैग मिलने से विशिष्ट पहचान मिल गई है। केसर के खेतों के कायाकल्प करने के कार्यक्रम को तेजी से क्रियान्वित किया जाता है और पंपोर के केसर पार्क को सही ढंग से संचालित किया जाता है तो कश्मीर की केसर का ना केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि केसर उत्पादक किसानों को नई राह मिलेगी, उनकी आय बढ़ेगी और इस क्षेत्र के युवा भी प्रोत्साहित होंगे। पुलवामा जो आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है वहां के युवा देशविरोधी गतिविधियों से हटकर नई सोच के साथ विकास की धारा से जुड़ेंगे। अब साफ होने लगा है कि इसी तरह से समग्र प्रयास जारी रहे तो आने वाले दिनों में कश्मीर की वादियों की केसर की महक दुनिया के देशों में बिखरेगी और कश्मीर की केसर की मांग बढ़ेगी जिसका सीधा लाभ केसर उत्पादक किसानों को होगा तो कश्मीर की पहचान केसर के नाम पर होगी।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







2026 में होने वाले परिसीमन को देखते हुए नये संसद भवन का निर्माण जरूरी हो गया था

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  जनवरी 15, 2021   12:17
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2026 में होने वाले परिसीमन को देखते हुए नये संसद भवन का निर्माण जरूरी हो गया था

वर्ष 2026 में देश में लोकसभा सीटों के परिसीमन का कार्य होना है, जिसके बाद लोकसभा और राज्यसभा की सीटें बढ़ जाएंगी। परिसीमन का कार्य होने के बाद लोकसभा में सांसदों की संख्या 545 से बढ़कर 700 से ज्यादा हो सकती है। इसी प्रकार राज्यसभा की सीटें भी बढ़ सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट’ को हरी झंडी दिए जाने के बाद नई संसद के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि केवल शिलान्यास के लिए अदालत की मंजूरी के बाद 10 दिसम्बर 2020 को संसद की नई इमारत का शिलान्यास कर दिया गया था लेकिन उसके बाद से नए भवन का निर्माण रूका हुआ था। चूंकि तीन मंजिला नई संसद के निर्माण का मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था, इसलिए सभी की नजरें अदालत के फैसले पर टिकी थी। दरअसल केन्द्र सरकार के इस सेंट्रल विस्टा ड्रीम प्रोजेक्ट को कई याचिकाकर्ताओं ने यह कहते हुए अदालत में चुनौती दी थी कि बगैर उचित कानून पारित किए सरकार द्वारा इस परियोजना को शुरू किया गया और इसके लिए पर्यावरणीय मंजूरी लेने की प्रक्रिया में भी कई खामियां हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि संसद और उसके आसपास की ऐतिहासिक इमारतों को इस परियोजना से नुकसान पहुंचने की आशंका है और हजारों करोड़ रुपये की यह योजना केवल सरकारी धन की बर्बादी ही है।

सरकार का याचिकाओं के जवाब में कहना था कि बदलती जरूरतों के हिसाब से मौजूदा संसद भवन और मंत्रालय अपर्याप्त साबित हो रहे हैं और नए सेंट्रल विस्टा का निर्माण करते हुए पर्यावरण के साथ यह भी ध्यान रखा जाएगा कि हेरिटेज इमारतों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। अदालत में सरकार की ओर से तर्क दिया गया था कि फिलहाल सभी मंत्रालय कई अलग-अलग इमारतों में हैं और अधिकारियों को एक मंत्रालय से दूसरे में जाने के लिए वाहनों का इस्तेमाल करना पड़ता है तथा कुछ मंत्रालयों का किराया देने में ही प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं, इसलिए यह कहना सही नहीं है कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण में सरकारी धन की बर्बादी हो रही है बल्कि धन की बर्बादी रोकने के लिए यह परियोजना जरूरी है। फिलहाल ये मंत्रालय एक-दूसरे से दूर 47 इमारतों से चल रहे हैं जबकि सेंट्रल विस्टा में एक दूसरे से जुड़ी 10 इमारतों में ही 51 मंत्रालय बनाए जाएंगे और इन्हें नजदीकी मैट्रो स्टेशन से जोड़ने के लिए भूमिगत मार्ग भी बनाया जाएगा।

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अदालत ने प्रोजेक्ट को चुनौती देती याचिकाओं पर 5 नवंबर को फैसला सुरक्षित रखा था, साथ ही कहा था कि अदालत इस दलील को खारिज करती है कि सेंट्रल विस्टा में कोई नया निर्माण नहीं हो सकता। अदालत का कहना था कि विचार इस पहलू पर किया जाएगा कि क्या प्रोजेक्ट के लिए सभी कानूनी जरूरतों का पालन किया गया है। अब 5 जनवरी को देश की सर्वोच्च अदालत के तीन जजों की बेंच के 2-1 के बहुमत के फैसले के साथ ही नए संसद भवन के निर्माण को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिल गई है। न्यायमूर्ति खानविलकर और न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने बहुमत में फैसला सुनाया जबकि अल्पमत के फैसले में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने ‘लैंड यूज’ बदलने की प्रक्रिया को कानूनन गलत बताया। अदालत ने अपने फैसले में निर्देश दिया है कि संसद के नए भवन के निर्माण से पहले हेरिटेज कमेटी की मंजूरी ली जाए और निर्माण के दौरान प्रदूषण रोकने के लिए स्मॉग टावर लगाए जाएं।

वर्ष 2026 में देश में लोकसभा सीटों के परिसीमन का कार्य होना है, जिसके बाद लोकसभा और राज्यसभा की सीटें बढ़ जाएंगी। परिसीमन का कार्य होने के बाद लोकसभा में सांसदों की संख्या 545 से बढ़कर 700 से ज्यादा हो सकती है। इसी प्रकार राज्यसभा की सीटें भी बढ़ सकती हैं। मौजूदा लोकसभा में इतने सांसदों के बैठने की व्यवस्था किया जाना असंभव है, ऐसे में समझा जा सकता है कि भविष्य की इन जरूरतों को पूरा करने के लिए नया संसद भवन कितना जरूरी है। संसद की नई इमारत में राज्यसभा का आकार पहले के मुकाबले बढ़ेगा तथा लोकसभा का आकार भी मौजूदा से तीन गुना ज्यादा होगा। नए संसद परिसर में 888 सीट वाली लोकसभा, 384 सीट वाली राज्यसभा और 1224 सीट वाला सेंट्रल हॉल बनाया जाएगा। ऐसे में संसद की संयुक्त बैठक के दौरान सांसदों को अलग से कुर्सी लगाकर बैठाने की जरूरत खत्म हो जाएगी। अभी प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के निवास स्थान राष्ट्रपति भवन से दूर हैं लेकिन नए प्रोजेक्ट में इनके नए निवास भी राष्ट्रपति भवन के नजदीक ही बनाए जाएंगे।

सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी मिलने के बाद अब बहुत जल्द सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत नए संसद परिसर का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा और उम्मीद है कि नया संसद भवन अक्तूबर 2022 तक बनकर तैयार हो जाएगा, जिसके बाद संसद का पुराना भवन प्राचीन धरोहर का हिस्सा बन जाएगा और इसका इस्तेमाल संसदीय आयोजनों के लिए किया जाएगा। संसद की नई इमारत का कार्य करीब 22 माह की अवधि में पूरा होने का अनुमान है और संभावना है कि नवम्बर 2022 से नई संसद में ही लोकसभा तथा राज्यसभा के सत्रों का आयोजन होगा। लोकसभाध्यक्ष ओम बिड़ला के मुताबिक नई इमारत बनाने के लिए परिसर के अंदर ही 8822 वर्ग मीटर खाली जगह उपलब्ध है, ऐसे में नया भवन बनाने के लिए बाहर के किसी भवन को गिराए जाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। नया संसद भवन वर्तमान संसद भवन के पास ही बनना प्रस्तावित है, जो पुरानी इमारत से करीब 17 हजार वर्गमीटर ज्यादा बड़ा होगा और इसके निर्माण कार्य पर करीब 971 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। 64500 वर्गमीटर क्षेत्र में बनने वाले नए संसद भवन में एक बेसमेंट सहित तीन फ्लोर होंगे और इसकी ऊंचाई संसद के मौजूदा भवन के बराबर ही होगी।

मौजूदा संसद भवन में सांसदों की जरूरतों के हिसाब से व्यवस्थाएं नहीं हैं, न ही संसद भवन में उनके कार्यालय हैं। नई संसद में प्रत्येक सांसद को कार्यालय के लिए 40 वर्ग मीटर स्थान उपलब्ध कराया जाएगा और हर ऑफिस सभी आधुनिक डिजिटल तकनीकों से लैस होगा। नई संसद में सांसदों के कार्यालयों को पेपरलेस ऑफिस बनाने के लिए नवीनतम डिजिटल इंटरफेस से लैस किया जाएगा और इन दफ्तरों को अंडरग्राउंड टनल से जोड़ा जाएगा। सदन में प्रत्येक बेंच पर दो सदस्य बैठ सकेंगे और हर सीट डिजिटल प्रणाली तथा टचस्क्रीन से सुसज्जित होगी। नए भवन में कॉन्स्टीट्यूशन हॉल, सांसद लॉज, लाइब्रेरी, कमेटी रूम, भोजनालय और पार्किंग की व्यवस्था होगी और भवन में करीब 1400 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की जाएगी।

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अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाओं से युक्त नए संसद भवन का निर्माण पूर्ण वैदिक रीति से वास्तु के अनुसार किया जाएगा, जो त्रिकोणीय आकार का होगा। भूकम्परोधी तकनीक से बनाया जाने वाला संसद का नया भवन ऊर्जा कुशल होगा, जिसमें सौर प्रणाली से ऊर्जा की बचत होगी। नई संसद वायु और ध्वनि प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त होगी और इसमें रेन हार्वेस्टिंग प्रणाली तथा वाटर रिसाइकलिंग प्रणाली भी होगी। नई संसद में राज्यसभा कक्ष का डिजाइन राष्ट्रीय पुष्प कमल जैसा तथा लोकसभा कक्ष का डिजाइन राष्ट्रीय पक्षी मयूर जैसा होगा। लोकसभा सचिवालय के मुताबिक नया संसद भवन भारत के लोकतंत्र और भारतवासियों के गौरव का प्रतीक होगा, जो न सिर्फ देश के गौरवशाली इतिहास बल्कि इसकी एकता और विविधता का भी परिचय देगा। नए संसद भवन में छह समिति कक्ष होंगे और इस भवन के निर्माण कार्य में दो हजार मजदूर तथा इंजीनियर प्रत्यक्ष तौर पर शामिल होंगे जबकि परोक्ष रूप से नौ हजार से भी ज्यादा लोग जुड़ेंगे। लोकसभाध्यक्ष का कहना है कि संसद का नया भवन केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं होगा बल्कि यह देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों की आकांक्षाओं का भवन होगा, जिसके निर्माण में आगामी सौ वर्षों से अधिक की जरूरतों पर ध्यान दिया जा रहा है।

-योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा समसामयिक मामलों के विश्लेषक हैं।)







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