क्यों हो गया मिजोरम से कांग्रेस का सफाया? क्या वादे पूरे कर पाएगा MNF?

By दिनकर कुमार | Publish Date: Dec 20 2018 12:07PM
क्यों हो गया मिजोरम से कांग्रेस का सफाया? क्या वादे पूरे कर पाएगा MNF?
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कांग्रेस से मिजोरम की जनता कुशासन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, पिछड़ापन आदि वजहों से नाराज थी। राज्य में ठीक से आधारभूत ढांचे का विकास नहीं हो पाया है। अधिकतर सड़कें जर्जर हैं और राज्य को ऊर्जा संकट का भी सामना करना पड़ रहा है।

मिजोरम में हुए विधानसभा चुनाव में मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करते हुए भारी जीत हासिल की है। जिस समय राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस की शोचनीय पराजय के कारणों की पड़ताल कर रहे हैं, उसी समय यह सवाल भी पैदा होता है कि सत्ता की बागडोर संभालने वाला एमएनएफ क्या अपने चुनावी वायदों पर अमल कर पाएगा? जोरमथंगा एमएनएफ के संस्थापक लालडेंगा के सहयोगी रह चुके हैं। 1957 में मिजोरम में भीषण अकाल पड़ा था और केंद्र पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए लालडेंगा ने उग्रवादी संगठन एमएनएफ का गठन कर सशस्त्र संग्राम शुरू कर दिया था। 30 जून 1986 को ऐतिहासिक मिज़ो शांति समझौता हुआ और एमएनएफ को राजनीतिक पार्टी का दर्जा मिला। जोरमथंगा ने लालडेंगा के उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी का नेतृत्व संभाला। वह दस सालों तक (1998-2003 और 2003-2008) मिजोरम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 74 वर्षीय जोरमथंगा को मिज़ो समाज का हितैषी समझा जाता है। उनके ऊपर प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों को भरोसा है। ऐसा उनके अतीत को देखते हुए स्वाभाविक लगता है। अलगाववाद के दौर में वह लालडेंगा के बाद दूसरे सर्वाधिक ताकतवर नेता थे। 1987 में जब एमएनएफ लालडेंगा के नेतृत्व में सत्ता में आई तब जोरमथंगा को वित्त एवं शिक्षा मंत्री बनाया गया। 1990 में जब लालडेंगा का देहांत हो गया तब उनको एमएनएफ का अध्यक्ष चुना गया।
 
 


राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस से मिजोरम की जनता कुशासन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, पिछड़ापन आदि वजहों से नाराज थी। राज्य में ठीक से आधारभूत ढांचे का विकास नहीं हो पाया है। अधिकतर सड़कें जर्जर हैं और राज्य को ऊर्जा संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही राज्य के किसानों को भी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षित बेरोजगारों की तादाद बढ़ती जा रही है और रोजगार का सृजन नहीं हो पाया है।
  
2008 में कांग्रेस ने उस समय एमएनएफ को सत्ता से बेदखल कर दिया था जिस समय मिजोरम के कई हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई थी और लोगों को गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ रहा था। उस समय एमएनएफ प्रमुख जोरमथंगा को अपनी सीट चंफाई नॉर्थ पर शिकस्त खानी पड़ी थी। आज परिदृश्य पूरी तरह विपरीत है। 26 सीटों पर विजय हासिल कर एमएनएफ ने बहुमत की सरकार बना ली है। वहीं जोरमथंगा राज्य के नौवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं।



 
एमएनएफ ने 1998 से 2008 तक मिजोरम पर शासन किया। उसके दूसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में आम लोग उससे नाराज होते गए, चूंकि उसने अपने किसी भी वादे को पूरा नहीं किया। एमएनएफ के खिलाफ जनता का आक्रोश 2007 में सामने आने लगा, जब किसानों के संगठन जोरम कुथनाथाक्तू पाऊल ने राजधानी एजल में विरोध प्रदर्शन किया। किसान बेबस और असहाय हो गए थे चूंकि लगातार दूसरे साल चूहों ने उनकी धान की फसल बर्बाद कर दी थी और उनके सामने फाकाकशी की नौबत आ गई थी। 700 से ज्यादा गांव ‘मौतम’ की चपेट में आ गए थे। मिजोरम में ‘मौतम’ उस परिघटना को कहा जाता है जब पचास साल के अंतराल पर बांस के फूल खिलते हैं और चूहों की तादाद बढ़ जाती है। ये चूहे फसल नष्ट कर देते हैं और अकाल की नौबत आ जाती है। मिजोरम में भीषण खाद्य संकट पैदा हो गया और तत्कालीन एमएनएफ सरकार आम लोगों को राहत देने में सफल नहीं हो पाई।
 


उस समय राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने जोरम कुथनाथाक्तू पाऊल के आंदोलन को अपना समर्थन देते हुए एमएनएफ सरकार के खिलाफ मुहिम को तेज कर दिया।मिज़ो समाज में निर्णायक भूमिका निभाने वाले चर्च ने भी जोरमथंगा सरकार की हरेक मोर्चे पर नाकामी की आलोचना शुरू कर दी। उस समय राज्य में सड़कों की दशा बिगड़ती चली जा रही थी, लेकिन एमएनएफ सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं थी। 2003 से 2008 के बीच राज्य में स्वास्थ्य सेवा की बदहाली चरम तक पहुंच चुकी थी। कुशासन और भ्रष्टाचार के चलते शिक्षा और ऊर्जा क्षेत्र की दशा भी शोचनीय हो चुकी थी। 2004 से 2008 के बीच केंद्र सरकार की तरफ से राज्य को अनुदान के तौर पर जो 3,800 करोड़ रुपए मिले थे, उनकी या तो बंदरबांट हुई थी या उनका कोई उपयोग ही नहीं हुआ था।
 
 
सत्ता में रहते हुए एमएनएफ पर सशस्त्र उग्रवादी संगठनों के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगा था। उस पर आरोप था कि उसने 200 ह्मार युवकों को बहाल कर उग्रवादी संगठन सिनलुंग पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन की स्थापना की थी। उस समय विपक्षी पार्टियों, नागरिक समाज, चर्च और किसानों के असंतोष से निपटने के लिए एमएनएफ सरकार ने जल्दबाज़ी में ख्वाज्वाल और नाथियल नामक दो नए जिलों का सृजन किया था। लेकिन दो नए जिले बनाकर भी वह लोगों के रोष को कम नहीं कर पाई थी।
 
हर मोर्चे पर नाकामी से क्षुब्ध होकर मिजोरम के मतदाताओं ने 2008 के विधानसभा चुनाव में एमएनएफ को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाते हुए कांग्रेस के पक्ष में जनादेश दिया था। कांग्रेस ने कुल 40 विधानसभा सीटों में से 29 सीटों पर जीत हासिल की थी और ललथनहवला दो सीटों पर विजयी हुए थे। अब जोरमथंगा को सुनिश्चित करना होगा कि नई पारी में वह अतीत की गलतियों को नहीं दोहराएंगे और मिजोरम के तमाम राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को हल करेंगे। चुनाव प्रचार के दौरान एमएनएफ ने वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर मिजोरम को खाद्य आपूर्ति के मामले में आत्म निर्भर बनाएगा। 
 
उसने वादा किया था कि पूरे मिजोरम में बांस की खेती को लेकर एक सटीक नीति बनाई जाएगी और सामाजिक मसलों का समाधान किया जाएगा। मिजोरम में ड्रग्स का काफी प्रचलन है। हर साल कई युवा शराब के सेवन के अलावा मादक पदार्थों के सेवन की वजह से भी जान गंवाते रहे हैं। एमएनएफ का वादा है कि डॉक्टरों, समाज सुधारकों, खिलाड़ियों और शिक्षा शास्त्रियों को साथ लेकर सामाजिक मसलों का हल ढूंढा जाएगा और कई राहत केन्द्रों की स्थापना की जाएगी। विजेता दल ने जनता को बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने का भी वादा किया है। आने वाले पांच साल एमएनएफ के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होंगे। उसे मिजोरम की जनता की कसौटी पर खरा उतरना होगा। उसने लोगों से जो वादे किए हैं, उनको निभाकर ही वह आम लोगों का भरोसा जीत सकता है। 
 
-दिनकर कुमार 

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