PMI कैसे डालता है किसी देश की अर्थव्यवस्था पर असर ? कैसे होती है इसकी गणना ?

PMI कैसे डालता है किसी देश की अर्थव्यवस्था पर असर ? कैसे होती है इसकी गणना ?

कहना ना होगा कि पीएमआई दुनिया भर में कारोबारी गतिविधियों के लिए सबसे ज्यादा देखा जाने वाला सूचकांक है। जिस पर कोई भी कंपनी अपनी पीएमआई आंकड़ों को स्‍पॉर्सर के नाम के साथ ही प्रदर्शित करती है।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए उसके पीएमआई पर गौर फरमाना होता है। पीएमआई मतलब पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स। साफ शब्दों में कहें तो यह मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर की आर्थिक सेहत को मापने का एक इंडिकेटर है, जिसके जरिए किसी भी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन करना विशेषज्ञों के लिए आसान हो जाता है।

दरअसल, पीएमआई सेवा क्षेत्र समेत निजी क्षेत्र की अनेक गतिविधियों पर आधारित होता है, जिसमें शामिल लगभग सभी देशों की तुलना एक जैसे मापदंड पर ही आधारित होती है। मसलन, पीएमआई का मुख्‍य उद्देश्य अर्थव्यवस्था के बारे में पुष्‍ट जानकारी को आधिकारिक आंकड़ों से भी पहले उपलब्‍ध कराना है, जिससे उसके इकोनॉमी के बारे में सटीक संकेत पहले ही मिल जाते हैं। 

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आम तौर पर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का पीएमआई 5 प्रमुख कारकों पर आधारित होता है, जिनमें नए ऑर्डर, इन्‍वेंटरी स्‍तर, प्रोडक्‍शन, सप्‍लाई डिलिवरी और रोजगार वातावरण शामिल हैं। अमूमन, बिजनेस और मैन्युफैक्चरिंग माहौल का पता लगाने के लिए ही पीएमआई का सहारा लिया जाता है। बता दें कि पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्‍स को 1948 में अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सप्लाई मैनेजमेंट यानी आईएसएम ने शुरू किया, जो कि सिर्फ अमेरिका के लिए काम करती है। जबकि इससे जुड़ा मार्किट ग्रुप दुनिया के अन्‍य देशों के लिए भी काम करती है। इस प्रकार यह 30 से भी ज्‍यादा देशों में करती है। 

कहना ना होगा कि पीएमआई दुनिया भर में कारोबारी गतिविधियों के लिए सबसे ज्यादा देखा जाने वाला सूचकांक है। जिस पर कोई भी कंपनी अपनी पीएमआई आंकड़ों को स्‍पॉर्सर के नाम के साथ ही प्रदर्शित करती है। फिलवक्त, निक्‍केई पीएमआई आंकड़ों के आधार पर भारत में अर्थव्यवस्था की दिशा का अनुमान लगाया जाता है। जबकि, इससे पहले यही आंकड़ें एचएसबीसी पीएमआई के नाम से जारी होते थे। 

जानिए कैसे काम करता है पीएमआई और क्या क्या हैं इसके फायदे 

वास्तव में, परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई एक मिश्रित सूचकांक होता है जिसका उपयोग मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की स्पष्ट स्थिति का आकलन करने के लिए ही किया जाता है। दरअसल, यह अलग-अलग कारोबारी पहलुओं पर मैनेजरों की राय के आधार पर तैयार होता है, जिसमें हजारों मैनेजरों से उनके उत्पाद, नए ऑर्डर, उद्योग की उम्मीदों एवं आशंकाओं और रोजगार से जुड़ी हुई अद्यतन राय ली जाती है। इसके साथ ही मैनेजरों से पिछले माह की तुलना में नई स्थिति पर राय और रेटिंग देने के लिए कहा जाता है, जिसके आधार पर इसको प्रत्येक माह जारी किया जाता है। इसकी मासिक रिपोर्ट का इंतजार हर किसी को होता है, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था व कारोबार की स्थिति का स्पष्ट आभास मिल जाता है।

दरअसल, पीएमआई आंकड़ों में 50 को ही आधार माना गया है, जिसको जादुई आंकड़ा भी माना जाता है। वहीं, 50 से ऊपर के पीएमआई आंकड़े को कारोबारी गतिविधियों के विस्तार के तौर पर देखा जाता है, जबकि 50 से नीचे के आंकड़े को कारोबारी गतिविधियों में गिरावट के तौर पर देखा जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि 50 से ऊपर या नीचे के पीएमआई आंकड़ों में जितना अंतर होगा, कारोबारी गतिविधि में भी क्रमश: उतनी ही वृद्धि और कमी मानी जाएगी।

देखिए, ऐसे निकालते हैं पीएमआई और पता करते हैं ग्रोथ या स्लो डाउन की स्थिति

दरअसल, भारत में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के लिए पीएमआई का आंकड़ा ही लिया जाता है। इस प्रकार सर्विस पीएमआई में छह उद्योगों को शामिल किया जाता है, जिसमें ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन, फाइनेंशियल इंटरमीडिएशन, बिजनेस सर्विसेज, पर्सनल सर्विसेज, कंप्यूटिंग एंड आईटी और होटल्स व रेस्टोरेंट शामिल हैं। अमूमन, पीएमआई के आकलन के लिए इन इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों के मैनेजरों को सर्वे के सवाल भेजे जाते हैं। जिसे कंपनी की साइज के हिसाब से इनके जवाब को वेटेज दिया जाता है।  

वहीं, इन सवालों के जवाब से पता लगाया जाता है कि इंडस्ट्री की हालत सामान्य है, खराब है या फिर अच्छी है। जबकि, वेटेज फीसदी में होते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि यदि हालात अच्छे हैं तो एक फीसदी का वेटेज मिलता है। जबकि आलम में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो आधा फीसदी और गिरावट की स्थिति में शून्य फीसदी की वेटेज दी जाती है। दरअसल, यह आकलन इस तरह किया जाता है जिसमें 50 का लेवल सिर्फ सामान्य स्थिति कहलाता है, यानी कि गतिविधियों में कोई परिवर्तन नहीं है। जबकि, इससे ऊंची रैंकिंग ग्रोथ में इजाफे को दर्शाती है, जिसकी कामना हरेक देश की अर्थव्यवस्था को होती है। वहीं, 50 से नीचे की स्थिति कारोबारी गतिविधियों में स्लोडाउन की स्थिति को दर्शाती है, जिससे उबरना हर देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक यक्ष प्रश्न की तरह होता है।

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जहां तक 'मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर' का सवाल है तो सर्वे के लिए प्रश्नावली '500 मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों' के परचेजिंग मैनेजरों को भेजा जाता है। हालांकि, फाइनल इंडेक्स, कंपोजिट इंडेक्स होता है जो पांच संकेतकों को दर्शाता है। जो कि पूर्व निर्धारित वेटेज के आधार पर तय होते हैं, उनमें न्यू ऑर्डर इंडेक्स, आउटपुट इंडेक्स, इंप्लॉयमेंट इंडेक्स, सप्लायर्स डिलीवरी टाइम्स इंडेक्स और स्टॉक ऑफ आइटम्स परचेज इंडेक्स शामिल हैं। 

वहीं, सर्विस पीएमआई की तरह ही मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी हर इंडेक्स सकारात्मक जवाब और आधे फीसदी के वेटेज का जोड़ होता है। इसके लिए कंपनियों और उनके परचेजिंग मैनेजरों का फाइनल पैनल देश भर में फैले उद्योगों के परचेजिंग मैनजर्स में से चुना जाता है। वास्तव में, इसमें 50 का आंकड़ा किसी भी परिवर्तन को सूचित नहीं करता, लेकिन 50 के ऊपर का आंकड़ा अर्थव्यवस्था में सुधार की स्थिति दर्शाता है। जिसकी परिकल्पना हर दूरदर्शी देश करता रहता है।

जानिए, क्या है पीएमआई और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर यह कैसे डालता है असर, मत रहिए बेखबर 

पीएमआई की प्रासंगिकता यही है कि पीएमआई सूचकांक को ही मुख्य सूचकांक माना जाता है। यह किसी खास सेक्टर में आगे की स्थिति का संकेत हमें देता है। चूंकि यह सर्वे मासिक आधार पर होता है, लिहाजा इससे आय में बढ़ोत्तरी का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियों में उछाल आएगा या नहीं। यह बात दीगर है कि यह सवालों के वास्तविक जवाब पर निर्भर करता है।  

वैसे भी तिमाही आधार पर इन जवाबों का विश्लेषण किया जाता है। इसलिए, जो लोग इंडस्ट्री का अहम हिस्सा बन चुके हैं, या बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाह रहे हैं, उनके लिए पीएमआई काफी महत्वपूर्ण सूचकांक है। देखा जाए तो पीएमआई हमारी अर्थव्यवस्था में सेंटिमेंट को भी दर्शाता है। लिहाजा, इसका बेहतर होना हमारी अर्थव्यवस्था में उत्साह का संचार करता है। वाकई, अर्थव्यवस्था पर इसका असर आमतौर पर महीने की शुरुआत में ही होता है, जब पीएमआई आंकड़ा जारी होता है, जिसे जीडीपी वृद्धि दर से पहले जारी किया जाता है। 

बताते चलें कि कई देशों के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर फैसला करने के लिए भी शीर्ष अधिकारी इस सूचकांक की मदद लेते हैं। क्योंकि अच्छे पीएमआई आंकड़े बताते हैं कि सम्बन्धित देश में आर्थिक हालात सुधर रहे हैं और अर्थव्यवस्था में मांग निरंतर बढ़ रही है, जिसकी वजह से कंपनियों को ज्यादा सामान बनाने के ऑर्डर मिलते हैं। इस प्रकार यदि कंपनियों का उत्पादन बढ़ता है तो लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।  

खास बात यह कि पीएमआई का देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है। इसलिए अर्थशास्त्री भी पीएमआई आंकड़ों को मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का अच्छा संकेतक मानते हैं। वहीं, वित्तीय बाजार में भी पीएमआई की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। क्योंकि, परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स ही वह आंकड़ा होता है जो कंपनियों की आय का स्पष्ट संकेत देता है। इसी वजह से बांड बाजार और निवेशक दोनों ही इस सूचकांक पर लगातार नजर रखते हैं। 

वास्तव में, इसके आधार पर ही निवेशक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने का फैसला करते हैं। आपको पता ही है कि भूमंडलीकरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था के समसामयिक दौर में देशी-विदेशी निवेश की ओर टकटकी प्रायः हर देश लगाए बैठा रहता है, लेकिन जिसकी पीएमआई अच्छी होती है, वही निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होता है।

-कमलेश पांडेय

(वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार)