क्रिकेट 'युवराज' के इन आंकड़ों पर डालिए एक नजर

By दीपक मिश्रा | Publish Date: Jun 13 2019 2:39PM
क्रिकेट 'युवराज' के इन आंकड़ों पर डालिए एक नजर
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90 के दशक के क्रिकेट प्रेमी बता सकते हैं कि युवराज जैसे चैंपियन से बड़ा मैचविनर उन्होंने उस दौर में नहीं देखा था। खैर युवराज वक्त के अनुसार अपना कॅरियर संवार रहे थे। 2007 में जब टी-20 वर्ल्ड कप का आयोजन हुआ। उस समय भारत को चैंपियन बनाने में युवराज सिंह का सबसे बड़ा योगदान था।

भारतीय क्रिकेट को तमाम बुलंदियों तक पहुंचाने वाले युवराज अब अंतराष्ट्रीय क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कह चुके हैं। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से अपना नाम दर्ज कराने वाले युवराज देश के लिए खरा सोना थे। 2007 टी-20 वर्ल्ड कप हो या फिर 2011 वर्ल्ड कप ये युवराज का ही कमाल था जो भारत के सर चैंपियन का ताज सज पाया। अंडर-19 क्रिकेट के वर्ल्ड कप में मैन ऑफ द सीरीज बनने के बाद सीनियर टीम में एंट्री मारने वाले युवराज को भी शायद पता नहीं होगा कि एक वक्त देश की जर्सी में वो ऐसा कमाल कर जाएंगे जिससे इतिहास में उनका नाम क्रिकेट की शोभा बढ़ाएगा। टी-20 में लगातार छह छक्कों की बात हो या फिर सबसे तेज अर्धशतक लगाना युवराज ने ये रिकार्ड दुनियां के सामने रखा जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया। ये युवराज ही थे जिन्होंने 2000 के दशक में टीम इंडिया को सफेद गेंदों में तमाम ऊंचाइयों पर पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। मिडिल आर्डर में लेफ्ट हैंड के इस खिलाड़ी के सामने विश्व क्रिकेट के सभी गेंदबाज थरथराते थे। चाहे वो नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल हो या पाकिस्तान के खिलाफ सफेद जर्सी में टेस्ट मैच में शतक जड़ टीम को हार से बचाना। युवराज ने हर मौके पर अपने आपको साबित किया कि उनसे बड़ा मैच विनर कोई नहीं हो सकता। युवराज केन्या के खिलाफ डेब्यू करने के बाद से ही भारतीय टीम का सबसे अहम हथियार रहे। सफेद गेंद की क्रिकेट में उन्होंने भारत के लिए कई बड़े मुकाम हासिल किए। लेकिन अफसोस सफेद जर्सी में वो अपनी काबिलियत के अनुसार ज्यादा बड़ा हासिल नहीं कर सकें। 


90 के दशक के क्रिकेट प्रेमी बता सकते हैं कि युवराज जैसे चैंपियन से बड़ा मैचविनर उन्होंने उस दौर में नहीं देखा था। खैर युवराज वक्त के अनुसार अपना कॅरियर संवार रहे थे। 2007 में जब टी-20 वर्ल्ड कप का आयोजन हुआ। उस समय भारत को चैंपियन बनाने में युवराज सिंह का सबसे बड़ा योगदान था। युवराज ने उस टूर्नामेंट में 6 छक्के जड़ने के साथ भारत के लिए कई मैच विनिंग पारियां खेली। लेकिन वक्त के साथ युवराज का बल्ला कई मौके पर खामोश पड़ने लगा था। साल 2010 में जब युवराज के वर्ल्ड कप 2011 में खेलने को सवाल उठ रहे थे। उस समय युवी ने ना सिर्फ भारत के लिए टूर्नामेंट में खेला बल्कि जीत के असली सूरमा वहीं बनें। युवराज इस वर्ल्ड कप के मैन ऑफ द सीरीज बनें। इसके साथ ही उन्होंने दुनिया को बता दिया क्रिकेट के मैदान के असली बाजीगर तो वही हैं। हिंदुस्तान वर्ल्ड कप जीत चुका था। जश्न मनाता पूरा देश विश्व क्रिकेट में भारत की बादशाहत की कहानी बयां कर रहा था। लेकिन इसके बाद कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे देश को गहरे सदमें में डाल दिया। क्रिकेट के मैदान में अपने छक्कों से देशवासियों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाले युवराज को कैंसर होना पूरे देश को झकझोर चुका था। क्रिकेट प्रेमी जहां गम के सागर में डूब चुके थे। वहीं दुनिया भर में युवी के ठीक होने की दुआएं मांगी जा रही थी। 
ये वो दौर था जब युवराज को देखकर लग रहा था कि उनके फाइटर वाले अंदाज पर कैंसर भारी ना पड़ जाएं। लेकिन युवी के हौंसले थे जो बीमारी पर भारी पड़ने के मूड में थे। युवराज ने  कैंसर को मानों मैदानी जंग की तरह लिया। युवी ने दिखा दिया कि जंग कोई भी लेकिन असल फाइटर तो वहीं है। युवराज कैंसर से अब ठीक हो चुके थे। पूरा देश खुश था और उनके फिर से मैदान में लौटने की उम्मीद की जा रही थी। युवराज ने वापसी भी की लेकिन उम्र और रफ्तार के बीच वक्त कब बीतता गया उसका पता ही नहीं चला। टीम इंडिया में कई नए खिलाड़ी आ चुके थे। युवाओं ने टीम इंडिया में जगह बनाने के लिए हल्ला बोल दिया था और एक दिन वो वक्त आ ही गया जब क्रिकेट के राजकुमार ने इस खेल को अलविदा कह दिया।


 
युवराज का यूं मैदान छोड़ जाना और फिर कभी नीली जर्सी में दिखना क्रिकेट प्रेमियों के दिल में अलग तरह का दर्द पैदा कर रहा होगा क्योंकि अब उनका चैंपियन फिर से भारत के लिए छक्के लगाते नहीं दिख सकेगा। क्रिकेट के मैदान पर युवराज की मस्ती अब हाईलाइट तक ही सीमित रह जाएगी। लेकिन ये देश और सभी क्रिकेट प्रेमी युवराज के क्रिकेट में सुनहरे योगदान को कभी नहीं भूल पाएंगे।
 
- दीपक मिश्रा


 

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